श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ११ ]
औरसे चाट रहा हूँ—इस प्रकारके मेरे घोर रूपको देखकर तेरेको व्यथा नहीं होनी चाहिये, प्रत्युत प्रसन्नता होनी चाहिये। तात्पर्य है कि पहले (पैतालीसवें श्लोकमें) तू जो मेरी कृपाको देखकर हर्षित हुआ था, तो मेरी कृपाकी तरफ दृष्टि होनेसे तेरा हर्षित होना ठीक ही था, पर यह व्यर्थ होना ठीक नहीं है।
अर्जुनने जो पहले कहा है—‘प्रव्यथितास्तथाहम् ’ (११।२३) और ‘प्रव्यथितान्तरात्मा ’ (११।२४)। उसीके उत्तरमें भगवान् यहाँ कहते हैं—‘मा ते व्यथा। ’
मैं कृपा करके ही ऐसा रूप दिखा रहा हूँ। इसको देखकर तेरेको मोहित नहीं होना चाहिये—‘मा च विमूह-भावः। ’ दूसरी बात, मैं तो प्रसन्न ही हूँ और अपनी प्रसन्नतासे ही तेरेको यह रूप दिखा रहा हूँ; परन्तु तू जो बार-बार यह कह रहा है कि ‘प्रसन्न हो जाओ; प्रसन्न हो जाओ’, यही तेरा विमूहभाव है। तू इसको छोड़ दे। तीसरी बात, पहले तूने कहा था कि मेरा मोह चला गया (पहला श्लोक), पर वास्तवमें तेरा मोह अभी नहीं गया है। तेरेको इस मोहको छोड़ देना चाहिये और निर्भय तथा प्रसन्न मनवाला होकर मेरा वह देवरूप देखना चाहिये। तेरा और मेरा जो संवाद है, यह तो प्रसन्नतासे, आनन्दरूपसे, लीलारूपसे होना चाहिये। इसमें भय और मोह बिलकुल नहीं होने चाहिये। मैं तेरे कहे अनुसार घोड़े हींकता हूँ, बातें करता हूँ, विश्वरूप दिखाता हूँ आदि सब कुछ करनेपर भी तूने मेरेमें कोई विकृति देखी है क्या? मेरेमें कुछ अन्तर आया है क्या? ऐसे ही मेरे विश्वरूपको देखकर तेरेमें भी कोई विकृति नहीं आनी चाहिये।
हे अर्जुन! तेरेको जो भय लग रहा है, वह शरीरमें अहंता-ममता (मैं-मेरापन) होनेसे ही लग रहा है अर्थात् अहंता-ममतावाली चीज (शरीर) नष्ट न हो जाय, इसको लेकर तू भयभीत हो रहा है—यह तेरी मूर्खता है, अनजानपना है। इसको तू छोड़ दे।
आज भी जिस-किसीको जहाँ-कहीं जिस-किसीसे भी
भय होता है, वह शरीरमें अहंता-ममता होनेसे ही होता है। शरीरमें अहंता-ममता होनेसे वह उत्पत्ति-विनाशशील वस्तु- (प्राणों-) को रखना चाहता है। यही मनुष्यकी मूर्खता है और यही आसुरी सम्पत्तिका मूल है। परन्तु जो भगवान्की तरफ चलनेवाले हैं, उनका प्राणोंमें मोह नहीं रहता, प्रत्युत उनका सर्वत्र भगवद्भाव रहता है और एकमात्र भगवान्में प्रेम रहता है। इसलिये वे निर्भय हो जाते हैं। उनका भगवान्की तरफ चलना दैवी सम्पत्तिका मूल है। नुसिंह-भगवान्के भयंकर रूपको देखकर देवता आदि सभी डर गये, पर प्रह्लादजी नहीं डरे; क्योंकि प्रह्लादजीकी सर्वत्र भगवदबुद्धि थी। इसलिये वे नुसिंहभगवान्के पास जाकर उनके चरणोंमें गिर गये और भगवान्ने उनको उठाकर गोदमें ले लिया तथा उनको जीभसे चाटने लगे!
‘व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ’—अर्जुनने पैतालीसवें श्लोकमें कहा था—‘भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ’; अतः भगवान्ने ‘भयेन ’ के लिये कहा है—‘व्यपेतभीः ’ अर्थात् तू भयरहित हो जा और ‘प्रव्यथितं मनः ’ के लिये कहा है—‘प्रीतमनाः ’ अर्थात् तू प्रसन्न मनवाला हो जा।
भगवान्ने विराट्रूपमें अर्जुनको जो चतुर्भुजरूप दिखाया था, उसीके लिये भगवान् ‘पुनः ’ पद देकर कह रहे हैं कि वही मेरा यह रूप तू फिर अच्छी तरहसे देख ले।
‘तदेव ’ कहनेका तात्पर्य है कि तू देवरूप (विष्णुरूप-) के साथ ब्रह्मा, शंकर आदि देवता और भयानक विश्वरूप नहीं देखना चाहता, केवल देवरूप ही देखना चाहता है; इसलिये वही रूप तू अच्छी तरहसे देख ले।
अर्जुनकी प्रार्थनाके अनुसार भगवान् अभी जो रूप दिखाना चाहते हैं, उसके लिये भगवान्ने यहाँ ‘इदम् ’ शब्दका प्रयोग किया है।
संजय और अर्जुनकी दिव्यदृष्टि कबतक रही?
संजयको वेदव्यासजीने युद्धके आरम्भमें दिव्यदृष्टि दी थी,१ जिससे वे धृतराष्ट्रको युद्धके समाचार सुनाते रहे।
१-अपनेमें कई तरहका परिवर्तन देखनेपर भी अर्जुन सब अवस्थाओंमें भगवान्को निर्वाकार ही मानते हैं, तभी तो उन्होंने गीताके आदि, मध्य तथा अन्तमें (गीता—पहले अध्यायके इक्कीसवें, ग्यारहवें अध्यायके बयालीसवें और अठारहवें अध्यायके तिहत्तरवें श्लोकमें) भगवान्के लिये ‘अच्युत’ सम्बोधनका प्रयोग किया है।
२-एष ते संजयो राजन् युद्धमेतद् वदिष्यति। एतस्य सर्वसंग्रामे न परोक्षं भविष्यति॥
चक्षुषा संजयो राजन् दिव्येनैव समन्वितः। कथयिष्यति ते युद्धं सर्वज्ञश्च भविष्यति॥
(महा०, भीष्म० २।१-१०)
‘राजन्! यह संजय आपको इस युद्धका सब समाचार बताया करेगा। सम्पूर्ण संग्रामभूमिमें कोई ऐसी बात नहीं होगी, जो इसके प्रत्यक्ष न हो। राजन्! संजय दिव्यदृष्टिसे सम्पन्न होकर सर्वज्ञ हो जायगा और तुम्हें युद्धकी बात बतायेगा।’