श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
श्लोक ४० ]
- साधक-संजीवनी *
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‘शशाङ्कः’—जिससे सम्पूर्ण ओषधियोंका, वनस्पतियों-का पोषण होता है, वह चन्द्रमा आप ही हैं।
‘प्रजापतिः’—प्रजाको उत्पन्न करनेवाले दक्ष आदि प्रजापति आप ही हैं।
‘प्रपितामहः’—पितामह ब्रह्माजीको भी प्रकट करनेवाले होनेसे आप प्रपितामह हैं।
‘नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते’—इन्द्र आदि जितने भी देवता हैं, वे सब-के-सब आप ही हैं। आप अनन्तस्वरूप हैं। आपकी मैं क्या स्तुति करूँ ? क्या महिमा गाऊँ ? मैं तो आपको हजारों
बार नमस्कार ही कर सकता हूँ और कर ही क्या सकता हूँ ?
कुछ भी करनेकी जिम्मेवारी मनुष्यपर तभीतक रहती है, जबतक अपनेमें करनेका बल अर्थात् अभिमान रहता है। जब अपनेमें कुछ भी करनेकी सामर्थ्य नहीं रहती, तब करनेकी जिम्मेवारी बिल्कुल नहीं रहती। अब वह केवल नमस्कार ही करता है अर्थात् अपने-आपको सर्वथा भगवान्के समर्पित कर देता है। फिर करने-करानेका सब काम शरण्य-(भगवान्-) का ही रहता है, शरणागतका नहीं।
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्व समाजोषि ततोऽसि सर्वः ॥ ४० ॥
सर्व = हे सर्वस्वरूप !
ते = आपको
पुरस्तात् = आगेसे (भी)
नमः = नमस्कार हो
अथ = और
पृष्ठतः = पीछेसे (भी नमस्कार हो !)
ते = आपको
सर्वतः = सब ओरसे (दसों
दिशाओंसे)
एव = ही
नमः = नमस्कार
अस्तु = हो
अनन्तवीर्य = हे अनन्तवीर्य !
अमित-
विक्रमः = असीम पराक्रमवाले
त्वम् = आपने
सर्वम् = सबको (एक देशमें)
समाजोषि = समेट रखा है ;
ततः = अतः
सर्वः = सब कुछ
असि = (आप ही) हैं।
व्याख्या—‘नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व’—अर्जुन भयभीत हैं। मैं क्या बोल्ता—यह उनकी समझमें नहीं आ रहा है। इसलिये वे आगेसे, पीछेसे सब ओरसे अर्थात् दसों दिशाओंसे केवल नमस्कार-ही-नमस्कार कर रहे हैं।
‘अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं’—‘अनन्तवीर्य’
कहनेका तात्पर्य है कि आप तेज, बल आदिसे भी अनन्त हैं; और ‘अमितविक्रम’ कहनेका तात्पर्य है कि आपके पराक्रमयुक्त संरक्षण आदि कार्य भी असीम हैं। इस
तरह आपकी शक्ति भी अनन्त है और पराक्रम भी अनन्त है।
‘सर्व समाजोषि ततोऽसि सर्वः’—आपने सबको समावृत कर रखा है अर्थात् सम्पूर्ण संसार आपके अन्तर्गत है। संसारका कोई भी अंश ऐसा नहीं है, जो कि आपके अन्तर्गत न हो।
अर्जुन एक बड़ी अलौकिक, विलक्षण बात देख रहे हैं कि भगवान् अनन्त सृष्टियोंमें परिपूर्ण, व्याप्त हो रहे हैं, और अनन्त सृष्टियाँ भगवान्के किसी अंशमें हैं।
परिशिष्ट भाव —भगवान्के दिव्य विराट्रूपको देखकर अर्जुनने कहा कि आप अपने तेजसे संसारको संतप्त कर रहे हैं—‘स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्’ (११।१९) तो संतप्त करनेवाले और संतप्त होनेवाले—दोनों एक ही विराट्रूपके अंग हैं। भगवान्के उग्ररूपको देखकर तीनों लोक व्यथित (व्याकुल) हो रहे हैं—‘लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्’ (११।२०) तो व्यथित होनेवाली त्रिलोकी भी भगवान्के विराट्रूपका ही अंग है। भगवान्को देखकर देवता भयभीत होकर उनका गुणगान कर रहे हैं—‘केचिद्भीताः प्रांजलयो गृणन्ति’ (११।२१) और राक्षसलोग भयभीत होकर दसों दिशाओंमें भाग रहे हैं—‘रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति’ (११।३६) तो भयभीत होनेवाले देवता और राक्षस भी भगवान्के विराट्रूपके ही अंग हैं। कारण कि ये देवता, राक्षस आदि कुरुक्षेत्रमें नहीं थे, प्रत्युत भगवान्के विराट्रूपमें ही अर्जुनको दीख रहे थे।
७८२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ११ ]
ब्रह्मा, विष्णु, शंकर, रुद्र, आदित्य, वसु, साध्यगण, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार, मरुद्रगण, पितृगण, सर्प, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, असुर, ऋषि-महर्षि, सिद्धगण, वायु, यमराज, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, सूर्य आदि और इनके सिवाय भीष्म, द्रोण, कर्ण, जयद्रथ आदि समस्त राजालोग—ये सब-के-सब दिव्य विराट्रूपके ही अंग हैं। इतना ही नहीं, अर्जुन, संजय, धृतराष्ट्र तथा कौरव और पाण्डवसेना भी उसी विराट्रूपके ही अंग हैं—‘सर्वं समानोषि ततोऽसि सर्वः’।
तात्पर्य है कि जड़-चेतन, स्थावर-जंगमरूपसे जो कुछ देखने, सुनने, सोचनेमें आ रहा है, वह सब अविनाशी भगवान् ही हैं। इसका अनुभव करनेके लिये साधकको दृढ़तासे यह मान लेना चाहिये कि चाहे मेरी समझमें आये या न आये, अनुभवमें आये या न आये, स्वीकार हो या न हो, पर बात यही सच्ची है। जैसे जलके एक कणमें और समुद्रमें एक ही जल-तत्त्व परिपूर्ण है, ऐसे ही छोटी-से-छोटी और बड़ी-से-बड़ी प्रत्येक वस्तुमें एक ही परमात्मतत्त्व परिपूर्ण है—ऐसा मानकर वह हर समय मन-ही-मन सबको नमस्कार करता रहे। उसको वृक्ष, नदी, पहाड़, पत्थर, दीवार आदि जो कुछ भी दीखे, उसमें अपने इष्ट भगवान्को देखकर वह प्रार्थना करे कि ‘हे नाथ! मुझे अपना प्रेम प्रदान करो, हे प्रभो! आपको मेरा नमस्कार हो’। ऐसा करनेसे उसको सब जगह भगवान् दीखने लग जायेंगे; क्योंकि वास्तवमें सब कुछ भगवान् ही हैं।
सम्बन्ध—अब आगेके दो श्लोकोंमें अर्जुन भगवान्से प्रार्थना करते हुए क्षमा माँगते हैं।
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।
अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥ ४१ ॥
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु।
एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥ ४२ ॥
| तव | = आपकी | हे, यादव | = हे यादव! | तत्समक्षम् | = उन (सखाओं, कुटुम्बियों आदि)के सामने |
|---|---|---|---|---|---|
| इदम् | = इस | हे, सखे | = हे सखे! | यत् | = (मेरे द्वारा आपका) जो कुछ |
| महिमानम् | = महिमाको | इति | = इस प्रकार | असत्कृतः | = तिरस्कार (अपमान) किया गया |
| अजानता | = न जानते हुए | यत् | = जो कुछ | असि | = है; |
| सखा | = ‘मेरे सखा हैं’ | उक्तम् | = कहा है; | अप्रमेयम् | = हे अप्रमेयस्वरूप! |
| इति | = ऐसा | च | = और | तत् | = वह सब |
| मत्वा | = मानकर | अच्युत | = हे अच्युत! | त्वाम् | = आपसे |
| मया | = मैंने | अवहासार्थम् | = हँसी-दिल्लीगमें, | अहम् | = मैं |
| प्रमादात् | = प्रमादसे | विहारशय्यासन- | भोजनेषु | क्षामये | = क्षमा करवाता हूँ |
| वा | = अथवा | = चलते-फिरते, सोते-जागते, उठते-बैठते, खाते-पीते समय | अर्थात् आपसे क्षमा माँगता हूँ। | ||
| प्रणयेन | = प्रेमसे | एकः | = अकेले | ||
| अपि | = भी | अथवा | = अथवा | ||
| प्रसभम् | = हटपूर्वक (बिना सोचे-समझे) | ||||
| हे, कृष्ण | = ‘हे कृष्ण! |
व्याख्या—[जब अर्जुन विराट्भगवान्के अत्युग्ररूपको देखकर भयभीत होते हैं, तब वे भगवान्के कृष्णरूपको भूल जाते हैं और पूछ बैठते हैं कि उग्ररूपवाले आप कौन हैं? परन्तु जब उनको भगवान् श्रीकृष्णकी स्मृति आती है कि वे ये ही हैं, तब भगवान्के प्रभाव आदिको देखकर
उनको सखाभावसे किये हुए पुराने व्यवहारकी याद आ जाती है और उसके लिये वे भगवान्से क्षमा माँगते हैं।]
‘सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति’—जो बड़े आदमी होते हैं, श्रेष्ठ पुरुष होते हैं, उनको साक्षात् नामसे नहीं पुकारा जाता। उनके लिये तो
श्लोक ४१-४२ ]
- साधक-संजीवनी *
७८३
‘आप’, ‘महाराज’ आदि शब्दोंका प्रयोग होता है। परन्तु मैंने आपको कभी ‘हे कृष्ण’ कह दिया, कभी ‘हे यादव’ कह दिया और कभी ‘हे सखे’ कह दिया। इसका कारण क्या था? ‘अज्ञानता महिमानं तवेदम्’ इसका कारण यह था कि मैंने आपकी ऐसी महिमाको और स्वरूपको जाना नहीं कि आप ऐसे विलक्षण हैं। आपके किसी एक अंशमें अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड विराजमान हैं—ऐसा मैं पहले नहीं जानता था। आपके प्रभावकी तरफ मेरी दृष्टि ही नहीं गयी। मैंने कभी सोचा-समझा ही नहीं कि आप कौन हैं और कैसे हैं।
यद्यपि अर्जुन भगवान्के स्वरूपको, महिमाको, प्रभावको पहले भी जानते थे, तभी तो उन्होंने एक अक्षौहिणी सेनाको छोड़कर निःशस्त्र भगवान्को स्वीकार किया था; तथापि भगवान्के शरीरके किसी एक अंशमें अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड यथावकाश स्थित हैं—ऐसे प्रभावको, स्वरूपको, महिमाको अर्जुनने पहले नहीं जाना था। जब भगवान्ने कृपा करके विश्वरूप दिखाया, तब उसको देखकर ही अर्जुनकी दृष्टि भगवान्के प्रभावकी तरफ गयी और वे भगवान्को कुछ जानने लगे। उनका यह विचित्र भाव हो गया कि ‘कहाँ तो मैं और कहाँ ये देवोंके देव! परन्तु मैंने प्रमादसे अथवा प्रेमसे हठपूर्वक, बिना सोचे-समझे, जो मनमें आया, वह कह दिया—‘मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥ ’ बोलनेमें मैंने बिलकुल ही सावधानी नहीं बरती!’
वास्तवमें भगवान्की महिमाको सर्वथा कोई जान ही नहीं सकता; क्योंकि भगवान्की महिमा अनन्त है। अगर वह सर्वथा जाननेमें आ जायगी तो उसकी अनन्तता नहीं रहेगी, वह सीमित हो जायगी। जब भगवान्की सामर्थ्यसे उत्पन्न होनेवाली विभूतियोंका भी अन्त नहीं है, तब भगवान् और उनकी महिमाका अन्त आ ही कैसे सकता है? अर्थात् आ ही नहीं सकता।
‘यच्चावहासार्थमसक्तुतोऽसि विहारशय्यासन-
भोजनेषु ’—मैंने आपको बराबरीका साधारण मित्र समझकर हँसी-दिल्लगी करते समय, रास्तेमें चलते-फिरते समय, शय्यापर सोते-जागते समय, आसनपर उठते-बैठते समय, भोजन करते समय जो कुछ अपमानके शब्द कहें, आपका असत्कार किया अथवा हे अच्युत! आप अकेले थे, उस समय या उन सखाओं, कुटुम्बीजनों, सभ्य व्यक्तियों आदिके सामने मैंने आपका जो कुछ तिरस्कार किया है, वह सब मैं आपसे क्षमा करवाता हूँ—‘एकोऽथवाच्यच्युत तत्समर्थं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्। ’
अर्जुन और भगवान्की मित्रताका ऐसा वर्णन आता है कि जैसे दो मित्र आपसमें खेलते हैं, ऐसे ही अर्जुन भगवान्के साथ खेलते थे। कभी स्नान करते तो अर्जुन हाथोंसे भगवान्के ऊपर जल फेंकते और भगवान् अर्जुनके ऊपर। कभी अर्जुन भगवान्के पीछे दौड़ते तो कभी भगवान् अर्जुनके पीछे दौड़ते। कभी दोनों आपसमें हँसते-हँसाते। कभी दोनों परस्पर अपनी-अपनी विशेष कलाएँ दिखाते। कभी भगवान् सो जाते तो अर्जुन कहते—‘तुम इतने फैलकर सो गये हो, क्या कोई दूसरा नहीं सोयेगा? तुम अकेले ही हो क्या?’ कभी भगवान् आसनपर बैठ जाते तो अर्जुन कहते—‘आसनपर तुम अकेले ही बैठोगे क्या? और किसीको बैठने दोगे कि नहीं? अकेले ही आधिपत्य जमा लिया! जरा एक तरफ तो खिसक जाओ।’ इस प्रकार अर्जुन भगवान्के साथ बहुत ही घनिष्ठताका व्यवहार करते थे। अब अर्जुन उन बातोंको याद करके कहते हैं कि ‘हे भगवान्! मैंने आपके न जाने कितने-कितने तिरस्कार किये हैं। मेरेको तो सब याद भी नहीं हैं। यद्यपि आपने मेरे तिरस्कारोंकी तरफ खयाल नहीं किया, तथापि मेरे द्वारा आपके बहुत-से तिरस्कार हुए हैं, इसलिये मैं अप्रमेयस्वरूप आपसे सब तिरस्कार क्षमा करवाता हूँ।’ भगवान्को ‘अप्रमेय’ कहनेका तात्पर्य है कि दिव्यदृष्टि होनेपर भी आप दिव्यदृष्टिके अन्तर्गत नहीं आते हैं।
१-‘महिमानं तव इदम्’—इसमें आया ‘इदम्’ पद ‘महिमानम्’ का विशेषण नहीं है; क्योंकि ‘महिमानम्’ पद पूर्णिलिंगमें आया है और ‘इदम्’ पद नपुंसकलिंगमें आया है। अतः यहाँ ‘इदम्’ का अर्थ ‘स्वरूप’ लिया गया है। इस दृष्टिसे ‘महिमानं तव इदम्’ का अर्थ हुआ—आपकी महिमा और स्वरूप।
२-शय्यासनाटनविकल्पनभोजनादिष्वैक्याद् वयस्य ऋतवानिति विप्रलब्धः।
सख्युः सखेव पितृवृत्तनयस्य सर्वं सेहे महान् महित्या कुमेतेरथं मे॥ (श्रीमद्भगवद्गीता १।१५।१९)
अर्जुन कहते हैं—‘भगवान् श्रीकृष्णके साथ सोने, बैठने, घूमने, बातचीत करने और भोजनादि करनेमें मेरा-उनका ऐसा सहज भाव हो गया था कि मैं कभी-कभी ‘हे सखे! तुम बड़े सच बोलनेवाले हो!’ ऐसा कहकर आश्चर्य भी करता था। परन्तु वे महात्मा प्रभु अपने बड़भयनके अनुसार मुझ कुबुद्धिके उन समस्त तिरस्कारोंको वैसे ही सहा करते थे, जैसे सखा अपने सखाके या पिता अपने पुत्रके तिरस्कारको सहा करता है।’
७८४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ११ ]
परिशिष्ट भाव —अर्जुनका भगवान्के साथ सखाभाव था, पर भगवान्के ऐश्वर्यको देखनेसे वे अपना सखाभाव भूल जाते हैं और भगवान्को देखकर आश्चर्य करते हैं, भयभीत होते हैं। उनके मनमें यह सम्भावना ही नहीं थी कि भगवान् ऐसे हैं!
सम्बन्ध—अब आगेके दो श्लोकोंमें अर्जुन भगवान्की महत्ता और प्रभावका वर्णन करके पुनः क्षमा करनेके लिये प्रार्थना करते हैं।
पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।
न त्वत्समोऽस्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥ ४३ ॥
| त्वम् | = आप (ही) | च | = और | त्वत्समः | = आपके समान |
|---|---|---|---|---|---|
| अस्य | = इस | गरीयान् | = (आप ही) | अपि | = भी |
| चराचरस्य | = चराचर | गुरुओंके | अन्यः | = दूसरा कोई | |
| लोकस्य | = संसारके | गुरुः | = महान् गुरु हैं। | न | = नहीं |
| पिता | = पिता | अप्रतिम- | अस्ति | = है, (फिर आपसे) | |
| असि | = हैं, | प्रभाव | = हे अनन्त | अभ्यधिकः | = अधिक तो |
| पूज्यः | = (आप ही) | प्रभावशाली भगवान्! | कृतः | = हो ही कैसे | |
| पूजनीय हैं | लोकत्रये | = इस त्रिलोकियोंमें | सकता है! |
व्याख्या —‘पितासि लोकस्य चराचरस्य’—अनन्त ब्रह्माण्डोंमें मनुष्य, पशु, पक्षी आदि जितने जंगम प्राणी हैं, और वृक्ष, लता आदि जितने स्थावर प्राणी हैं, उन सबको उत्पन्न करनेवाले और उनका पालन करनेवाले पिता भी आप हैं, उनके पूजनीय भी आप हैं तथा उनको शिक्षा देनेवाले महान् गुरु भी आप ही हैं—‘त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान्।’
‘गुरुर्गरीयान्’ का तात्पर्य है कि मनुष्यमात्रको व्यवहार और परमार्थमें जहाँ-कहीं भी गुरुजनोंसे शिक्षा मिलती है,
परिशिष्ट भाव —अर्जुन लौकिक दृष्टिसे, संसारकी सत्ताको लेकर कहते हैं कि इस त्रिलोकियोंमें आपके समान भी दूसरा कोई नहीं है, फिर अधिक कैसे हो सकता है! परन्तु वास्तविक दृष्टिसे जब भगवान्के सिवाय और कुछ है ही नहीं, तो फिर उसमें समान और अधिक कहना बनता ही नहीं।
तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कार्यं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् ।
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम् ॥ ४४ ॥
| तस्मात् | = इसलिये | कायम् | = शरीरसे | इव | = जैसे |
|---|---|---|---|---|---|
| ईड्यम् | = स्तुति करनेयोग्य | प्रणिधाय | = लम्बा पड़कर | पुत्रस्य | = पुत्रके, |
| त्वाम् | = आप | प्रणम्य | = प्रणाम करके | सखा | = मित्र |
| ईशम् | = ईश्वरको | प्रसादये | = प्रसन्न करना | इव | = जैसे |
| अहम् | = मैं | चाहता हूँ। | सख्युः | = मित्रके (और) | |
| पिता | = पिता | प्रियः | = पति (जैसे) |
श्लोक ४५ ]
- साधक-संजीवनी *
७८५
| प्रियाय | = पत्नीके (अपमान सह लेता है), | (आप मेरे द्वारा किया गया | सोडुम् | = सहनेमें अर्थात् क्षमा करनेमें |
|---|---|---|---|---|
| देव | = (ऐसे ही) हे देव! | अपमान) | अर्हसि | = समर्थ हैं। |
व्याख्या—‘तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कार्यं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम्’ —आप अनन्त ब्रह्माण्डोंके ईश्वर हैं। इसलिये सबके द्वारा स्तुति करनेयोग्य आप ही हैं। आपके गुण, प्रभाव, महत्त्व आदि अनन्त हैं; अतः ऋषि, महर्षि, देवता, महापुरुष आपकी नित्य-निरन्तर स्तुति करते रहें, तो भी पार नहीं पा सकते। ऐसे स्तुति करनेयोग्य आपकी मैं क्या स्तुति कर सकता हूँ? मेरेमें आपकी स्तुति करनेका बल नहीं है, सामर्थ्य नहीं है। इसलिये मैं तो केवल आपके चरणोंमें लम्बा पड़कर दण्डवत् प्रणाम ही कर सकता हूँ और इसीसे आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ।
‘पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोडुम्’ —किसीका अपमान होता है तो उसमें मुख्य तीन कारण होते हैं—(१) प्रमाद-(असावधानी-) से, (२) हँसी-दिल्लीगी, विनोदमें खयाल न रहनेसे और (३) अपनेपनकी घनिष्ठता होनेपर अपने साथ रहनेवालेका महत्त्व न जाननेसे। जैसे, गोदीमें बैठा हुआ छोटा बच्चा अज्ञानवश पिताकी दाढ़ी-मूँछ खींचता है, मुँहपर थप्पड़ लगाता है, कभी कहीं लात मार देता है तो बच्चेकी ऐसी चेष्टा देखकर पिता राजी ही होते हैं, प्रसन्न ही होते हैं। वे अपनेमें यह भाव लाते ही नहीं कि पुत्र मेरा अपमान कर रहा है। मित्र मित्रके साथ चलते-फिरते, उठते-बैठते आदि समय चाहे जैसा व्यवहार करता है, चाहे जैसा बोल देता है, जैसे—‘तुम बड़े सत्य बोलते हो जी! तुम तो बड़े सत्यप्रतिज्ञ हो! अब तो तुम बड़े आदमी हो गये हो! तुम तो खूब अभिमान करने लग गये हो! आज मानो तुम राजा ही बन गये हो! आदि, पर उसका मित्र उसकी इन बातोंका खयाल नहीं करता। वह तो यही समझता है कि हम बराबरीके मित्र हैं, ऐसी हँसी-दिल्लीगी तो होती ही रहती है। पत्नीके द्वारा आपसके प्रेमके कारण उठने-बैठने, बातचीत करने आदिमें पतिकी जो कुछ अवहेलना होती है, उसे पति सह लेता है। जैसे, पति नीचे बैठा है तो वह ऊँचे आसनपर बैठ जाती है, कभी किसी बातको लेकर
अवहेलना भी कर देती है, पर पति उसे स्वाभाविक ही सह लेता है। अर्जुन कहते हैं कि जैसे पिता पुत्रके, मित्र मित्रके और पति पत्नीके अपमानको सह लेता है अर्थात् क्षमा कर देता है, ऐसे ही हे भगवन्! आप मेरे अपमानको सहनेमें समर्थ हैं अर्थात् इसके लिये मैं आपसे क्षमा माँगता हूँ।
इकतालसीवें-बयालीसवें श्लोकोंमें अर्जुनने तीन बातें कही थीं—‘प्रमादात् ’ (प्रमादसे), ‘अवहासार्थम् ’ (हँसी-दिल्लीगीसे) और ‘प्रणयेन ’ (प्रेमसे)। उन्हीं तीन बातोंका संकेत अर्जुनने यहाँ तीन दृष्टान्त देकर किया है अर्थात् प्रमादके लिये पिता-पुत्रका, हँसी-दिल्लीगीके लिये मित्र-मित्रका और प्रेमके लिये पति-पत्नीका दृष्टान्त दिया है।
ग्यारहवें अध्यायमें ग्यारह रसोंका वर्णन
ग्यारहवें अध्यायमें ग्यारह रसोंका वर्णन इस प्रकार हुआ है—देवरूपका वर्णन होनेसे ‘शान्तरस’ (पन्द्रहवेंसे अठारहवें श्लोकतक); स्वर्गसे पृथ्वीतक और दसों दिशाओंमें व्याप्त विराट् रूपका वर्णन होनेसे ‘अद्भुतरस’ (बीसवों श्लोक); अपनी जिह्वासे सबका ग्रसन कर रहे हैं और सबका संहार करनेके लिये कालरूपसे प्रवृत्त हुए हैं—ऐसा रूप धारण किये होनेसे ‘रौद्रस’ (तीसवों और बत्तीसवों श्लोक); भयंकर विकराल मुख और दाढ़ोंवाला रूप होनेसे ‘बीभत्सरस’ (तेईसवेंसे पचीसवें श्लोकतक); तुम युद्धके लिये खड़े हो जाओ—इस रूपमें ‘वीररस’ (तैंतीसवों श्लोक); लम्बे पड़कर दण्डवत्-प्रणाम आदि करनेसे ‘दास्यरस’ (चौवालीसवें श्लोकका पूर्वार्ध); मुख्य-मुख्य योद्धाओंको तथा अन्य राजालोगोंको भगवान् के मुखमें जाते हुए देखनेसे ‘करुणरस’ (अट्ठाईसवों-उन्तीसवों श्लोक); दृष्टान्तसे मित्र मित्रके, पिता पुत्रके और पति पत्नीके अपमानको सह लेता है—इस रूपमें क्रमशः ‘सख्यरस’, ‘वात्सल्यरस’ और ‘माधुर्यरस’ का वर्णन हुआ है (चौवालीसवें श्लोकका उत्तरार्ध) और हँसी आदिकी स्मृतिरूपसे ‘हास्यरस’ का वर्णन हुआ है (बयालीसवें श्लोकका पूर्वार्ध)।
सम्बन्ध—अब आगेके दो श्लोकोंमें अर्जुन चतुर्थुजरूप दिखानेके लिये प्रार्थना करते हैं।
अदृष्टपूर्व हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे। तदेव मे दर्शय देवरूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ ४५ ॥
७८६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ११ ]
अदृष्टपूर्वम् = जिसको पहले कभी नहीं देखा, उस रूपको | भयेन = भयसे मे = मेरा मनः = मन | देवरूपम् = देवरूप (शान्त विष्णुरूप)-को ---|---|--- दृष्ट्वा = देखकर (में) | प्रव्यथितम् = अत्यन्त व्यथित हो रहा है। (अतः आप) | दर्शय = दिखाइये। हृषितः = हर्षित | | देवेश = हे देवेश! अस्मि = हो रहा हूँ | | जगन्निवास = हे जगन्निवास! च = और (साथ-ही-साथ) | मे = मुझे (अपने) | प्रसीद = (आप) प्रसन्न होइये।
व्याख्या —[जैसे विराट् रूप दिखानेके लिये मैंने भगवान्से प्रार्थना की तो भगवान्ने मुझे विराट् रूप दिखा दिया, ऐसे ही देवरूप दिखानेके लिये प्रार्थना करनेपर भगवान् देवरूप दिखायेंगे ही—ऐसी आशा होनेसे अर्जुन भगवान्से देवरूप दिखानेके लिये प्रार्थना करते हैं।]
‘अदृष्टपूर्व हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे’ —आपका ऐसा अलौकिक आश्चर्यमय विशाल-रूप मैंने पहले कभी नहीं देखा। आपका ऐसा भी रूप है—ऐसी मेरे मनमें सम्भावना भी नहीं थी। ऐसा रूप देखनेकी मेरेमें कोई योग्यता भी नहीं थी। यह तो केवल आपने अपनी तरफसे ही कृपा करके दिखाया है। इससे मैं अपने-आपको बड़ा सौभाग्यशाली मानकर हर्षित हो रहा हूँ, आपकी कृपाको देखकर गदाद हो रहा हूँ। परन्तु साथ-ही-साथ आपके स्वरूपकी उग्रताको देखकर मेरा मन भयके कारण अत्यन्त व्यथित हो रहा है, व्याकुल हो रहा है, घबरा रहा है।
‘तदेव मे दर्शय देवरूपम्’ —‘तत्’ (वह) शब्द परोक्षवाची है; अतः ‘तदेव’ (तत् एव) कहनेसे ऐसा मालूम देता है कि अर्जुनने देवरूप (विष्णुरूप) पहले कभी देखा है, जो अभी सामने नहीं है। विश्वरूप देखनेपर जहाँ अर्जुनकी पहले दृष्टि पड़ी, वहाँ उन्होंने कमलासनपर विराजमान ब्रह्माजीको देखा—‘पश्यामि देवांस्तव देव देहे ’ ‘ब्रह्माण्मीशं कमलासनस्थम् ’ (११।१५)। इससे सिद्ध होता है कि वह कमल जिसकी नाभिसे निकला है, उस शेषशायी चतुर्भुज विष्णुरूपको भी अर्जुनने देखा है। फिर सत्रहवें श्लोकमें अर्जुनने कहा है कि मैं आपको कीरीट, गदा, चक्र (और ‘च’ पदसे शंख और पद्म) धारण किये हुए देख रहा हूँ—‘कीरीटिनं गदिनं चक्रिणं
च ’—इन दोनों बातोंसे यही सिद्ध होता है कि अर्जुनने विश्वरूपके अन्तर्गत भगवान्के जिस विष्णुरूपको देखा था, उसीके लिये अर्जुन यहाँ ‘वही देवरूप मेरेको दिखाइये’ ऐसा कह रहे हैं।*
‘देवरूपम्’ कहनेका तात्पर्य है कि मैंने विराट् रूपमें आपके विष्णुरूपको भी देखा था, पर अब आप मेरेको केवल विष्णुरूप ही दिखाइये। दूसरी बात, पंद्रहवें श्लोकमें भी अर्जुनने भगवान्के लिये ‘देव’ कहा है—‘पश्यामि देवांस्तव देव देहे ’ और यहाँ भी देवरूप दिखानेके लिये कहते हैं इसका तात्पर्य है कि विराट् रूप भी नहीं और मनुष्यरूप भी नहीं, केवल देवरूप दिखाइये। आगेके (छियालीसवें) श्लोकमें भी ‘तेनैव ’ पदसे विराट् रूप और मनुष्यरूपका निषेध करके भगवान्से चतुर्भुज विष्णुरूप बन जानेके लिये प्रार्थना करते हैं।
‘प्रसीद देवेश जगन्निवास’ —यहाँ ‘जगन्निवास’ सम्बोधन विश्वरूपका और ‘देवेश’ सम्बोधन चतुर्भुजरूपका संकेत कर रहा है। अर्जुन ये दो सम्बोधन देकर मानो यह कह रहे हैं कि सम्पूर्ण संसारका निवास आपमें है—ऐसा विश्वरूप तो मैंने देख लिया है और देख ही रहा हूँ। अब आप ‘देवेश’—देवताओंके मालिक विष्णुरूपसे हो जाइये।
विशेष बात
भगवान्का विश्वरूप दिव्य है, अविनाशी है, अक्षय है। इस विश्वरूपमें अनन्त ब्रह्माण्ड है तथा उन ब्रह्माण्डोंकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करनेवाले ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी अनन्त हैं। इस नित्य विश्वरूपसे अनन्त विश्व (ब्रह्माण्ड) उत्पन्न हो-होकर उसमें लीन होते रहते हैं, पर यह विश्वरूप अव्यय होनेसे ज्यों-का-त्यों ही रहता है। यह
- आगे उनचासवें श्लोकमें ‘पुनः’ तथा ‘तदेव’ पदसे भगवान्ने और पचासवें श्लोकमें ‘भूयः’ पदसे संजयने भी उसी (विश्वरूपके अन्तर्गत देखे गये) चतुर्भुजरूपको दिखानेकी बात कही है।
श्लोक ४६ ]
- साधक-संजीवनी *
७८७
विश्वरूप इतना दिव्य, अलौकिक है कि हजारों भौतिक सूर्योका प्रकाश भी इसके प्रकाशका उपमेय नहीं हो सकता (इसी अध्यायका बारहवाँ श्लोक)। इसलिये इस विश्वरूपको 'दिव्यचक्षु' के बिना कोई भी देख नहीं सकता। 'ज्ञानचक्षु' के द्वारा संसारके मूलमें सत्कारूपसे जो परमात्मतत्त्व है, उसका बोध होता है और 'भावचक्षु' से संसार भगवत्स्वरूप दीखता है, पर इन दोनों ही चक्षुओंसे विश्वरूपका दर्शन नहीं होता। 'चर्मचक्षु' से न तो तत्त्वका बोध होता है, न संसार भगवत्स्वरूप दीखता है और न विश्वरूपका दर्शन ही होता है; क्योंकि चर्मचक्षु प्रकृतिका कार्य है। इसलिये चर्मचक्षुसे प्रकृतिके स्थूल कार्यको ही देखा जा सकता है। वास्तवमें भगवान्के द्विभुज, चतुर्भुज, सहस्रभुज आदि जितने भी रूप हैं, वे सब-के-सब दिव्य और अव्यय हैं। इसी तरह भगवान्के सगुण-निराकार, निर्गुण-निराकार, सगुण-साकार आदि जितने रूप हैं, वे सब-के-सब भी दिव्य और अव्यय हैं।
माधुर्य-लीलामें तो भगवान् द्विभुजरूप ही रहते हैं; परन्तु जहाँ अपना कुछ ऐश्वर्य दिखलानेकी आवश्यकता होती है, वहाँ भगवान् पात्र, अधिकार, भाव आदिके भेदसे अपना विराट्रूप भी दिखा देते हैं। जैसे, भगवान्ने
अर्जुनको मनुष्यरूपसे प्रकट हुए अपने द्विभुजरूप—शरीरके किसी अंशमें विराट्रूप दिखाया है।
भगवान्ने अनन्त-असीम ऐश्वर्य, माधुर्य, सौन्दर्य, औदार्य आदि दिव्य गुण हैं। उन अनन्त दिव्य गुणोंके सहित भगवान्का विश्वरूप है। भगवान् जिस-किसीको ऐसा विश्वरूप दिखाते हैं, उसे पहले दिव्यदृष्टि देते हैं। दिव्यदृष्टि देनेपर भी वह जैसा पात्र होता है, जैसी योग्यता और रुचिवाला होता है, उसीके अनुसार भगवान् उसको अपने विश्वरूपके स्तरोंका दर्शन कराते हैं। यहाँ ग्यारहवें अध्यायके पंद्रहवेंसे तीसवें श्लोकतक भगवान् विश्वरूपसे अनेक स्तरोंसे प्रकट होते गये, जिसमें पहले देवरूपकी (पन्द्रहवेंसे अठारहवें श्लोकतक), फिर उग्ररूपकी (उन्नीसवेंसे बाईसवें श्लोकतक) और उसके बाद अत्युग्ररूपकी (तेईसवेंसे तीसवें श्लोकतक) प्रधानता रही। अत्युग्ररूपको देखकर जब अर्जुन भयभीत हो गये, तब भगवान्ने अपने दिव्यतिदिव्य विश्वरूपके स्तरोंको दिखाना बंद कर दिया अर्थात् अर्जुनके भयभीत होनेके कारण भगवान्ने अगले रूपोंके दर्शन नहीं कराये। तात्पर्य है कि भगवान्ने दिव्य विराट्रूपके अनन्त स्तरोंमेंसे उतने ही स्तर अर्जुनको दिखाये, जितने स्तरोंको दिखानेकी आवश्यकता थी और जितने स्तर देखनेकी अर्जुनमें योग्यता थी।
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव।
तैनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ॥ ४६ ॥
| अहम् | = मैं | चक्रहस्तम् | = हाथमें चक्र लिये हुए अर्थात् चतुर्भुज-रूपसे | विश्वमूर्ते | = हे विश्वमूर्ते! (आप) |
|---|---|---|---|---|---|
| त्वाम् | = आपको | द्रष्टुम् | = देखना | तेन, एव * | = उसी |
| तथा | = वैसे | इच्छामि | = चाहता हूँ। (इसलिये) | चतुर्भुजेन, रूपेण | = चतुर्भुजरूपसे (शंख-चक्र-गदा-पद्मसहित) |
| एव | = ही | सहस्रबाहो | = हे सहस्रबाहो! | भव | = हो जाइये। |
| किरीटिनम् | = किरीट-(मुकुट) धारी, | ||||
| गदिनम् | = गदाधारी (और) |
- इदमस्तु सन्निकृष्टे समीपतरवर्ति चैतदो रूपम्। अदसस्तु विप्रकृष्टे तदिति परोक्षे विजानीयात् ॥
—इस उक्तिके अनुसार 'इदम्' शब्द समीपका, 'एतत्' शब्द अत्यन्त समीपका, 'अदस्' शब्द दूरका और 'तत्' शब्द परोक्षका वाचक है। विश्वरूपमें इन सबका प्रयोग हुआ है; जैसे—विश्वरूप नजदीक होनेसे अर्जुनने अठारहवें-उन्नीसवें आदि श्लोकोंमें 'इदम्' शब्दका; भीष्म, द्रोण आदि विराट्रूप भगवान्के अत्यन्त नजदीक होनेसे अर्थात् विराट्रूपका ही अंग होनेसे भगवान्ने तैंतीसवें श्लोकमें 'एतत्' शब्दका; भगवान्की ही हुई दिव्यदृष्टिसे विराट्रूप बहुत दूरतक दीखता था और उसमें देवता आदि भी दूरतक दीखते थे, इसलिये अर्जुनने इक्कीसवें, छब्बीसवें और अड़ईसवें श्लोकमें 'अदस्' शब्दका; और विराट्रूपके पहले स्तरमें देखा हुआ चतुर्भुज विष्णुरूप (विराट्रूपके स्तर बदलनेके कारण) नेत्रोंके सामने न होनेसे अर्थात् परोक्ष होनेसे अर्जुनने 'तत्' शब्दका प्रयोग किया है।
७८८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ११ ]
व्याख्या —‘किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव’—जिसमें आपने सिरपर दिव्य मुकुट तथा हाथोंमें गदा और चक्र धारण कर रखे हैं, उसी रूपको मैं देखना चाहता हूँ।
‘तथैव’ कहनेका तात्पर्य है कि मेरे द्वारा ‘द्रष्टुमिच्छामि ते रूपम्’ (११।३) ऐसी इच्छा प्रकट करनेसे आपने विराटरूप दिखाया। अब मैं अपनी इच्छा बाकी क्यों रहूँ? अतः मैंने आपके विराटरूपमें जैसा सौम्य चतुर्भुजरूप देखा है, वैसा-का-वैसा ही रूप मैं अब देखना चाहता हूँ—‘इच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव’।
‘तैनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहवे भव विश्वमूर्ते’—पंद्रहवें और सत्रहवें श्लोकमें जिस विराटरूपमें चतुर्भुज विष्णुरुपको देखा था, उस विराटरूपका निषेध करनेके लिये अर्जुन यहाँ ‘एव’ पद देते हैं। तात्पर्य यह है कि ‘तेन चतुर्भुजेन रूपेण’—ये पद तो चतुर्भुजरूप दिखानेके
परिशिष्ट भाव —यद्यपि मूल श्लोकमें भगवान्को ‘चतुर्भुजेन’ पद आनेसे यहाँ चारों भुजाओंमें गदा और चक्रके साथ-साथ शंख और पद्म भी समझ लेने चाहिये।
सम्बन्ध—इकतीसवें श्लोकमें अर्जुनने पूछा कि उग्ररूपवाले आप कौन हैं, तो भगवान्ने उत्तर दिया कि मैं काल हूँ और सबका संहार करनेके लिये प्रवृत्त हुआ हूँ। ऐसा सुनकर तथा अत्यन्त विकारालरूपको देखकर अर्जुनको ऐसा लगा कि भगवान् बड़े क्रोधमें हैं। इसलिये अर्जुन भगवान्से बार-बार प्रसन्न होनेके लिये प्रार्थना करते हैं। अर्जुनकी इस भावनाको दूर करनेके लिये भगवान् कहते हैं—
श्रीभगवानुवाच
मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात्। तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ॥ ४७ ॥
श्रीभगवान् बोले—
| अर्जुन | = हे अर्जुन! | परम् | = अत्यन्त श्रेष्ठ, | तव | = तुझे |
|---|---|---|---|---|---|
| मया | = मैंने | तेजोमयम् | = तेजस्वरूप, | दर्शितम् | = दिखाया है, |
| प्रसन्नेन | = प्रसन्न होकर | आद्यम् | = सबका आदि (और) | यत् | = जिसको |
| आत्मयोगात् | = अपनी सामर्थ्यसे | अनन्तम् | = अनन्त | त्वदन्येन | = तुम्हारे सिवाय |
| मे | = मेरा | विश्वम् | = विश्व- | न, दृष्टपूर्वम् | = पहले किसिने नहीं |
| इदम् | = यह | रूपम् | = रूप | देखा है। |
व्याख्या —‘मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं दर्शितम्’—हे अर्जुन! तू बार-बार यह कह रहा है कि आप प्रसन्न हो जाओ (पचीसवाँ, इकतीसवाँ और पैतालीसवाँ श्लोक), तो प्यारे भैया! मैंने जो यह विराटरूप तुझे दिखाया है, उसमें विकारालरूपको देखकर तू भयभीत हो गया है, पर यह विकारालरूप मैंने क्रोधमें आकर या तुझे भयभीत करनेके लिये नहीं दिखाया है। मैंने तो अपनी प्रसन्नतासे ही यह
लिये आये हैं और ‘एव’ पद ‘विराटरूपके साथ नहीं’—ऐसा निषेध करनेके लिये आया है तथा ‘भव’ पद ‘हो जाइये’—ऐसी प्रार्थनाके लिये आया है।
पूर्वश्लोकमें ‘तदेव’ तथा यहाँ ‘तथैव’ और ‘तैनैव’—तीनों पदोंका तात्पर्य है कि अर्जुन विश्वरूपसे बहुत डर गये थे। इसलिये तीन बार ‘एव’ शब्दका प्रयोग करके भगवान्ने कहते हैं कि मैं आपका केवल विष्णुरुप ही देखना चाहता हूँ; विष्णुरुपके साथ विश्वरूप नहीं। अतः आप केवल चतुर्भुजरूपसे प्रकट हो जाइये।
‘सहस्रबाहवे’ सम्बोधनका यह भाव मालूम देता है कि हे हजारों हाथोंवाले भगवन्! आप चार हाथोंवाले हो जाइये; और ‘विश्वमूर्ते’ सम्बोधनका यह भाव मालूम देता है कि हे अनेक रूपोंवाले भगवन्! आप एक रूपवाले हो जाइये। तात्पर्य है कि आप विश्वरूपका उपसंहार करके चतुर्भुज विष्णुरुपसे हो जाइये।
गदा और चक्र धारण किये हुए बताया गया है, तथापि गदा और चक्रके साथ-साथ शंख और पद्म भी समझ लेने चाहिये।
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श्लोक ४७ ]
- साधक-संजीवनी *
७८९
यह बात कही कि तुझे बहुत जाननेसे क्या मतलब ? देखने, सुनने, समझनेमें जो कुछ संसार आता है, उस सम्पूर्ण संसारको मैं अपने किसी अंशमें धारण करके स्थित हूँ। दूसरा भाव यह है कि तुझे मेरी विभूति और योगशक्तिको जाननेकी क्या जरूरत है? क्योंकि सब विभूतियाँ मेरी योगशक्तिके आश्रित हैं और उस योगशक्तिका आश्रय मैं स्वयं तेरे सामने बैठा हूँ। यह बात तो मैंने विशेष कृपा करके ही कही थी। इस बातको लेकर ही तेरी विश्वरूप-दर्शनकी इच्छा हुई और मैंने दिव्यचक्षु देकर तुझे विश्वरूप दिखाया। यह तो मेरी कोरी प्रसन्नता-ही-प्रसन्नता है। तात्पर्य है कि इस विश्वरूपको दिखानेमें मेरी कृपाके सिवाय दूसरा कोई हेतु नहीं है। तेरी देखनेकी इच्छा तो निमित्तमात्र है।
‘आत्मयोगात्’ —इस विराट् रूपको दिखानेमें मैंने किसीकी सहायता नहीं ली, प्रत्युत केवल अपनी सामर्थ्यसे ही तेरेको यह रूप दिखाया है।
‘परम्’ —मेरा यह विराट् रूप अत्यन्त श्रेष्ठ है।
‘तेजोमयम्’ —यह मेरा विश्वरूप अत्यन्त तेजोमय है। इसलिये दिव्यदृष्टि मिलनेपर भी तुमने इस रूपको दुर्निरीक्ष्य कहा है (सत्रहवाँ श्लोक)।
‘विश्वम्’ —इस रूपको तुमने स्वयं विश्वरूप, विश्वमूर्ति आदि नामोंसे सम्बोधित किया है। मेरा यह रूप सर्वव्यापी है।
‘अन्तमाद्यम्’ —मेरे इस विश्वरूपका देश, काल आदिकी दृष्टिसे न तो आदि है और न अन्त ही है। यह सबका आदि है और स्वयं अनादि है।
‘यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्’ —तेरे सिवाय मेरे विश्वरूपको पहले किसीने भी नहीं देखा—यह बात भगवान्ने कैसे कही? क्योंकि रामावतारमें माता कौसल्याजीने और कृष्णावतारमें माता यशोदाजीने तथा कौरवसभामें भीष्म, द्रोण, संजय, विदुर और ऋषि-मुनियोंने भगवान्का विराट् रूप देखा ही था! इसका उत्तर यह है कि भगवान्ने अपने विराट् रूपके लिये ‘एवर्रूपः’ (११।४८) पद देकर कहा है कि इस प्रकारके भयंकर विश्वरूपको, जिसके मुखोंमें बड़े-बड़े योद्धा, सेनापति आदि जा रहे हैं, पहले किसीने नहीं देखा है।
दूसरी बात, अर्जुनके सामने युद्धका मौका होनेसे ऐसा भयंकर विश्वरूप दिखानेकी ही आवश्यकता थी और शूरवीर अर्जुन ही ऐसे रूपको देख सकते थे। परन्तु माता
कौसल्या आदिके सामने ऐसा रूप दिखानेकी आवश्यकता भी नहीं थी और वे ऐसा रूप देख भी नहीं सकते थे अर्थात् उनमें ऐसा रूप देखनेकी सामर्थ्य भी नहीं थी।
भगवान्ने यह तो कहा है कि इस विश्वरूपको पहले किसीने नहीं देखा, पर वर्तमानमें कोई नहीं देख रहा है—ऐसा नहीं कहा है। कारण कि अर्जुनके साथ-साथ संजय भी भगवान्के विश्वरूपको देख रहे हैं। अगर संजय न देखते तो वे गीताके अन्तमें यह कैसे कह सकते थे कि भगवान्के अति अद्भुत विराट् रूपका बार-बार स्मरण करके मेरेको बड़ा भारी विस्मय हो रहा है और मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ (अठारहवाँ अध्यायका सतहतस्वाँ श्लोक)।
विशेष बात
भगवान्के द्वारा ‘मैंने अपनी प्रसन्नतासे, कृपासे ही तेरेको यह विश्वरूप दिखाया है’—ऐसा कहनेसे एक विलक्षण भाव निकलता है कि साधक अपनेपर भगवान्की जितनी कृपा मानता है, उससे कई गुना अधिक भगवान्की कृपा होती है। भगवान्की जितनी कृपा होती है, उसको माननेकी सामर्थ्य साधकमें नहीं है। कारण कि भगवान्की कृपा अपार-असीम है; और उसको माननेकी सामर्थ्य सीमित है।
साधक प्रायः अनुकूल वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति आदिमें ही भगवान्की कृपा मान लेता है अर्थात् सत्संग मिलता है, साधन ठीक चलता है, वृत्तियाँ ठीक हैं, मन भगवान्में ठीक लग रहा है आदिमें वह भगवान्की कृपा मान लेता है। इस प्रकार केवल अनुकूलतामें ही कृपा मानना कृपाको सीमामें बाँधना है, जिससे असीम कृपाका अनुभव नहीं होता। उस कृपामें ही राजी होना कृपाका भोग है। साधकको चाहिये कि वह न तो कृपाको सीमामें बाँधे और न कृपाका भोग ही करे।
साधन ठीक चलनेमें जो सुख होता है, उस सुखमें सुखी होना, राजी होना भी भोग है, जिससे बन्धन होता है—‘सुखसंगेन बध्नाति ज्ञानसंगेन चानघ’ (गीता १४।६)। सुख होना अथवा सुखका ज्ञान होना दोषी नहीं है, प्रत्युत उसके साथ संग करना, उससे सुखी होना, प्रसन्न होना ही दोषी है। इससे अर्थात् साधनजन्य सात्त्विक सुख भोगनेसे गुणातीत होनेमें बाधा लगती है। अतः साधकको बड़ी सावधानीसे इस सुखसे असंग होना चाहिये। जो साधक इस सुखसे असंग नहीं होता अर्थात् इसमें प्रसन्नतापूर्वक सुख लेता रहता है, वह भी यदि अपनी साधनामें
७९०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ११ ]
तपस्वतापूर्वक लगा रहे, तो समय पाकर उसकी उस सुखसे स्वतः अस्त्रि हो जायगी। परन्तु जो उस सुखसे सावधानीपूर्वक असंग रहता है, उसे शीघ्र ही वास्तविक तत्त्वका अनुभव हो जाता है।
सम्बन्ध—विश्वरूपदर्शनके लिये भगवान्की कृपाके सिवाय दूसरा कोई साधन नहीं है—इस बातका आगेके श्लोकमें विशेषतासे वर्णन करते हैं।
न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रेः ।
एवंप्रः शक्य अहं नूलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥ ४८ ॥
| कुरुप्रवीर | = हे कुरुश्रेष्ठ ! | अनुष्ठानसे, | च | = और |
|---|---|---|---|---|
| नूलोके | = मनुष्यलोकमें | न शास्त्रोंके | न | = न |
| एवंप्रः | = इस प्रकारके | अध्ययनसे*, | क्रियाभिः | = मात्र क्रियाओंसे |
| विश्वरूपवाला | न | त्वदन्येन | = तैरे (कृपापात्रके) | |
| अहम् | = मैं | दानैः | सिवाय और | |
| न, | न | किसीके द्वारा | ||
| वेदयज्ञाध्ययनैः | = न वेदोंके | उग्रेः | द्रष्टुम् | = देखा जा |
| पाठसे, न यज्ञोंके | तपोभिः | शक्यः | = सकता हूँ। |
व्याख्या—‘कुरुप्रवीर’—यहाँ अर्जुनके लिये ‘कुरुप्रवीर’ सम्बोधन देनेका अभिप्राय है कि सम्पूर्ण कुरुवंशियोंमें मेरेसे उपदेश सुननेकी, मेरे रूपको देखनेकी और जाननेकी तेरी जिज्ञासा हुई, तो यह कुरुवंशियोंमें तुम्हारी श्रेष्ठता है। तात्पर्य यह हुआ कि भगवान्को देखनेकी, जाननेकी इच्छा होना ही वास्तवमें मनुष्यकी श्रेष्ठता है।
‘न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रेः’—वेदोंका अध्ययन किया जाय, यज्ञोंका विधि-विधानसे अनुष्ठान किया जाय, शास्त्रोंका अध्ययन किया जाय, बड़े-बड़े दान किये जायँ, बड़ी उग्र (कठिन-से-कठिन) तपस्याएँ की जायँ और तीर्थ, व्रत आदि शुभ-कर्म किये जायँ—ये सब-के-सब कर्म विश्वरूपदर्शनमें हेतु नहीं बन सकते। कारण कि जितने भी कर्म किये जाते हैं, उन सबका आरम्भ और समाप्ति होती है। अतः उन कर्मोंसे मिलनेवाला फल भी आदि और अन्तवाला ही होता है। अतः ऐसे कर्मोंसे भगवान्के अनन्त, असीम, अव्यय, दिव्य विश्वरूपके दर्शन कैसे हो सकते हैं? उसके दर्शन तो केवल भगवान्की कृपासे ही होते हैं। कारण कि भगवान् नित्य हैं और उनकी कृपा भी नित्य है। अतः नित्य
कृपासे ही अर्जुनको भगवान्के नित्य, अव्यय, दिव्य विश्वरूपके दर्शन हुए हैं। तात्पर्य यह हुआ कि उनमेंसे एक-एकमें अथवा सभी साधनोंमें यह सामर्थ्य नहीं है कि वे विराट्रूपके दर्शन करा सकें। विराट्रूपके दर्शन तो केवल भगवान्की कृपासे, प्रसन्नतासे ही हो सकते हैं।
गीतामें प्रायः यज्ञ, दान और तप—इन तीनोंका ही वर्णन आता है। आठवें अध्यायके अट्टाईसवें श्लोकमें और इसी अध्यायके तिरपनवें श्लोकमें वेद, यज्ञ, दान और तप—इन चारोंका वर्णन आया है और यहाँ वेद, यज्ञ, दान, तप और क्रिया—इन पाँचोंका वर्णन आया है। आठवें अध्यायके अट्टाईसवें श्लोकमें सप्तमी विभक्ति और बहुवचन तथा यहाँके श्लोकमें तृतीया विभक्ति और बहुवचनका प्रयोग हुआ है, जब कि दूसरी जगह प्रायः प्रथमा विभक्ति और एकवचनका प्रयोग आता है।
यहाँ तृतीया विभक्ति और बहुवचन देनेका तात्पर्य यह है कि इन वेद, यज्ञ, दान आदि साधनोंमेंसे एक-एक साधन विशेषतासे बहुत बार किया जाय अथवा सभी साधन विशेषतासे बहुत बार किये जायँ, तो भी वे सब-के-सब साधन विश्वरूपदर्शनके कारण नहीं बन सकते अर्थात् इनके द्वारा विश्वरूप नहीं देखा जा सकता। कारण कि विश्वरूपका
- अगर ‘वेदयज्ञाध्ययनैः’ पदका अर्थ ‘वेदोंका अध्ययन और यज्ञोंका अनुष्ठान’ लिया जाय तो वेदोंके अध्ययनके अन्तर्गत शास्त्रोंका अध्ययन भी आ जाता है; क्योंकि सभी शास्त्र वेदोंका ही अनुगमन करते हैं। परन्तु खुलासा करनेके लिये यहाँ शास्त्रोंका अध्ययन अलगसे लिया गया है।
श्लोक ४९ ]
- साधक-संजीवनी *
७९१
दर्शन करना किसी कर्मका फल नहीं है।
जैसे यहाँ वेद, यज्ञ आदि साधनोंसे विश्वरूप नहीं देखा जा सकता—ऐसा कहकर विश्वरूपदर्शनकी दुर्लभता बतायी है, ऐसे ही आगे तिरपनवें श्लोकमें वेद, यज्ञ आदि साधनोंसे चतुर्भुजरूप नहीं देखा जा सकता—ऐसा कहकर चतुर्भुजरूप—दर्शनकी दुर्लभता बतायी है। चतुर्भुजरूपको देखनेमें अनन्यभक्तिको साधन बताया है। (इसी अध्यायका चौवनवाँ श्लोक); क्योंकि वह रूप ऐसा विलक्षण है कि उसका दर्शन देवता भी चाहते हैं। इसलिये उस रूपमें भक्ति हो सकती है। परन्तु विश्वरूपको देखकर तो भय लगता है; अतः ऐसे रूपमें भक्ति कैसे होगी, प्रेम कैसे होगा? इसलिये इसके दर्शनमें भक्तिको साधन नहीं बताया है। यह तो केवल भगवान्की प्रसन्नतासे, कृपासे ही देखा जा सकता है।
‘एवंरूपः शक्य अहं नूलोके द्रष्टुं त्वदन्येन’—मनुष्यलोकमें इन साधनोंसे तुम्हारे सिवाय मेरा विश्वरूप कोई देख नहीं सकता—इसका अर्थ यह नहीं है कि इन साधनोंसे तू देख सकता है। तुम्हारेको तो मैंने अपनी प्रसन्नतासे ही यह रूप दिखाया है।
संजयको भी जो विश्वरूपके दर्शन हो रहे थे, वह भी व्यासजीकी कृपासे प्राप्त दिव्यदृष्टिसे ही हो रहे थे, किसी दूसरे साधनसे नहीं। तात्पर्य है कि भगवान् और उनके भक्तों, सन्तोंकी कृपासे जो काम होता है, वह काम
साधनोंसे नहीं होता। इनकी कृपा भी अहेतुकी होती है।
कई लोग ठीक न समझनेके कारण ऐसा कहते हैं कि भगवान्ने अर्जुनको विश्वरूप दिखाया नहीं था, प्रत्युत यह समझा दिया था कि मेरे शरीरके किसी एक अंशमें अनन्त ब्रह्माण्ड हैं। पर वास्तवमें यह बात है ही नहीं। स्वयं भगवान्ने कहा है कि ‘मेरे इस शरीरमें एक जगह चराचर-सहित सम्पूर्ण जगत्को अभी देख ले’ (सातवाँ श्लोक)। जब अर्जुनको दिखायी नहीं दिया, तब भगवान्ने कहा कि ‘तू अपने इन चर्मचक्षुओंसे मेरे विश्वरूपको नहीं देख सकता, इसलिये मैं तुझे दिव्यचक्षु देता हूँ’ (आठवाँ श्लोक)। फिर भगवान्ने अर्जुनको दिव्यचक्षु देकर साक्षात् अपना विश्वरूप दिखाया। संजयने भी कहा है कि ‘भगवान्के शरीरमें एक जगह स्थित विश्वरूपको अर्जुनने देखा’ (तेरहवाँ श्लोक)। अर्जुनने भी विश्वरूपका दर्शन करते हुए कहा कि ‘मैं आपके शरीरमें सम्पूर्ण प्राणियोंके समुदायोंको तथा ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि सबको देख रहा हूँ’ (पन्द्रहवाँ श्लोक) आदि—आदि। इससे सिद्ध होता है कि भगवान्ने अर्जुनको प्रत्यक्षमें अपने विश्वरूपके दर्शन कराये थे। दूसरी बात, समझानेके लिये तो ज्ञानचक्षु होते हैं (गीता—तेरहवें अध्यायका चौतीसवाँ और पन्द्रहवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक), पर दिव्यचक्षुसे साक्षात् दर्शन ही होते हैं। अतः भगवान्ने केवल कहकर समझा दिया हो, ऐसी बात नहीं है।
सम्बन्ध—अर्जुनका भय दूर करनेके लिये भगवान् आगेके श्लोकमें उनको ‘देवरूप’ देखनेकी आज्ञा देते हैं।
मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम्।
व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥ ४९ ॥
| इदम् | = यह | मा | = नहीं होनी चाहिये |
|---|---|---|---|
| मम | = मेरा | च | = और |
| ईदृङ् | = इस प्रकारका | विमूढभावः | = विमूढभाव (भी) |
| घोरम् | = उग्र | मा | = नहीं होना चाहिये। |
| रूपम् | = रूप | (अब) | |
| दृष्ट्वा | = देखकर | व्यपेतभीः | = निर्भय (और) |
| ते | = तुझे | प्रीतमनाः | = प्रसन्न मनवाला |
| व्यथा | = व्यथा | होकर |
व्याख्या—‘मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम्’—विकराल दाढ़ीके कारण भयभीत करनेवाले मेरे मुखोंमें योद्धालोग बड़ी तेजीसे जा रहे हैं,
| त्वम् | = तू |
|---|---|
| पुनः | = फिर |
| तत्, एव | = उसी |
| मे | = मेरे |
| इदम् | = इस (चतुर्भुज) |
| रूपम् | = रूपको |
| प्रपश्य | = अच्छी तरह देख ले। |
उनमेंसे कई चूर्ण हुए सिरोंसहित दांतोंके बीचमें फँसे हुए दीख रहे हैं और मैं प्रलयकालकी अग्निके समान प्रज्वलित मुखोंद्वारा सम्पूर्ण लोगोंका ग्रसन करते हुए उनको चारों
७९२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ११ ]
औरसे चाट रहा हूँ—इस प्रकारके मेरे घोर रूपको देखकर तेरेको व्यथा नहीं होनी चाहिये, प्रत्युत प्रसन्नता होनी चाहिये। तात्पर्य है कि पहले (पैतालीसवें श्लोकमें) तू जो मेरी कृपाको देखकर हर्षित हुआ था, तो मेरी कृपाकी तरफ दृष्टि होनेसे तेरा हर्षित होना ठीक ही था, पर यह व्यर्थ होना ठीक नहीं है।
अर्जुनने जो पहले कहा है—‘प्रव्यथितास्तथाहम् ’ (११।२३) और ‘प्रव्यथितान्तरात्मा ’ (११।२४)। उसीके उत्तरमें भगवान् यहाँ कहते हैं—‘मा ते व्यथा। ’
मैं कृपा करके ही ऐसा रूप दिखा रहा हूँ। इसको देखकर तेरेको मोहित नहीं होना चाहिये—‘मा च विमूह-भावः। ’ दूसरी बात, मैं तो प्रसन्न ही हूँ और अपनी प्रसन्नतासे ही तेरेको यह रूप दिखा रहा हूँ; परन्तु तू जो बार-बार यह कह रहा है कि ‘प्रसन्न हो जाओ; प्रसन्न हो जाओ’, यही तेरा विमूहभाव है। तू इसको छोड़ दे। तीसरी बात, पहले तूने कहा था कि मेरा मोह चला गया (पहला श्लोक), पर वास्तवमें तेरा मोह अभी नहीं गया है। तेरेको इस मोहको छोड़ देना चाहिये और निर्भय तथा प्रसन्न मनवाला होकर मेरा वह देवरूप देखना चाहिये। तेरा और मेरा जो संवाद है, यह तो प्रसन्नतासे, आनन्दरूपसे, लीलारूपसे होना चाहिये। इसमें भय और मोह बिलकुल नहीं होने चाहिये। मैं तेरे कहे अनुसार घोड़े हींकता हूँ, बातें करता हूँ, विश्वरूप दिखाता हूँ आदि सब कुछ करनेपर भी तूने मेरेमें कोई विकृति देखी है क्या? मेरेमें कुछ अन्तर आया है क्या? ऐसे ही मेरे विश्वरूपको देखकर तेरेमें भी कोई विकृति नहीं आनी चाहिये।
हे अर्जुन! तेरेको जो भय लग रहा है, वह शरीरमें अहंता-ममता (मैं-मेरापन) होनेसे ही लग रहा है अर्थात् अहंता-ममतावाली चीज (शरीर) नष्ट न हो जाय, इसको लेकर तू भयभीत हो रहा है—यह तेरी मूर्खता है, अनजानपना है। इसको तू छोड़ दे।
आज भी जिस-किसीको जहाँ-कहीं जिस-किसीसे भी
भय होता है, वह शरीरमें अहंता-ममता होनेसे ही होता है। शरीरमें अहंता-ममता होनेसे वह उत्पत्ति-विनाशशील वस्तु- (प्राणों-) को रखना चाहता है। यही मनुष्यकी मूर्खता है और यही आसुरी सम्पत्तिका मूल है। परन्तु जो भगवान्की तरफ चलनेवाले हैं, उनका प्राणोंमें मोह नहीं रहता, प्रत्युत उनका सर्वत्र भगवद्भाव रहता है और एकमात्र भगवान्में प्रेम रहता है। इसलिये वे निर्भय हो जाते हैं। उनका भगवान्की तरफ चलना दैवी सम्पत्तिका मूल है। नुसिंह-भगवान्के भयंकर रूपको देखकर देवता आदि सभी डर गये, पर प्रह्लादजी नहीं डरे; क्योंकि प्रह्लादजीकी सर्वत्र भगवदबुद्धि थी। इसलिये वे नुसिंहभगवान्के पास जाकर उनके चरणोंमें गिर गये और भगवान्ने उनको उठाकर गोदमें ले लिया तथा उनको जीभसे चाटने लगे!
‘व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ’—अर्जुनने पैतालीसवें श्लोकमें कहा था—‘भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ’; अतः भगवान्ने ‘भयेन ’ के लिये कहा है—‘व्यपेतभीः ’ अर्थात् तू भयरहित हो जा और ‘प्रव्यथितं मनः ’ के लिये कहा है—‘प्रीतमनाः ’ अर्थात् तू प्रसन्न मनवाला हो जा।
भगवान्ने विराट्रूपमें अर्जुनको जो चतुर्भुजरूप दिखाया था, उसीके लिये भगवान् ‘पुनः ’ पद देकर कह रहे हैं कि वही मेरा यह रूप तू फिर अच्छी तरहसे देख ले।
‘तदेव ’ कहनेका तात्पर्य है कि तू देवरूप (विष्णुरूप-) के साथ ब्रह्मा, शंकर आदि देवता और भयानक विश्वरूप नहीं देखना चाहता, केवल देवरूप ही देखना चाहता है; इसलिये वही रूप तू अच्छी तरहसे देख ले।
अर्जुनकी प्रार्थनाके अनुसार भगवान् अभी जो रूप दिखाना चाहते हैं, उसके लिये भगवान्ने यहाँ ‘इदम् ’ शब्दका प्रयोग किया है।
संजय और अर्जुनकी दिव्यदृष्टि कबतक रही?
संजयको वेदव्यासजीने युद्धके आरम्भमें दिव्यदृष्टि दी थी,१ जिससे वे धृतराष्ट्रको युद्धके समाचार सुनाते रहे।
१-अपनेमें कई तरहका परिवर्तन देखनेपर भी अर्जुन सब अवस्थाओंमें भगवान्को निर्वाकार ही मानते हैं, तभी तो उन्होंने गीताके आदि, मध्य तथा अन्तमें (गीता—पहले अध्यायके इक्कीसवें, ग्यारहवें अध्यायके बयालीसवें और अठारहवें अध्यायके तिहत्तरवें श्लोकमें) भगवान्के लिये ‘अच्युत’ सम्बोधनका प्रयोग किया है।
२-एष ते संजयो राजन् युद्धमेतद् वदिष्यति। एतस्य सर्वसंग्रामे न परोक्षं भविष्यति॥
चक्षुषा संजयो राजन् दिव्येनैव समन्वितः। कथयिष्यति ते युद्धं सर्वज्ञश्च भविष्यति॥
(महा०, भीष्म० २।१-१०)
‘राजन्! यह संजय आपको इस युद्धका सब समाचार बताया करेगा। सम्पूर्ण संग्रामभूमिमें कोई ऐसी बात नहीं होगी, जो इसके प्रत्यक्ष न हो। राजन्! संजय दिव्यदृष्टिसे सम्पन्न होकर सर्वज्ञ हो जायगा और तुम्हें युद्धकी बात बतायेगा।’
श्लोक ४९ ]
- साधक-संजीवनी *
७९३
परन्तु अन्तमें जब दुर्योधनकी मृत्युपर संजय शोकसे व्याकुल हो गये, तब संजयकी वह दिव्यदृष्टि चली गयी*।
अर्जुनके द्वारा विश्वरूप दिखानेकी प्रार्थना करनेपर भगवान्ने अर्जुनको दिव्यदृष्टि दी—‘दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्’ (११।८) और अर्जुन विराट्रूप भगवान्के देवरूप, उग्ररूप आदि रूपोंके दर्शन करने लगे। जब अर्जुनके सामने अत्युग्र रूप आया, तब वे डर गये और भगवान्की स्तुति-प्रार्थना करते हुए कहने लगे कि ‘मेरा मन भयसे व्यथित हो रहा है, आप मेरेको वही चतुर्भुजरूप दिखाइये।’ तब भगवान्ने अपना चतुर्भुजरूप दिखाया और फिर द्विभुजरूपसे हो गये। इससे सिद्ध होता है कि यहाँ (उनचासवें श्लोक- ) तक ही अर्जुनकी दिव्यदृष्टि रही। इक्यावनमें श्लोकमें स्वयं अर्जुनने कहा है कि ‘मैं आपके सौम्य मनुष्यरूपको देखकर सचेत हो गया हूँ और अपनी स्वाभाविक स्थितिको प्राप्त हो गया हूँ।’
यहाँ शंका होती है कि अर्जुन तो पहले भी व्यथित (व्याकुल) हुए थे—‘दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम्’ (११।२३), ‘दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा’ (११।२४); अतः वहाँ उनकी दिव्यदृष्टि चली जानी चाहिये थी। इसका समाधान यह है कि वहाँ अर्जुन इतने भयभीत नहीं हुए थे, जितने यहाँ हुए हैं। यहाँ तो अर्जुन भयभीत होकर भगवान्को बार-बार नमस्कार करते हैं और उनसे चतुर्भुजरूप दिखानेके लिये प्रार्थना भी करते हैं (पैतालीसवाँ
परिशिष्ट भाव —अर्जुनने घबराकर भगवान्से कहा—‘तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्’ (११।४२) तो भगवान् यहाँ कहते हैं कि मैं चाहे शान्त अथवा उग्र किसी भी रूपमें दिखायी दूँ, हूँ तो मैं तुम्हारा सखा ही! तुम डर गये तो यह तुम्हारी मूढ़ता है, मित्रतामें ढिलाई है! जो कुछ दीख रहा है, वह सब मेरी ही लीला है। इसमें घबराणेकी क्या बात है? मित्रतामें कौन बड़ा और कौन छोटा?
भगवान् ही जगत्-रूपसे प्रकट हुए हैं, इसलिये यह जगत् भगवान्का आदि अवतार कहा जाता है—‘आद्योऽवतारः पुरुषः परस्य’ (श्रीमद्भगवद्गीता २।६।४९)। जैसे भगवान्ने राम, कृष्ण आदि रूपोंसे अवतार लिया है, ऐसे ही जगत्-रूपसे भी अवतार लिया है। इसको अवतार इसलिये कहा है कि इसमें भगवान् दृश्यरूपसे दीखनेमें आ जाते हैं। अवतारके समय लौकिक दृष्टिसे दीखनेपर भी भगवान् सदा अलौकिक ही रहते हैं (गीता—चौथे अध्यायका छठा श्लोक)। परन्तु राग-द्वेषके कारण अज्ञानियोंको भगवान् लौकिक दीखते हैं (गीता—सातवें अध्यायका चौबीसवाँ-पचीसवाँ और नवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)।
भगवान् शान्त अथवा उग्र किसी भी रूपमें आये, उसकी मरजी है। सुन्दर दृश्य हो, पुष्प खिले हों, सुगन्ध आ रही हो तो वह भी भगवान्का रूप है और मांस, हड्डियाँ, मैला पड़ा हो, दुर्गन्ध आ रही हो तो वह भी भगवान्का रूप है।
- तव पुत्रे गते स्वर्गे शोकात्तस्य ममानघ। ऋषिदत्तं प्रणष्टे तद् दिव्यदर्शित्वमद्य वै॥
(महा०, सौप्तिक० १।६२)
‘निष्ठाप नरेश! आपके पुत्रके स्वर्गलोकमें चले जानेसे मैं शोकसे आतुर हो गया हूँ और महर्षि व्यासजीकी दी हुई मेरी वह दिव्यदृष्टि भी अब नष्ट हो गयी है।’
श्लोक)। इसलिये यहाँ अर्जुनकी दिव्यदृष्टि चली जाती है।
दूसरा कारण यह भी माना जा सकता है कि पहले अर्जुनकी विश्वरूप देखनेकी विशेष रुचि (इच्छा) थी—‘द्रष्टुमिच्छामि ते रूपम्’ (११।३), इसलिये भगवान्ने अर्जुनको दिव्यदृष्टि दी; परन्तु यहाँ अर्जुनकी विश्वरूप देखनेकी रुचि नहीं रही और वे भयभीत होनेके कारण चतुर्भुजरूप देखनेकी इच्छा करते हैं, इसलिये (दिव्य-दृष्टिकी आवश्यकता न रहनेसे) उनकी दिव्यदृष्टि चली जाती है।
अगर संजय और अर्जुन शोकसे, भयसे व्यथित (व्याकुल) न होते, तो उनकी दिव्यदृष्टि बहुत समयतक रहती और वे बहुत कुछ देख लेते। परन्तु शोक और भयसे व्यथित होनेके कारण उनकी दिव्यदृष्टि चली गयी। इसी तरहसे जब मनुष्य मोहसे संसारमें आसक्त हो जाता है, तब भगवान्की दी हुई विवेकदृष्टि काम नहीं करती। जैसे, मनुष्यका रुपयोंमें अधिक मोह होता है तो वह चोरी करने लग जाता है, फिर और मोह बढ़नेपर ढकैती करने लग जाता है तथा अत्यधिक मोह बढ़ जानेपर वह रुपयोंके लिये दूसरेकी हत्यातक कर देता है। इस प्रकार ज्यों-ज्यों मोह बढ़ता है, त्यों-ही-त्यों उसका विवेक काम नहीं करता। अगर मनुष्य मोहमें न फँसकर अपनी विवेकदृष्टिको महत्त्व देता, तो वह अपना उद्धार करके संसारमात्रका उद्धार करनेवाला बन जाता!
७९४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ११ ]
भगवान्के सिवाय कुछ नहीं है। भगवान्ने राम, कृष्ण आदि रूप भी धारण किये और मत्स्य, कच्छप, वराह आदि रूप भी धारण किये। वे कोई भी रूप धारण करें, हैं तो भगवान् ही! रूप तो भगवान्का है और क्रिया उनकी लीला है। कोई पाप, अन्याय करता हुआ दीखे तो समझे कि भगवान् कलियुगकी लीला कर रहे हैं। वे जैसा रूप धारण करते हैं, वैसी ही लीला (क्रिया) करते हैं। मूर्तिका रूप (अर्चितातर) धारण करके वे मूर्तिकी तरह ही अचल रहनेकी लीला करते हैं। मूर्तिरूप धारण करके क्रिया करनेमें शोभा नहीं है, प्रत्युत क्रिया न करनेमें ही शोभा है। अन्याथा वह अर्चितातर कैसे रहेगा? वराह (सूअर) का रूप धारण करके वे वराहकी तरह क्रिया करते हैं और मनुष्यका रूप धारण करके वे मनुष्यकी तरह क्रिया करते हैं। वे कोई भी रूप धारण करके कैसी ही क्रिया करें, उससे भक्तोंके हृदयमें कोई विकार नहीं होता, क्योंकि उनकी दृष्टिमें एक भगवान्के सिवाय और कुछ है ही नहीं, हुआ ही नहीं, होगा ही नहीं, होना सम्भव ही नहीं।
हमें जो संसार दीखता है, यह भगवान्का विराटरूप नहीं है; क्योंकि विराटरूप तो दिव्य और अव्यय है, पर दीखनेवाला संसार भौतिक और नाशवान् है। जैसे हमें भौतिक वृन्दावन तो दीखता है, पर उसके भीतरका दिव्य वृन्दावन नहीं दीखता, ऐसे ही हमें भौतिक विश्व तो दीखता है, पर उसके भीतरका दिव्य विश्व (विराटरूप) नहीं दीखता, ऐसा दीखनेमें कारण है—सुखभोगकी इच्छा। भोगेच्छाके कारण ही जड़ता, भौतिकता, मलिनता आयी है। अगर भोगेच्छाको लेकर संसारमें आकर्षण न हो तो सब कुछ चिन्मय विराटरूप ही है।
तत्त्वबोध होनेपर ज्ञानीको तो संसार चिन्मयरूपसे दीखता है, पर प्रेमी भक्तको वह माधुर्यरूपसे दीखता है। माधुर्यरूपसे दीखनेपर जैसे अपने शरीरमें सबकी स्वाभाविक प्रियता होती है, ऐसे ही भक्तकी मात्र प्राणियोंके साथ स्वाभाविक प्रियता होती है। परन्तु अर्जुनने ऐश्वर्यरूपसे भगवान्का विराटरूप देखा था; क्योंकि वे वही रूप देखना चाहते थे—‘द्वष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ’ (११।३)। माधुर्यमें प्रियता विशेष होती है और ऐश्वर्यमें प्रभाव विशेष होता है। तात्पर्य है कि दिव्य विराटरूप एक होनेपर भी भावनाके अनुसार अनेक रूपोंमें दीखता है और अनेकरूपसे दीखनेपर भी एक ही रहता है। एकतामें अनेकता और अनेकतामें एकता भगवान्की विलक्षणता, अलौकिकता, विचित्रता है।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अर्जुनको जिस रूपको देखनेके लिये आज्ञा दी, उसीके अनुसार भगवान् अपना विष्णुरूप दिखाते हैं—इसका वर्णन संजय आगेके श्लोकमें करते हैं।
सज्जय उवाच
इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः। आशवासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ॥ ५० ॥
संजय बोले—
| वासुदेवः | = वासुदेवभगवान्ने | रूपम् | = रूप (देवरूप) | भूत्वा | = होकर |
|---|---|---|---|---|---|
| अर्जुनम् | = अर्जुनसे | दर्शयामास | = दिखाया | एनम् | = इस |
| इति | = ऐसा | च | = और | भीतम् | = भयभीत |
| उक्त्वा | = कहकर | महात्मा | = महात्मा श्रीकृष्णने | अर्जुनको | |
| भूयः | = फिर | पुनः | = पुनः | आशवासया- | |
| तथा | = उसी प्रकारसे | सौम्यवपुः | = सौम्यरूप (द्विभुज मानुषरूप) | मास | = आशवासन दिया। |
| स्वकम् | = अपना |
व्याख्या—‘इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः ’—अर्जुनने जब भगवान्से चतुर्भुजरूप होनेके लिये प्रार्थना की, तब भगवान्ने कहा कि मेरे इस विश्वरूपको देखकर तू व्यथित और भयभीत मत हो।
१-जथा अनेक बेष धरि नृत्य करड़ नट कोइ। सोइ सोइ भाव देखावइ आपुन होइ न सोइ॥
(मानस, उत्तर० ७२ ख)
२-देखें, चौथे अध्यायके नवें श्लोकका परिशिष्ट भाव।
श्लोक ५१ ]
- साधक-संजीवनी *
७९५
तू प्रसन्न मनवाला होकर मेरे इस रूपको देख (उनचासवों श्लोक)। भगवान्के इसी कथनको संजयने यहाँ 'इत्यर्जुन वासुदेवस्तथोक्तत्वा' पदोंसे कहा है।
'तथा' कहनेका तात्पर्य है कि जिस प्रकार कृपाके परवश होकर भगवान्ने अपना विश्वरूप दिखाया था, उसी प्रकार कृपाके परवश होकर भगवान्ने अर्जुनको चतुर्भुजरूप दिखाया। इस चतुर्भुजरूपको देखनेमें अर्जुनकी कोई साधना हो, योग्यता हो—यह बात नहीं है, प्रत्युत भगवान्की कृपा—ही-कृपा है।
'भूयः' कहनेका तात्पर्य है, जिस देवरूप-(चतुर्भुज-रूप-) को अर्जुने विश्वरूपके अन्तर्गत देखा था (पन्द्रहवाँ और सत्रहवाँ श्लोक) और जिसे दिखानेके लिये अर्जुने प्रार्थना की थी (पैंतालीसवाँ-छियालीसवाँ श्लोक), वही रूप भगवान्ने फिर दिखाया।
'आश्वासयामास च भीतमेन भूत्वा पुनः सौम्य-वपुर्माहात्मा'— भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनको पहले चतुर्भुजरूप दिखाया। फिर अर्जुनकी प्रसन्नताके लिये माहात्मा भगवान् श्रीकृष्ण पुनः द्विभुजरूप-(मनुष्यरूप-) से प्रकट हो गये और उन्होंने विश्वरूपको देखनेसे भयभीत हुए अर्जुनको आश्वासन दिया।
भगवान् श्रीकृष्ण द्विभुज थे या चतुर्भुज? इसका उत्तर है कि भगवान् हरदम द्विभुजरूपसे ही रहते थे, पर समय-समयपर जहाँ उचित समझते थे, वहाँ चतुर्भुजरूप हो जाते थे।
दसवें और ग्यारहवें अध्यायमें भगवान्ने अपनी विभूतियोंका वर्णन करनेमें भी अपनी महत्ता, प्रभाव सामर्थ्यको बताया है और अपने अत्यन्त विलक्षण विश्व-रूपको दिखानेमें भी अपने प्रभावको बताया है। अगर मनुष्य भगवान्के ऐसे महान् प्रभावको जान ले अथवा मान ले, तो उसका संसारमें आकर्षण नहीं रहे। वह सदाके लिये संसार-बन्धनसे छूट जाय।
अर्जुनपर भगवान्की कितनी अद्भुत कृपा है कि भगवान्ने पहले विश्वरूप दिखाया, फिर देवरूप (चतुर्भुज-रूप) दिखाया और फिर मानुरूप (द्विभुजरूप) हो गये। इसके साथ-साथ भगवान्ने हमलोगोंपर भी कितनी अलौकिक विलक्षण कृपा की है कि जहाँ-कहीं जिस किसी विशेषताको लेकर हमारा मन चला जाय, वहाँ हम भगवान्का चिन्तन कर सकते हैं और भगवान्के विश्वरूपका पठन-पाठन, चिन्तन कर सकते हैं। इस भयंकर समयमें हमें भगवान्की विभूतियों तथा विश्वरूपके चिन्तन आदिका जो मौका मिला है, इसमें हमारा उद्योग, योग्यता कारण नहीं है, प्रत्युत भगवान्की कृपा ही कारण है। भगवान्की इस कृपाको देखकर हमें प्रसन्न हो जाना चाहिये। इन विभूतियोंको सुनने और विश्वरूपके चिन्तन-स्मरणका मौका तो उस समय भी संजय आदि बहुत थोड़े लोगोंको ही मिला था। वही मौका आज हमें प्राप्त हुआ है। अतः ऐसे मौकेको व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिये।
सम्बन्ध—भगवान्ने मनुष्यरूप होकर जब अर्जुनको आश्वासन दिया, तब अर्जुन बोले—
अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेदेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन। इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ॥ ५१ ॥
अर्जुन बोले—
जनार्दन = हे जनार्दन!
तव = आपके
इदम् = इस
सौम्यम् = सौम्य
मानुषम् = मनुष्य
रूपम् = रूपको
दृष्ट्वा = देखकर (मैं)
इदानीम् = इस समय
सचेताः = स्थिरचित्त
संवृत्तः = हो गया
अस्मि = हूँ (और)
प्रकृतिम् = अपनी स्वाभाविक स्थितिको
गतः = प्राप्त हो गया हूँ।
व्याख्या—'दृष्ट्वेदेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन'— आपके मनुष्यरूपमें प्रकट होकर लीला करनेवाले रूपको
देखकर गायें, पशु-पक्षी, वृक्ष, लताएँ आदि भी पुलकित हो जाती हैं*, ऐसे सौम्य द्विभुजरूपको देखकर मैं होशमें आ
- त्रैलोक्यसौभागमिदं च निरीक्ष्य रूपं यदगोद्विजद्वयमुगाः पुलकान्यबिभ्रन् ॥ (श्रीमद्भगवद्गीता १०।२९।४०)
७९६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १२ ]
गया हूँ, मेरा चित्त स्थिर हो गया है—‘इदानीमस्मि संवृतः सचेताः’, विराट् रूपको देखकर जो मैं भयभीत हो गया था, वह सब भय अब मिट गया है, सब व्यथा चली गयी है और मैं अपनी वास्तविक स्थितिको प्राप्त हो गया हूँ—‘प्रकृतिं गतः’। यहाँ ‘सचेताः’ कहनेका तात्पर्य है कि जब अर्जुनकी
दृष्टि भगवान्की कृपाकी तरफ गयी, तब अर्जुनको होश आया और वे सोचने लगे कि कहाँ तो मैं और कहाँ भगवान्का विस्मयकारक विलक्षण विराट् रूप! इसमें मेरी कोई योग्यता, अधिकारिता नहीं है। इसमें तो केवल भगवान्की कृपा—ही-कृपा है।
परिशिष्ट भाव —भगवान्का सौम्यरूप द्विभुज होनेके कारण अर्जुने उसको मनुष्यरूप कहा है। भगवान् श्रीकृष्ण द्विभुज थे। ब्रह्मवैवर्तपुराणमें आया है—
त्वमेव भगवानाद्यो निर्गुणः प्रकृतेः परः। अद्वागिो द्विभुजः कृष्णोऽप्यद्वागिनि चतुर्भुजः ॥
(प्रकृति० १२।१५)
‘आप सबके आदि, निर्गुण और प्रकृतिसे अतीत भगवान् ही अपने आधे अंगसे द्विभुज कृष्ण और आधे अंगसे चतुर्भुज विष्णुके रूपमें प्रकट हुए हैं।’
द्विभुजो राधिकाकान्तो लक्ष्मीकान्तश्चतुर्भुजः। गोलोके द्विभुजस्तथौ गोपैर्गोपीभिरावृतः ॥
चतुर्भुजश्च वैकुण्ठं प्रययौ पद्मया सह। सर्वांशिन समी तौ द्वौ कृष्णनारायणौ परौ ॥
(प्रकृति० ३५।१४-१५)
‘द्विभुज कृष्ण राधिकापति हैं और चतुर्भुज विष्णु लक्ष्मीपति हैं। कृष्ण गोप-गोपियोंसे आवृत होकर गोलोकमें और विष्णु लक्ष्मीके साथ (पार्षदोंसहित) वैकुण्ठमें स्थित हैं। वे कृष्ण और विष्णु—दोनों सब प्रकारसे समान अर्थात् एक ही हैं।’
तात्पर्य है कि द्विभुजरूप (कृष्ण), चतुर्भुजरूप (विष्णु) और सहस्रभुजरूप (विराट् रूप)—तीनों एक ही समग्र भगवान्के रूप हैं।
सम्बन्ध—अर्जुनकी कृतज्ञताका अनुमोदन करते हुए भगवान् कहते हैं—
श्रीभगवानुवाच
सुदुर्दशंमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम।
देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः ॥ ५२ ॥
श्रीभगवान् बोले—
| मम | = मेरा | सुदुर्दशंम् | = इसके दर्शन | रूपस्य | = रूपको |
|---|---|---|---|---|---|
| इदम् | = यह | अत्यन्त ही | नित्यम्, | ||
| यत् | = जो | दुर्लभ हैं। | दर्शनकाङ्क्षिणः | = देखनेके | |
| रूपम् | = (चतुर्भुज) रूप | देवाः | = देवता | लिये नित्य | |
| दृष्टवान्, | अपि | = भी | लालायित | ||
| असि | = (तुमने) देखा है, | अस्य | = इस | रहते हैं। |
व्याख्या —‘सुदुर्दशंमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम’—
यहाँ ‘सुदुर्दशंम्’ पद चतुर्भुजरूपके लिये ही आया है, विराट् रूप या द्विभुजरूपके लिये नहीं। कारण कि विराट् रूपकी तो देवता भी कल्पना क्यों करने लगे! और मनुष्यरूप जब मनुष्योंके लिये सुलभ था, तब देवताओंके लिये वह दुर्लभ कैसे होता! इसलिये ‘सुदुर्दशंम्’ पदसे भगवान् विष्णुका चतुर्भुजरूप ही लेना चाहिये, जिसके लिये ‘देवरूपम्’ (११।४५) और ‘स्वर्क रूपम्’ (११।
५०) पद आये हैं।
‘देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः’—
भगवान्ने यहाँ कहा है कि मेरा यह जो चतुर्भुजरूप है इसके दर्शन बड़े ही दुर्लभ हैं। आगे तिरपनवें-चौवनवें श्लोकोंमें कहा है कि इस चतुर्भुजरूपके दर्शन वेद, यज्ञ, तप, दान आदि साधनोंसे नहीं हो सकते; प्रत्युत इसके दर्शन तो अनन्यभक्तिसे ही हो सकते हैं। अब यहाँ एक शंका होती है कि देवता भी इस रूपके दर्शनकी नित्य आकांक्षा
श्लोक ५३ ]
- साधक-संजीवनी *
७९७
(लालसा) रखते हैं, फिर उनको दर्शन क्यों नहीं होते? जब कि भगवान् के दर्शनकी नित्य लालसा रहना अनन्य-भक्ति ही है। इसका समाधान यह है कि वास्तवमें देवताओंकी नित्य लालसा अनन्यभक्ति नहीं है।
नित्य लालसा रखनेका तात्पर्य है कि नित्य-निरन्तर एक परमात्माकी ही लालसा लगी रहे और दूसरी कोई लालसा न रहे। ऐसी लालसावाला दुराचारी-से-दुराचारी मनुष्य भी भगवान् का भक्त हो जाता है और उसे भगवत्प्राप्ति हो जाती है। परन्तु ऐसी अनन्य लालसा देवताओंकी नहीं होती; क्योंकि वे प्रायः भोग भोगनेके लिये ही देवता बने हैं और उनका प्रायः भोग भोगनेका ही उद्देश्य होता है। तो फिर उनकी लालसा कैसी होती है? जैसी लालसा (इच्छा) प्रायः सभी आस्तिक मनुष्योंमें रहती है कि 'हमें भगवान् के दर्शन हो जायँ, हमारा कल्याण हो जाय।' उनकी ऐसी इच्छा तो रहती है, पर भोग और संग्रहकी रुचि ज्यों-की-त्यों बनी रहती है। तात्पर्य है कि जैसे मार्गमें चलते हुए किसीको मणि मिल जाय, ऐसे ही (गौणतासे) हमारी मुक्ति हो जाय तो अच्छी बात है—इस प्रकार जैसे मनुष्योंमें मुक्तिकी इच्छा गौण होती है, ऐसे ही भगवान् दर्शन दे तो हम भी दर्शन कर लें—इस प्रकार देवताओंमें दर्शनकी इच्छा गौण होती है।
देवतालोग 'हम इतने ऊँचे पदपर हैं, हमारे लोक, शरीर और भोग दिव्य हैं, हम बड़े पुण्यशाली हैं; अतः हमें भगवान् के दर्शन होने चाहिये'—ऐसी कोरी इच्छा ही
परिशिष्ट भाव —यद्यपि देवताओंका शरीर दिव्य होता है, पर भगवान् का शरीर उससे भी विलक्षण होता है। देवताओंका शरीर भौतिक तेजोमय और भगवान् का शरीर चिन्मय होता है। भगवान् का शरीर सत्-चित्-आनन्दमय, नित्य, अलौकिक और अत्यन्त दिव्य होता है। अतः देवता भी भगवान् को देखनेके लिये लालायित रहते हैं। जैसे साधारण लोगोंमें नये-नये स्थान देखनेका शौक रहता है, ऐसे ही देवताओंमें भगवान् को देखनेका शौक है, प्रेम नहीं। तात्पर्य है कि जैसे भक्त प्रेमपूर्वक भगवान् को देखना चाहते हैं, ऐसे देवता नहीं देखना चाहते। इसलिये भगवान् प्रेमी भक्तोंके तो अधीन हैं, पर देवताओंके अधीन नहीं हैं।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें कही हुई बातको ही भगवान् आगेके श्लोकमें पुष्ट करते हैं।
नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया। शक्य एवँविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥ ५३ ॥
१-मार्गं प्रयाते मणिलाभवन्मे लभेत मोक्षो यदि तर्हि धन्यः।
२-चिदानन्दमय देह तुम्हारी। बिगत बिकार जान अधिकारी ॥ (मानस, अयोध्या १२७। ३)
करते हैं, इसलिये उनको कभी दर्शन होंगे नहीं। कारण कि उनमें देवत्व, पद आदिका अभिमान है। अभिमानसे, पद आदिके बलसे भगवान् के दर्शन नहीं हो सकते। इसलिये अर्जुनने दसवें अध्यायके चौदहवें श्लोकमें कहा है कि 'हे भगवान्! आपके प्रकट होनेको देवता और दानव भी नहीं जानते।' इस प्रकार अर्जुनने भगवान् को न जाननेमें देवताओं और दानवोंको एक श्रेणीमें लिया है। इसका तात्पर्य यही है कि जैसे देवताओंके पास वैभव है, ऐसे ही दानवोंके पास विचित्र-विचित्र माया है, सिद्धियाँ हैं, पर उनके बलपर वे भगवान् को नहीं जान सकते। ऐसे ही देवता भगवान् के दर्शनकी लालसा भी रखें, तो भी उनको देवत्व-शक्तिके दर्शन नहीं हो सकते; क्योंकि भगवान् के दर्शनमें देवत्व कारण नहीं है। तात्पर्य है कि भगवान् को न तो देवत्व-शक्तिके देखा जा सकता है और न यज्ञ, तप, दान आदि शुभ-कर्मोंसे ही देखा जा सकता है (इसी अध्यायका तिरपनवाँ श्लोक)। उनको तो अनन्यभक्तिके ही देखा जा सकता है (चौवनवाँ श्लोक)। अनन्यभक्तिके देवता और मनुष्य—दोनों ही भगवान् को देख सकते हैं।
'देवा अपि' कहनेका तात्पर्य है कि जिन पुण्योंके कारण देवताओंको ऊँचा पद मिला है, ऊँचे (दिव्य) भोग मिले हैं, उन पुण्योंके बलसे, पद आदिके बलसे वे भगवान् के दर्शन नहीं कर सकते। तात्पर्य है कि पुण्यकर्म ऊँचे लोक, ऊँचे भोग तो दे सकते हैं, पर भगवान् के दर्शन करानेकी उनमें सामर्थ्य नहीं है। भगवान् के दर्शनमें यह प्राकृत महत्त्व कुछ भी मूल्य नहीं रखता।
७९८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ११ ]
यथा | = जिस प्रकार (तुमने) | अहम् | = (चतुर्भुजरूपवाला) मैं | दानेन | = दानसे ---|---|---|---|---|--- माम् | = मुझे | न | = न तो | च | = और द्रष्टवान् | = देखा | वेदैः | = वेदोंसे, | न | = न असि | = है, | न | = न | इज्यया | = यज्ञसे ही एवंविधः | = इस प्रकारका | तपसा | = तपसे, | द्रष्टुम् | = देखा | | न | = न | शक्यः | = जा सकता हूँ।
व्याख्या—‘द्रष्टवानसि मां यथा’ —तुमने मेरा चतुर्भुजरूप मेरी कृपासे ही देखा है। तात्पर्य है कि मेरे दर्शन मेरी कृपासे ही हो सकते हैं, किसी योग्यतासे नहीं।
‘नाहं वेदेन तपसा न दानेन न चैज्यया शक्य एवंविधो द्रष्टुम्’ —यह एक सिद्धान्तकी बात है कि जो चीज किसी मूल्यसे खरीदी जाती है, वह चीज उस मूल्यसे कम मूल्यकी ही होती है। जैसे, कोई दूकानदार एक घड़ी सौ रुपयेमें बेचता है, तो उसने वह घड़ी कम मूल्यमें ली है, तभी तो वह सौ रुपयेमें देता है। इसी तरह अनेक वेदोंका अध्ययन करनेपर, बहुत बड़ी तपस्या करनेपर, बहुत बड़ा दान देनेपर तथा बहुत बड़ा यज्ञ-अनुष्ठान करनेपर भगवान् मिल जायेंगे—ऐसी बात नहीं है। कितनी ही महान् क्रिया क्यों न हो, कितनी ही योग्यता सम्पन्न क्यों न की जाय, उसके द्वारा भगवान् खरीदे नहीं जा सकते। वे सब-के-सब मिलकर भी भगवत्प्राप्तिका मूल्य नहीं हो सकते। उनके द्वारा भगवान्पर अधिकार नहीं जमाया जा सकता। अर्जुनने इसी अध्यायके तैतालौसवें श्लोकमें साफ कहा है कि त्रिलोकीमें आपके समान भी कोई नहीं है, फिर आपसे अधिक हो ही कैसे सकता है ? तात्पर्य है कि आपसे अधिक हुए बिना आपपर अधिकार नहीं किया जा सकता।
सांसारिक चीजोंमें तो अधिक योग्यतावाला कम योग्यतावालेपर आधिपत्य कर सकता है, अधिक बुद्धिमान् कम बुद्धिवालोंपर अपना रोब जमा सकता है, अधिक धनवान् निर्धनोपर अपनी अधिकता प्रकट कर सकता है; परन्तु भगवान् किसी बल, बुद्धि, योग्यता, व्यक्ति, वस्तु आदिसे खरीदे नहीं जा सकते। कारण कि जिस भगवान्के
संकल्पमात्रसे तत्काल अनन्त ब्रह्माण्डोंकी रचना हो जाती है, उसे एक ब्रह्माण्डके भी किसी अंशमें रहनेवाले किसी वस्तु, व्यक्ति आदिसे कैसे खरीदा जा सकता है ? तात्पर्य यह है कि भगवान्की प्राप्ति केवल भगवान्की कृपासे ही होती है। वह कृपा तब प्राप्त होती है, जब मनुष्य अपनी सामर्थ्य, समय, समझ, सामग्री आदिको भगवान्के सर्वथा अर्पण करके अपनेमें सर्वथा निर्बलता, अयोग्यताका अनुभव करता है अर्थात् अपने बल, योग्यता आदिका किंचिन्मात्र भी अभिमान नहीं करता। इस प्रकार जब वह सर्वथा निर्बल होकर अपने-आपको भगवान्के सर्वथा समर्पित करके अनन्यभावसे भगवान्को पुकारता है, तब भगवान् तत्काल प्रकट हो जाते हैं। कारण कि जबतक मनुष्यके अन्तःकरणमें प्राकृत वस्तु, योग्यता, बल, बुद्धि आदिका महत्त्व और सहारा रहता है, तबतक भगवान् अत्यन्त नजदीक होनेपर भी दूर दीखते हैं।
इस श्लोकमें जो दुर्लभता बतायी गयी है, वह चतुर्भुजरूपके लिये ही बतायी गयी है, विश्वरूपके लिये नहीं। अगर इसको विश्वरूपके लिये ही मान लिया जाय तो पुनरुक्ति-दोष आ जायगा; क्योंकि पहले अङ्गतालीसवें श्लोकमें विश्वरूपकी दुर्लभता बतायी जा चुकी है। दूसरी बात, आगेके श्लोकमें भगवान्ने अनन्यभक्तिसे अपनेको देखा जाना शक्य बताया है। विश्वरूपमें अनन्यभक्ति हो ही नहीं सकती, क्योंकि अर्जुन-जैसे शूरवीर पुरुष भगवान्से दिव्यदृष्टि प्राप्त करके भी विश्वरूपको देखकर भयभीत हो गये, तो उस रूपमें अनन्यभक्ति, अनन्यप्रेम, आकर्षण कैसे हो सकता है ? अर्थात् नहीं हो सकता।
सम्बन्ध—जब कोई किसी साधनसे, किसी योग्यतासे, किसी सामग्रीसे आपको प्राप्त नहीं कर सकता, तो फिर आप कैसे प्राप्त किये जाते हैं—इसका उत्तर भगवान् आगेके श्लोकमें देते हैं।
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन। ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप ॥५४॥
श्लोक ५४ ]
- साधक-संजीवनी *
७९९
| तु | = परन्तु | अनन्यया, | द्रष्टुम् | = (साकाररूपसे) | |
|---|---|---|---|---|---|
| परन्तप | = हे शत्रुतापन | भवत्या | = (केवल) अनन्य- | देखनेमें | |
| अर्जुन | = अर्जुन! | भक्तिसे ही | च | = तथा | |
| एवंविधः | = इस प्रकार | तत्त्वेन | = तत्त्वसे | प्रवेष्टुम् | = प्रवेश (प्राप्त) |
| अहम् | = (चतुर्भुजरूप- | ज्ञातुम् | = जाननेमें | करनेमें | |
| वाला) मैं | च | = और | शक्यः | = शक्य हूँ। |
व्याख्या —‘भवत्या त्वनन्यया शक्य अहमेवं-विधोर्जुन’—यहाँ ‘तु’ पद पहले बताये हुए साधनोंसे विलक्षण साधन बतानेके लिये आया है। भगवान् कहते हैं कि ‘हे अर्जुन! तुमने मेरा जैसा शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी चतुर्भुजरूप देखा है, वैसा रूपवाला मैं यज्ञ, दान, तप आदिके द्वारा नहीं देखा जा सकता, प्रत्युत अनन्यभक्तिके द्वारा ही देखा जा सकता हूँ।
अनन्यभक्तिका अर्थ है—केवल भगवान्का ही आश्रय हो, सहारा हो, आशा हो, विश्वास हो*। भगवान्के सिवाय किसी योग्यता, बल, बुद्धि आदिका किंचिन्मात्र भी सहारा न हो। इनका अन्तःकरणमें किंचिन्मात्र भी महत्त्व न हो। यह अनन्यभक्ति स्वयंसे ही होती है, मन-बुद्धि-इन्द्रियों आदिके द्वारा नहीं। तात्पर्य है कि केवल स्वयंकी व्याकुलतापूर्वक उत्कण्ठा हो, भगवान्के दर्शन बिना एक क्षण भी चैन न पड़े। ऐसी जो भीतरमें स्वयंकी बेचैनी है, वही भगवत्प्राप्तिमें खास कारण है। इस बेचैनीमें, व्याकुलतामें अनन्त जन्मोंके अनन्त पाप भस्म हो जाते हैं। ऐसी अनन्यभक्तिवालोंके लिये ही भगवान्ने कहा है—‘जो अनन्यचित्वाला भक्त नित्य-निरन्तर मेरा चिन्तन करता है, उसके लिये मैं सुलभ हूँ’ (गीता—आठवें अध्यायका चौदहवाँ श्लोक); और ‘जो अनन्यभक्त मेरा चिन्तन करते हुए उपासना करते हैं, उनका योगक्षेम मैं वहन करता हूँ (गीता—नवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)।
अनन्यभक्तिका दूसरा तात्पर्य यह है कि अपनेमें भजन-स्मरण करनेका, साधन करनेका, उत्कण्ठापूर्वक पुकारनेका जो कुछ सहारा है, वह सहारा किंचिन्मात्र भी न हो। फिर साधन किसलिये करना है? केवल अपना अभिमान मिटानेके लिये अर्थात् अपनेमें जो साधन करनेके बलका भान होता है, कि साधनके बलपर मैं अपना उद्धार
कर लूँगा, उसको मिटानेके लिये ही साधन करना है। तात्पर्य है कि भगवान्की प्राप्ति साधन करनेसे नहीं होती, प्रत्युत साधनका अभिमान गलनेसे होती है। साधनका अभिमान गल जानेसे साधकपर भगवान्की शुद्ध कृपा असर करती है अर्थात् उस कृपाके आनेमें कोई आड़ नहीं रहती और (उस कृपासे) भगवान्की प्राप्ति हो जाती है।
‘ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुम्’—ऐसी अनन्यभक्तिसे ही मैं तत्त्वसे जाना जा सकता हूँ, अनन्यभक्तिसे ही मैं देखा जा सकता हूँ और अनन्यभक्तिसे ही मैं प्राप्त किया जा सकता हूँ।
ज्ञानके द्वारा भी भगवान् तत्त्वसे जाने जा सकते हैं और प्राप्त किये जा सकते हैं (गीता—अठारहवें अध्यायका पचपनवाँ श्लोक), पर दर्शन देनेके लिये भगवान् बाध्य नहीं हैं।
‘ज्ञातुम्’ कहनेका तात्पर्य है कि मैं जैसा हूँ, वैसा-का-वैसा जाननेमें आ जाता हूँ। जाननेमें आनेका यह अर्थ नहीं है कि मैं उसकी बुद्धिके अन्तर्गत आ जाता हूँ, प्रत्युत उसकी जाननेकी शक्ति मेरेसे परिपूर्ण हो जाती है। तात्पर्य है कि वह मेरेको ‘वासुदेवः सर्वम्’ (गीता ७।११) और ‘सदसच्चाहम्’ (गीता ९।११)— इस तरह वास्तविक तत्त्वसे जान लेता है।
‘द्रष्टुम्’ कहनेका तात्पर्य है कि वह सगुणरूपसे अर्थात् विष्णु, राम, कृष्ण आदि जिस किसी भी रूपसे देखना चाहे, मेरेको देख सकता है।
‘प्रवेष्टुम्’ कहनेका तात्पर्य है कि वह भगवान्के साथ अपने-आपकी अभिन्नताका अनुभव कर लेता है अथवा उसका भगवान्की नित्यलीलामें प्रवेश हो जाता है। नित्यलीलामें प्रवेश होनेमें भक्तकी इच्छा और भगवान्की मरजी ही मुख्य होती है। यद्यपि भगवान्के सर्वथा शरण
- (१) एक भरोसो एक बल एक आस बिस्वास। एक राम घन स्याम हित चातक तुलसीदास॥ (दोहावली २७७)
(२) एक बानि करुनानिधान की। सो प्रिय जाकें गति न आन की॥ (मानस ३।१०।४)
८००
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ११ ]
होनेपर भक्तकी सब इच्छाएँ समाप्त हो जाती हैं, तथापि भगवान्की यह एक विलक्षणता है कि भक्तकी लीलामें प्रवेश होनेकी जो इच्छा रही है, उसको वे पूरी कर देते हैं। केवल पारमार्थिक इच्छाको ही पूरी करते हों, ऐसी बात नहीं; किन्तु भक्तकी पहले जो सांसारिक यत्किंचित् इच्छा रही हो, उसको भी भगवान् पूरी कर देते हैं। जैसे भगवर्दर्शनसे पूर्वकी इच्छाके अनुसार ध्रुवजीको छतीस हजार वर्षका राज्य मिला और विभीषणको एक कल्पका। तात्पर्य यह हुआ कि भगवान् भक्तकी इच्छाको पूरी कर देते हैं और फिर अपनी मरजीके अनुसार उसे वास्तविक पूर्णताकी प्राप्ति करा देते हैं, जिससे भक्तके लिये कुछ भी
करना, जानना और पाना शेष नहीं रहता।
विशेष बात
भक्तकी खुदकी जो उत्कट अभिलाषा है, उस अभिलाषामें ऐसी ताकत है कि वह भगवान्में भी भक्तसे मिलनेकी उत्कण्ठा पैदा कर देती है। भगवान्की इस उत्कण्ठामें बाधा देनेकी किसीमें भी सामर्थ्य नहीं है। अनन्त सामर्थ्यशाली भगवान्की जब भक्तकी तरफ कृपा उमड़ती है, तब वह कृपा भक्तके सम्पूर्ण विघ्नोंको दूर करके, भक्तकी योग्यता-अयोग्यताको किंचिन्मात्र भी न देखती हुई भगवान्को भी परवश कर देती है, जिससे भगवान् भक्तके सामने तत्काल प्रकट हो जाते हैं।
परिशिष्ट भाव— जहाँ भगवान्ने ज्ञानकी परानिष्ठा बतायी है, वहाँ ज्ञानसे केवल जानना और प्रवेश करना—ये दो ही बताये हैं—‘ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्’ (गीता १८।५५) परन्तु यहाँ भक्तिसे जानना, देखना और प्रवेश करना—ये तीनों बताये हैं। भक्तिसे भगवान्के दर्शन भी हो सकते हैं—यह भक्तिकी विशेषता है, जबकि ज्ञानकी परानिष्ठा होनेपर भी भगवान्के दर्शन नहीं होते। अतः भक्तिकी विशेष महिमा है। भक्तिमें समग्रकी प्राप्ति होती है।
ब्रह्मकी प्राप्तिमें जानना और प्रवेश करना—ये दो बातें हो सकती हैं, पर समग्रकी प्राप्तिमें जानना, प्रवेश करना और देखना—ये तीनों बातें होती हैं। कारण कि एकदेशीयमें एकदेशीयता होती है और समग्रमें समग्रता होती है।
सम्बन्ध—अब भगवान् अन्यभक्तिके साधनोंका वर्णन करते हैं।
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥ ५५ ॥
| पाण्डव | = हे पाण्डव! | (और) | सर्वभूतेषु | = प्राणिमात्रके साथ |
|---|---|---|---|---|
| यः | = जो | मद्भक्तः | = मेरा ही प्रेमी भक्त | निर्वैरः |
| मत्कर्मकृत् | = मेरे लिये ही कर्म करनेवाला, | सङ्गवर्जितः | = सर्वथा आसक्ति-रहित (और) | सः |
| मत्परमः | = मेरे ही परायण | माम् | ||
| एति | = प्राप्त होता है। |
व्याख्या—[इस श्लोकमें पाँच बातें आयी हैं। इन पाँचोंको ‘साधनपंचक’ भी कहते हैं। इन पाँचों बातोंके दो विभाग हैं। (१) भगवान्के साथ घनिष्ठता और (२) संसारके साथ सम्बन्ध-विच्छेद। पहले विभागमें ‘मत्कर्मकृत्’, ‘मत्परमः’ और ‘मद्भक्तः’—ये तीन बातें हैं; और दूसरे विभागमें ‘संगवर्जितः’ और ‘निर्वैरः सर्वभूतेषु’—ये दो बातें हैं।
‘मत्कर्मकृत्’—जो जप, कीर्तन, ध्यान, सत्संग, स्वाध्याय आदि भगवत्सम्बन्धी कर्मोंको और वर्ण, आश्रम, देश, काल, परिस्थिति आदिके अनुसार प्राप्त लौकिक
कर्मोंको केवल मेरे लिये ही अर्थात् मेरी प्रसन्नताके लिये ही करता है, वह ‘मत्कर्मकृत्’ है।
वास्तवमें देखा जाय तो कर्मके पारमार्थिक और लौकिक—ये दो बाह्यरूप होते हैं, पर भीतरमें ‘सब कर्म केवल भगवान्के लिये ही करने हैं’—ऐसा एक ही भाव रहता है, एक ही उद्देश्य रहता है। तात्पर्य यह हुआ कि भक्त शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिसे जो कुछ भी कर्म करता है, वह सब भगवान्के लिये ही करता है। कारण कि उसके पास शरीर, मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, योग्यता, करनेकी सामर्थ्य, समझ आदि जो कुछ है, वह सब-की-सब भगवान्की ही