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भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 780

श्लोक ३८ ]

  • साधक-संजीवनी *

७७९

आदिकी दृष्टिसे देखें तो आप वस्तु, व्यक्ति आदि कितने रूपोंमें हैं—इसका कोई आदि और अन्त नहीं है। सब दृष्टियोंसे आप अनन्त-ही-अनन्त हैं। बुद्धि आदि कोई भी दृष्टि आपको देखने जाती है तो वह दृष्टि खत्म हो जाती है, पर आपका अन्त नहीं आता। इसलिये सब तरफसे आप सीमारहित हैं, अपार हैं, अगाध हैं।

'देवेश'—इन्द्र, वरुण आदि अनेक देवता हैं, जिनका शास्त्रोंमें वर्णन आता है। उन सब देवताओंके आप मालिक हैं, नियन्ता हैं, शासक हैं। इसलिये आप 'देवेश' हैं।

'जगन्निवास'—अनन्त सृष्टियाँ आपके किसी अंशमें विस्तृत रूपसे निवास कर रही हैं, तो भी आपका वह अंश पूरा नहीं होता, प्रत्युत खाली ही रहता है। ऐसे आप असौम

परिशिष्ट भाव —नवें अध्यायमें आये 'सदसच्चाहम्' (९।१९) पदसे और यहाँ आये 'सदसत्तत्परं यत्' पदोंसे परमात्माके सगुण रूपकी अनन्तता, समग्रता सिद्ध होती है।

सत् और असत्—दोनों सापेक्ष होनेसे लौकिक हैं और जो इनसे परे है, वह निरपेक्ष होनेसे अलौकिक है। लौकिक और अलौकिक—दोनों ही समग्र परमात्माके रूप हैं। परमात्माकी परा और अपरा प्रकृति सत्-असत्से परे नहीं है, पर परमात्मा सत्-असत्से परे भी हैं—'मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति धनंजय' (गीता ७।७)।

सगुण (समग्र) के अन्तर्गत तो निर्गुण आ सकता है, पर निर्गुणके अन्तर्गत सगुण नहीं आ सकता। कारण कि सगुणमें निर्गुणका निषेध नहीं है, जबकि निर्गुणमें गुणोंका निषेध है। अतः निर्गुण एकदेशीय होता है अर्थात् उसके अन्तर्गत सब कुछ नहीं आता। परन्तु सगुण (समग्र) के अन्तर्गत सब कुछ आ जाता है, कुछ भी बाकी नहीं रहता। इसलिये अर्जुन 'सदसत्तत्परं यत्' पदोंसे मानो यह कहते हैं कि सत् भी आप हैं, असत् भी आप हैं और सत्-असत्के सिवाय जो भी हमारी कल्पनामें आ सकता है, वह भी आप ही हैं। ज्ञानकी दृष्टिसे जो न सत् कहा जा सकता है और न असत् कहा जा सकता है, वह अनिर्वचनीय तत्त्व भी आप ही हैं—'न सत्तन्नासदुच्यते' (गीता १३।१२)। तात्पर्य है कि आपके सिवाय न तो कोई हुआ है, न कोई है, न कोई होगा और न कोई हो ही सकता है अर्थात् केवल आप-ही-आप हैं।

त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।

वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूपम् ॥ ३८ ॥

त्वम्= आप (ही)विश्वस्य= संसारकेपरम्= परम
आदिदेवः= आदिदेवपरम्= परमधाम= धाम
= औरनिधानम्= आश्रय हैं।असि= हैं।
पुराणः= पुराणवेत्ता= (आप ही) सबकोअनन्तरूप= हे अनन्तरूप!
पुरुषः= पुरुष हैं (तथा)जाननेवाले,त्वया= आपसे (ही)
त्वम्= आप (ही)वेद्यम्= जाननेयोग्यविश्वम्= सम्पूर्ण संसार
अस्य= इस= औरततम्= व्याप्त है।

व्याख्या— 'त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः'—आप सम्पूर्ण प्रकट होते हैं। आप पुराणपुरुष हैं; क्योंकि आप सदासे देवताओंके आदिदेव हैं; क्योंकि सबसे पहले आप ही हैं और सदा ही रहनेवाले हैं।

  • इसी अक्षर ब्रह्मको अर्जुनने पहले 'त्वमक्षरं परमं वेदितव्यम्' (११।१८) पदोंसे और यहाँ 'त्वमक्षरम्' पदसे कहा है।