श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ११ ]
नाश होता है, और आपसे विमुख होनेपर दुःख-ही-दुःख, अशान्ति-ही-अशान्ति होती है। तात्पर्य है कि आपका अंश जीव आपके सम्मुख होनेसे सुख पाता है, उसमें शान्ति, क्षमा, नम्रता आदि गुण प्रकट हो जाते हैं और आपके विमुख होनेसे दुःख पाता है—यह सब उचित ही है।
यह जीवात्मा परमात्मा और संसारके बीचका है। यह स्वरूपसे तो साक्षात् परमात्माका अंश है और प्रकृतिके
परिशिष्ट भाव— यहाँ ‘स्थाने’ पद पीछे और आगे—दोनों जगह आये श्लोकोंके लिये समझना चाहिये। भगवान्ने बत्तीसवें, तैंतीसवें और चौंतीसवें श्लोकोंमें जो बात कही थी और जो बात इस श्लोकमें कही है, उसके लिये अर्जुन कहते हैं कि ‘प्रतिपक्षके सभी योद्धा मेरे द्वारा मारे हुए हैं, तू केवल निमित्त बन जा’ आदि जो कुछ आपने कहा है, वह आपका कथन उचित ही है। ‘आपके नाम, गुण आदिका कीर्तन करनेसे जगत् हर्षित हो रहा है और राक्षसलोग भयभीत होकर भाग रहे हैं’ आदि जो हो रहा है, वह भी ठीक ही हो रहा है। आपके द्वारा ही यह सब लीला हो रही है, मेरे द्वारा नहीं।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें ‘स्थाने’ पदसे जो औचित्य बताया है, उसकी आगेके चार श्लोकोंमें पुष्टि करते हैं।
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रै ।
अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥ ३७ ॥
महात्मन् = हे महात्मन् ! गरीयसे = गुरुओंके भी गुरु च = और ब्रह्मणः = ब्रह्माके अपि = भी आदिकर्त्रै = आदिकर्ता ते = आपके लिये (वे)
सिद्धगण) कस्मात्, न, नमेरन् = नमस्कार क्यों नहीं करें ? अनन्त = (क्योंकि) हे अनन्त ! देवेश = हे देवेश ! जगन्निवास = हे जगन्निवास !
त्वम् = आप अक्षरम् = अक्षरस्वरूप है; सत् = (आप) सत् भी हैं, असत् = असत् भी हैं (और) तत्परम् = उनसे (सत्- असत्से) पर भी यत् = जो कुछ है, (वह भी आप ही हैं।)
व्याख्या—‘कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रै’ —आदिरूपसे प्रकट होनेवाले महान् स्वरूप आपको (पूर्वोक्त सिद्धगण) नमस्कार क्यों न करें ? नमस्कार दोको किया जाता है—(१) जिनसे मनुष्यको शिक्षा मिलती है, प्रकाश मिलता है, ऐसे आचार्य, गुरुजन आदिको नमस्कार किया जाता है और (२) जिनसे हमारा जन्म हुआ है, उन माता-पिताको तथा आयु, विद्या आदिमें अपनेसे बड़े पुरुषोंको नमस्कार किया जाता है। अर्जुन कहते हैं कि आप गुरुओंके भी गुरु हैं—‘गरीयसे’* और
आप सृष्टिकी रचना करनेवाले पितामह ब्रह्माजीको भी उत्पन्न करनेवाले हैं—‘ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रै’। अतः सिद्ध महापुरुष आपको नमस्कार करें, यह उचित ही है।
‘अनन्त’—आपको देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदि किसीकी भी दृष्टिसे देखें, आपका अन्त नहीं आता। तात्पर्य है कि आपको देशकी दृष्टिसे देखें तो आपका कहाँसे आरम्भ हुआ है और कहाँ जाकर अन्त होगा—ऐसा है ही नहीं। कालकी दृष्टिसे देखा जाय तो आप कबसे हैं और कबतक रहेंगे—इसका कोई अन्त नहीं है। वस्तु, व्यक्ति
- पतंजलि महाराजने कहा है कि वे परमात्मा पहले-से-पहले जो ब्रह्मा आदि प्रकट हुए हैं, उनके भी गुरु हैं—‘पूर्वेषामपि गुरुः।’ (योगदर्शन १।२६)