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भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 784

श्लोक ४१-४२ ]

  • साधक-संजीवनी *

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‘आप’, ‘महाराज’ आदि शब्दोंका प्रयोग होता है। परन्तु मैंने आपको कभी ‘हे कृष्ण’ कह दिया, कभी ‘हे यादव’ कह दिया और कभी ‘हे सखे’ कह दिया। इसका कारण क्या था? ‘अज्ञानता महिमानं तवेदम्’ इसका कारण यह था कि मैंने आपकी ऐसी महिमाको और स्वरूपको जाना नहीं कि आप ऐसे विलक्षण हैं। आपके किसी एक अंशमें अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड विराजमान हैं—ऐसा मैं पहले नहीं जानता था। आपके प्रभावकी तरफ मेरी दृष्टि ही नहीं गयी। मैंने कभी सोचा-समझा ही नहीं कि आप कौन हैं और कैसे हैं।

यद्यपि अर्जुन भगवान्के स्वरूपको, महिमाको, प्रभावको पहले भी जानते थे, तभी तो उन्होंने एक अक्षौहिणी सेनाको छोड़कर निःशस्त्र भगवान्को स्वीकार किया था; तथापि भगवान्के शरीरके किसी एक अंशमें अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड यथावकाश स्थित हैं—ऐसे प्रभावको, स्वरूपको, महिमाको अर्जुनने पहले नहीं जाना था। जब भगवान्ने कृपा करके विश्वरूप दिखाया, तब उसको देखकर ही अर्जुनकी दृष्टि भगवान्के प्रभावकी तरफ गयी और वे भगवान्को कुछ जानने लगे। उनका यह विचित्र भाव हो गया कि ‘कहाँ तो मैं और कहाँ ये देवोंके देव! परन्तु मैंने प्रमादसे अथवा प्रेमसे हठपूर्वक, बिना सोचे-समझे, जो मनमें आया, वह कह दिया—‘मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥ ’ बोलनेमें मैंने बिलकुल ही सावधानी नहीं बरती!’

वास्तवमें भगवान्की महिमाको सर्वथा कोई जान ही नहीं सकता; क्योंकि भगवान्की महिमा अनन्त है। अगर वह सर्वथा जाननेमें आ जायगी तो उसकी अनन्तता नहीं रहेगी, वह सीमित हो जायगी। जब भगवान्की सामर्थ्यसे उत्पन्न होनेवाली विभूतियोंका भी अन्त नहीं है, तब भगवान् और उनकी महिमाका अन्त आ ही कैसे सकता है? अर्थात् आ ही नहीं सकता।

यच्चावहासार्थमसक्तुतोऽसि विहारशय्यासन-

भोजनेषु ’—मैंने आपको बराबरीका साधारण मित्र समझकर हँसी-दिल्लगी करते समय, रास्तेमें चलते-फिरते समय, शय्यापर सोते-जागते समय, आसनपर उठते-बैठते समय, भोजन करते समय जो कुछ अपमानके शब्द कहें, आपका असत्कार किया अथवा हे अच्युत! आप अकेले थे, उस समय या उन सखाओं, कुटुम्बीजनों, सभ्य व्यक्तियों आदिके सामने मैंने आपका जो कुछ तिरस्कार किया है, वह सब मैं आपसे क्षमा करवाता हूँ—‘एकोऽथवाच्यच्युत तत्समर्थं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्।

अर्जुन और भगवान्की मित्रताका ऐसा वर्णन आता है कि जैसे दो मित्र आपसमें खेलते हैं, ऐसे ही अर्जुन भगवान्के साथ खेलते थे। कभी स्नान करते तो अर्जुन हाथोंसे भगवान्के ऊपर जल फेंकते और भगवान् अर्जुनके ऊपर। कभी अर्जुन भगवान्के पीछे दौड़ते तो कभी भगवान् अर्जुनके पीछे दौड़ते। कभी दोनों आपसमें हँसते-हँसाते। कभी दोनों परस्पर अपनी-अपनी विशेष कलाएँ दिखाते। कभी भगवान् सो जाते तो अर्जुन कहते—‘तुम इतने फैलकर सो गये हो, क्या कोई दूसरा नहीं सोयेगा? तुम अकेले ही हो क्या?’ कभी भगवान् आसनपर बैठ जाते तो अर्जुन कहते—‘आसनपर तुम अकेले ही बैठोगे क्या? और किसीको बैठने दोगे कि नहीं? अकेले ही आधिपत्य जमा लिया! जरा एक तरफ तो खिसक जाओ।’ इस प्रकार अर्जुन भगवान्के साथ बहुत ही घनिष्ठताका व्यवहार करते थे। अब अर्जुन उन बातोंको याद करके कहते हैं कि ‘हे भगवान्! मैंने आपके न जाने कितने-कितने तिरस्कार किये हैं। मेरेको तो सब याद भी नहीं हैं। यद्यपि आपने मेरे तिरस्कारोंकी तरफ खयाल नहीं किया, तथापि मेरे द्वारा आपके बहुत-से तिरस्कार हुए हैं, इसलिये मैं अप्रमेयस्वरूप आपसे सब तिरस्कार क्षमा करवाता हूँ।’ भगवान्को ‘अप्रमेय’ कहनेका तात्पर्य है कि दिव्यदृष्टि होनेपर भी आप दिव्यदृष्टिके अन्तर्गत नहीं आते हैं।

१-‘महिमानं तव इदम्’—इसमें आया ‘इदम्’ पद ‘महिमानम्’ का विशेषण नहीं है; क्योंकि ‘महिमानम्’ पद पूर्णिलिंगमें आया है और ‘इदम्’ पद नपुंसकलिंगमें आया है। अतः यहाँ ‘इदम्’ का अर्थ ‘स्वरूप’ लिया गया है। इस दृष्टिसे ‘महिमानं तव इदम्’ का अर्थ हुआ—आपकी महिमा और स्वरूप।

२-शय्यासनाटनविकल्पनभोजनादिष्वैक्याद् वयस्य ऋतवानिति विप्रलब्धः।

सख्युः सखेव पितृवृत्तनयस्य सर्वं सेहे महान् महित्या कुमेतेरथं मे॥ (श्रीमद्भगवद्गीता १।१५।१९)

अर्जुन कहते हैं—‘भगवान् श्रीकृष्णके साथ सोने, बैठने, घूमने, बातचीत करने और भोजनादि करनेमें मेरा-उनका ऐसा सहज भाव हो गया था कि मैं कभी-कभी ‘हे सखे! तुम बड़े सच बोलनेवाले हो!’ ऐसा कहकर आश्चर्य भी करता था। परन्तु वे महात्मा प्रभु अपने बड़भयनके अनुसार मुझ कुबुद्धिके उन समस्त तिरस्कारोंको वैसे ही सहा करते थे, जैसे सखा अपने सखाके या पिता अपने पुत्रके तिरस्कारको सहा करता है।’