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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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पृष्ठ 781

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ११ ]

‘त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्’—देखने, सुनने, समझने और जाननेमें जो कुछ संसार आता है; और संसारकी उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय आदि जो कुछ होता है, उस सबके परम आधार आप हैं।

‘वेत्तासि’—आप सम्पूर्ण संसारको जाननेवाले हैं अर्थात् भूत, भविष्य और वर्तमान काल तथा देश, वस्तु, व्यक्ति आदि जो कुछ है, उन सबको जाननेवाले (सर्वज्ञ) आप ही हैं।

‘वेद्यम्’—वेदों, शास्त्रों, सन्त-महात्माओं आदिके

परिशिष्ट भाव—अर्जुन भगवान्की कही बातको ही देवानां महर्षीणां च सर्वशः’ (१०।२) पदोंसे कहा विदध्यनादी उभावपि’ (१३।१९), तथापि अनादि होते हुए भी प्रकृति परमात्माके अधीन, आश्रित है। कारण कि प्रकृति परमात्माकी परिवर्तनशील शक्ति है, पर परमात्मा किसीकी शक्ति नहीं हैं, प्रत्युत शक्तिमान् हैं।

‘पुराणः’—इसको भगवान्ने ‘पुराणम्’ (८।९) पदसे कहा था। भगवान्ने पुराना कोई नहीं है; क्योंकि वे कालातीत हैं।

‘परं निधानम्’—इसको भगवान्ने ‘निधानम्’ (९।१८) पदसे कहा था। सृष्टि अनन्त है, पर वह भी भगवान्के एक देशमें रहती है।

‘वेत्ता’—इसको भगवान्ने ‘वेदाहं समतीतानि०’ (७।२६) आदि पदोंसे कहा था।

‘वेद्यम्’—इसको भगवान्ने ‘वेद्यम्’ (९।१७) पदसे कहा था।

‘परं धाम’—इसको भगवान्ने ‘यं प्राप्य न निवर्तते तद्भ्राम परमं मम’ (८।२१) पदोंसे कहा था।

‘त्वया ततं विश्वम्’—इसको भगवान्ने ‘येन सर्वमिदं ततम्’ (८।२२) और ‘मया ततमिदं सर्वम्’ (९।४) पदोंसे कहा था।

द्वारा जाननेयोग्य केवल आप ही हैं।

‘परं धाम’—जिसको मुक्ति, परमपद आदि नामोंसे कहते हैं, जिसमें जाकर फिर लौटकर नहीं आना पड़ता और जिसको प्राप्त करनेपर करना, जानना और पाना कुछ भी बाकी नहीं रहता, ऐसे परमधाम आप हैं।

‘अनन्तरूप’—विराटरूपसे प्रकट हुए आपके रूपोंका कोई पारावार नहीं है। सब तरफसे ही आपके अनन्त रूप हैं।

‘त्वया ततं विश्वम्’—आपसे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है अर्थात् संसारके कण-कणमें आप ही व्याप्त हो रहे हैं।

कह रहे हैं—‘आदिदेवः’—इसको भगवान्ने ‘अहमादिहिं’ (१०।२) पदोंसे कहा था। यद्यपि प्रकृति भी अनादि है—‘प्रकृतिं पुरुषं चैव विदध्यनादी उभावपि’ (१३।१९), तथापि अनादि होते हुए भी प्रकृति परमात्माके अधीन, आश्रित है। कारण कि प्रकृति परमात्माकी परिवर्तनशील शक्ति है, पर परमात्मा किसीकी शक्ति नहीं हैं, प्रत्युत शक्तिमान् हैं।

‘पुराणः’—इसको भगवान्ने ‘पुराणम्’ (८।९) पदसे कहा था। भगवान्ने पुराना कोई नहीं है; क्योंकि वे कालातीत हैं।

‘परं निधानम्’—इसको भगवान्ने ‘निधानम्’ (९।१८) पदसे कहा था। सृष्टि अनन्त है, पर वह भी भगवान्के एक देशमें रहती है।

‘वेत्ता’—इसको भगवान्ने ‘वेदाहं समतीतानि०’ (७।२६) आदि पदोंसे कहा था।

‘वेद्यम्’—इसको भगवान्ने ‘वेद्यम्’ (९।१७) पदसे कहा था।

‘परं धाम’—इसको भगवान्ने ‘यं प्राप्य न निवर्तते तद्भ्राम परमं मम’ (८।२१) पदोंसे कहा था।

‘त्वया ततं विश्वम्’—इसको भगवान्ने ‘येन सर्वमिदं ततम्’ (८।२२) और ‘मया ततमिदं सर्वम्’ (९।४) पदोंसे कहा था।

वायुर्धर्मोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।

नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥ ३९ ॥

त्वम् = आप ही

वायुः = वायु,

यमः = यमराज,

अग्निः = अग्नि,

वरुणः = वरुण,

शशाङ्कः = चन्द्रमा,

प्रजापतिः = दक्ष आदि प्रजापति

च = और

प्रपितामहः = प्रपितामह (ब्रह्मा-

जीके भी पिता)

हैं।

ते = आपको

सहस्रकृत्वः = हजारों बार

नमः = नमस्कार

अस्तु = हो!

नमः = नमस्कार हो!

च = और

पुनः = फिर

अपि = भी

ते = आपको

भूयः = बार-बार

नमः = नमस्कार हो!

नमः = नमस्कार हो!

व्याख्या—‘वायुः’—जिससे सबको प्राण मिल रहे हैं, मात्र प्राणी जी रहे हैं, सबको सामर्थ्य मिल रही है, वह वायु आप ही हैं।

‘यमः’—जो संयमनीपुरीके अधिपति हैं और सम्पूर्ण संसारपर जिनका शासन चलता है, वे यम आप ही हैं।

‘अग्निः’—जो सबमें व्याप्त रहकर शक्ति देता है, प्रकट होकर प्रकाश देता है और जठराग्निके रूपमें अन्नका पाचन करता है, वह अग्नि आप ही हैं।

‘वरुणः’—जिसके द्वारा सबको जीवन मिल रहा है, उस जलके अधिपति वरुण आप ही हैं।