श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 783, कुल 1299 में से
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ११ ]
ब्रह्मा, विष्णु, शंकर, रुद्र, आदित्य, वसु, साध्यगण, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार, मरुद्रगण, पितृगण, सर्प, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, असुर, ऋषि-महर्षि, सिद्धगण, वायु, यमराज, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, सूर्य आदि और इनके सिवाय भीष्म, द्रोण, कर्ण, जयद्रथ आदि समस्त राजालोग—ये सब-के-सब दिव्य विराट्रूपके ही अंग हैं। इतना ही नहीं, अर्जुन, संजय, धृतराष्ट्र तथा कौरव और पाण्डवसेना भी उसी विराट्रूपके ही अंग हैं—‘सर्वं समानोषि ततोऽसि सर्वः’।
तात्पर्य है कि जड़-चेतन, स्थावर-जंगमरूपसे जो कुछ देखने, सुनने, सोचनेमें आ रहा है, वह सब अविनाशी भगवान् ही हैं। इसका अनुभव करनेके लिये साधकको दृढ़तासे यह मान लेना चाहिये कि चाहे मेरी समझमें आये या न आये, अनुभवमें आये या न आये, स्वीकार हो या न हो, पर बात यही सच्ची है। जैसे जलके एक कणमें और समुद्रमें एक ही जल-तत्त्व परिपूर्ण है, ऐसे ही छोटी-से-छोटी और बड़ी-से-बड़ी प्रत्येक वस्तुमें एक ही परमात्मतत्त्व परिपूर्ण है—ऐसा मानकर वह हर समय मन-ही-मन सबको नमस्कार करता रहे। उसको वृक्ष, नदी, पहाड़, पत्थर, दीवार आदि जो कुछ भी दीखे, उसमें अपने इष्ट भगवान्को देखकर वह प्रार्थना करे कि ‘हे नाथ! मुझे अपना प्रेम प्रदान करो, हे प्रभो! आपको मेरा नमस्कार हो’। ऐसा करनेसे उसको सब जगह भगवान् दीखने लग जायेंगे; क्योंकि वास्तवमें सब कुछ भगवान् ही हैं।
सम्बन्ध—अब आगेके दो श्लोकोंमें अर्जुन भगवान्से प्रार्थना करते हुए क्षमा माँगते हैं।
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।
अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥ ४१ ॥
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु।
एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥ ४२ ॥
| तव | = आपकी | हे, यादव | = हे यादव! | तत्समक्षम् | = उन (सखाओं, कुटुम्बियों आदि)के सामने |
|---|---|---|---|---|---|
| इदम् | = इस | हे, सखे | = हे सखे! | यत् | = (मेरे द्वारा आपका) जो कुछ |
| महिमानम् | = महिमाको | इति | = इस प्रकार | असत्कृतः | = तिरस्कार (अपमान) किया गया |
| अजानता | = न जानते हुए | यत् | = जो कुछ | असि | = है; |
| सखा | = ‘मेरे सखा हैं’ | उक्तम् | = कहा है; | अप्रमेयम् | = हे अप्रमेयस्वरूप! |
| इति | = ऐसा | च | = और | तत् | = वह सब |
| मत्वा | = मानकर | अच्युत | = हे अच्युत! | त्वाम् | = आपसे |
| मया | = मैंने | अवहासार्थम् | = हँसी-दिल्लीगमें, | अहम् | = मैं |
| प्रमादात् | = प्रमादसे | विहारशय्यासन- | भोजनेषु | क्षामये | = क्षमा करवाता हूँ |
| वा | = अथवा | = चलते-फिरते, सोते-जागते, उठते-बैठते, खाते-पीते समय | अर्थात् आपसे क्षमा माँगता हूँ। | ||
| प्रणयेन | = प्रेमसे | एकः | = अकेले | ||
| अपि | = भी | अथवा | = अथवा | ||
| प्रसभम् | = हटपूर्वक (बिना सोचे-समझे) | ||||
| हे, कृष्ण | = ‘हे कृष्ण! |
व्याख्या—[जब अर्जुन विराट्भगवान्के अत्युग्ररूपको देखकर भयभीत होते हैं, तब वे भगवान्के कृष्णरूपको भूल जाते हैं और पूछ बैठते हैं कि उग्ररूपवाले आप कौन हैं? परन्तु जब उनको भगवान् श्रीकृष्णकी स्मृति आती है कि वे ये ही हैं, तब भगवान्के प्रभाव आदिको देखकर
उनको सखाभावसे किये हुए पुराने व्यवहारकी याद आ जाती है और उसके लिये वे भगवान्से क्षमा माँगते हैं।]
‘सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति’—जो बड़े आदमी होते हैं, श्रेष्ठ पुरुष होते हैं, उनको साक्षात् नामसे नहीं पुकारा जाता। उनके लिये तो