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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ११ ]

व्याख्या —‘किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव’—जिसमें आपने सिरपर दिव्य मुकुट तथा हाथोंमें गदा और चक्र धारण कर रखे हैं, उसी रूपको मैं देखना चाहता हूँ।

‘तथैव’ कहनेका तात्पर्य है कि मेरे द्वारा ‘द्रष्टुमिच्छामि ते रूपम्’ (११।३) ऐसी इच्छा प्रकट करनेसे आपने विराटरूप दिखाया। अब मैं अपनी इच्छा बाकी क्यों रहूँ? अतः मैंने आपके विराटरूपमें जैसा सौम्य चतुर्भुजरूप देखा है, वैसा-का-वैसा ही रूप मैं अब देखना चाहता हूँ—‘इच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव’।

‘तैनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहवे भव विश्वमूर्ते’—पंद्रहवें और सत्रहवें श्लोकमें जिस विराटरूपमें चतुर्भुज विष्णुरुपको देखा था, उस विराटरूपका निषेध करनेके लिये अर्जुन यहाँ ‘एव’ पद देते हैं। तात्पर्य यह है कि ‘तेन चतुर्भुजेन रूपेण’—ये पद तो चतुर्भुजरूप दिखानेके

परिशिष्ट भाव —यद्यपि मूल श्लोकमें भगवान्को ‘चतुर्भुजेन’ पद आनेसे यहाँ चारों भुजाओंमें गदा और चक्रके साथ-साथ शंख और पद्म भी समझ लेने चाहिये।

सम्बन्ध—इकतीसवें श्लोकमें अर्जुनने पूछा कि उग्ररूपवाले आप कौन हैं, तो भगवान्ने उत्तर दिया कि मैं काल हूँ और सबका संहार करनेके लिये प्रवृत्त हुआ हूँ। ऐसा सुनकर तथा अत्यन्त विकारालरूपको देखकर अर्जुनको ऐसा लगा कि भगवान् बड़े क्रोधमें हैं। इसलिये अर्जुन भगवान्से बार-बार प्रसन्न होनेके लिये प्रार्थना करते हैं। अर्जुनकी इस भावनाको दूर करनेके लिये भगवान् कहते हैं—

श्रीभगवानुवाच

मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात्। तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ॥ ४७ ॥

श्रीभगवान् बोले—

अर्जुन= हे अर्जुन!परम्= अत्यन्त श्रेष्ठ,तव= तुझे
मया= मैंनेतेजोमयम्= तेजस्वरूप,दर्शितम्= दिखाया है,
प्रसन्नेन= प्रसन्न होकरआद्यम्= सबका आदि (और)यत्= जिसको
आत्मयोगात्= अपनी सामर्थ्यसेअनन्तम्= अनन्तत्वदन्येन= तुम्हारे सिवाय
मे= मेराविश्वम्= विश्व-न, दृष्टपूर्वम्= पहले किसिने नहीं
इदम्= यहरूपम्= रूपदेखा है।

व्याख्या —‘मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं दर्शितम्’—हे अर्जुन! तू बार-बार यह कह रहा है कि आप प्रसन्न हो जाओ (पचीसवाँ, इकतीसवाँ और पैतालीसवाँ श्लोक), तो प्यारे भैया! मैंने जो यह विराटरूप तुझे दिखाया है, उसमें विकारालरूपको देखकर तू भयभीत हो गया है, पर यह विकारालरूप मैंने क्रोधमें आकर या तुझे भयभीत करनेके लिये नहीं दिखाया है। मैंने तो अपनी प्रसन्नतासे ही यह

लिये आये हैं और ‘एव’ पद ‘विराटरूपके साथ नहीं’—ऐसा निषेध करनेके लिये आया है तथा ‘भव’ पद ‘हो जाइये’—ऐसी प्रार्थनाके लिये आया है।

पूर्वश्लोकमें ‘तदेव’ तथा यहाँ ‘तथैव’ और ‘तैनैव’—तीनों पदोंका तात्पर्य है कि अर्जुन विश्वरूपसे बहुत डर गये थे। इसलिये तीन बार ‘एव’ शब्दका प्रयोग करके भगवान्ने कहते हैं कि मैं आपका केवल विष्णुरुप ही देखना चाहता हूँ; विष्णुरुपके साथ विश्वरूप नहीं। अतः आप केवल चतुर्भुजरूपसे प्रकट हो जाइये।

‘सहस्रबाहवे’ सम्बोधनका यह भाव मालूम देता है कि हे हजारों हाथोंवाले भगवन्! आप चार हाथोंवाले हो जाइये; और ‘विश्वमूर्ते’ सम्बोधनका यह भाव मालूम देता है कि हे अनेक रूपोंवाले भगवन्! आप एक रूपवाले हो जाइये। तात्पर्य है कि आप विश्वरूपका उपसंहार करके चतुर्भुज विष्णुरुपसे हो जाइये।

गदा और चक्र धारण किये हुए बताया गया है, तथापि गदा और चक्रके साथ-साथ शंख और पद्म भी समझ लेने चाहिये।