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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

श्लोक २२ ]

  • साधक-संजीवनी *

७६३

रहे हैं (जो सभी विराटरूपके ही अंग हैं); परन्तु अर्जुनको ऐसा लग रहा है कि वे विराटरूप भगवान्को देखकर ही भयभीत होकर स्तुति कर रहे हैं। 'स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घा: स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभि:

पुष्कलाभि: '—सप्तर्षियों, देवर्षियों, महर्षियों, सनकादिकों और देवताओंके द्वारा स्वस्तिवाचन (कल्याण हो! मंगल हो!) हो रहा है और बड़े उत्तम-उत्तम स्तोत्रोंके द्वारा आपकी स्तुतियाँ हो रही हैं।

परिशिष्ट भाव—देवता, महर्षि, सिद्ध आदि सब भगवान्के ही विराटरूपके अंग हैं। अतः प्रविष्ट होनेवाले, भयभीत होनेवाले, भगवान्के नामों और गुणोंका कीर्तन करनेवाले तथा स्तुति करनेवाले भी भगवान् हैं और जिनमें प्रविष्ट हो रहे हैं, जिनसे भयभीत हो रहे हैं, जिनके नामों और गुणोंका कीर्तन कर रहे हैं और जिनकी स्तुति कर रहे हैं, वे भी भगवान् हैं। यह भगवान्के सगुण रूपकी विलक्षणता है!

रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च । गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ॥ २२ ॥

ये =जो रुद्रादित्या: =ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, वसव: =आठ वसु, साध्या: =बारह साध्यगण, विश्वे =दस विश्वेदेव च =और अश्विनौ =दो अश्विनीकुमार,

च =तथा मरुत: =उनचास मरुद्गण च =और ऊष्मपा: =गरम-गरम भोजन करनेवाले (सात पितृगण) च =तथा

गन्धर्वयक्षासुर- सिद्धसङ्घा: =गन्धर्व, यक्ष, असुर और सिद्धोंके समुदाय हैं, सर्वे, एव =(वे) सभी विस्मिता: =चकित होकर त्वाम् =आपको वीक्षन्ते =देख रहे हैं।

व्याख्या—'रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च'—ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, आठ वसु, दो अश्विनीकुमार और उनचास मरुद्गण—इन सबके नाम इसी अध्यायके छठे श्लोककी व्याख्यामें दिये गये हैं, इसलिये वहाँ देख लेना चाहिये। मन, अनुमन्ता, प्राण, नर, यान, चित्ति, हय, नय, हंस, नारायण, प्रभव और विभु—ये बारह 'साध्य' हैं (वायुपुराण, छाछठवाँ अध्याय, पन्द्रहवाँ-सोलहवाँ श्लोक)। क्रतु, दक्ष, श्रव, सत्य, काल, काम, धुनि, कुरुवान्, प्रभवन् और रोचमान—ये दस 'विश्वेदेव' हैं (वायुपुराण, छाछठवाँ अध्याय, इकतीसवाँ-बत्तीसवाँ श्लोक)। कव्यवाह, अनल, सोम, यम, अर्यमा, अग्निष्वात और बर्हिषत्—ये सात 'पितर' हैं (शिवपुराण, धर्म० तिरसठवाँ अध्याय, दूसरा श्लोक)। ऊष्म अर्थात् गरम अन्न खानेके कारण पितरोंका नाम 'ऊष्मपा' है। 'गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा: '—कश्यपजीकी पत्नी मुनि और प्राधासे तथा अरिष्टासे गन्धर्वोंकी उत्पत्ति हुई है। गन्धर्वलोग राग-रागिनियोंकी विद्यामें बड़े चतुर हैं। ये स्वर्गलोकके गायक हैं। कश्यपजीकी पत्नी खसासे यक्षोंकी उत्पत्ति हुई है। देवताओंके विरोधी* दैत्यों, दानवों और राक्षसोंको असुर कहते हैं। कपिल आदिको सिद्ध कहते हैं। 'वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे'—उपर्युक्त सभी देवता, पितर, गन्धर्व, यक्ष आदि चकित होकर आपको देख रहे हैं। ये सभी देवता आदि विराटरूपके ही अंग हैं।

परिशिष्ट भाव—रुद्र, आदित्य, वसु, साध्यगण, विश्वेदेव आदि सब-के-सब एक भगवान्के समग्ररूपके ही अंग हैं। अतः देखनेवाले और दीखनेवाले सभी एक परमात्मा ही हैं।

सम्बन्ध—अब अर्जुन आगेके तीन श्लोकोंमें विश्वरूपके महान् विकराल रूपका वर्णन करके उसका परिणाम बताते हैं।

  • यहाँ आये 'असुर' शब्दमें 'नञ्' समास है—'न सुरा असुरा:'। अतः यहाँ 'असुर' शब्द देवताओंके विरोधीका वाचक है।

७६४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ११

रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरूपादम्।

बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम्॥ २३॥

महाबाहो = हे महाबाहो! ते = आपके बहुवक्त्र- नेत्रम् = बहुत मुखों और नेत्रोंवाले, बहुबाहूरूपादम् = बहुत भुजाओं, जंघाओं और चरणोंवाले, बहूदरम् = बहुत उदरोंवाले (और) बहुदंष्ट्रा- करालम् = बहुत विकराल दाढ़ोंवाले महत् = महान् रूपम् = रूपको दृष्ट्वा = देखकर लोकाः = सब प्राणी प्रव्यथिताः = व्यथित हो रहे हैं तथा = तथा अहम् = मैं भी (व्यथित हो रहा हूँ)।

व्याख्या—[पन्द्रहवेंसे अठारहवें श्लोकतक विश्वरूपमें 'देव'-रूपका, उन्नीसवेंसे बाईसवें श्लोकतक 'उग्र'-रूपका और तेईसवेंसे तीसवें श्लोकतक 'अत्यन्त उग्र'-रूपका वर्णन हुआ है।] 'बहुवक्त्रनेत्रम्'—आपके मुख एक-दूसरेसे नहीं मिलते। कई मुख सौम्य हैं और कई विकराल हैं। कई मुख छोटे हैं और कई बड़े हैं। ऐसे ही आपके जो नेत्र हैं, वे भी सभी एक समान नहीं दीख रहे हैं। कई नेत्र सौम्य हैं और कई विकराल हैं। कई नेत्र छोटे हैं, कई बड़े हैं, कई लम्बे हैं, कई चौड़े हैं, कई गोल हैं, कई टेढ़े हैं, आदि-आदि। 'बहुबाहूरूपादम्'—हाथोंकी बनावट, वर्ण, आकृति और उनके कार्य विलक्षण-विलक्षण हैं। जंघाएँ विचित्र-विचित्र हैं और चरण भी तरह-तरहके हैं। 'बहूदरम्'—पेट भी एक समान नहीं हैं। कोई बड़ा, कोई छोटा, कोई भयंकर आदि कई तरहके पेट हैं। 'बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम्'—मुखोंमें बहुत प्रकारकी विकराल दाढ़ें हैं। ऐसे महान् भयंकर, विकराल रूपको देखकर सब प्राणी व्याकुल हो रहे हैं और मैं भी व्याकुल हो रहा हूँ। इस श्लोकसे पहले कहे हुए श्लोकोंमें भी अनेक मुखों, नेत्रों आदिकी और सब लोगोंके भयभीत होनेकी बात आयी है। अतः अर्जुन एक ही बात बार-बार क्यों कह रहे हैं? इसका कारण है कि—(१) विराट् रूपमें अर्जुनकी दृष्टिके सामने जो-जो रूप आता है, उस-उसमें उनको नयी-नयी विलक्षणता और दिव्यता दीख रही है।

(२) विराट् रूपको देखकर अर्जुन इतने घबरा गये, चकित हो गये, चक्रा गये, व्यथित हो गये कि उनको यह ख्याल ही नहीं रहा कि मैंने क्या कहा और मैं क्या कह रहा हूँ। (३) पहले तो अर्जुनने तीनों लोकोंके व्यथित होनेकी बात कही थी, पर यहाँ सब प्राणियोंके साथ-साथ स्वयंके भी व्यथित होनेकी बात कहते हैं। (४) एक बातको बार-बार कहना अर्जुनके भयभीत और आश्चर्यचकित होनेका चिह्न है। संसारमें देखा भी जाता है कि जिसको भय, हर्ष, शोक, आश्चर्य आदि होते हैं, उसके मुखसे स्वाभाविक ही किसी शब्द या वाक्यका बार-बार उच्चारण हो जाता है; जैसे—कोई साँपको देखकर भयभीत होता है तो वह बार-बार 'साँप! साँप! साँप!' ऐसा कहता है। कोई सज्जन पुरुष आता है तो हर्षमें भरकर कहते हैं—'आइये! आइये! आइये!' कोई प्रिय व्यक्ति मर जाता है तो शोकाकुल होकर कहते हैं—'मैं मारा गया! मारा गया! घरमें अँधेरा हो गया, अँधेरा हो गया!' अचानक कोई आफत आ जाती है तो मुखसे निकलता है—'मैं मरा! मरा! मरा!' ऐसे ही यहाँ विश्वरूप-दर्शनमें अर्जुनके द्वारा भय और हर्षके कारण कुछ शब्दों और वाक्योंका बार-बार उच्चारण हुआ है। अर्जुनने भय और हर्षको स्वीकार भी किया है—'अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे' (११।४५)। तात्पर्य यह कि भय, हर्ष, शोक आदिमें एक बातको बार-बार कहना पुनरुक्ति-दोष नहीं माना जाता।

परिशिष्ट भाव—दीखनेवाले और देखनेवाले, व्यथित करनेवाले और व्यथित होनेवाले सब प्राणी और स्वयं अर्जुन भी भगवान्के विराट् रूपके अन्तर्गत ही हैं।

श्लोक २४ ]

  • साधक-संजीवनी *

७६५

नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् । दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥ २४ ॥

हि= क्योंकिव्यात्ताननम्= आपका मुख फैला हुआ है,प्रव्यथितान्तरात्मा= भयभीत
विष्णो= हे विष्णो ! (आपके)दीप्तविशाल-अन्तःकरणवाला
दीप्तम्= देदीप्यमाननेत्रम्= आपके नेत्र प्रदीप्त और विशाल हैं ।(में)
अनेकवर्णम्= अनेक वर्ण हैं,त्वाम्= (ऐसे) आपकोधृतिम्= धैर्य
नभःस्पृशम्= आप आकाशको स्पर्श कर रहे हैंदृष्ट्वा= देखकर= और
अर्थात् सब तरफसे बहुत बड़े हैं,शमम्= शान्तिको
न, विन्दामि= प्राप्त नहीं हो रहा हूँ ।

व्याख्या—[बीसवें श्लोकमें तो अर्जुने विराट् रूपकी लम्बाई-चौड़ाईका वर्णन किया, अब यहाँ केवल लम्बाईका वर्णन करते हैं ।]

‘विष्णो’—आप साक्षात् सर्वव्यापक विष्णु हैं, जिन्होंने पृथ्वीका भार दूर करनेके लिये कृष्णरूपसे अवतार लिया है।

‘दीप्तमनेकवर्णम्’—आपके काले, पीले, श्याम, गौर आदि अनेक वर्ण हैं, जो बड़े ही देदीप्यमान हैं।

‘नभःस्पृशम्’—आपका स्वरूप इतना लम्बा है कि वह आकाशको स्पर्श कर रहा है।

वायुका गुण होनेसे स्पर्श वायुका ही होता है, आकाशका नहीं। फिर यहाँ आकाशको स्पर्श करनेका तात्पर्य क्या है? मनुष्यकी दृष्टि जहाँतक जाती है, वहाँतक तो उसको आकाश दीखता है, पर उसके आगे कालापन दिखायी देता है। कारण कि जब दृष्टि आगे नहीं जाती, थक जाती है, तब वह वहाँसे लौटती है, जिससे आगे कालापन दीखता है। यही दृष्टिका आकाशको स्पर्श करना है। ऐसे ही अर्जुनकी दृष्टि जहाँतक जाती है, वहाँतक उनको भगवान्का विराट् रूप दिखायी देता है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि भगवान्का विराट् रूप असीम है, जिसके सामने दिव्यदृष्टि भी सीमित ही है।

‘व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्’—जैसे कोई भयानक जन्तु किसी जन्तुको खानेके लिये अपना मुख फैलाता है, ऐसे ही मात्र विश्वको चट करनेके लिये आपका मुख फैला हुआ दीख रहा है।

आपके नेत्र बड़े ही देदीप्यमान और विशाल दीख रहे हैं।

‘दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि

शमं च विष्णो’—इस तरह आपको देखकर मैं भीतरसे बहुत व्यथित हो रहा हूँ। मेरेको कहींसे भी धैर्य नहीं मिल रहा है और शान्ति भी नहीं मिल रही है।

यहाँ एक शंका होती है कि अर्जुनमें एक तो खुदकी सामर्थ्य है और दूसरी, भगवत्प्रदत्त सामर्थ्य (दिव्यदृष्टि) है। फिर भी अर्जुन तो विश्वरूपको देखकर डर गये, पर संजय नहीं डरे। इसमें क्या कारण है? सन्तोसे ऐसा सुना है कि भीष्म, विदुर, संजय और कुन्ती—ये चारों भगवान् श्रीकृष्णके तत्त्वको विशेषतासे जाननेवाले थे। इसलिये संजय पहलेसे ही भगवान्के तत्त्वको, उनके प्रभावको जानते थे, जब कि अर्जुन भगवान्के तत्त्वको उतना नहीं जानते थे। अर्जुनका विमूढ़भाव (मोह) अभी सर्वथा दूर नहीं हुआ था (गीता—ग्यारहवें अध्यायका उन्चासवाँ श्लोक)। इस विमूढ़भावके कारण अर्जुन भयभीत हुए। परन्तु संजय भगवान्के तत्त्वको जानते थे अर्थात् उनमें विमूढ़भाव नहीं था; अतः वे भयभीत नहीं हुए।

उपर्युक्त विवेचनसे एक बात सिद्ध होती है कि भगवान् और महापुरुषोंकी कृपा विशेषरूपसे अयोग्य मनुष्योंपर होती है, पर उस कृपाको विशेषरूपसे योग्य मनुष्य ही जानते हैं। जैसे, छोटे बच्चेपर माँका अधिक स्नेह होता है, पर बड़ा लड़का माँको जितना जानता है, उतना छोटा बच्चा नहीं जानता। ऐसे ही भोले-भाले, सीधे-सादे ब्रजवासी, ग्वालबाल, गोप-गोपी और गाय—इनपर भगवान् जितना अधिक स्नेह करते हैं, उतना स्नेह जीवन्मुक्त महापुरुषोंपर नहीं करते। परन्तु जीवन्मुक्त महापुरुष ग्वालबाल आदिकी अपेक्षा भगवान्को विशेषरूपसे जानते हैं। संजयने विश्वरूपके लिये प्रार्थना भी नहीं की और विश्वरूपको देख लिया। परन्तु विश्वरूप देखनेके लिये अर्जुनको स्वयं

७६६ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय ११

भगवान्ने ही उत्कण्ठित किया और अपना विश्वरूप भी दिखाया; क्योंकि संजयकी अपेक्षा भगवान्के तत्त्वको जाननेमें अर्जुन छोटे थे और भगवान्के साथ सखाभाव रखते थे। इसलिये अर्जुनपर भगवान्की कृपा अधिक थी। इस कृपाके कारण अन्तमें अर्जुनका मोह नष्ट हो गया—'नष्टो मोहः ....... त्वत्प्रसादात्' (गीता १८।७३)। इससे सिद्ध होता है कि कृपापात्रका मोह अन्तमें नष्ट हो ही जाता है।

परिशिष्ट भाव—यहाँ आया 'नभःस्पृशम्' पद विराटरूपकी अनन्तताका द्योतक है। अर्जुनकी दृष्टि जहाँतक जाती है, वहाँतक उनको विराटरूप ही दीखता है—'सा काष्ठा सा परा गतिः' (कठ० १।३।११) अर्थात् वह परमात्मा सबकी परम अवधि और परम गति है।

दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि। दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ २५ ॥

ते = आपके, कालानल-सन्निभानि = प्रलयकालकी अग्निके समान, प्रज्वलित = और, दंष्ट्राकरालानि = दाढ़ोंके कारण विकराल (भयानक), मुखानि = मुखोंको, दृष्ट्वा = देखकर, (मुझे), न = न तो, दिशः = दिशाओंका, जाने = ज्ञान हो रहा है, च = और, न = न, शर्म = शान्ति, एव = ही, लभे = मिल रही है। (इसलिये), देवेश = हे देवेश!, जगन्निवास = हे जगन्निवास!, प्रसीद = (आप) प्रसन्न होइये।

व्याख्या—'दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि'—महाप्रलयके समय सम्पूर्ण त्रिलोकीको भस्म करनेवाली जो अग्नि प्रकट होती है, उसे संवर्तक अथवा कालाग्नि कहते हैं। उस कालाग्निके समान आपके मुख हैं, जो भयंकर-भयंकर दाढ़ोंके कारण बहुत विकराल हो रहे हैं। उनको देखनेमात्रसे ही बड़ा भय लग रहा है। अगर उनका कार्य देखा जाय तो उसके सामने किसीका टिकना ही मुश्किल है।

'दिशो न जाने न लभे च शर्म'—ऐसे विकराल मुखोंको देखकर मुझे दिशाओंका भी ज्ञान नहीं हो रहा है। इसका तात्पर्य है कि दिशाओंका ज्ञान होता है सूर्यके उदय और अस्त होनेसे। पर वह सूर्य तो आपके नेत्रोंकी जगह है अर्थात् वह तो आपके विराटरूपके अन्तर्गत आ गया है। इसके सिवाय आपके चारों ओर महान् प्रज्वलित प्रकाश-ही-प्रकाश दीख रहा है (ग्यारहवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक), जिसका न उदय और न अस्त हो रहा है। इसलिये मेरेको दिशाओंका ज्ञान नहीं हो रहा है और विकराल मुखोंको देखकर भयके कारण मैं किसी तरहका सुख और शान्ति भी प्राप्त नहीं कर रहा हूँ।

'प्रसीद देवेश जगन्निवास'—आप सब देवताओंके मालिक हैं और सम्पूर्ण संसार आपमें ही निवास कर रहा है। अतः कोई भी देवता, मनुष्य भयभीत होनेपर आपको ही पुकारेगा! आपके सिवाय और किसको पुकारेगा? तथा और कौन सुनेगा? इसलिये मैं भी आपको पुकारकर कह रहा हूँ कि हे देवेश! हे जगन्निवास! आप प्रसन्न होइये।

भगवान्के विकराल रूपको देखकर अर्जुनको ऐसा लगा कि भगवान् मानो बड़े क्रोधमें आये हुए हैं। इस भावनाको लेकर ही भयभीत अर्जुन भगवान्से प्रसन्न होनेके लिये प्रार्थना कर रहे हैं।

परिशिष्ट भाव—भगवान् तो प्रसन्न होकर ही अर्जुनको अपना विराटरूप दिखा रहे हैं (गीता—इसी अध्यायका सैंतालीसवाँ श्लोक), पर उनके रूपकी उग्रताको देखकर अर्जुनको यह वहम हो रहा है कि भगवान् अप्रसन्न हैं। इसलिये वे भगवान्से प्रसन्न होनेके लिये प्रार्थना करते हैं।

सम्बन्ध—अब अर्जुन आगेके दो श्लोकोंमें मुख्य-मुख्य योद्धाओंका विराटरूपमें प्रवेश होनेका वर्णन करते हैं।

श्लोक २६-२७ ]

  • साधक-संजीवनी *

७६७

अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहेवावनपालसङ्घैः । भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः ॥ २६ ॥ वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि । केचिद्विलग्ना दशानान्तेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः ॥ २७ ॥

अस्मदीयैः= हमारे पक्षकेअवनपाल-भयानकानि= भयंकर
योधमुख्यैः= मुख्य-मुख्य
योद्धाओंकेसङ्घैः= राजाओंके
समुदायोंकेवक्त्राणि= मुखोंमें
सह= सहितसह= सहितत्वरमाणाः= बड़ी तेजीसे
भीष्मः= भीष्म,धृतराष्ट्रस्य= धृतराष्ट्रकेविशन्ति= प्रविष्ट हो रहे हैं।
द्रोणः= द्रोणअमी= वेकेचित्= (उनमेंसे) कई-
तथा= औरएव= हीएक तो
असौ= वहसर्वे= सब-के-सबचूर्णितैः= चूर्ण हुए
सूतपुत्रः= कर्णपुत्राः= पुत्रउत्तमाङ्गैः= सिरोंसहित
अपि= भीते= आपकेदशानान्तेषु= (आपके) दांतोंके
त्वाम्= आपमेंदंष्ट्राकरालानि= विकराल दाढ़ोंकेविलग्नाः= बीचमें
(प्रविष्ट हो रहे हैं)कारणसन्दृश्यन्ते= फँसे हुए
= दीख रहे हैं।

व्याख्या —‘भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः’—हमारे पक्षके धृष्टद्युम्न, विराट, हुपद आदि जो मुख्य-मुख्य योद्धालोग हैं, वे सब-के-सब धर्मके पक्षमें हैं और केवल अपना कर्तव्य समझकर युद्ध करनेके लिये आये हैं। हमारे इन सेनापतियोंके साथ पितामह भीष्म,

आचार्य द्रोण और वह प्रसिद्ध सूतपुत्र कर्ण आपमें प्रविष्ट हो रहे हैं।

यहाँ भीष्म, द्रोण और कर्णका नाम लेनेका तात्पर्य है कि ये तीनों ही अपने कर्तव्यका पालन करनेके लिये युद्धमें आये थे*।

  • भीष्म—भीष्मजीकी प्रतिज्ञा दुनियामें प्रसिद्ध है कि उन्होंने पिताजीकी प्रसन्नताके लिये विवाह न करनेकी प्रतिज्ञा की और आबाल ब्रह्मचारी रहे। इस प्रतिज्ञापर वे इतने डटे रहे कि उन्होंने गुरु परशुरामजीके साथ युद्ध किया, पर अपनी प्रतिज्ञा नहीं तोड़ी। भगवान्ने पहले हाथमें शस्त्र ग्रहण न करनेकी प्रतिज्ञा की थी। परन्तु जब भीष्मजीने (भगवान्की प्रतिज्ञाके विरुद्ध) यह प्रतिज्ञा कर ली कि ‘आजु जो हरिहि न शस्त्र गृह्णाऊँ। तौ लाजौ गंगा जननीको शान्तनु-सुत न कहहाऊँ॥’ तो भगवान्को भी अपनी प्रतिज्ञा छोड़कर एक बार चाबुक और दूसरी बार चक्र लेकर भीष्मजीकी तरफ दौड़ना पड़ा। इस तरह भीष्मकी प्रतिज्ञा बनी रही और भगवान्की प्रतिज्ञा टूट गयी!

द्रोण—द्रोणाचार्य दुर्वाधनका अन्न खाकर उसके वृत्तिभोगी रहे हैं। इसलिये वे युद्धको अपना कर्तव्य समझकर युद्धमें लग जाते हैं और अन्तमें देवताओंकी बातें सुनकर और युद्धमें अपने ब्राह्मणोचित धर्मको समझकर युद्धसे उपरत हो जाते हैं।

द्रोणाचार्यमें इतनी निष्पक्षता थी कि गुरुभक्त और विद्यामें तत्पर अर्जुनको ब्रह्मास्त्र छोड़ना और उसका उपसंहार करना (वापस लेना)—ये दो विद्याएँ सिखा दीं; परन्तु अपने पुत्र अश्वत्थामाको केवल ब्रह्मास्त्र छोड़ना ही सिखाया, उपसंहार करना सिखाया ही नहीं।

कर्ण—कर्णकी दुर्वाधनके साथ मित्रता थी, उस मित्रतारूप कर्तव्यको निभानेके लिये वे युद्धमें आते हैं। भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा ‘कर्ण! तू कुत्तीका बेटा है,’ ऐसा कहनेपर भी वे दुर्वाधनके पक्षमें ही रहे और उन्होंने भगवान्से कहा कि ‘यह बात आप धर्मराज युधिष्ठिरसे मत कहना; क्योंकि अगर उनको पता लग जायगा तो मुझे बड़ा समझकर वे राज्य मुझे दे देंगे और मैं राज्य दुर्वाधनको दे दूँगा। इससे पाण्डव सदाके लिये दुःखी रहेंगे।’

कर्ण बड़े दृढ़प्रतिज्ञ थे। वे विचित्र ही दानवीर थे। इन्द्रके माँगनेपर उन्होंने अपने नैसर्गिक (जन्मजात) कुण्डल और कवच उतारकर दे दिये थे। माता कुत्तीके द्वारा माँगनेपर उन्होंने उनको पाँच पुत्रोंके बने रहनेका वचन दिया, जिसमें उन्होंने कहा ‘माँ! मैं युधिष्ठिर, भीष्म, नकुल और सहदेवको तो मारूँगा नहीं, पर अर्जुनके साथ मेरा युद्ध होगा। युद्धमें अगर अर्जुन मेरेको मार देगा, तो तेरे पाँच पुत्र रहेंगे ही और अगर मैं अर्जुनको मार दूँगा, तो भी मेरेसहित तेरे पाँच पुत्र रहेंगे!’

७६८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ११ ]

'अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहीवावनिपालसङ्घैः' —दुर्योधनके पक्षमें जितने राजालोग हैं, जो युद्धमें दुर्योधनका प्रिय करना चाहते हैं (गीता—पहले अध्यायका तेईसवाँ श्लोक) अर्थात् दुर्योधनको हितकी सलाह नहीं दे रहे हैं, उन सभी राजाओंके समूहोंके साथ धृतराष्ट्रके दुर्योधन, दुःशासन आदि सौ पुत्र विकराल दाढ़ोंके कारण अत्यन्त भयानक आपके मुखोंमें बड़ी तेजीसे प्रवेश कर रहे हैं—'वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दृष्ट्वाकरालानि भयानकानि ।'

विराट्रूपमें वे चाहे भगवान्में प्रवेश करें, चाहे भगवान्के मुखोंमें जायँ, वह एक ही लीला है। परन्तु भावोंके अनुसार उनकी गतियाँ अलग-अलग प्रतीत हो रही हैं। इसलिये भगवान्में जायँ अथवा मुखोंमें जायँ, वे हैं तो विराट्रूपमें ही।

'केचिद्विलग्ना दशानान्तेषु संधूश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्घ्रैः' —जैसे खाद्य पदार्थोंमें कुछ पदार्थ ऐसे होते हैं, जो चबाते समय सीधे पेटमें चले जाते हैं, पर कुछ पदार्थ ऐसे होते हैं, जो चबाते समय दाँतों और दाढ़ोंके बीचमें

फँस जाते हैं। ऐसे ही आपके मुखोंमें प्रविष्ट होनेवालोंमेंसे कई-एक तो सीधे भीतर (पेटमें) चले जा रहे हैं, पर कई-एक चूर्ण हुए मस्तकोंसहित आपके दाँतों और दाढ़ोंके बीचमें फँसे हुए दीख रहे हैं।

यहाँ एक शंका होती है कि योद्धालोग तो अभी सामने युद्धक्षेत्रमें खड़े हुए हैं, फिर वे अर्जुनको विराट्रूपके मुखोंमें जाते हुए कैसे दिखायी दिये? इसका समाधान यह है कि भगवान् विराट्रूपमें अर्जुनको आसन्न भविष्यकी बात दिखा रहे हैं। भगवान्ने विराट्रूप दिखाते समय अर्जुनसे कहा था कि तू और भी जो कुछ देखना चाहता है, वह भी मेरे इस विराट्रूपमें देख ले (सातवाँ श्लोक)। अर्जुनके मनमें सन्देह था कि युद्धमें हमारी जीत होगी या कौरवोंकी? (दूसरे अध्यायका छठा श्लोक) इसलिये उस सन्देहको दूर करनेके लिये भगवान् अर्जुनको आसन्न भविष्यका दृश्य दिखाकर मानो यह बताते हैं कि युद्धमें तुम्हारी ही जीत होगी। आगे अर्जुनके द्वारा प्रश्न करनेपर भी भगवान्ने यही बात कही है (बत्तीसवेंसे चौतीसवें श्लोकतक)।

परिशिष्ट भाव —अर्जुन भगवान्के विराट्रूपमें आसन्न भविष्यको देख रहे हैं। कालातीत होनेसे भगवान्में भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों काल वर्तमान ही हैं (गीता—सातवें अध्यायका छब्बीसवाँ श्लोक)।

सम्बन्ध —जो अपना कर्तव्य समझकर धर्मकी दृष्टिसे युद्धमें आये हैं और जो परमात्माकी प्राप्ति चाहनेवाले हैं—ऐसे पुरुषोंका विराट्रूपमें नदियोंके दृष्टान्तसे प्रवेश करनेका वर्णन अर्जुन आगेके श्लोकमें करते हैं।

यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ।

तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ॥ २८ ॥

यथा= जैसेअभिमुखाः= सम्मुखतव= आपके
नदीनाम्= नदियोंकेद्रवन्ति= दौड़ते हैं,अभिविज्वलन्ति= सब तरफसे
बहवः= बहुत-सेतथा= ऐसे हीदेदीप्यमान
अम्बुवेगाः= जलके प्रवाहअमी= वेवक्त्राणि= मुखोंमें
एव= (स्वाभाविक) हीनरलोकवीराः= संसारके महान्विशन्ति= प्रवेश
समुद्रम्= समुद्रकेशूरवीरकर रहे हैं।

व्याख्या'यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति' —मूलमें जलमात्र समुद्रका है। वही जल बादलोंके द्वारा वर्षारूपमें पृथ्वीपर बरसकर झरने, नाले आदिको लेकर नदियोंका रूप धारण करता है। उन नदियोंके जितने वेग हैं, प्रवाह हैं, वे सभी स्वाभाविक ही समुद्रकी तरफ दौड़ते हैं। कारण कि जलका उद्गम स्थान समुद्र ही है। वे सभी जल-प्रवाह समुद्रमें जाकर अपने नाम

और रूपको छोड़कर अर्थात् गंगा, यमुना, सरस्वती आदि नामोंको और प्रवाहके रूपको छोड़कर समुद्ररूप ही हो जाते हैं। फिर वे जल-प्रवाह समुद्रके सिवाय अपना कोई अलग, स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं रखते। वास्तवमें तो उनका स्वतन्त्र अस्तित्व पहले भी नहीं था, केवल नदियोंके प्रवाहरूपमें होनेके कारण वे अलग दीखते थे।

'तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभि-

श्लोक २९ ]

  • साधक-संजीवनी *

७६९

विज्वलन्ति —नदियोंकी तरह मात्र जीव नित्य सुखकी अभिलाषाको लेकर परमात्माके सम्मुख ही दौड़ते हैं। परन्तु भूलसे असत्, नाशवान् शरीरके साथ सम्बन्ध मान लेनेसे वे सांसारिक संग्रह और संयोगजन्य सुखमें लग जाते हैं तथा अपना अलग अस्तित्व मानने लगते हैं। उन जीवोंमें वे ही वास्तविक शूरवीर हैं, जो सांसारिक संग्रह और सुखभोगोंमें न लगकर, जिसके लिये शरीर

मिला है, उस परमात्मप्राप्तिके मार्गमें ही तत्परतासे लगे हुए हैं। ऐसे युद्धमें आये हुए भीष्म, द्रोण आदि नरलोकवीर आपके प्रकाशमय (ज्ञानस्वरूप) मुखोंमें प्रविष्ट हो रहे हैं।

सामने दीखनेवाले लोगोंमें परमात्मप्राप्ति चाहनेवाले लोग विलक्षण हैं और बहुत थोड़े हैं। अतः उनके लिये परोक्षवाचक ‘अमी’ (वे) पद दिया गया है।

सम्बन्ध —जो राज्य और प्रशांसाके लोभसे युद्धमें आये हैं और जो सांसारिक संग्रह और भोगोंकी प्राप्तिमें लगे हुए हैं—ऐसे पुरुषोंका विराद्वरूपमें पतंगोंके दृष्टान्तसे प्रवेश करनेका वर्णन अर्जुन आगेके श्लोकमें करते हैं।

यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।

तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥ २९ ॥

यथा = जैसे पतङ्गाः = पतंगे (मोहवश) नाशाय = (अपना) नाश करनेके लिये समृद्धवेगाः = बड़े वेगसे दौड़ते हुए प्रदीप्तम् = प्रज्वलित

ज्वलनम् = अग्नियें विशन्ति = प्रविष्ट होते हैं, तथा = ऐसे एव = ही लोकाः = ये सब लोग अपि = भी (मोहवश) नाशाय = (अपना) नाश

करनेके लिये समृद्धवेगाः = बड़े वेगसे दौड़ते हुए तव = आपके वक्त्राणि = मुखोंमें विशन्ति = प्रविष्ट हो रहे हैं।

व्याख्या —‘यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतंगा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः’—‘जैसे हरी-हरी घासमें रहनेवाले पतंगे चातुर्मासकी अँधेरी रात्रियें कहींपर प्रज्वलित अग्नि देखते हैं, तो उसपर मुग्ध होकर (कि बहुत सुन्दर प्रकाश मिल गया, हम इससे लाभ ले लेंगे, हमारा अँधेरा मिट जायगा) उसकी तरफ बड़ी तेजीसे दौड़ते हैं। उनमेंसे कुछ तो प्रज्वलित अग्नियें स्वाहा हो जाते हैं; कुछको अग्निकी थोड़ी-सी लपट लग जाती है तो उनका उड़ना बंद हो जाता है और वे तड़पते रहते हैं। फिर भी उनकी लालसा उस अग्निकी तरफ ही रहती है! यदि कोई पुरुष दया करके उस अग्निको बुझा देता है तो वे पतंगे बड़े दुःखी हो जाते हैं कि उसने हमारेको बड़े लाभसे वंचित कर दिया!

‘तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवापि वक्त्राणि

समृद्धवेगाः’ —‘भोग भोगने और संग्रह करनेमें ही तत्परतापूर्वक लगे रहना और मनमें भोगों और संग्रहका ही चिन्तन होते रहना—यह बढ़ा हुआ सांसारिक वेग है। ऐसे वेगवाले दुर्बोधनादि राजालोग पतंगोंकी तरह बड़ी तेजीसे कालचक्ररूप आपके मुखोंमें जा रहे हैं अर्थात् पतनकी तरफ जा रहे हैं—चौरासी लाख योनियों और नरकोंकी तरफ जा रहे हैं। तात्पर्य यह हुआ कि प्रायः मनुष्य सांसारिक भोग, सुख, आराम, मान, आदर आदिको प्राप्त करनेके लिये रात-दिन दौड़ते हैं। उनको प्राप्त करनेमें उनका अपमान होता है, निन्दा होती है, घाटा लगता है, चिन्ता होती है, अन्तःकरणमें जलन होती है और जिस आयुके बलपर वे जी रहे हैं, वह आयु भी समाप्त होती जाती है, फिर भी वे नाशवान् भोग और संग्रहकी प्राप्तिके लिये भीतरसे लालायित रहते हैं*।

  • अजानन् दाहात्म्यं पतति शलभो दीपदहने स मीनोऽप्यज्ञानाद्विज्ञायुतमभ्यनाति पिशितम्।

विजानन्तोऽप्येते वयमिह विपज्जालजटिलान् न मुंचामः कामानहह गहनो मोहमहिमा ॥ ( भर्तृहरिवैराग्यशतक )

‘पतंग दीपकके दाहक स्वरूपको न जाननेके कारण ही उसपर गिरता है, मछली भी अज्ञानवश ही बंसीमें लगे हुए मांसके टुकड़ोंको निगलती है; परन्तु हमलोग जानते हुए भी विपत्तिके जटिल जालमें फँसानेवाली कामनाओंको नहीं छोड़ते; अहो! मोहको महिमा बड़ी गहन है।’

७७०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ११ ]

परिशिष्ट भाव —पिछले श्लोकमें नदियोंका और इस श्लोकमें पतंगोंका दृष्टान्त दिया गया है। पतंगे तो मोहवश लेनेकी इच्छासे खुद अग्नियमें जाते हैं, पर नदियाँ अपने-आपको देनेके लिये समुद्रमें जाती हैं। अतः जो मनुष्य, 'लेने' की इच्छा रखते हैं, वे पतंगोंके समान हैं और जो मनुष्य 'देने' की इच्छा रखते हैं, वे नदियोंके समान हैं, लेनेका भाव जड़ता है और देनेका भाव चेतनता है। लेनेकी भावनासे अशुभ कर्म और देनेकी भावनासे शुभ कर्म होते हैं। लेनेकी इच्छावालोंके लिये स्वर्ग हैं और देनेकी इच्छावालोंके लिये मोक्ष है। कारण कि लेनेका भाव बाँधनेवाला और देनेका भाव मुक्त करनेवाला होता है।

सम्बन्ध—पीछेके दो श्लोकोंमें दो दृष्टान्तोंसे दोनों समुदायोंका वर्णन करके अब सम्पूर्ण लोकोंका प्रसन्न करते हुए विश्वरूप भगवान्के भयानक रूपका वर्णन करते हैं।

लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदैनैर्ज्वलद्भिः ।

तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ॥ ३० ॥

ज्वलद्भिः= (आप अपने)समन्तात्= सब ओरसेतेजोभिः= अपने तेजसे
प्रज्वलितलेलिह्यसे= बार-बार चाट रहे हैं;समग्रम्= सम्पूर्ण
वदैनः= मुखोंद्वाराजगत्= जगत्को
समग्रान्= सम्पूर्णविष्णो= (और) हे विष्णो !आपूर्य= परिपूर्ण
लोकान्= लोकोंकातव= आपकाकरके
ग्रसमानः= प्रसन्न करते हुएउग्राः= उग्रप्रतपन्ति= (सबको)
(उन्हें)भासः= प्रकाशतपा रहा है।

व्याख्या —'लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान् समग्रान्वदैनैर्ज्वलद्भिः'—आप सम्पूर्ण प्राणियोंका संहार कर रहे हैं और कोई इधर-उधर न चला जाय, इसलिये बार-बार जीभके लपेटेसे अपने प्रज्वलित मुखोंमें लेते हुए उनका प्रसन्न कर रहे हैं। तात्पर्य है कि कालरूप भगवान्की

जीभके लपेटसे कोई भी प्राणी बच नहीं सकता।

'तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो'—विराटरूप भगवान्का तेज बड़ा उग्र है। वह उग्र तेज सम्पूर्ण जगत्में परिपूर्ण होकर सबको संतप्त कर रहा है, व्यथित कर रहा है।

परिशिष्ट भाव —यहाँ 'लोकान्समग्रान्' (लोकमात्र) तथा 'जगत्समग्रम्' (जड़-चेतन, स्थावर-जंगमरूप जगन्मात्र) कहनेका तात्पर्य है कि यह सब कुछ भगवान्के ही समग्ररूपके अन्तर्गत है।

गीतामें भगवान्को भी समग्र कहा है—'असंशयं समग्रं माम्' (७।१), कर्मोंको भी समग्र कहा है—'यज्ञायाचरतः कर्म समग्रम्' (४।२३) और प्रस्तुत श्लोकमें संसारको भी समग्र कहा है। इसका तात्पर्य है कि सब भगवान्के ही रूप हैं।

सम्बन्ध —विराटरूप भगवान् अपने विलक्षण-विलक्षण रूपोंका दर्शन कराते ही चले गये। उनके भयंकर और अत्यन्त उग्ररूपके मुखोंमें सम्पूर्ण प्राणी और दोनों पक्षोंके योद्धा जाते देखकर अर्जुन बहुत घबरा गये। अतः अत्यन्त उग्ररूपधारी भगवान्का वास्तविक परिचय जाननेके लिये अर्जुन प्रश्न करते हैं।

आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।

विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥ ३१ ॥

मे= मुझे यहभवान्= आपते= आपको
आख्याहि= बताइये किकः= कौन हैं ?नमः= नमस्कार
उग्ररूपः= उग्र रूपवालेदेववर= हे देवताओंमें श्रेष्ठ !अस्तु= हो ।

श्लोक ३२ ]

  • साधक-संजीवनी *

७७९

प्रसीद= (आप) प्रसन्न होइये।विज्ञातुम्= तत्त्वसे जाननातव= आपकी
आद्यम्= आदिरूपइच्छामि= चाहता हूँ;प्रवृत्तिम्= प्रवृत्तिको
भवन्तम्= आपको (मैं)हि= क्योंकि (मैं)न, प्रजानामि= भलीभाँति नहीं जानता।

व्याख्या— आख्याहि मे को भवानुग्रूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद—आप देवरूपसे भी दीख रहे हैं और उग्ररूपसे भी दीख रहे हैं; तो वास्तवमें ऐसे रूपोंको धारण करनेवाले आप कौन हैं?

अत्यन्त उग्र विराट् रूपको देखकर भयके कारण अर्जुन नमस्कारके सिवाय और करते भी क्या? जब अर्जुन भगवान् के ऐसे विराट् रूपको समझनेमें सर्वथा असमर्थ हो गये, तब अन्तमें कहते हैं कि हे देवताओंमें श्रेष्ठ! आपको नमस्कार है।

भगवान् अपनी जीभसे सबको अपने मुखोंमें लेकर बार-बार चाट रहे हैं, ऐसे भयंकर बर्तावको देखकर अर्जुन प्रार्थना करते हैं कि आप प्रसन्न हो जाइये।

‘विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्’— भगवान्का पहला अवतार विराट्-(संसार-) रूपमें ही हुआ था। इसलिये अर्जुन कहते हैं कि आदिनारायण! आपको मैं स्पष्टरूपसे नहीं जानता हूँ। मैं आपकी इस प्रवृत्तिको भी नहीं जानता हूँ कि आप यहाँ क्यों प्रकट हुए हैं? और आपके मुखोंमें हमारे पक्षके तथा

विपक्षके बहुत-से योद्धा प्रविष्ट होते जा रहे हैं; अतः वास्तवमें आप क्या करना चाहते हैं? तात्पर्य यह हुआ कि आप कौन हैं और क्या करना चाहते हैं—इस बातको मैं जानना चाहता हूँ और इसको आप ही स्पष्टरूपसे बताइये।

एक प्रश्न होता है कि भगवान्का पहला अवतार विराट्-(संसारके) रूपमें हुआ और अभी अर्जुन भगवान्के किसी एक देशमें विराट् रूप देख रहे हैं—ये दोनों विराट् रूप एक ही हैं या अलग-अलग? इसका उत्तर यह है कि वास्तविक बात तो भगवान् ही जानें, पर विचार करनेसे ऐसा प्रतीत होता है कि अर्जुनने जो विराट् रूप देखा था, उसीके अन्तर्गत यह संसाररूपी विराट् रूप भी था। जैसे कहा जाता है कि भगवान् सर्वव्यापी हैं, तो इसका तात्पर्य केवल इतना ही नहीं है कि भगवान् केवल सम्पूर्ण संसारमें ही व्याप्त हैं, प्रत्युत भगवान् संसारसे बाहर भी व्याप्त हैं। संसार तो भगवान् के किसी अंशमें है तथा ऐसी अनन्त सृष्टियाँ भगवान् के किसी अंशमें हैं। ऐसे ही अर्जुन जिस विराट्-रूपको देख रहे हैं, उसमें यह संसार भी है और इसके सिवाय और भी बहुत कुछ है।

परिशिष्ट भाव— भगवान् के ऐश्वर्ययुक्त उग्ररूपको श्रीकृष्णसे पूछ बैठते हैं कि आप कौन हैं!

देखकर अर्जुन इतने घबरा जाते हैं कि अपने ही सखा

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें अर्जुनने प्रार्थनापूर्वक जो प्रश्न किया था, उसका यथार्थ उत्तर भगवान् आगेके श्लोकमें देते हैं।

श्रीभगवानुवाच

कालोऽस्मि लोकक्षयकृतप्रवृद्धो लोकात्ममाहर्तुमिह प्रवृत्तः । ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥ ३२ ॥

श्रीभगवान् बोले—

लोकक्षयकृत्= (मैं) सम्पूर्ण लोकोंका नाश करनेवालासमाहर्तुम्= संहार करनेके लियेअवस्थिताः= खड़े हैं,
प्रवृद्धः= बढ़ा हुआप्रवृत्तः= (यहाँ) आया हूँ।सर्वे= (वे) सब
कालः= कालप्रत्यनीकेषु= (तुम्हारे) प्रतिपक्षमेंत्वाम्= तुम्हारे
अस्मि= हूँ (और)ये= जोऋते= (युद्ध किये) बिना
इह= इस समय (मैं)योधाः= योद्धालोगअपि= भी
लोकान्= (इन सब)= नहीं
भविष्यन्ति= रहेंगे।

७७२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ११ ]

व्याख्या —[ भगवान्का विश्वरूप विचार करनेपर बहुत विलक्षण मालूम देता है; क्योंकि उसको देखनेमें अर्जुनकी दिव्यदृष्टि भी पूरी तरहसे काम नहीं कर रही है और वे विश्वरूपको कठिनतासे देखे जानेयोग्य बताते हैं—‘दुर्निरीक्ष्यं समन्तात्’ (११।१७)। यहाँ भी वे भगवान्से पूछ बैठते हैं कि उग्ररूपवाले आप कौन हैं? ऐसा मालूम देता है कि अगर अर्जुन भयभीत होकर ऐसा नहीं पूछते तो भगवान् और भी अधिक विलक्षणरूपसे प्रकट होते चले जाते। परन्तु अर्जुनके बीचमें ही पूछनेसे भगवान्ने और आगेका रूप दिखाना बन्द कर दिया और अर्जुनके प्रश्नका उत्तर देने लगे।]

‘कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्स्वप्नद्वः’ —पूर्वश्लोकमें अर्जुनने पूछा था कि उग्ररूपवाले आप कौन हैं—‘आख्याहि मे को भवानुग्ररूपः’ , उसके उत्तरमें विराट्रूप भगवान् कहते हैं कि मैं सम्पूर्ण लोकोंका क्षय (नाश) करनेवाला बड़े भयंकररूपसे बढ़ा हुआ अक्षय काल हूँ। ‘लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः’ —अर्जुनने पूछा था कि मैं आपकी प्रवृत्तिको नहीं जान रहा हूँ—‘न हि प्रजानामितव प्रवृत्तिम्’ अर्थात् आप यहाँ क्या करने आये हैं? उसके उत्तरमें भगवान् कहते हैं कि मैं इस समय दोनों सेनाओंका संहार करनेके लिये ही यहाँ आया हूँ।

‘ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः’ —तुमने पहले यह कहा था कि मैं युद्ध नहीं करूँगा—‘न योत्स्ये’ (२।९), तो क्या तुम्हारे युद्ध किये बिना ये प्रतिपक्षी नहीं मरेंगे? अर्थात् तुम्हारे युद्ध

करने और न करनेसे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। कारण कि मैं सबका संहार करनेके लिये प्रवृत्त हुआ हूँ। यह बात तुमने विराट्रूपमें भी देख ली है कि तुम्हारे पक्षकी और विपक्षकी दोनों सेनाएँ मेरे भयंकर मुखोंमें प्रविष्ट हो रही हैं।

यहाँ एक शंका होती है कि अर्जुनने अपनी और कौरवपक्षकी सेनाके सभी लोगोंको भगवान्के मुखोंमें जाकर नष्ट होते हुए देखा था, तो फिर भगवान्ने यहाँ केवल प्रतिपक्षकी ही बात क्यों कही कि तुम्हारे युद्ध किये बिना भी ये प्रतिपक्षी नहीं रहेंगे? इसका समाधान है कि अगर अर्जुन युद्ध करते तो केवल प्रतिपक्षियोंको ही मारते और युद्ध नहीं करते तो प्रतिपक्षियोंको नहीं मारते। अतः भगवान् कहते हैं कि तुम्हारे मारे बिना भी ये प्रतिपक्षी नहीं बचेंगे; क्योंकि मैं कालरूपसे सबको खा जाऊँगा। तात्पर्य यह है कि इन सबका संहार तो होनेवाला ही है, तुम केवल अपने युद्धरूप कर्तव्यका पालन करो।

एक शंका यह भी होती है कि यहाँ भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि प्रतिपक्षके योद्धालोग तुम्हारे युद्ध किये बिना भी नहीं रहेंगे, फिर इस युद्धमें प्रतिपक्षके अश्वत्थामा आदि योद्धा कैसे बच गये? इसका समाधान है कि यहाँ भगवान्ने उन्हीं योद्धाओंके मरनेकी बात कही है, जिनको अर्जुन मार सकते हैं और जिनको अर्जुन आगे मारेंगे। अतः भगवान्के कथनका तात्पर्य है कि जिन योद्धाओंको तुम मार सकते हो, वे सभी तुम्हारे मारे बिना ही मर जायेंगे। जिनको तुम आगे मारोगे, वे मेरे द्वारा पहलेसे ही मारे हुए हैं—‘मयैवैते निहताः पूर्वमेव’ (११।३३)।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने कहा था कि तुम्हारे मारे बिना भी ये प्रतिपक्षी योद्धा नहीं रहेंगे। ऐसी स्थितिमें अर्जुनको क्या करना चाहिये—इसका उत्तर भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें देते हैं।

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून्भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्। मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥ ३३ ॥

तस्मात्= इसलियेसमृद्धम्= धन-धान्यसेनिहताः= मारे हुए हैं।
त्वम्= तुम (युद्धके लिये)सम्पन्नसव्यसाचिन्= हे सव्यसाचिन् अर्थात् दोनों हाथोंसे बाण चलानेवाले अर्जुन! (तुम इनको मारनेमें)
उत्तिष्ठ= खड़े हो जाओ (और)राज्यम्= राज्यको
यशः= यशकोभुङ्क्ष्व= भोगो।
लभस्व= प्राप्त करो (तथा)एते, एव= ये सभी
शत्रून्= शत्रुओंकोमया= मेरे द्वारानिमित्तमात्रम्= निमित्तमात्र
जित्वा= जीतकरपूर्वम्= पहलेसेभव= बन जाओ।
एव= ही

श्लोक ३३ ]

  • साधक-संजीवनी *

७७३

व्याख्या —‘तस्मान्तमुत्तिष्ठ यशो लभस्व’—हे अर्जुन! जब तुमने यह देख ही लिया कि तुम्हारे मारे बिना भी ये प्रतिपक्षी बचेंगे नहीं, तो तुम कमर कसकर युद्धके लिये खड़े हो जाओ और मुफ्तमें ही यशको प्राप्त कर लो। इसका तात्पर्य है कि यह सब होनहार है, जो होकर ही रहेगी और इसको मैंने तुम्हें प्रत्यक्ष दिखा भी दिया है। अतः तुम युद्ध करोगे तो तुम्हें मुफ्तमें ही यश मिलेगा और लोग भी कहेंगे कि अर्जुनने विजय कर ली?

‘यशो लभस्व’ कहनेका यह अर्थ नहीं है कि यशकी प्राप्ति होनेपर तुम फूल जाओ कि ‘वाह’! मैंने विजय प्राप्त कर ली’, प्रत्युत तुम ऐसा समझो कि जैसे ये प्रतिपक्षी मेरे द्वारा मारे हुए ही मरेंगे, ऐसे ही यश भी जो होनेवाला है, वही होगा। अगर तुम यशको अपने पुरुषार्थसे प्राप्त मानकर राजी होओगे, तो तुम फलमें बँध जाओगे—‘फले सक्तो निबध्यते ’ (गीता ५।१२)। तात्पर्य यह हुआ कि लाभ-हानि, यश-अपयश सब प्रभुके हाथमें है। अतः मनुष्य इनके साथ अपना सम्बन्ध न जोड़े; क्योंकि ये तो होनहार हैं।

‘जित्वा शत्रून् भुङ्क्व राज्यं समृद्धम्’ —समृद्ध राज्यमें दो बातें होती हैं—(१) राज्य निष्कण्टक हो अर्थात् उसमें बाधा देनेवाला कोई भी शत्रु या प्रतिपक्षी न रहे और (२) राज्य धन-धान्यसे सम्पन्न हो अर्थात् प्रजाके पास खूब धन-सम्पत्ति हो; हाथी, घोड़े, गाय, जमीन, मकान, जलाशय आदि आवश्यक वस्तुएँ भरपूर हों; प्रजाके खानेके लिये भरपूर अन्न हो। इन दोनों बातोंसे ही राज्यकी समृद्धता, पूर्णता होती है। भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि शत्रुओंको जीतकर तुम ऐसे निष्कण्टक और धन-धान्यसे सम्पन्न राज्यको भोगो।

यहाँ राज्यको भोगनेका अर्थ अनुकूलताका सुख भोगनेमें नहीं है, प्रत्युत यह अर्थ है कि साधारण लोग जिसे भोग मानते हैं, उस राज्यको भी तुम अनायास प्राप्त कर लो।

‘मयैवैते निहताः पूर्वमेव’ —तुम मुफ्तमें यश और राज्यको कैसे प्राप्त कर लोगे, इसका हेतु बताते हैं कि यहाँ जितने भी आये हुए हैं, उन सबकी आयु समाप्त हो चुकी है अर्थात् कालरूप मेरे द्वारा ये पहलेसे ही मारे जा चुके हैं।

‘निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्’ —बायें हाथसे बाण चलानेके कारण अर्थात् दायें और बायें—दोनों हाथोंसे बाण चलानेके कारण अर्जुनका नाम ‘सव्यसाची’ था*। इस नामसे सम्बोधित करके भगवान् अर्जुनसे यह कहते हैं

कि तुम दोनों हाथोंसे बाण चलाओ अर्थात् युद्धमें अपनी पूरी शक्ति लगाओ, पर बनना है निमित्तमात्र। निमित्तमात्र बननेका तात्पर्य अपने बल, बुद्धि, पराक्रम आदिको कम लगाना नहीं है, प्रत्युत इनको सावधानीपूर्वक पूरा-का-पूरा लगाना है। परन्तु मैंने मार दिया, मैंने विजय प्राप्त कर ली—यह अभिमान नहीं करना है; क्योंकि ये सब मेरे द्वारा पहलेसे ही मारे हुए हैं। इसलिये तुम्हें केवल निमित्तमात्र बनना है, कोई नया काम नहीं करना है।

निमित्तमात्र बनकर कार्य करनेमें अपनी ओरसे किसी भी अंशमें कोई कमी नहीं रहनी चाहिये, प्रत्युत पूरी-की-पूरी शक्ति लगाकर सावधानीपूर्वक कार्य करना चाहिये। कार्यकी सिद्धिमें अपने अभिमानका किंचित्मात्र भी अंश नहीं रखना चाहिये। जैसे, भगवान् श्रीकृष्णने गोवर्धन पर्वत उठाया तो उन्होंने ग्वालबालोंसे कहा कि तुमलोग भी पर्वतके नीचे अपनी-अपनी लाटियाँ लगाओ। सभी ग्वालबालोंने अपनी-अपनी लाटियाँ लगायीं और वे ऐसा समझने लगे कि हम सबकी लाटियाँ लगनेसे ही पर्वत ऊपर ठहरा हुआ है। वास्तवमें पर्वत ठहरा हुआ था भगवान्के बायें हाथकी छोटी अंगुलीके नखपर! ग्वालबालोंमें जब इस तरहका अभिमान हुआ, तब भगवान्ने अपनी अंगुली थोड़ी-सी नीचे कर ली। अंगुली नीचे करते ही पर्वत नीचे आने लगा तो ग्वालबालोंने पुकारकर भगवान्से कहा—‘अरे दादा! मेरे! मेरे!! मेरे!!!’ भगवान्ने कहा कि जोरसे शक्ति लगाओ। पर वे सब-के-सब एक साथ अपनी पूरी शक्ति लगाकर भी पर्वतको ऊँचा नहीं कर सके। तब भगवान्ने पुनः अपनी अंगुलीसे पर्वतको ऊँचा कर दिया।

ऐसे ही साधकको परमात्मप्राप्तिके लिये अपने बल, बुद्धि, योग्यता आदिको तो पूरा-का-पूरा लगाना चाहिये, उसमें कभी किंचित्मात्र भी कमी नहीं रखनी चाहिये, पर परमात्माका अनुभव होनेमें बल, उद्योग, योग्यता, तत्परता, जितेन्द्रियता, परिश्रम आदिको कारण मानकर अभिमान नहीं करना चाहिये। उसमें तो केवल भगवान्की कृपाको ही कारण मानना चाहिये। भगवान्ने भी गीतामें कहा है कि शाश्वत अविनाशी पदकी प्राप्ति मेरी कृपासे होगी—‘मत्प्रसादा-दवाजोति शाश्वतं पदमव्ययम् ’ (१८।५६), और सम्पूर्ण विघ्नोंको मेरी कृपासे तर जायगा—‘मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादातरिष्यसि ’ (१८।५८)। इससे यह सिद्ध हुआ कि केवल निमित्तमात्र बननेसे साधकको परमात्माकी प्राप्ति

  • उभौ मे दक्षिणौ पाणौ गाण्डीवस्य विकर्षणे। तेन देवमनुष्येषु सव्यसाचीति मां विदुः॥ (महा० विराट० ४४।१९)

७७४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ११ ]

हो जाती है।

जब साधक अपना बल मानते हुए साधन करता है, तब अपना बल माननेके कारण उसको बार-बार विफलताका अनुभव होता रहता है और तत्त्वकी प्राप्तिमें देरी लगती है। अगर साधक अपने बलका किंचिन्मात्र भी अभिमान न करे तो सिद्धि तत्काल हो जाती है। कारण कि परमात्मा तो नित्यप्राप्त है ही, केवल अपने पुरुषार्थके अभिमानके कारण ही उनका अनुभव नहीं हो रहा था। इस पुरुषार्थके अभिमानको दूर करनेमें ही 'निमित्तमात्रं भव' पदोंका तात्पर्य है।

कर्मोंमें जो अपने करनेका अभिमान है कि 'मैं करता हूँ तो होता है, अगर मैं नहीं करूँ तो नहीं होगा', यह

केवल अज्ञताके कारण ही अपनेमें आरोपित कर रखा है। अगर मनुष्य अभिमान और फलेच्छाका त्याग करके प्राप्त परिस्थितिके अनुसार कर्तव्य-कर्म करनेमें निमित्तमात्र बन जाय, तो उसका उद्धार स्वतःसिद्ध है। कारण कि जो होनेवाला है, वह तो होगा ही, उसको कोई अपनी शक्तिसे रोक नहीं सकता; और जो नहीं होनेवाला है, वह नहीं होगा, उसको कोई अपने बल-बुद्धिसे कर नहीं सकता। अतः सिद्धि-असिद्धिमें सम रहते हुए कर्तव्य-कर्मोंका पालन किया जाय तो मुक्ति स्वतःसिद्ध है। बन्धन, नरकोंकी प्राप्ति, चौरासी लाख योनियोंकी प्राप्ति—ये सभी कृतिसाध्य हैं और मुक्ति, कल्याण, भगवत्प्राप्ति, भगवत्प्रेम आदि सभी स्वतःसिद्ध हैं।

परिशिष्ट भाव—'निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्' —निमित्तमात्र बननेका तात्पर्य यह नहीं है कि नाममात्रके लिये कर्म करो, प्रत्युत इसका तात्पर्य है कि अपनी पूरी-की-पूरी शक्ति लगाओ, पर अपनेको कारण मत मानो अर्थात् अपने उद्योगमें कमी भी मत रखो और अपनेमें अभिमान भी मत करो। भगवान्ने जो कुछ बल, विद्या, योग्यता आदि दी है, वह सब लगानेके लिये दी है; परन्तु अपना पूरा बल आदि लगाकर हम उसको प्राप्त नहीं कर सकते। प्राप्ति तो उनकी कृपासे ही होगी।

भगवान्ने अपनी ओरसे हमारेपर कृपा करनेमें कोई कमी नहीं रखी है। जैसे बछड़ा एक थनसे ही दूध पीता है, पर भगवान्ने गायको चार थन दिये हैं! ऐसे ही भगवान् चारों तरफसे हमारेपर कृपा कर रहे हैं! हमें तो निमित्तमात्र बनना है। अर्जुनके सामने तो युद्ध था, इसलिये भगवान् उनसे कहते हैं कि तुम निमित्तमात्र बनकर युद्ध करो, तुम्हारी विजय होगी। इसी तरह हमारे सामने संसार है; अतः हम भी निमित्तमात्र बनकर साधन करें तो संसारपर हमारी विजय हो जायगी।

द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् ।

मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेतासि रणे सपत्तान् ॥ ३४ ॥

द्रोणम्= द्रोणतथा= तथाजहि= मारो।
= औरअन्यान्मा, व्यथिष्ठाः= तुम व्यथा मत करो।
भीष्मम्= भीष्मअपि= अन्य सभीयुध्यस्व= (और) युद्ध करो।
= तथामया= मेरे द्वारारणे= युद्धमें (तुम निःसन्देह)
जयद्रथम्= जयद्रथहतान्= मारे हुएसपत्तान्= वैरियोंको
= औरयोधवीरान्= शूरवीरोंकोजेतासि= जीतोगे।
कर्णम्= कर्णत्वम्= तुम

व्याख्या—'द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् मया हतांस्त्वं जहि' —तुम्हारी दृष्टिमें गुरु द्रोणाचार्य, पितामह भीष्म, जयद्रथ और कर्ण तथा अन्य जितने प्रतिपक्षके नामी शूरवीर हैं, जिनपर विजय करना बड़ा

कठिन काम है*, उन सबकी आयु समाप्त हो चुकी है अर्थात् वे सब कालरूप मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। इसलिये हे अर्जुन! मेरे द्वारा मारे हुए शूरवीरोंको तुम मार दो।

भगवान्के द्वारा पूर्वश्लोकमें 'मयैवैते निहताः पूर्वमेव'

  • भीष्म, द्रोण और कर्ण अपनी शूरवीरताके कारण संसारमें प्रसिद्ध थे; अतः इनको जीतनेमें कठिनता थी। जयद्रथ तो ऐसा कोई नामी शूरवीर था नहीं, पर उसको एक वरदान था कि 'तुम्हारा सिर कोई पृथ्वीपर गिरा देगा तो उस (सिर गिरानेवाले-) के सिरके सौ टुकड़े हो जायेंगे। इस वरदानके कारण जयद्रथको मारनेमें कठिनता थी।

श्लोक ३४ ]

  • साधक-संजीवनी *

७७५

और यहाँ 'मया हतांस्तं जहि' कहनेका तात्पर्य यह है कि तुम इनपर विजय करो, पर विजयका अभिमान मत करो; क्योंकि ये सब-के-सब मेरे द्वारा पहलेसे ही मारे हुए हैं।

'मा व्यथिष्ठा युध्यस्व'—अर्जुन पितामह भीष्म और गुरु द्रोणाचार्यको मारनेमें पाप समझते थे, यही अर्जुनके मनमें व्यथा थी। अतः भगवान् कह रहे हैं कि वह व्यथा भी तुम मत करो अर्थात् भीष्म और द्रोण आदिको मारनेसे हिंसा आदि दोषोंका विचार करनेकी तुम्हें किंचिन्मात्र भी आवश्यकता नहीं है। तुम अपने क्षात्रधर्मका अनुष्ठान करो अर्थात् युद्ध करो। इसका त्याग मत करो।

'जेतासि रणे सप्लान्'—इस युद्धमें तुम वैरियोंको जीतोगे। ऐसा कहनेका तात्पर्य है कि पहले (गीता—दूसरे अध्यायके छठे श्लोकमें) अर्जुनके कहा था कि हम उनको जीतेंगे या वे हमें जीतेंगे—इसका हमें पता नहीं। इस प्रकार अर्जुनके मनमें सन्देह था। यहाँ ग्यारहवें अध्यायके आरम्भमें भगवान्ने अर्जुनको विश्वरूप देखनेकी आज्ञा दी, तो उसमें भगवान्ने कहा कि तुम और भी जो कुछ देखना चाहो, वह देख लो (सातवाँ श्लोक) अर्थात् किसकी जय होगी और किसकी पराजय होगी—यह भी तुम देख लो। फिर भगवान्ने विराट्रूपके अन्तर्गत भीष्म, द्रोण और कर्णके नाशकी बात दिखा दी और इस श्लोकमें वह बात स्पष्टरूपसे कह दी कि युद्धमें निःसन्देह तुम्हारी विजय होगी।

विशेष बात

साधकको अपने साधनमें बाधकरूपसे नाशवान् पदार्थोंका, व्यक्तियोंका जो आकर्षण दीखता है, उससे वह घबरा जाता है कि मेरा उद्योग कुछ भी काम नहीं कर रहा है; अतः यह आकर्षण कैसे मिटे! भगवान् 'मयैवेते निहताः पूर्वमेव' और 'मया हतांस्तं जहि' पदोंसे ढाढ़स बँधाते हुए मानो

परिशिष्ट भाव —भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि ये सभी शूरवीर मेरे द्वारा पहलेसे ही मारे हुए हैं। इससे यह समझना चाहिये कि साधकके राग-द्वेष, काम-क्रोध आदि भी पहलेसे ही मारे हुए हैं अर्थात् सत्तारहित हैं। इनको हमने ही सत्ता और महत्ता देकर अपनेमें स्वीकार किया है। वास्तवमें इनकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं—'नासतो विद्यते भावः' (गीता २।१६)।

सम्बन्ध—विराट्रूप भगवान्के अत्यन्त उग्ररूपको देखकर अर्जुनने इकतीसवें श्लोकमें पूछा कि आप कौन हैं और यहाँ क्या करने आये हैं? बत्तीसवें श्लोकमें भगवान्ने उसका उत्तर दिया कि मैं बढ़ा हुआ काल हूँ और सबका संहार करनेके लिये यहाँ आया हूँ। फिर तैंतीसवें-चौतीसवें श्लोकोंमें भगवान्ने अर्जुनको आश्वासन दिया कि मेरे द्वारा मारे हुएको ही तू मार दे, तेरी जीत होगी। इसके बाद अर्जुनने क्या किया—इसको संजय आगेके श्लोकमें बताते हैं।

यह आश्वासन देते हैं कि तुम्हारेको अपने साधनमें जो वस्तुओं आदिका आकर्षण दिखायी देता है और वृत्तियाँ खराब होती हुई दीखती हैं, ये सब-के-सब विघ्न नाशवान् हैं और मेरे द्वारा नष्ट किये हुए हैं। इसलिये साधक इनको महत्त्व न दे।

'दुर्गुण-दुराचार दूर नहीं हो रहे हैं, क्या करूँ!—ऐसी चिन्ता होनेमें तो साधकका अभिमान ही कारण है और 'ये दूर होने चाहिये और जल्दी होने चाहिये'—इसमें भगवान्के विश्वासकी, भरोसेकी, आश्रयकी कमी है। दुर्गुण-दुराचार अच्छे नहीं लगते, सुहाते नहीं, इसमें दोष नहीं है। दोष है चिन्ता करनेमें। इसलिये साधकको कभी चिन्ता नहीं करनी चाहिये।

'मेरे द्वारा मारे हुएको तू मार'—इस कथनसे यह शंका होती है कि कालरूप भगवान्के द्वारा सब-के-सब मारे हुए हैं तो संसारमें कोई किसीको मारता है तो वह भगवान्के द्वारा मारे हुएको ही मारता है। अतः मारनेवालेको पाप नहीं लगना चाहिये। इसका समाधान यह है कि किसीको मारनेका या दुःख देनेका अधिकार मनुष्यको नहीं है। उसका तो सबकी सेवा करनेका, सबको सुख पहुँचानेका ही अधिकार है। अगर मारनेका अधिकार मनुष्यको होता तो विधि-निषेध अर्थात् शुभ-कर्म करो, अशुभ-कर्म मत करो—ऐसा शास्त्रोंका, गुरुजनों और सन्तोंका कहना ही व्यर्थ हो जायगा। वह विधि-निषेध किसपर लागू होगा? अतः मनुष्य किसीको मारता है या दुःख देता है तो उसको पाप लगेगा ही; क्योंकि यह उसकी राग-द्वेषपूर्वक अनधिकार चेष्टा है। परन्तु क्षत्रियके लिये शास्त्रविहित युद्ध प्राप्त हो जाय, तो स्वार्थ और अहंकारका त्याग करके कर्तव्य-पालन करनेसे पाप नहीं लगता, क्योंकि यह क्षत्रियका स्वधर्म है।

७७६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ११ ]

संजय उवाच

एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताज्जलिवैपमानः किरिटी । नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगदगदं भीतभीतः प्रणाम्य ॥ ३५ ॥

संजय बोले—

केशवस्य= भगवान् केशवकाकृताज्जलिः= हाथ जोड़करप्रणाम्य= प्रणाम
एतत्= यहनमस्कृत्वा= नमस्कार करकेकरके
वचनम्= वचन(और)सगदगदम्= गदगद वाणीसे
श्रुत्वा= सुनकरभीतभीतः= भयभीत होते हुएकृष्णम्= भगवान्
वेषमानः= (भयसे) काँपते हुएएव= भीकृष्णसे
किरीटी= किरिटीधारी अर्जुनभूयः= फिरआह= बोले।

व्याख्या—‘एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताज्जलिवैपमानः किरिटी’—अर्जुन तो पहलेसे भयभीत थे ही, फिर भगवान्ने ‘मैं काल हूँ, सबको खा जाऊँगा’—ऐसा कहकर मानो डरे हुएको और डरा दिया। तात्पर्य है कि ‘कालोऽस्मि’—यहाँसे लेकर ‘मया हतास्त्वं जहि’—यहाँतक भगवान्ने नाश-ही-नाशकी बात बतायी। इसे सुनकर अर्जुन डरके मारे काँपने लगे और हाथ जोड़कर बार-बार नमस्कार करने लगे।

अर्जुनने इन्द्रकी सहायताके लिये जब काल, खंज आदि राक्षसोंको मारा था, तब इन्द्रने प्रसन्न होकर अर्जुनको सूर्यके समान प्रकाशवाला एक दिव्य ‘किरीट’ (मुकुट) दिया था। इसीसे अर्जुनका नाम ‘किरीटी’ पड़ गया*। यहाँ ‘किरीटी’ कहनेका तात्पर्य है कि जिन्होंने बड़े-बड़े राक्षसोंको मारकर इन्द्रकी सहायता की थी, वे अर्जुन भी भगवान्के विराटरूपको देखकर कम्पित हो रहे हैं।

‘नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगदगदं भीतभीतः प्रणाम्य’—काल सबका भक्षण करता है; किसीको भी छोड़ता नहीं। कारण कि यह भगवान्की संहारशक्ति है, जो हरदम संहार करती ही रहती है। इधर अर्जुनने जब भगवान्के अत्युग्र विराटरूपको देखा तो उनको लगा कि भगवान् कालके भी काल—महाकाल हैं। उनके सिवाय दूसरा कोई भी कालसे बचानेवाला नहीं है। इसलिये अर्जुन भयभीत होकर भगवान्को बार-बार प्रणाम करते हैं।

‘भूयः’ कहनेका तात्पर्य है कि पहले पंद्रहवेंसे इकतीसवें श्लोकतक अर्जुनने भगवान्की स्तुति और नमस्कार किया, अब फिर भगवान्की स्तुति और नमस्कार करते हैं।

हर्षसे भी वाणी गदगद होती है और भयसे भी। यहाँ भयका विषय है। अगर अर्जुन बहुत ज्यादा भयभीत होते तो वे बोल ही न सकते। परन्तु अर्जुन गदगद वाणीसे बोलते हैं। इससे सिद्ध होता है कि वे इतने भयभीत नहीं हैं।

सम्बन्ध—अब आगेके श्लोकसे अर्जुन भगवान्की स्तुति करना आरम्भ करते हैं।

अर्जुन उवाच

स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च । रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः ॥ ३६ ॥

अर्जुन बोले—

हृषीकेश= हे अन्तर्यामीलीलाका) कीर्तन= और
भगवन्!करनेसेअनुरज्यते= अनुराग-(प्रेम)
तव= आपकेजगत्= यह सम्पूर्ण जगत्को प्राप्त हो
प्रकीर्त्या= (नाम, गुण,प्रहृष्यति= हर्षित हो रहा हैरहा है।
  • पुरा शक्रेण मे दत्तं युध्यतो दानवर्षभैः। किरिटं मूर्ध्नि सूर्याभं तेनाहर्मा किरिटिनम् ॥ (महा० विराट० ४४।१७)

श्लोक ३६ ]

  • साधक-संजीवनी *

७७७

भीतानि= (आपके नाम, गुण आदिके कीर्तनसे)द्रवन्ति= भागते हुए जा रहे हैंनमस्यन्ति= आपको नमस्कार कर रहे हैं।
रक्षांसि= राक्षसलोग= औरस्थाने= यह सब होना उचित
दिशः= दसों दिशाओंमेंसर्वे= सम्पूर्णही है।
सिद्धसङ्घः= सिद्धगण

व्याख्या —[संसारमें यह देखा जाता है कि जो व्यक्ति अत्यन्त भयभीत हो जाता है, उससे बोला नहीं जाता। अर्जुन भगवान्का अत्युग्ररूप देखकर अत्यन्त भयभीत हो गये थे। फिर उन्होंने इस (छत्तीसवें) श्लोकसे लेकर छियालीसवें श्लोकतक भगवान्की स्तुति कैसे की? इसका समाधान यह है कि यद्यपि अर्जुन भगवान्के अत्यन्त उग्र (भयानक) विश्वरूपको देखकर भयभीत हो रहे थे, तथापि वे भयभीत होनेके साथ-साथ हर्षित भी हो रहे थे, जैसा कि अर्जुनने आगे कहा है—‘अदृष्टपूर्व हषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ’ (११।४५)। इससे सिद्ध होता है कि अर्जुन इतने भयभीत नहीं हुए थे, जिससे कि वे भगवान्की स्तुति भी न कर सकें।]

‘हृषीकेश’ —इन्द्रियोंका नाम ‘हृषीक’ है और उनके ‘ईश’ अर्थात् मालिक भगवान् हैं। यहाँ इस सम्बोधनका तात्पर्य है कि आप सबके हृदयमें विराजमान रहकर इन्द्रियाँ, अन्तःकरण आदिको सत्ता-स्फूर्ति देनेवाले हैं।

‘तव प्रकीर्त्या जगत्प्रह्व्यत्यनुरज्यते च’ —संसारसे विमुख होकर आपको प्रसन्न करनेके लिये भक्तलोग आपके नामोंका, गुणोंका कीर्तन करते हैं, आपकी लीलाके पद गाते हैं, आपके चरित्रोंका कथन और श्रवण करते हैं, तो इससे सम्पूर्ण जगत् हर्षित होता है। तात्पर्य यह है कि संसारकी तरफ चलनेसे तो सबको जलन होती है, परस्पर राग-द्वेष पैदा होते हैं, पर जो आपके सम्मुख होकर आपका भजन-कीर्तन करते हैं, उनके द्वारा मात्र जीवोंको शान्ति मिलती है, मात्र जीव प्रसन्न हो जाते हैं! उन जीवोंको पता लगे चाहे न लगे, पर ऐसा होता है।

जैसे भगवान् अवतार लेते हैं तो सम्पूर्ण स्थावर-जंगम, जड-चेतन जगत् हर्षित हो जाता है अर्थात् वृक्ष, लता आदि स्थावर; देवता, मनुष्य, ऋषि, मुनि, किन्नर, गन्धर्व, पशु, पक्षी आदि जंगम; नदी, सरोवर आदि जड—सब-के-सब

प्रसन्न हो जाते हैं। ऐसे ही भगवान्के नाम, लीला, गुण आदिके कीर्तनका सधीपर असर पड़ता है और सभी हर्षित होते हैं।

भगवान्के नामों और गुणोंका कीर्तन करनेसे जब मनुष्य हर्षित हो जाते हैं अर्थात् उनका मन भगवान्में तल्लीन हो जाता है, तब (भगवान्की तरफ वृत्ति होनेसे,) उनका भगवान्में अनुराग, प्रेम हो जाता है।

‘रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति’ —जितने राक्षस हैं; भूत, प्रेत, पिशाच हैं, वे सब-के-सब आपके नामों और गुणोंका कीर्तन करनेसे, आपके चरित्रोंका पठन-कथन करनेसे भयभीत होकर भाग जाते हैं।*

राक्षस, भूत, प्रेत आदिके भयभीत होकर भाग जानेमें भगवान्के नाम, गुण आदि कारण नहीं हैं, प्रत्युत उनके अपने खुदके पाप ही कारण हैं। अपने पापोंके कारण ही वे पवित्रोंमें महान् पवित्र और मंगलोंमें महान् मंगलस्वरूप भगवान्के गुणगानको सह नहीं सकते और जहाँ गुणगान होता है, वहाँ वे टिक नहीं सकते। अगर उनमेंसे कोई टिक जाता है तो उसका सुधार हो जाता है, उसकी वह दुष्ट योनि छूट जाती है और उसका कल्याण हो जाता है।

‘सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घः’ —‘सिद्धोंके, सन्त-महात्माओंके और भगवान्की तरफ चलनेवाले साधकोंके जितने समुदाय हैं, वे सब-के-सब आपके नामों और गुणोंके कीर्तनको तथा आपकी लीलाओंको सुनकर आपको नमस्कार करते हैं।

यह ध्यान रहे कि यह सब-का-सब दृश्य भगवान्के नित्य, दिव्य, अलौकिक विराट्रूपमें ही है। उसीमें एक-एकसे विचित्र लीलाएँ हो रही हैं।

‘स्थाने’ —यह सब यथोचित ही है और ऐसा ही होना चाहिये तथा ऐसा ही हो रहा है। कारण कि आपकी तरफ चलनेसे शान्ति, आनन्द, प्रसन्नता होती है, विघ्नोंका

  • न यत्र श्रवणादीनि रक्षोज्ञानि स्वकर्मसु। कुर्वन्ति सात्वात्तां भर्तृयार्तुधान्यश्च तत्र हि॥ (श्रीमद्भगवद्गीता १०।६।३)

‘जहाँ लोग अपने प्रतिदिनके कामोंमें राक्षसोंके भयको दूर भगानेवाले भगवान्के नाम, गुण, लीलाके श्रवण, कीर्तन आदि नहीं करते, वहाँ ऐसी राक्षसियोंका बल चलता है।’

७७८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ११ ]

नाश होता है, और आपसे विमुख होनेपर दुःख-ही-दुःख, अशान्ति-ही-अशान्ति होती है। तात्पर्य है कि आपका अंश जीव आपके सम्मुख होनेसे सुख पाता है, उसमें शान्ति, क्षमा, नम्रता आदि गुण प्रकट हो जाते हैं और आपके विमुख होनेसे दुःख पाता है—यह सब उचित ही है।

यह जीवात्मा परमात्मा और संसारके बीचका है। यह स्वरूपसे तो साक्षात् परमात्माका अंश है और प्रकृतिके

परिशिष्ट भाव— यहाँ ‘स्थाने’ पद पीछे और आगे—दोनों जगह आये श्लोकोंके लिये समझना चाहिये। भगवान्ने बत्तीसवें, तैंतीसवें और चौंतीसवें श्लोकोंमें जो बात कही थी और जो बात इस श्लोकमें कही है, उसके लिये अर्जुन कहते हैं कि ‘प्रतिपक्षके सभी योद्धा मेरे द्वारा मारे हुए हैं, तू केवल निमित्त बन जा’ आदि जो कुछ आपने कहा है, वह आपका कथन उचित ही है। ‘आपके नाम, गुण आदिका कीर्तन करनेसे जगत् हर्षित हो रहा है और राक्षसलोग भयभीत होकर भाग रहे हैं’ आदि जो हो रहा है, वह भी ठीक ही हो रहा है। आपके द्वारा ही यह सब लीला हो रही है, मेरे द्वारा नहीं।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें ‘स्थाने’ पदसे जो औचित्य बताया है, उसकी आगेके चार श्लोकोंमें पुष्टि करते हैं।

कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रै ।

अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥ ३७ ॥

महात्मन् = हे महात्मन् ! गरीयसे = गुरुओंके भी गुरु च = और ब्रह्मणः = ब्रह्माके अपि = भी आदिकर्त्रै = आदिकर्ता ते = आपके लिये (वे)

सिद्धगण) कस्मात्, न, नमेरन् = नमस्कार क्यों नहीं करें ? अनन्त = (क्योंकि) हे अनन्त ! देवेश = हे देवेश ! जगन्निवास = हे जगन्निवास !

त्वम् = आप अक्षरम् = अक्षरस्वरूप है; सत् = (आप) सत् भी हैं, असत् = असत् भी हैं (और) तत्परम् = उनसे (सत्- असत्से) पर भी यत् = जो कुछ है, (वह भी आप ही हैं।)

व्याख्या—‘कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रै’ —आदिरूपसे प्रकट होनेवाले महान् स्वरूप आपको (पूर्वोक्त सिद्धगण) नमस्कार क्यों न करें ? नमस्कार दोको किया जाता है—(१) जिनसे मनुष्यको शिक्षा मिलती है, प्रकाश मिलता है, ऐसे आचार्य, गुरुजन आदिको नमस्कार किया जाता है और (२) जिनसे हमारा जन्म हुआ है, उन माता-पिताको तथा आयु, विद्या आदिमें अपनेसे बड़े पुरुषोंको नमस्कार किया जाता है। अर्जुन कहते हैं कि आप गुरुओंके भी गुरु हैं—‘गरीयसे’* और

आप सृष्टिकी रचना करनेवाले पितामह ब्रह्माजीको भी उत्पन्न करनेवाले हैं—‘ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रै’। अतः सिद्ध महापुरुष आपको नमस्कार करें, यह उचित ही है।

‘अनन्त’—आपको देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदि किसीकी भी दृष्टिसे देखें, आपका अन्त नहीं आता। तात्पर्य है कि आपको देशकी दृष्टिसे देखें तो आपका कहाँसे आरम्भ हुआ है और कहाँ जाकर अन्त होगा—ऐसा है ही नहीं। कालकी दृष्टिसे देखा जाय तो आप कबसे हैं और कबतक रहेंगे—इसका कोई अन्त नहीं है। वस्तु, व्यक्ति

  • पतंजलि महाराजने कहा है कि वे परमात्मा पहले-से-पहले जो ब्रह्मा आदि प्रकट हुए हैं, उनके भी गुरु हैं—‘पूर्वेषामपि गुरुः।’ (योगदर्शन १।२६)

श्लोक ३८ ]

  • साधक-संजीवनी *

७७९

आदिकी दृष्टिसे देखें तो आप वस्तु, व्यक्ति आदि कितने रूपोंमें हैं—इसका कोई आदि और अन्त नहीं है। सब दृष्टियोंसे आप अनन्त-ही-अनन्त हैं। बुद्धि आदि कोई भी दृष्टि आपको देखने जाती है तो वह दृष्टि खत्म हो जाती है, पर आपका अन्त नहीं आता। इसलिये सब तरफसे आप सीमारहित हैं, अपार हैं, अगाध हैं।

'देवेश'—इन्द्र, वरुण आदि अनेक देवता हैं, जिनका शास्त्रोंमें वर्णन आता है। उन सब देवताओंके आप मालिक हैं, नियन्ता हैं, शासक हैं। इसलिये आप 'देवेश' हैं।

'जगन्निवास'—अनन्त सृष्टियाँ आपके किसी अंशमें विस्तृत रूपसे निवास कर रही हैं, तो भी आपका वह अंश पूरा नहीं होता, प्रत्युत खाली ही रहता है। ऐसे आप असौम

परिशिष्ट भाव —नवें अध्यायमें आये 'सदसच्चाहम्' (९।१९) पदसे और यहाँ आये 'सदसत्तत्परं यत्' पदोंसे परमात्माके सगुण रूपकी अनन्तता, समग्रता सिद्ध होती है।

सत् और असत्—दोनों सापेक्ष होनेसे लौकिक हैं और जो इनसे परे है, वह निरपेक्ष होनेसे अलौकिक है। लौकिक और अलौकिक—दोनों ही समग्र परमात्माके रूप हैं। परमात्माकी परा और अपरा प्रकृति सत्-असत्से परे नहीं है, पर परमात्मा सत्-असत्से परे भी हैं—'मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति धनंजय' (गीता ७।७)।

सगुण (समग्र) के अन्तर्गत तो निर्गुण आ सकता है, पर निर्गुणके अन्तर्गत सगुण नहीं आ सकता। कारण कि सगुणमें निर्गुणका निषेध नहीं है, जबकि निर्गुणमें गुणोंका निषेध है। अतः निर्गुण एकदेशीय होता है अर्थात् उसके अन्तर्गत सब कुछ नहीं आता। परन्तु सगुण (समग्र) के अन्तर्गत सब कुछ आ जाता है, कुछ भी बाकी नहीं रहता। इसलिये अर्जुन 'सदसत्तत्परं यत्' पदोंसे मानो यह कहते हैं कि सत् भी आप हैं, असत् भी आप हैं और सत्-असत्के सिवाय जो भी हमारी कल्पनामें आ सकता है, वह भी आप ही हैं। ज्ञानकी दृष्टिसे जो न सत् कहा जा सकता है और न असत् कहा जा सकता है, वह अनिर्वचनीय तत्त्व भी आप ही हैं—'न सत्तन्नासदुच्यते' (गीता १३।१२)। तात्पर्य है कि आपके सिवाय न तो कोई हुआ है, न कोई है, न कोई होगा और न कोई हो ही सकता है अर्थात् केवल आप-ही-आप हैं।

त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।

वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूपम् ॥ ३८ ॥

त्वम्= आप (ही)विश्वस्य= संसारकेपरम्= परम
आदिदेवः= आदिदेवपरम्= परमधाम= धाम
= औरनिधानम्= आश्रय हैं।असि= हैं।
पुराणः= पुराणवेत्ता= (आप ही) सबकोअनन्तरूप= हे अनन्तरूप!
पुरुषः= पुरुष हैं (तथा)जाननेवाले,त्वया= आपसे (ही)
त्वम्= आप (ही)वेद्यम्= जाननेयोग्यविश्वम्= सम्पूर्ण संसार
अस्य= इस= औरततम्= व्याप्त है।

व्याख्या— 'त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः'—आप सम्पूर्ण प्रकट होते हैं। आप पुराणपुरुष हैं; क्योंकि आप सदासे देवताओंके आदिदेव हैं; क्योंकि सबसे पहले आप ही हैं और सदा ही रहनेवाले हैं।

  • इसी अक्षर ब्रह्मको अर्जुनने पहले 'त्वमक्षरं परमं वेदितव्यम्' (११।१८) पदोंसे और यहाँ 'त्वमक्षरम्' पदसे कहा है।

७८०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ११ ]

‘त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्’—देखने, सुनने, समझने और जाननेमें जो कुछ संसार आता है; और संसारकी उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय आदि जो कुछ होता है, उस सबके परम आधार आप हैं।

‘वेत्तासि’—आप सम्पूर्ण संसारको जाननेवाले हैं अर्थात् भूत, भविष्य और वर्तमान काल तथा देश, वस्तु, व्यक्ति आदि जो कुछ है, उन सबको जाननेवाले (सर्वज्ञ) आप ही हैं।

‘वेद्यम्’—वेदों, शास्त्रों, सन्त-महात्माओं आदिके

परिशिष्ट भाव—अर्जुन भगवान्की कही बातको ही देवानां महर्षीणां च सर्वशः’ (१०।२) पदोंसे कहा विदध्यनादी उभावपि’ (१३।१९), तथापि अनादि होते हुए भी प्रकृति परमात्माके अधीन, आश्रित है। कारण कि प्रकृति परमात्माकी परिवर्तनशील शक्ति है, पर परमात्मा किसीकी शक्ति नहीं हैं, प्रत्युत शक्तिमान् हैं।

‘पुराणः’—इसको भगवान्ने ‘पुराणम्’ (८।९) पदसे कहा था। भगवान्ने पुराना कोई नहीं है; क्योंकि वे कालातीत हैं।

‘परं निधानम्’—इसको भगवान्ने ‘निधानम्’ (९।१८) पदसे कहा था। सृष्टि अनन्त है, पर वह भी भगवान्के एक देशमें रहती है।

‘वेत्ता’—इसको भगवान्ने ‘वेदाहं समतीतानि०’ (७।२६) आदि पदोंसे कहा था।

‘वेद्यम्’—इसको भगवान्ने ‘वेद्यम्’ (९।१७) पदसे कहा था।

‘परं धाम’—इसको भगवान्ने ‘यं प्राप्य न निवर्तते तद्भ्राम परमं मम’ (८।२१) पदोंसे कहा था।

‘त्वया ततं विश्वम्’—इसको भगवान्ने ‘येन सर्वमिदं ततम्’ (८।२२) और ‘मया ततमिदं सर्वम्’ (९।४) पदोंसे कहा था।

द्वारा जाननेयोग्य केवल आप ही हैं।

‘परं धाम’—जिसको मुक्ति, परमपद आदि नामोंसे कहते हैं, जिसमें जाकर फिर लौटकर नहीं आना पड़ता और जिसको प्राप्त करनेपर करना, जानना और पाना कुछ भी बाकी नहीं रहता, ऐसे परमधाम आप हैं।

‘अनन्तरूप’—विराटरूपसे प्रकट हुए आपके रूपोंका कोई पारावार नहीं है। सब तरफसे ही आपके अनन्त रूप हैं।

‘त्वया ततं विश्वम्’—आपसे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है अर्थात् संसारके कण-कणमें आप ही व्याप्त हो रहे हैं।

कह रहे हैं—‘आदिदेवः’—इसको भगवान्ने ‘अहमादिहिं’ (१०।२) पदोंसे कहा था। यद्यपि प्रकृति भी अनादि है—‘प्रकृतिं पुरुषं चैव विदध्यनादी उभावपि’ (१३।१९), तथापि अनादि होते हुए भी प्रकृति परमात्माके अधीन, आश्रित है। कारण कि प्रकृति परमात्माकी परिवर्तनशील शक्ति है, पर परमात्मा किसीकी शक्ति नहीं हैं, प्रत्युत शक्तिमान् हैं।

‘पुराणः’—इसको भगवान्ने ‘पुराणम्’ (८।९) पदसे कहा था। भगवान्ने पुराना कोई नहीं है; क्योंकि वे कालातीत हैं।

‘परं निधानम्’—इसको भगवान्ने ‘निधानम्’ (९।१८) पदसे कहा था। सृष्टि अनन्त है, पर वह भी भगवान्के एक देशमें रहती है।

‘वेत्ता’—इसको भगवान्ने ‘वेदाहं समतीतानि०’ (७।२६) आदि पदोंसे कहा था।

‘वेद्यम्’—इसको भगवान्ने ‘वेद्यम्’ (९।१७) पदसे कहा था।

‘परं धाम’—इसको भगवान्ने ‘यं प्राप्य न निवर्तते तद्भ्राम परमं मम’ (८।२१) पदोंसे कहा था।

‘त्वया ततं विश्वम्’—इसको भगवान्ने ‘येन सर्वमिदं ततम्’ (८।२२) और ‘मया ततमिदं सर्वम्’ (९।४) पदोंसे कहा था।

वायुर्धर्मोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।

नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥ ३९ ॥

त्वम् = आप ही

वायुः = वायु,

यमः = यमराज,

अग्निः = अग्नि,

वरुणः = वरुण,

शशाङ्कः = चन्द्रमा,

प्रजापतिः = दक्ष आदि प्रजापति

च = और

प्रपितामहः = प्रपितामह (ब्रह्मा-

जीके भी पिता)

हैं।

ते = आपको

सहस्रकृत्वः = हजारों बार

नमः = नमस्कार

अस्तु = हो!

नमः = नमस्कार हो!

च = और

पुनः = फिर

अपि = भी

ते = आपको

भूयः = बार-बार

नमः = नमस्कार हो!

नमः = नमस्कार हो!

व्याख्या—‘वायुः’—जिससे सबको प्राण मिल रहे हैं, मात्र प्राणी जी रहे हैं, सबको सामर्थ्य मिल रही है, वह वायु आप ही हैं।

‘यमः’—जो संयमनीपुरीके अधिपति हैं और सम्पूर्ण संसारपर जिनका शासन चलता है, वे यम आप ही हैं।

‘अग्निः’—जो सबमें व्याप्त रहकर शक्ति देता है, प्रकट होकर प्रकाश देता है और जठराग्निके रूपमें अन्नका पाचन करता है, वह अग्नि आप ही हैं।

‘वरुणः’—जिसके द्वारा सबको जीवन मिल रहा है, उस जलके अधिपति वरुण आप ही हैं।

श्लोक ४० ]

  • साधक-संजीवनी *

७८९

‘शशाङ्कः’—जिससे सम्पूर्ण ओषधियोंका, वनस्पतियों-का पोषण होता है, वह चन्द्रमा आप ही हैं।

‘प्रजापतिः’—प्रजाको उत्पन्न करनेवाले दक्ष आदि प्रजापति आप ही हैं।

‘प्रपितामहः’—पितामह ब्रह्माजीको भी प्रकट करनेवाले होनेसे आप प्रपितामह हैं।

‘नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते’—इन्द्र आदि जितने भी देवता हैं, वे सब-के-सब आप ही हैं। आप अनन्तस्वरूप हैं। आपकी मैं क्या स्तुति करूँ ? क्या महिमा गाऊँ ? मैं तो आपको हजारों

बार नमस्कार ही कर सकता हूँ और कर ही क्या सकता हूँ ?

कुछ भी करनेकी जिम्मेवारी मनुष्यपर तभीतक रहती है, जबतक अपनेमें करनेका बल अर्थात् अभिमान रहता है। जब अपनेमें कुछ भी करनेकी सामर्थ्य नहीं रहती, तब करनेकी जिम्मेवारी बिल्कुल नहीं रहती। अब वह केवल नमस्कार ही करता है अर्थात् अपने-आपको सर्वथा भगवान्के समर्पित कर देता है। फिर करने-करानेका सब काम शरण्य-(भगवान्-) का ही रहता है, शरणागतका नहीं।

नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।

अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्व समाजोषि ततोऽसि सर्वः ॥ ४० ॥

सर्व = हे सर्वस्वरूप !

ते = आपको

पुरस्तात् = आगेसे (भी)

नमः = नमस्कार हो

अथ = और

पृष्ठतः = पीछेसे (भी नमस्कार हो !)

ते = आपको

सर्वतः = सब ओरसे (दसों

दिशाओंसे)

एव = ही

नमः = नमस्कार

अस्तु = हो

अनन्तवीर्य = हे अनन्तवीर्य !

अमित-

विक्रमः = असीम पराक्रमवाले

त्वम् = आपने

सर्वम् = सबको (एक देशमें)

समाजोषि = समेट रखा है ;

ततः = अतः

सर्वः = सब कुछ

असि = (आप ही) हैं।

व्याख्या—‘नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व’—अर्जुन भयभीत हैं। मैं क्या बोल्ता—यह उनकी समझमें नहीं आ रहा है। इसलिये वे आगेसे, पीछेसे सब ओरसे अर्थात् दसों दिशाओंसे केवल नमस्कार-ही-नमस्कार कर रहे हैं।

‘अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं’—‘अनन्तवीर्य’

कहनेका तात्पर्य है कि आप तेज, बल आदिसे भी अनन्त हैं; और ‘अमितविक्रम’ कहनेका तात्पर्य है कि आपके पराक्रमयुक्त संरक्षण आदि कार्य भी असीम हैं। इस

तरह आपकी शक्ति भी अनन्त है और पराक्रम भी अनन्त है।

‘सर्व समाजोषि ततोऽसि सर्वः’—आपने सबको समावृत कर रखा है अर्थात् सम्पूर्ण संसार आपके अन्तर्गत है। संसारका कोई भी अंश ऐसा नहीं है, जो कि आपके अन्तर्गत न हो।

अर्जुन एक बड़ी अलौकिक, विलक्षण बात देख रहे हैं कि भगवान् अनन्त सृष्टियोंमें परिपूर्ण, व्याप्त हो रहे हैं, और अनन्त सृष्टियाँ भगवान्के किसी अंशमें हैं।

परिशिष्ट भाव —भगवान्के दिव्य विराट्रूपको देखकर अर्जुनने कहा कि आप अपने तेजसे संसारको संतप्त कर रहे हैं—‘स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्’ (११।१९) तो संतप्त करनेवाले और संतप्त होनेवाले—दोनों एक ही विराट्रूपके अंग हैं। भगवान्के उग्ररूपको देखकर तीनों लोक व्यथित (व्याकुल) हो रहे हैं—‘लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्’ (११।२०) तो व्यथित होनेवाली त्रिलोकी भी भगवान्के विराट्रूपका ही अंग है। भगवान्को देखकर देवता भयभीत होकर उनका गुणगान कर रहे हैं—‘केचिद्भीताः प्रांजलयो गृणन्ति’ (११।२१) और राक्षसलोग भयभीत होकर दसों दिशाओंमें भाग रहे हैं—‘रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति’ (११।३६) तो भयभीत होनेवाले देवता और राक्षस भी भगवान्के विराट्रूपके ही अंग हैं। कारण कि ये देवता, राक्षस आदि कुरुक्षेत्रमें नहीं थे, प्रत्युत भगवान्के विराट्रूपमें ही अर्जुनको दीख रहे थे।

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ११ ]

ब्रह्मा, विष्णु, शंकर, रुद्र, आदित्य, वसु, साध्यगण, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार, मरुद्रगण, पितृगण, सर्प, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, असुर, ऋषि-महर्षि, सिद्धगण, वायु, यमराज, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, सूर्य आदि और इनके सिवाय भीष्म, द्रोण, कर्ण, जयद्रथ आदि समस्त राजालोग—ये सब-के-सब दिव्य विराट्‌रूपके ही अंग हैं। इतना ही नहीं, अर्जुन, संजय, धृतराष्ट्र तथा कौरव और पाण्डवसेना भी उसी विराट्‌रूपके ही अंग हैं—‘सर्वं समानोषि ततोऽसि सर्वः’।

तात्पर्य है कि जड़-चेतन, स्थावर-जंगमरूपसे जो कुछ देखने, सुनने, सोचनेमें आ रहा है, वह सब अविनाशी भगवान् ही हैं। इसका अनुभव करनेके लिये साधकको दृढ़तासे यह मान लेना चाहिये कि चाहे मेरी समझमें आये या न आये, अनुभवमें आये या न आये, स्वीकार हो या न हो, पर बात यही सच्ची है। जैसे जलके एक कणमें और समुद्रमें एक ही जल-तत्त्व परिपूर्ण है, ऐसे ही छोटी-से-छोटी और बड़ी-से-बड़ी प्रत्येक वस्तुमें एक ही परमात्मतत्त्व परिपूर्ण है—ऐसा मानकर वह हर समय मन-ही-मन सबको नमस्कार करता रहे। उसको वृक्ष, नदी, पहाड़, पत्थर, दीवार आदि जो कुछ भी दीखे, उसमें अपने इष्ट भगवान्‌को देखकर वह प्रार्थना करे कि ‘हे नाथ! मुझे अपना प्रेम प्रदान करो, हे प्रभो! आपको मेरा नमस्कार हो’। ऐसा करनेसे उसको सब जगह भगवान् दीखने लग जायेंगे; क्योंकि वास्तवमें सब कुछ भगवान् ही हैं।

सम्बन्ध—अब आगेके दो श्लोकोंमें अर्जुन भगवान्‌से प्रार्थना करते हुए क्षमा माँगते हैं।

सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।

अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥ ४१ ॥

यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु।

एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥ ४२ ॥

तव= आपकीहे, यादव= हे यादव!तत्समक्षम्= उन (सखाओं, कुटुम्बियों आदि)के सामने
इदम्= इसहे, सखे= हे सखे!यत्= (मेरे द्वारा आपका) जो कुछ
महिमानम्= महिमाकोइति= इस प्रकारअसत्कृतः= तिरस्कार (अपमान) किया गया
अजानता= न जानते हुएयत्= जो कुछअसि= है;
सखा= ‘मेरे सखा हैं’उक्तम्= कहा है;अप्रमेयम्= हे अप्रमेयस्वरूप!
इति= ऐसा= औरतत्= वह सब
मत्वा= मानकरअच्युत= हे अच्युत!त्वाम्= आपसे
मया= मैंनेअवहासार्थम्= हँसी-दिल्लीगमें,अहम्= मैं
प्रमादात्= प्रमादसेविहारशय्यासन-भोजनेषुक्षामये= क्षमा करवाता हूँ
वा= अथवा= चलते-फिरते, सोते-जागते, उठते-बैठते, खाते-पीते समयअर्थात् आपसे क्षमा माँगता हूँ।
प्रणयेन= प्रेमसेएकः= अकेले
अपि= भीअथवा= अथवा
प्रसभम्= हटपूर्वक (बिना सोचे-समझे)
हे, कृष्ण= ‘हे कृष्ण!

व्याख्या—[जब अर्जुन विराट्‌भगवान्‌के अत्युग्ररूपको देखकर भयभीत होते हैं, तब वे भगवान्‌के कृष्णरूपको भूल जाते हैं और पूछ बैठते हैं कि उग्ररूपवाले आप कौन हैं? परन्तु जब उनको भगवान् श्रीकृष्णकी स्मृति आती है कि वे ये ही हैं, तब भगवान्‌के प्रभाव आदिको देखकर

उनको सखाभावसे किये हुए पुराने व्यवहारकी याद आ जाती है और उसके लिये वे भगवान्‌से क्षमा माँगते हैं।]

‘सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति’—जो बड़े आदमी होते हैं, श्रेष्ठ पुरुष होते हैं, उनको साक्षात् नामसे नहीं पुकारा जाता। उनके लिये तो