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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 785

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ११ ]

परिशिष्ट भाव —अर्जुनका भगवान्के साथ सखाभाव था, पर भगवान्के ऐश्वर्यको देखनेसे वे अपना सखाभाव भूल जाते हैं और भगवान्को देखकर आश्चर्य करते हैं, भयभीत होते हैं। उनके मनमें यह सम्भावना ही नहीं थी कि भगवान् ऐसे हैं!

सम्बन्ध—अब आगेके दो श्लोकोंमें अर्जुन भगवान्की महत्ता और प्रभावका वर्णन करके पुनः क्षमा करनेके लिये प्रार्थना करते हैं।

पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।

न त्वत्समोऽस्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥ ४३ ॥

त्वम्= आप (ही)= औरत्वत्समः= आपके समान
अस्य= इसगरीयान्= (आप ही)अपि= भी
चराचरस्य= चराचरगुरुओंकेअन्यः= दूसरा कोई
लोकस्य= संसारकेगुरुः= महान् गुरु हैं।= नहीं
पिता= पिताअप्रतिम-अस्ति= है, (फिर आपसे)
असि= हैं,प्रभाव= हे अनन्तअभ्यधिकः= अधिक तो
पूज्यः= (आप ही)प्रभावशाली भगवान्!कृतः= हो ही कैसे
पूजनीय हैंलोकत्रये= इस त्रिलोकियोंमेंसकता है!

व्याख्या —‘पितासि लोकस्य चराचरस्य’—अनन्त ब्रह्माण्डोंमें मनुष्य, पशु, पक्षी आदि जितने जंगम प्राणी हैं, और वृक्ष, लता आदि जितने स्थावर प्राणी हैं, उन सबको उत्पन्न करनेवाले और उनका पालन करनेवाले पिता भी आप हैं, उनके पूजनीय भी आप हैं तथा उनको शिक्षा देनेवाले महान् गुरु भी आप ही हैं—‘त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान्।’

‘गुरुर्गरीयान्’ का तात्पर्य है कि मनुष्यमात्रको व्यवहार और परमार्थमें जहाँ-कहीं भी गुरुजनोंसे शिक्षा मिलती है,

परिशिष्ट भाव —अर्जुन लौकिक दृष्टिसे, संसारकी सत्ताको लेकर कहते हैं कि इस त्रिलोकियोंमें आपके समान भी दूसरा कोई नहीं है, फिर अधिक कैसे हो सकता है! परन्तु वास्तविक दृष्टिसे जब भगवान्के सिवाय और कुछ है ही नहीं, तो फिर उसमें समान और अधिक कहना बनता ही नहीं।

तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कार्यं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् ।

पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम् ॥ ४४ ॥

तस्मात्= इसलियेकायम्= शरीरसेइव= जैसे
ईड्यम्= स्तुति करनेयोग्यप्रणिधाय= लम्बा पड़करपुत्रस्य= पुत्रके,
त्वाम्= आपप्रणम्य= प्रणाम करकेसखा= मित्र
ईशम्= ईश्वरकोप्रसादये= प्रसन्न करनाइव= जैसे
अहम्= मैंचाहता हूँ।सख्युः= मित्रके (और)
पिता= पिताप्रियः= पति (जैसे)