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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 788, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 788

श्लोक ४६ ]

  • साधक-संजीवनी *

७८७

विश्वरूप इतना दिव्य, अलौकिक है कि हजारों भौतिक सूर्योका प्रकाश भी इसके प्रकाशका उपमेय नहीं हो सकता (इसी अध्यायका बारहवाँ श्लोक)। इसलिये इस विश्वरूपको 'दिव्यचक्षु' के बिना कोई भी देख नहीं सकता। 'ज्ञानचक्षु' के द्वारा संसारके मूलमें सत्कारूपसे जो परमात्मतत्त्व है, उसका बोध होता है और 'भावचक्षु' से संसार भगवत्स्वरूप दीखता है, पर इन दोनों ही चक्षुओंसे विश्वरूपका दर्शन नहीं होता। 'चर्मचक्षु' से न तो तत्त्वका बोध होता है, न संसार भगवत्स्वरूप दीखता है और न विश्वरूपका दर्शन ही होता है; क्योंकि चर्मचक्षु प्रकृतिका कार्य है। इसलिये चर्मचक्षुसे प्रकृतिके स्थूल कार्यको ही देखा जा सकता है। वास्तवमें भगवान्के द्विभुज, चतुर्भुज, सहस्रभुज आदि जितने भी रूप हैं, वे सब-के-सब दिव्य और अव्यय हैं। इसी तरह भगवान्के सगुण-निराकार, निर्गुण-निराकार, सगुण-साकार आदि जितने रूप हैं, वे सब-के-सब भी दिव्य और अव्यय हैं।

माधुर्य-लीलामें तो भगवान् द्विभुजरूप ही रहते हैं; परन्तु जहाँ अपना कुछ ऐश्वर्य दिखलानेकी आवश्यकता होती है, वहाँ भगवान् पात्र, अधिकार, भाव आदिके भेदसे अपना विराट्रूप भी दिखा देते हैं। जैसे, भगवान्ने

अर्जुनको मनुष्यरूपसे प्रकट हुए अपने द्विभुजरूप—शरीरके किसी अंशमें विराट्रूप दिखाया है।

भगवान्ने अनन्त-असीम ऐश्वर्य, माधुर्य, सौन्दर्य, औदार्य आदि दिव्य गुण हैं। उन अनन्त दिव्य गुणोंके सहित भगवान्का विश्वरूप है। भगवान् जिस-किसीको ऐसा विश्वरूप दिखाते हैं, उसे पहले दिव्यदृष्टि देते हैं। दिव्यदृष्टि देनेपर भी वह जैसा पात्र होता है, जैसी योग्यता और रुचिवाला होता है, उसीके अनुसार भगवान् उसको अपने विश्वरूपके स्तरोंका दर्शन कराते हैं। यहाँ ग्यारहवें अध्यायके पंद्रहवेंसे तीसवें श्लोकतक भगवान् विश्वरूपसे अनेक स्तरोंसे प्रकट होते गये, जिसमें पहले देवरूपकी (पन्द्रहवेंसे अठारहवें श्लोकतक), फिर उग्ररूपकी (उन्नीसवेंसे बाईसवें श्लोकतक) और उसके बाद अत्युग्ररूपकी (तेईसवेंसे तीसवें श्लोकतक) प्रधानता रही। अत्युग्ररूपको देखकर जब अर्जुन भयभीत हो गये, तब भगवान्ने अपने दिव्यतिदिव्य विश्वरूपके स्तरोंको दिखाना बंद कर दिया अर्थात् अर्जुनके भयभीत होनेके कारण भगवान्ने अगले रूपोंके दर्शन नहीं कराये। तात्पर्य है कि भगवान्ने दिव्य विराट्रूपके अनन्त स्तरोंमेंसे उतने ही स्तर अर्जुनको दिखाये, जितने स्तरोंको दिखानेकी आवश्यकता थी और जितने स्तर देखनेकी अर्जुनमें योग्यता थी।

किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव।

तैनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ॥ ४६ ॥

अहम्= मैंचक्रहस्तम्= हाथमें चक्र लिये हुए अर्थात् चतुर्भुज-रूपसेविश्वमूर्ते= हे विश्वमूर्ते! (आप)
त्वाम्= आपकोद्रष्टुम्= देखनातेन, एव *= उसी
तथा= वैसेइच्छामि= चाहता हूँ। (इसलिये)चतुर्भुजेन, रूपेण= चतुर्भुजरूपसे (शंख-चक्र-गदा-पद्मसहित)
एव= हीसहस्रबाहो= हे सहस्रबाहो!भव= हो जाइये।
किरीटिनम्= किरीट-(मुकुट) धारी,
गदिनम्= गदाधारी (और)
  • इदमस्तु सन्निकृष्टे समीपतरवर्ति चैतदो रूपम्। अदसस्तु विप्रकृष्टे तदिति परोक्षे विजानीयात् ॥

—इस उक्तिके अनुसार 'इदम्' शब्द समीपका, 'एतत्' शब्द अत्यन्त समीपका, 'अदस्' शब्द दूरका और 'तत्' शब्द परोक्षका वाचक है। विश्वरूपमें इन सबका प्रयोग हुआ है; जैसे—विश्वरूप नजदीक होनेसे अर्जुनने अठारहवें-उन्नीसवें आदि श्लोकोंमें 'इदम्' शब्दका; भीष्म, द्रोण आदि विराट्रूप भगवान्के अत्यन्त नजदीक होनेसे अर्थात् विराट्रूपका ही अंग होनेसे भगवान्ने तैंतीसवें श्लोकमें 'एतत्' शब्दका; भगवान्की ही हुई दिव्यदृष्टिसे विराट्रूप बहुत दूरतक दीखता था और उसमें देवता आदि भी दूरतक दीखते थे, इसलिये अर्जुनने इक्कीसवें, छब्बीसवें और अड़ईसवें श्लोकमें 'अदस्' शब्दका; और विराट्रूपके पहले स्तरमें देखा हुआ चतुर्भुज विष्णुरूप (विराट्रूपके स्तर बदलनेके कारण) नेत्रोंके सामने न होनेसे अर्थात् परोक्ष होनेसे अर्जुनने 'तत्' शब्दका प्रयोग किया है।