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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 787

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ११ ]

अदृष्टपूर्वम् = जिसको पहले कभी नहीं देखा, उस रूपको | भयेन = भयसे मे = मेरा मनः = मन | देवरूपम् = देवरूप (शान्त विष्णुरूप)-को ---|---|--- दृष्ट्वा = देखकर (में) | प्रव्यथितम् = अत्यन्त व्यथित हो रहा है। (अतः आप) | दर्शय = दिखाइये। हृषितः = हर्षित | | देवेश = हे देवेश! अस्मि = हो रहा हूँ | | जगन्निवास = हे जगन्निवास! = और (साथ-ही-साथ) | मे = मुझे (अपने) | प्रसीद = (आप) प्रसन्न होइये।

व्याख्या —[जैसे विराट् रूप दिखानेके लिये मैंने भगवान्से प्रार्थना की तो भगवान्ने मुझे विराट् रूप दिखा दिया, ऐसे ही देवरूप दिखानेके लिये प्रार्थना करनेपर भगवान् देवरूप दिखायेंगे ही—ऐसी आशा होनेसे अर्जुन भगवान्से देवरूप दिखानेके लिये प्रार्थना करते हैं।]

‘अदृष्टपूर्व हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे’ —आपका ऐसा अलौकिक आश्चर्यमय विशाल-रूप मैंने पहले कभी नहीं देखा। आपका ऐसा भी रूप है—ऐसी मेरे मनमें सम्भावना भी नहीं थी। ऐसा रूप देखनेकी मेरेमें कोई योग्यता भी नहीं थी। यह तो केवल आपने अपनी तरफसे ही कृपा करके दिखाया है। इससे मैं अपने-आपको बड़ा सौभाग्यशाली मानकर हर्षित हो रहा हूँ, आपकी कृपाको देखकर गदाद हो रहा हूँ। परन्तु साथ-ही-साथ आपके स्वरूपकी उग्रताको देखकर मेरा मन भयके कारण अत्यन्त व्यथित हो रहा है, व्याकुल हो रहा है, घबरा रहा है।

‘तदेव मे दर्शय देवरूपम्’ —‘तत्’ (वह) शब्द परोक्षवाची है; अतः ‘तदेव’ (तत् एव) कहनेसे ऐसा मालूम देता है कि अर्जुनने देवरूप (विष्णुरूप) पहले कभी देखा है, जो अभी सामने नहीं है। विश्वरूप देखनेपर जहाँ अर्जुनकी पहले दृष्टि पड़ी, वहाँ उन्होंने कमलासनपर विराजमान ब्रह्माजीको देखा—‘पश्यामि देवांस्तव देव देहे ’ ‘ब्रह्माण्मीशं कमलासनस्थम् ’ (११।१५)। इससे सिद्ध होता है कि वह कमल जिसकी नाभिसे निकला है, उस शेषशायी चतुर्भुज विष्णुरूपको भी अर्जुनने देखा है। फिर सत्रहवें श्लोकमें अर्जुनने कहा है कि मैं आपको कीरीट, गदा, चक्र (और ‘च’ पदसे शंख और पद्म) धारण किये हुए देख रहा हूँ—‘कीरीटिनं गदिनं चक्रिणं

’—इन दोनों बातोंसे यही सिद्ध होता है कि अर्जुनने विश्वरूपके अन्तर्गत भगवान्के जिस विष्णुरूपको देखा था, उसीके लिये अर्जुन यहाँ ‘वही देवरूप मेरेको दिखाइये’ ऐसा कह रहे हैं।*

‘देवरूपम्’ कहनेका तात्पर्य है कि मैंने विराट् रूपमें आपके विष्णुरूपको भी देखा था, पर अब आप मेरेको केवल विष्णुरूप ही दिखाइये। दूसरी बात, पंद्रहवें श्लोकमें भी अर्जुनने भगवान्के लिये ‘देव’ कहा है—‘पश्यामि देवांस्तव देव देहे ’ और यहाँ भी देवरूप दिखानेके लिये कहते हैं इसका तात्पर्य है कि विराट् रूप भी नहीं और मनुष्यरूप भी नहीं, केवल देवरूप दिखाइये। आगेके (छियालीसवें) श्लोकमें भी ‘तेनैव ’ पदसे विराट् रूप और मनुष्यरूपका निषेध करके भगवान्से चतुर्भुज विष्णुरूप बन जानेके लिये प्रार्थना करते हैं।

‘प्रसीद देवेश जगन्निवास’ —यहाँ ‘जगन्निवास’ सम्बोधन विश्वरूपका और ‘देवेश’ सम्बोधन चतुर्भुजरूपका संकेत कर रहा है। अर्जुन ये दो सम्बोधन देकर मानो यह कह रहे हैं कि सम्पूर्ण संसारका निवास आपमें है—ऐसा विश्वरूप तो मैंने देख लिया है और देख ही रहा हूँ। अब आप ‘देवेश’—देवताओंके मालिक विष्णुरूपसे हो जाइये।

विशेष बात

भगवान्का विश्वरूप दिव्य है, अविनाशी है, अक्षय है। इस विश्वरूपमें अनन्त ब्रह्माण्ड है तथा उन ब्रह्माण्डोंकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करनेवाले ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी अनन्त हैं। इस नित्य विश्वरूपसे अनन्त विश्व (ब्रह्माण्ड) उत्पन्न हो-होकर उसमें लीन होते रहते हैं, पर यह विश्वरूप अव्यय होनेसे ज्यों-का-त्यों ही रहता है। यह

  • आगे उनचासवें श्लोकमें ‘पुनः’ तथा ‘तदेव’ पदसे भगवान्ने और पचासवें श्लोकमें ‘भूयः’ पदसे संजयने भी उसी (विश्वरूपके अन्तर्गत देखे गये) चतुर्भुजरूपको दिखानेकी बात कही है।