श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 782, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ४० ]
- साधक-संजीवनी *
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‘शशाङ्कः’—जिससे सम्पूर्ण ओषधियोंका, वनस्पतियों-का पोषण होता है, वह चन्द्रमा आप ही हैं।
‘प्रजापतिः’—प्रजाको उत्पन्न करनेवाले दक्ष आदि प्रजापति आप ही हैं।
‘प्रपितामहः’—पितामह ब्रह्माजीको भी प्रकट करनेवाले होनेसे आप प्रपितामह हैं।
‘नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते’—इन्द्र आदि जितने भी देवता हैं, वे सब-के-सब आप ही हैं। आप अनन्तस्वरूप हैं। आपकी मैं क्या स्तुति करूँ ? क्या महिमा गाऊँ ? मैं तो आपको हजारों
बार नमस्कार ही कर सकता हूँ और कर ही क्या सकता हूँ ?
कुछ भी करनेकी जिम्मेवारी मनुष्यपर तभीतक रहती है, जबतक अपनेमें करनेका बल अर्थात् अभिमान रहता है। जब अपनेमें कुछ भी करनेकी सामर्थ्य नहीं रहती, तब करनेकी जिम्मेवारी बिल्कुल नहीं रहती। अब वह केवल नमस्कार ही करता है अर्थात् अपने-आपको सर्वथा भगवान्के समर्पित कर देता है। फिर करने-करानेका सब काम शरण्य-(भगवान्-) का ही रहता है, शरणागतका नहीं।
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्व समाजोषि ततोऽसि सर्वः ॥ ४० ॥
सर्व = हे सर्वस्वरूप !
ते = आपको
पुरस्तात् = आगेसे (भी)
नमः = नमस्कार हो
अथ = और
पृष्ठतः = पीछेसे (भी नमस्कार हो !)
ते = आपको
सर्वतः = सब ओरसे (दसों
दिशाओंसे)
एव = ही
नमः = नमस्कार
अस्तु = हो
अनन्तवीर्य = हे अनन्तवीर्य !
अमित-
विक्रमः = असीम पराक्रमवाले
त्वम् = आपने
सर्वम् = सबको (एक देशमें)
समाजोषि = समेट रखा है ;
ततः = अतः
सर्वः = सब कुछ
असि = (आप ही) हैं।
व्याख्या—‘नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व’—अर्जुन भयभीत हैं। मैं क्या बोल्ता—यह उनकी समझमें नहीं आ रहा है। इसलिये वे आगेसे, पीछेसे सब ओरसे अर्थात् दसों दिशाओंसे केवल नमस्कार-ही-नमस्कार कर रहे हैं।
‘अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं’—‘अनन्तवीर्य’
कहनेका तात्पर्य है कि आप तेज, बल आदिसे भी अनन्त हैं; और ‘अमितविक्रम’ कहनेका तात्पर्य है कि आपके पराक्रमयुक्त संरक्षण आदि कार्य भी असीम हैं। इस
तरह आपकी शक्ति भी अनन्त है और पराक्रम भी अनन्त है।
‘सर्व समाजोषि ततोऽसि सर्वः’—आपने सबको समावृत कर रखा है अर्थात् सम्पूर्ण संसार आपके अन्तर्गत है। संसारका कोई भी अंश ऐसा नहीं है, जो कि आपके अन्तर्गत न हो।
अर्जुन एक बड़ी अलौकिक, विलक्षण बात देख रहे हैं कि भगवान् अनन्त सृष्टियोंमें परिपूर्ण, व्याप्त हो रहे हैं, और अनन्त सृष्टियाँ भगवान्के किसी अंशमें हैं।
परिशिष्ट भाव —भगवान्के दिव्य विराट्रूपको देखकर अर्जुनने कहा कि आप अपने तेजसे संसारको संतप्त कर रहे हैं—‘स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्’ (११।१९) तो संतप्त करनेवाले और संतप्त होनेवाले—दोनों एक ही विराट्रूपके अंग हैं। भगवान्के उग्ररूपको देखकर तीनों लोक व्यथित (व्याकुल) हो रहे हैं—‘लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्’ (११।२०) तो व्यथित होनेवाली त्रिलोकी भी भगवान्के विराट्रूपका ही अंग है। भगवान्को देखकर देवता भयभीत होकर उनका गुणगान कर रहे हैं—‘केचिद्भीताः प्रांजलयो गृणन्ति’ (११।२१) और राक्षसलोग भयभीत होकर दसों दिशाओंमें भाग रहे हैं—‘रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति’ (११।३६) तो भयभीत होनेवाले देवता और राक्षस भी भगवान्के विराट्रूपके ही अंग हैं। कारण कि ये देवता, राक्षस आदि कुरुक्षेत्रमें नहीं थे, प्रत्युत भगवान्के विराट्रूपमें ही अर्जुनको दीख रहे थे।