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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 792, कुल 1299 में से

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पृष्ठ 792

श्लोक ४९ ]

  • साधक-संजीवनी *

७९१

दर्शन करना किसी कर्मका फल नहीं है।

जैसे यहाँ वेद, यज्ञ आदि साधनोंसे विश्वरूप नहीं देखा जा सकता—ऐसा कहकर विश्वरूपदर्शनकी दुर्लभता बतायी है, ऐसे ही आगे तिरपनवें श्लोकमें वेद, यज्ञ आदि साधनोंसे चतुर्भुजरूप नहीं देखा जा सकता—ऐसा कहकर चतुर्भुजरूप—दर्शनकी दुर्लभता बतायी है। चतुर्भुजरूपको देखनेमें अनन्यभक्तिको साधन बताया है। (इसी अध्यायका चौवनवाँ श्लोक); क्योंकि वह रूप ऐसा विलक्षण है कि उसका दर्शन देवता भी चाहते हैं। इसलिये उस रूपमें भक्ति हो सकती है। परन्तु विश्वरूपको देखकर तो भय लगता है; अतः ऐसे रूपमें भक्ति कैसे होगी, प्रेम कैसे होगा? इसलिये इसके दर्शनमें भक्तिको साधन नहीं बताया है। यह तो केवल भगवान्की प्रसन्नतासे, कृपासे ही देखा जा सकता है।

‘एवंरूपः शक्य अहं नूलोके द्रष्टुं त्वदन्येन’—मनुष्यलोकमें इन साधनोंसे तुम्हारे सिवाय मेरा विश्वरूप कोई देख नहीं सकता—इसका अर्थ यह नहीं है कि इन साधनोंसे तू देख सकता है। तुम्हारेको तो मैंने अपनी प्रसन्नतासे ही यह रूप दिखाया है।

संजयको भी जो विश्वरूपके दर्शन हो रहे थे, वह भी व्यासजीकी कृपासे प्राप्त दिव्यदृष्टिसे ही हो रहे थे, किसी दूसरे साधनसे नहीं। तात्पर्य है कि भगवान् और उनके भक्तों, सन्तोंकी कृपासे जो काम होता है, वह काम

साधनोंसे नहीं होता। इनकी कृपा भी अहेतुकी होती है।

कई लोग ठीक न समझनेके कारण ऐसा कहते हैं कि भगवान्ने अर्जुनको विश्वरूप दिखाया नहीं था, प्रत्युत यह समझा दिया था कि मेरे शरीरके किसी एक अंशमें अनन्त ब्रह्माण्ड हैं। पर वास्तवमें यह बात है ही नहीं। स्वयं भगवान्ने कहा है कि ‘मेरे इस शरीरमें एक जगह चराचर-सहित सम्पूर्ण जगत्को अभी देख ले’ (सातवाँ श्लोक)। जब अर्जुनको दिखायी नहीं दिया, तब भगवान्ने कहा कि ‘तू अपने इन चर्मचक्षुओंसे मेरे विश्वरूपको नहीं देख सकता, इसलिये मैं तुझे दिव्यचक्षु देता हूँ’ (आठवाँ श्लोक)। फिर भगवान्ने अर्जुनको दिव्यचक्षु देकर साक्षात् अपना विश्वरूप दिखाया। संजयने भी कहा है कि ‘भगवान्के शरीरमें एक जगह स्थित विश्वरूपको अर्जुनने देखा’ (तेरहवाँ श्लोक)। अर्जुनने भी विश्वरूपका दर्शन करते हुए कहा कि ‘मैं आपके शरीरमें सम्पूर्ण प्राणियोंके समुदायोंको तथा ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि सबको देख रहा हूँ’ (पन्द्रहवाँ श्लोक) आदि—आदि। इससे सिद्ध होता है कि भगवान्ने अर्जुनको प्रत्यक्षमें अपने विश्वरूपके दर्शन कराये थे। दूसरी बात, समझानेके लिये तो ज्ञानचक्षु होते हैं (गीता—तेरहवें अध्यायका चौतीसवाँ और पन्द्रहवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक), पर दिव्यचक्षुसे साक्षात् दर्शन ही होते हैं। अतः भगवान्ने केवल कहकर समझा दिया हो, ऐसी बात नहीं है।

सम्बन्ध—अर्जुनका भय दूर करनेके लिये भगवान् आगेके श्लोकमें उनको ‘देवरूप’ देखनेकी आज्ञा देते हैं।

मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम्।

व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥ ४९ ॥

इदम्= यहमा= नहीं होनी चाहिये
मम= मेरा= और
ईदृङ्= इस प्रकारकाविमूढभावः= विमूढभाव (भी)
घोरम्= उग्रमा= नहीं होना चाहिये।
रूपम्= रूप(अब)
दृष्ट्वा= देखकरव्यपेतभीः= निर्भय (और)
ते= तुझेप्रीतमनाः= प्रसन्न मनवाला
व्यथा= व्यथाहोकर

व्याख्या—‘मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम्’—विकराल दाढ़ीके कारण भयभीत करनेवाले मेरे मुखोंमें योद्धालोग बड़ी तेजीसे जा रहे हैं,

त्वम्= तू
पुनः= फिर
तत्, एव= उसी
मे= मेरे
इदम्= इस (चतुर्भुज)
रूपम्= रूपको
प्रपश्य= अच्छी तरह देख ले।

उनमेंसे कई चूर्ण हुए सिरोंसहित दांतोंके बीचमें फँसे हुए दीख रहे हैं और मैं प्रलयकालकी अग्निके समान प्रज्वलित मुखोंद्वारा सम्पूर्ण लोगोंका ग्रसन करते हुए उनको चारों