श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
श्लोक ४९ ]
- साधक-संजीवनी *
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दर्शन करना किसी कर्मका फल नहीं है।
जैसे यहाँ वेद, यज्ञ आदि साधनोंसे विश्वरूप नहीं देखा जा सकता—ऐसा कहकर विश्वरूपदर्शनकी दुर्लभता बतायी है, ऐसे ही आगे तिरपनवें श्लोकमें वेद, यज्ञ आदि साधनोंसे चतुर्भुजरूप नहीं देखा जा सकता—ऐसा कहकर चतुर्भुजरूप—दर्शनकी दुर्लभता बतायी है। चतुर्भुजरूपको देखनेमें अनन्यभक्तिको साधन बताया है। (इसी अध्यायका चौवनवाँ श्लोक); क्योंकि वह रूप ऐसा विलक्षण है कि उसका दर्शन देवता भी चाहते हैं। इसलिये उस रूपमें भक्ति हो सकती है। परन्तु विश्वरूपको देखकर तो भय लगता है; अतः ऐसे रूपमें भक्ति कैसे होगी, प्रेम कैसे होगा? इसलिये इसके दर्शनमें भक्तिको साधन नहीं बताया है। यह तो केवल भगवान्की प्रसन्नतासे, कृपासे ही देखा जा सकता है।
‘एवंरूपः शक्य अहं नूलोके द्रष्टुं त्वदन्येन’—मनुष्यलोकमें इन साधनोंसे तुम्हारे सिवाय मेरा विश्वरूप कोई देख नहीं सकता—इसका अर्थ यह नहीं है कि इन साधनोंसे तू देख सकता है। तुम्हारेको तो मैंने अपनी प्रसन्नतासे ही यह रूप दिखाया है।
संजयको भी जो विश्वरूपके दर्शन हो रहे थे, वह भी व्यासजीकी कृपासे प्राप्त दिव्यदृष्टिसे ही हो रहे थे, किसी दूसरे साधनसे नहीं। तात्पर्य है कि भगवान् और उनके भक्तों, सन्तोंकी कृपासे जो काम होता है, वह काम
साधनोंसे नहीं होता। इनकी कृपा भी अहेतुकी होती है।
कई लोग ठीक न समझनेके कारण ऐसा कहते हैं कि भगवान्ने अर्जुनको विश्वरूप दिखाया नहीं था, प्रत्युत यह समझा दिया था कि मेरे शरीरके किसी एक अंशमें अनन्त ब्रह्माण्ड हैं। पर वास्तवमें यह बात है ही नहीं। स्वयं भगवान्ने कहा है कि ‘मेरे इस शरीरमें एक जगह चराचर-सहित सम्पूर्ण जगत्को अभी देख ले’ (सातवाँ श्लोक)। जब अर्जुनको दिखायी नहीं दिया, तब भगवान्ने कहा कि ‘तू अपने इन चर्मचक्षुओंसे मेरे विश्वरूपको नहीं देख सकता, इसलिये मैं तुझे दिव्यचक्षु देता हूँ’ (आठवाँ श्लोक)। फिर भगवान्ने अर्जुनको दिव्यचक्षु देकर साक्षात् अपना विश्वरूप दिखाया। संजयने भी कहा है कि ‘भगवान्के शरीरमें एक जगह स्थित विश्वरूपको अर्जुनने देखा’ (तेरहवाँ श्लोक)। अर्जुनने भी विश्वरूपका दर्शन करते हुए कहा कि ‘मैं आपके शरीरमें सम्पूर्ण प्राणियोंके समुदायोंको तथा ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि सबको देख रहा हूँ’ (पन्द्रहवाँ श्लोक) आदि—आदि। इससे सिद्ध होता है कि भगवान्ने अर्जुनको प्रत्यक्षमें अपने विश्वरूपके दर्शन कराये थे। दूसरी बात, समझानेके लिये तो ज्ञानचक्षु होते हैं (गीता—तेरहवें अध्यायका चौतीसवाँ और पन्द्रहवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक), पर दिव्यचक्षुसे साक्षात् दर्शन ही होते हैं। अतः भगवान्ने केवल कहकर समझा दिया हो, ऐसी बात नहीं है।
सम्बन्ध—अर्जुनका भय दूर करनेके लिये भगवान् आगेके श्लोकमें उनको ‘देवरूप’ देखनेकी आज्ञा देते हैं।
मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम्।
व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥ ४९ ॥
| इदम् | = यह | मा | = नहीं होनी चाहिये |
|---|---|---|---|
| मम | = मेरा | च | = और |
| ईदृङ् | = इस प्रकारका | विमूढभावः | = विमूढभाव (भी) |
| घोरम् | = उग्र | मा | = नहीं होना चाहिये। |
| रूपम् | = रूप | (अब) | |
| दृष्ट्वा | = देखकर | व्यपेतभीः | = निर्भय (और) |
| ते | = तुझे | प्रीतमनाः | = प्रसन्न मनवाला |
| व्यथा | = व्यथा | होकर |
व्याख्या—‘मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम्’—विकराल दाढ़ीके कारण भयभीत करनेवाले मेरे मुखोंमें योद्धालोग बड़ी तेजीसे जा रहे हैं,
| त्वम् | = तू |
|---|---|
| पुनः | = फिर |
| तत्, एव | = उसी |
| मे | = मेरे |
| इदम् | = इस (चतुर्भुज) |
| रूपम् | = रूपको |
| प्रपश्य | = अच्छी तरह देख ले। |
उनमेंसे कई चूर्ण हुए सिरोंसहित दांतोंके बीचमें फँसे हुए दीख रहे हैं और मैं प्रलयकालकी अग्निके समान प्रज्वलित मुखोंद्वारा सम्पूर्ण लोगोंका ग्रसन करते हुए उनको चारों
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ११ ]
औरसे चाट रहा हूँ—इस प्रकारके मेरे घोर रूपको देखकर तेरेको व्यथा नहीं होनी चाहिये, प्रत्युत प्रसन्नता होनी चाहिये। तात्पर्य है कि पहले (पैतालीसवें श्लोकमें) तू जो मेरी कृपाको देखकर हर्षित हुआ था, तो मेरी कृपाकी तरफ दृष्टि होनेसे तेरा हर्षित होना ठीक ही था, पर यह व्यर्थ होना ठीक नहीं है।
अर्जुनने जो पहले कहा है—‘प्रव्यथितास्तथाहम् ’ (११।२३) और ‘प्रव्यथितान्तरात्मा ’ (११।२४)। उसीके उत्तरमें भगवान् यहाँ कहते हैं—‘मा ते व्यथा। ’
मैं कृपा करके ही ऐसा रूप दिखा रहा हूँ। इसको देखकर तेरेको मोहित नहीं होना चाहिये—‘मा च विमूह-भावः। ’ दूसरी बात, मैं तो प्रसन्न ही हूँ और अपनी प्रसन्नतासे ही तेरेको यह रूप दिखा रहा हूँ; परन्तु तू जो बार-बार यह कह रहा है कि ‘प्रसन्न हो जाओ; प्रसन्न हो जाओ’, यही तेरा विमूहभाव है। तू इसको छोड़ दे। तीसरी बात, पहले तूने कहा था कि मेरा मोह चला गया (पहला श्लोक), पर वास्तवमें तेरा मोह अभी नहीं गया है। तेरेको इस मोहको छोड़ देना चाहिये और निर्भय तथा प्रसन्न मनवाला होकर मेरा वह देवरूप देखना चाहिये। तेरा और मेरा जो संवाद है, यह तो प्रसन्नतासे, आनन्दरूपसे, लीलारूपसे होना चाहिये। इसमें भय और मोह बिलकुल नहीं होने चाहिये। मैं तेरे कहे अनुसार घोड़े हींकता हूँ, बातें करता हूँ, विश्वरूप दिखाता हूँ आदि सब कुछ करनेपर भी तूने मेरेमें कोई विकृति देखी है क्या? मेरेमें कुछ अन्तर आया है क्या? ऐसे ही मेरे विश्वरूपको देखकर तेरेमें भी कोई विकृति नहीं आनी चाहिये।
हे अर्जुन! तेरेको जो भय लग रहा है, वह शरीरमें अहंता-ममता (मैं-मेरापन) होनेसे ही लग रहा है अर्थात् अहंता-ममतावाली चीज (शरीर) नष्ट न हो जाय, इसको लेकर तू भयभीत हो रहा है—यह तेरी मूर्खता है, अनजानपना है। इसको तू छोड़ दे।
आज भी जिस-किसीको जहाँ-कहीं जिस-किसीसे भी
भय होता है, वह शरीरमें अहंता-ममता होनेसे ही होता है। शरीरमें अहंता-ममता होनेसे वह उत्पत्ति-विनाशशील वस्तु- (प्राणों-) को रखना चाहता है। यही मनुष्यकी मूर्खता है और यही आसुरी सम्पत्तिका मूल है। परन्तु जो भगवान्की तरफ चलनेवाले हैं, उनका प्राणोंमें मोह नहीं रहता, प्रत्युत उनका सर्वत्र भगवद्भाव रहता है और एकमात्र भगवान्में प्रेम रहता है। इसलिये वे निर्भय हो जाते हैं। उनका भगवान्की तरफ चलना दैवी सम्पत्तिका मूल है। नुसिंह-भगवान्के भयंकर रूपको देखकर देवता आदि सभी डर गये, पर प्रह्लादजी नहीं डरे; क्योंकि प्रह्लादजीकी सर्वत्र भगवदबुद्धि थी। इसलिये वे नुसिंहभगवान्के पास जाकर उनके चरणोंमें गिर गये और भगवान्ने उनको उठाकर गोदमें ले लिया तथा उनको जीभसे चाटने लगे!
‘व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ’—अर्जुनने पैतालीसवें श्लोकमें कहा था—‘भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ’; अतः भगवान्ने ‘भयेन ’ के लिये कहा है—‘व्यपेतभीः ’ अर्थात् तू भयरहित हो जा और ‘प्रव्यथितं मनः ’ के लिये कहा है—‘प्रीतमनाः ’ अर्थात् तू प्रसन्न मनवाला हो जा।
भगवान्ने विराट्रूपमें अर्जुनको जो चतुर्भुजरूप दिखाया था, उसीके लिये भगवान् ‘पुनः ’ पद देकर कह रहे हैं कि वही मेरा यह रूप तू फिर अच्छी तरहसे देख ले।
‘तदेव ’ कहनेका तात्पर्य है कि तू देवरूप (विष्णुरूप-) के साथ ब्रह्मा, शंकर आदि देवता और भयानक विश्वरूप नहीं देखना चाहता, केवल देवरूप ही देखना चाहता है; इसलिये वही रूप तू अच्छी तरहसे देख ले।
अर्जुनकी प्रार्थनाके अनुसार भगवान् अभी जो रूप दिखाना चाहते हैं, उसके लिये भगवान्ने यहाँ ‘इदम् ’ शब्दका प्रयोग किया है।
संजय और अर्जुनकी दिव्यदृष्टि कबतक रही?
संजयको वेदव्यासजीने युद्धके आरम्भमें दिव्यदृष्टि दी थी,१ जिससे वे धृतराष्ट्रको युद्धके समाचार सुनाते रहे।
१-अपनेमें कई तरहका परिवर्तन देखनेपर भी अर्जुन सब अवस्थाओंमें भगवान्को निर्वाकार ही मानते हैं, तभी तो उन्होंने गीताके आदि, मध्य तथा अन्तमें (गीता—पहले अध्यायके इक्कीसवें, ग्यारहवें अध्यायके बयालीसवें और अठारहवें अध्यायके तिहत्तरवें श्लोकमें) भगवान्के लिये ‘अच्युत’ सम्बोधनका प्रयोग किया है।
२-एष ते संजयो राजन् युद्धमेतद् वदिष्यति। एतस्य सर्वसंग्रामे न परोक्षं भविष्यति॥
चक्षुषा संजयो राजन् दिव्येनैव समन्वितः। कथयिष्यति ते युद्धं सर्वज्ञश्च भविष्यति॥
(महा०, भीष्म० २।१-१०)
‘राजन्! यह संजय आपको इस युद्धका सब समाचार बताया करेगा। सम्पूर्ण संग्रामभूमिमें कोई ऐसी बात नहीं होगी, जो इसके प्रत्यक्ष न हो। राजन्! संजय दिव्यदृष्टिसे सम्पन्न होकर सर्वज्ञ हो जायगा और तुम्हें युद्धकी बात बतायेगा।’
श्लोक ४९ ]
- साधक-संजीवनी *
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परन्तु अन्तमें जब दुर्योधनकी मृत्युपर संजय शोकसे व्याकुल हो गये, तब संजयकी वह दिव्यदृष्टि चली गयी*।
अर्जुनके द्वारा विश्वरूप दिखानेकी प्रार्थना करनेपर भगवान्ने अर्जुनको दिव्यदृष्टि दी—‘दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्’ (११।८) और अर्जुन विराट्रूप भगवान्के देवरूप, उग्ररूप आदि रूपोंके दर्शन करने लगे। जब अर्जुनके सामने अत्युग्र रूप आया, तब वे डर गये और भगवान्की स्तुति-प्रार्थना करते हुए कहने लगे कि ‘मेरा मन भयसे व्यथित हो रहा है, आप मेरेको वही चतुर्भुजरूप दिखाइये।’ तब भगवान्ने अपना चतुर्भुजरूप दिखाया और फिर द्विभुजरूपसे हो गये। इससे सिद्ध होता है कि यहाँ (उनचासवें श्लोक- ) तक ही अर्जुनकी दिव्यदृष्टि रही। इक्यावनमें श्लोकमें स्वयं अर्जुनने कहा है कि ‘मैं आपके सौम्य मनुष्यरूपको देखकर सचेत हो गया हूँ और अपनी स्वाभाविक स्थितिको प्राप्त हो गया हूँ।’
यहाँ शंका होती है कि अर्जुन तो पहले भी व्यथित (व्याकुल) हुए थे—‘दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम्’ (११।२३), ‘दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा’ (११।२४); अतः वहाँ उनकी दिव्यदृष्टि चली जानी चाहिये थी। इसका समाधान यह है कि वहाँ अर्जुन इतने भयभीत नहीं हुए थे, जितने यहाँ हुए हैं। यहाँ तो अर्जुन भयभीत होकर भगवान्को बार-बार नमस्कार करते हैं और उनसे चतुर्भुजरूप दिखानेके लिये प्रार्थना भी करते हैं (पैतालीसवाँ
परिशिष्ट भाव —अर्जुनने घबराकर भगवान्से कहा—‘तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्’ (११।४२) तो भगवान् यहाँ कहते हैं कि मैं चाहे शान्त अथवा उग्र किसी भी रूपमें दिखायी दूँ, हूँ तो मैं तुम्हारा सखा ही! तुम डर गये तो यह तुम्हारी मूढ़ता है, मित्रतामें ढिलाई है! जो कुछ दीख रहा है, वह सब मेरी ही लीला है। इसमें घबराणेकी क्या बात है? मित्रतामें कौन बड़ा और कौन छोटा?
भगवान् ही जगत्-रूपसे प्रकट हुए हैं, इसलिये यह जगत् भगवान्का आदि अवतार कहा जाता है—‘आद्योऽवतारः पुरुषः परस्य’ (श्रीमद्भगवद्गीता २।६।४९)। जैसे भगवान्ने राम, कृष्ण आदि रूपोंसे अवतार लिया है, ऐसे ही जगत्-रूपसे भी अवतार लिया है। इसको अवतार इसलिये कहा है कि इसमें भगवान् दृश्यरूपसे दीखनेमें आ जाते हैं। अवतारके समय लौकिक दृष्टिसे दीखनेपर भी भगवान् सदा अलौकिक ही रहते हैं (गीता—चौथे अध्यायका छठा श्लोक)। परन्तु राग-द्वेषके कारण अज्ञानियोंको भगवान् लौकिक दीखते हैं (गीता—सातवें अध्यायका चौबीसवाँ-पचीसवाँ और नवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)।
भगवान् शान्त अथवा उग्र किसी भी रूपमें आये, उसकी मरजी है। सुन्दर दृश्य हो, पुष्प खिले हों, सुगन्ध आ रही हो तो वह भी भगवान्का रूप है और मांस, हड्डियाँ, मैला पड़ा हो, दुर्गन्ध आ रही हो तो वह भी भगवान्का रूप है।
- तव पुत्रे गते स्वर्गे शोकात्तस्य ममानघ। ऋषिदत्तं प्रणष्टे तद् दिव्यदर्शित्वमद्य वै॥
(महा०, सौप्तिक० १।६२)
‘निष्ठाप नरेश! आपके पुत्रके स्वर्गलोकमें चले जानेसे मैं शोकसे आतुर हो गया हूँ और महर्षि व्यासजीकी दी हुई मेरी वह दिव्यदृष्टि भी अब नष्ट हो गयी है।’
श्लोक)। इसलिये यहाँ अर्जुनकी दिव्यदृष्टि चली जाती है।
दूसरा कारण यह भी माना जा सकता है कि पहले अर्जुनकी विश्वरूप देखनेकी विशेष रुचि (इच्छा) थी—‘द्रष्टुमिच्छामि ते रूपम्’ (११।३), इसलिये भगवान्ने अर्जुनको दिव्यदृष्टि दी; परन्तु यहाँ अर्जुनकी विश्वरूप देखनेकी रुचि नहीं रही और वे भयभीत होनेके कारण चतुर्भुजरूप देखनेकी इच्छा करते हैं, इसलिये (दिव्य-दृष्टिकी आवश्यकता न रहनेसे) उनकी दिव्यदृष्टि चली जाती है।
अगर संजय और अर्जुन शोकसे, भयसे व्यथित (व्याकुल) न होते, तो उनकी दिव्यदृष्टि बहुत समयतक रहती और वे बहुत कुछ देख लेते। परन्तु शोक और भयसे व्यथित होनेके कारण उनकी दिव्यदृष्टि चली गयी। इसी तरहसे जब मनुष्य मोहसे संसारमें आसक्त हो जाता है, तब भगवान्की दी हुई विवेकदृष्टि काम नहीं करती। जैसे, मनुष्यका रुपयोंमें अधिक मोह होता है तो वह चोरी करने लग जाता है, फिर और मोह बढ़नेपर ढकैती करने लग जाता है तथा अत्यधिक मोह बढ़ जानेपर वह रुपयोंके लिये दूसरेकी हत्यातक कर देता है। इस प्रकार ज्यों-ज्यों मोह बढ़ता है, त्यों-ही-त्यों उसका विवेक काम नहीं करता। अगर मनुष्य मोहमें न फँसकर अपनी विवेकदृष्टिको महत्त्व देता, तो वह अपना उद्धार करके संसारमात्रका उद्धार करनेवाला बन जाता!
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ११ ]
भगवान्के सिवाय कुछ नहीं है। भगवान्ने राम, कृष्ण आदि रूप भी धारण किये और मत्स्य, कच्छप, वराह आदि रूप भी धारण किये। वे कोई भी रूप धारण करें, हैं तो भगवान् ही! रूप तो भगवान्का है और क्रिया उनकी लीला है। कोई पाप, अन्याय करता हुआ दीखे तो समझे कि भगवान् कलियुगकी लीला कर रहे हैं। वे जैसा रूप धारण करते हैं, वैसी ही लीला (क्रिया) करते हैं। मूर्तिका रूप (अर्चितातर) धारण करके वे मूर्तिकी तरह ही अचल रहनेकी लीला करते हैं। मूर्तिरूप धारण करके क्रिया करनेमें शोभा नहीं है, प्रत्युत क्रिया न करनेमें ही शोभा है। अन्याथा वह अर्चितातर कैसे रहेगा? वराह (सूअर) का रूप धारण करके वे वराहकी तरह क्रिया करते हैं और मनुष्यका रूप धारण करके वे मनुष्यकी तरह क्रिया करते हैं। वे कोई भी रूप धारण करके कैसी ही क्रिया करें, उससे भक्तोंके हृदयमें कोई विकार नहीं होता, क्योंकि उनकी दृष्टिमें एक भगवान्के सिवाय और कुछ है ही नहीं, हुआ ही नहीं, होगा ही नहीं, होना सम्भव ही नहीं।
हमें जो संसार दीखता है, यह भगवान्का विराटरूप नहीं है; क्योंकि विराटरूप तो दिव्य और अव्यय है, पर दीखनेवाला संसार भौतिक और नाशवान् है। जैसे हमें भौतिक वृन्दावन तो दीखता है, पर उसके भीतरका दिव्य वृन्दावन नहीं दीखता, ऐसे ही हमें भौतिक विश्व तो दीखता है, पर उसके भीतरका दिव्य विश्व (विराटरूप) नहीं दीखता, ऐसा दीखनेमें कारण है—सुखभोगकी इच्छा। भोगेच्छाके कारण ही जड़ता, भौतिकता, मलिनता आयी है। अगर भोगेच्छाको लेकर संसारमें आकर्षण न हो तो सब कुछ चिन्मय विराटरूप ही है।
तत्त्वबोध होनेपर ज्ञानीको तो संसार चिन्मयरूपसे दीखता है, पर प्रेमी भक्तको वह माधुर्यरूपसे दीखता है। माधुर्यरूपसे दीखनेपर जैसे अपने शरीरमें सबकी स्वाभाविक प्रियता होती है, ऐसे ही भक्तकी मात्र प्राणियोंके साथ स्वाभाविक प्रियता होती है। परन्तु अर्जुनने ऐश्वर्यरूपसे भगवान्का विराटरूप देखा था; क्योंकि वे वही रूप देखना चाहते थे—‘द्वष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ’ (११।३)। माधुर्यमें प्रियता विशेष होती है और ऐश्वर्यमें प्रभाव विशेष होता है। तात्पर्य है कि दिव्य विराटरूप एक होनेपर भी भावनाके अनुसार अनेक रूपोंमें दीखता है और अनेकरूपसे दीखनेपर भी एक ही रहता है। एकतामें अनेकता और अनेकतामें एकता भगवान्की विलक्षणता, अलौकिकता, विचित्रता है।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अर्जुनको जिस रूपको देखनेके लिये आज्ञा दी, उसीके अनुसार भगवान् अपना विष्णुरूप दिखाते हैं—इसका वर्णन संजय आगेके श्लोकमें करते हैं।
सज्जय उवाच
इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः। आशवासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ॥ ५० ॥
संजय बोले—
| वासुदेवः | = वासुदेवभगवान्ने | रूपम् | = रूप (देवरूप) | भूत्वा | = होकर |
|---|---|---|---|---|---|
| अर्जुनम् | = अर्जुनसे | दर्शयामास | = दिखाया | एनम् | = इस |
| इति | = ऐसा | च | = और | भीतम् | = भयभीत |
| उक्त्वा | = कहकर | महात्मा | = महात्मा श्रीकृष्णने | अर्जुनको | |
| भूयः | = फिर | पुनः | = पुनः | आशवासया- | |
| तथा | = उसी प्रकारसे | सौम्यवपुः | = सौम्यरूप (द्विभुज मानुषरूप) | मास | = आशवासन दिया। |
| स्वकम् | = अपना |
व्याख्या—‘इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः ’—अर्जुनने जब भगवान्से चतुर्भुजरूप होनेके लिये प्रार्थना की, तब भगवान्ने कहा कि मेरे इस विश्वरूपको देखकर तू व्यथित और भयभीत मत हो।
१-जथा अनेक बेष धरि नृत्य करड़ नट कोइ। सोइ सोइ भाव देखावइ आपुन होइ न सोइ॥
(मानस, उत्तर० ७२ ख)
२-देखें, चौथे अध्यायके नवें श्लोकका परिशिष्ट भाव।
श्लोक ५१ ]
- साधक-संजीवनी *
७९५
तू प्रसन्न मनवाला होकर मेरे इस रूपको देख (उनचासवों श्लोक)। भगवान्के इसी कथनको संजयने यहाँ 'इत्यर्जुन वासुदेवस्तथोक्तत्वा' पदोंसे कहा है।
'तथा' कहनेका तात्पर्य है कि जिस प्रकार कृपाके परवश होकर भगवान्ने अपना विश्वरूप दिखाया था, उसी प्रकार कृपाके परवश होकर भगवान्ने अर्जुनको चतुर्भुजरूप दिखाया। इस चतुर्भुजरूपको देखनेमें अर्जुनकी कोई साधना हो, योग्यता हो—यह बात नहीं है, प्रत्युत भगवान्की कृपा—ही-कृपा है।
'भूयः' कहनेका तात्पर्य है, जिस देवरूप-(चतुर्भुज-रूप-) को अर्जुने विश्वरूपके अन्तर्गत देखा था (पन्द्रहवाँ और सत्रहवाँ श्लोक) और जिसे दिखानेके लिये अर्जुने प्रार्थना की थी (पैंतालीसवाँ-छियालीसवाँ श्लोक), वही रूप भगवान्ने फिर दिखाया।
'आश्वासयामास च भीतमेन भूत्वा पुनः सौम्य-वपुर्माहात्मा'— भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनको पहले चतुर्भुजरूप दिखाया। फिर अर्जुनकी प्रसन्नताके लिये माहात्मा भगवान् श्रीकृष्ण पुनः द्विभुजरूप-(मनुष्यरूप-) से प्रकट हो गये और उन्होंने विश्वरूपको देखनेसे भयभीत हुए अर्जुनको आश्वासन दिया।
भगवान् श्रीकृष्ण द्विभुज थे या चतुर्भुज? इसका उत्तर है कि भगवान् हरदम द्विभुजरूपसे ही रहते थे, पर समय-समयपर जहाँ उचित समझते थे, वहाँ चतुर्भुजरूप हो जाते थे।
दसवें और ग्यारहवें अध्यायमें भगवान्ने अपनी विभूतियोंका वर्णन करनेमें भी अपनी महत्ता, प्रभाव सामर्थ्यको बताया है और अपने अत्यन्त विलक्षण विश्व-रूपको दिखानेमें भी अपने प्रभावको बताया है। अगर मनुष्य भगवान्के ऐसे महान् प्रभावको जान ले अथवा मान ले, तो उसका संसारमें आकर्षण नहीं रहे। वह सदाके लिये संसार-बन्धनसे छूट जाय।
अर्जुनपर भगवान्की कितनी अद्भुत कृपा है कि भगवान्ने पहले विश्वरूप दिखाया, फिर देवरूप (चतुर्भुज-रूप) दिखाया और फिर मानुरूप (द्विभुजरूप) हो गये। इसके साथ-साथ भगवान्ने हमलोगोंपर भी कितनी अलौकिक विलक्षण कृपा की है कि जहाँ-कहीं जिस किसी विशेषताको लेकर हमारा मन चला जाय, वहाँ हम भगवान्का चिन्तन कर सकते हैं और भगवान्के विश्वरूपका पठन-पाठन, चिन्तन कर सकते हैं। इस भयंकर समयमें हमें भगवान्की विभूतियों तथा विश्वरूपके चिन्तन आदिका जो मौका मिला है, इसमें हमारा उद्योग, योग्यता कारण नहीं है, प्रत्युत भगवान्की कृपा ही कारण है। भगवान्की इस कृपाको देखकर हमें प्रसन्न हो जाना चाहिये। इन विभूतियोंको सुनने और विश्वरूपके चिन्तन-स्मरणका मौका तो उस समय भी संजय आदि बहुत थोड़े लोगोंको ही मिला था। वही मौका आज हमें प्राप्त हुआ है। अतः ऐसे मौकेको व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिये।
सम्बन्ध—भगवान्ने मनुष्यरूप होकर जब अर्जुनको आश्वासन दिया, तब अर्जुन बोले—
अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेदेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन। इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ॥ ५१ ॥
अर्जुन बोले—
जनार्दन = हे जनार्दन!
तव = आपके
इदम् = इस
सौम्यम् = सौम्य
मानुषम् = मनुष्य
रूपम् = रूपको
दृष्ट्वा = देखकर (मैं)
इदानीम् = इस समय
सचेताः = स्थिरचित्त
संवृत्तः = हो गया
अस्मि = हूँ (और)
प्रकृतिम् = अपनी स्वाभाविक स्थितिको
गतः = प्राप्त हो गया हूँ।
व्याख्या—'दृष्ट्वेदेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन'— आपके मनुष्यरूपमें प्रकट होकर लीला करनेवाले रूपको
देखकर गायें, पशु-पक्षी, वृक्ष, लताएँ आदि भी पुलकित हो जाती हैं*, ऐसे सौम्य द्विभुजरूपको देखकर मैं होशमें आ
- त्रैलोक्यसौभागमिदं च निरीक्ष्य रूपं यदगोद्विजद्वयमुगाः पुलकान्यबिभ्रन् ॥ (श्रीमद्भगवद्गीता १०।२९।४०)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १२ ]
गया हूँ, मेरा चित्त स्थिर हो गया है—‘इदानीमस्मि संवृतः सचेताः’, विराट् रूपको देखकर जो मैं भयभीत हो गया था, वह सब भय अब मिट गया है, सब व्यथा चली गयी है और मैं अपनी वास्तविक स्थितिको प्राप्त हो गया हूँ—‘प्रकृतिं गतः’। यहाँ ‘सचेताः’ कहनेका तात्पर्य है कि जब अर्जुनकी
दृष्टि भगवान्की कृपाकी तरफ गयी, तब अर्जुनको होश आया और वे सोचने लगे कि कहाँ तो मैं और कहाँ भगवान्का विस्मयकारक विलक्षण विराट् रूप! इसमें मेरी कोई योग्यता, अधिकारिता नहीं है। इसमें तो केवल भगवान्की कृपा—ही-कृपा है।
परिशिष्ट भाव —भगवान्का सौम्यरूप द्विभुज होनेके कारण अर्जुने उसको मनुष्यरूप कहा है। भगवान् श्रीकृष्ण द्विभुज थे। ब्रह्मवैवर्तपुराणमें आया है—
त्वमेव भगवानाद्यो निर्गुणः प्रकृतेः परः। अद्वागिो द्विभुजः कृष्णोऽप्यद्वागिनि चतुर्भुजः ॥
(प्रकृति० १२।१५)
‘आप सबके आदि, निर्गुण और प्रकृतिसे अतीत भगवान् ही अपने आधे अंगसे द्विभुज कृष्ण और आधे अंगसे चतुर्भुज विष्णुके रूपमें प्रकट हुए हैं।’
द्विभुजो राधिकाकान्तो लक्ष्मीकान्तश्चतुर्भुजः। गोलोके द्विभुजस्तथौ गोपैर्गोपीभिरावृतः ॥
चतुर्भुजश्च वैकुण्ठं प्रययौ पद्मया सह। सर्वांशिन समी तौ द्वौ कृष्णनारायणौ परौ ॥
(प्रकृति० ३५।१४-१५)
‘द्विभुज कृष्ण राधिकापति हैं और चतुर्भुज विष्णु लक्ष्मीपति हैं। कृष्ण गोप-गोपियोंसे आवृत होकर गोलोकमें और विष्णु लक्ष्मीके साथ (पार्षदोंसहित) वैकुण्ठमें स्थित हैं। वे कृष्ण और विष्णु—दोनों सब प्रकारसे समान अर्थात् एक ही हैं।’
तात्पर्य है कि द्विभुजरूप (कृष्ण), चतुर्भुजरूप (विष्णु) और सहस्रभुजरूप (विराट् रूप)—तीनों एक ही समग्र भगवान्के रूप हैं।
सम्बन्ध—अर्जुनकी कृतज्ञताका अनुमोदन करते हुए भगवान् कहते हैं—
श्रीभगवानुवाच
सुदुर्दशंमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम।
देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः ॥ ५२ ॥
श्रीभगवान् बोले—
| मम | = मेरा | सुदुर्दशंम् | = इसके दर्शन | रूपस्य | = रूपको |
|---|---|---|---|---|---|
| इदम् | = यह | अत्यन्त ही | नित्यम्, | ||
| यत् | = जो | दुर्लभ हैं। | दर्शनकाङ्क्षिणः | = देखनेके | |
| रूपम् | = (चतुर्भुज) रूप | देवाः | = देवता | लिये नित्य | |
| दृष्टवान्, | अपि | = भी | लालायित | ||
| असि | = (तुमने) देखा है, | अस्य | = इस | रहते हैं। |
व्याख्या —‘सुदुर्दशंमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम’—
यहाँ ‘सुदुर्दशंम्’ पद चतुर्भुजरूपके लिये ही आया है, विराट् रूप या द्विभुजरूपके लिये नहीं। कारण कि विराट् रूपकी तो देवता भी कल्पना क्यों करने लगे! और मनुष्यरूप जब मनुष्योंके लिये सुलभ था, तब देवताओंके लिये वह दुर्लभ कैसे होता! इसलिये ‘सुदुर्दशंम्’ पदसे भगवान् विष्णुका चतुर्भुजरूप ही लेना चाहिये, जिसके लिये ‘देवरूपम्’ (११।४५) और ‘स्वर्क रूपम्’ (११।
५०) पद आये हैं।
‘देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः’—
भगवान्ने यहाँ कहा है कि मेरा यह जो चतुर्भुजरूप है इसके दर्शन बड़े ही दुर्लभ हैं। आगे तिरपनवें-चौवनवें श्लोकोंमें कहा है कि इस चतुर्भुजरूपके दर्शन वेद, यज्ञ, तप, दान आदि साधनोंसे नहीं हो सकते; प्रत्युत इसके दर्शन तो अनन्यभक्तिसे ही हो सकते हैं। अब यहाँ एक शंका होती है कि देवता भी इस रूपके दर्शनकी नित्य आकांक्षा
श्लोक ५३ ]
- साधक-संजीवनी *
७९७
(लालसा) रखते हैं, फिर उनको दर्शन क्यों नहीं होते? जब कि भगवान् के दर्शनकी नित्य लालसा रहना अनन्य-भक्ति ही है। इसका समाधान यह है कि वास्तवमें देवताओंकी नित्य लालसा अनन्यभक्ति नहीं है।
नित्य लालसा रखनेका तात्पर्य है कि नित्य-निरन्तर एक परमात्माकी ही लालसा लगी रहे और दूसरी कोई लालसा न रहे। ऐसी लालसावाला दुराचारी-से-दुराचारी मनुष्य भी भगवान् का भक्त हो जाता है और उसे भगवत्प्राप्ति हो जाती है। परन्तु ऐसी अनन्य लालसा देवताओंकी नहीं होती; क्योंकि वे प्रायः भोग भोगनेके लिये ही देवता बने हैं और उनका प्रायः भोग भोगनेका ही उद्देश्य होता है। तो फिर उनकी लालसा कैसी होती है? जैसी लालसा (इच्छा) प्रायः सभी आस्तिक मनुष्योंमें रहती है कि 'हमें भगवान् के दर्शन हो जायँ, हमारा कल्याण हो जाय।' उनकी ऐसी इच्छा तो रहती है, पर भोग और संग्रहकी रुचि ज्यों-की-त्यों बनी रहती है। तात्पर्य है कि जैसे मार्गमें चलते हुए किसीको मणि मिल जाय, ऐसे ही (गौणतासे) हमारी मुक्ति हो जाय तो अच्छी बात है—इस प्रकार जैसे मनुष्योंमें मुक्तिकी इच्छा गौण होती है, ऐसे ही भगवान् दर्शन दे तो हम भी दर्शन कर लें—इस प्रकार देवताओंमें दर्शनकी इच्छा गौण होती है।
देवतालोग 'हम इतने ऊँचे पदपर हैं, हमारे लोक, शरीर और भोग दिव्य हैं, हम बड़े पुण्यशाली हैं; अतः हमें भगवान् के दर्शन होने चाहिये'—ऐसी कोरी इच्छा ही
परिशिष्ट भाव —यद्यपि देवताओंका शरीर दिव्य होता है, पर भगवान् का शरीर उससे भी विलक्षण होता है। देवताओंका शरीर भौतिक तेजोमय और भगवान् का शरीर चिन्मय होता है। भगवान् का शरीर सत्-चित्-आनन्दमय, नित्य, अलौकिक और अत्यन्त दिव्य होता है। अतः देवता भी भगवान् को देखनेके लिये लालायित रहते हैं। जैसे साधारण लोगोंमें नये-नये स्थान देखनेका शौक रहता है, ऐसे ही देवताओंमें भगवान् को देखनेका शौक है, प्रेम नहीं। तात्पर्य है कि जैसे भक्त प्रेमपूर्वक भगवान् को देखना चाहते हैं, ऐसे देवता नहीं देखना चाहते। इसलिये भगवान् प्रेमी भक्तोंके तो अधीन हैं, पर देवताओंके अधीन नहीं हैं।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें कही हुई बातको ही भगवान् आगेके श्लोकमें पुष्ट करते हैं।
नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया। शक्य एवँविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥ ५३ ॥
१-मार्गं प्रयाते मणिलाभवन्मे लभेत मोक्षो यदि तर्हि धन्यः।
२-चिदानन्दमय देह तुम्हारी। बिगत बिकार जान अधिकारी ॥ (मानस, अयोध्या १२७। ३)
करते हैं, इसलिये उनको कभी दर्शन होंगे नहीं। कारण कि उनमें देवत्व, पद आदिका अभिमान है। अभिमानसे, पद आदिके बलसे भगवान् के दर्शन नहीं हो सकते। इसलिये अर्जुनने दसवें अध्यायके चौदहवें श्लोकमें कहा है कि 'हे भगवान्! आपके प्रकट होनेको देवता और दानव भी नहीं जानते।' इस प्रकार अर्जुनने भगवान् को न जाननेमें देवताओं और दानवोंको एक श्रेणीमें लिया है। इसका तात्पर्य यही है कि जैसे देवताओंके पास वैभव है, ऐसे ही दानवोंके पास विचित्र-विचित्र माया है, सिद्धियाँ हैं, पर उनके बलपर वे भगवान् को नहीं जान सकते। ऐसे ही देवता भगवान् के दर्शनकी लालसा भी रखें, तो भी उनको देवत्व-शक्तिके दर्शन नहीं हो सकते; क्योंकि भगवान् के दर्शनमें देवत्व कारण नहीं है। तात्पर्य है कि भगवान् को न तो देवत्व-शक्तिके देखा जा सकता है और न यज्ञ, तप, दान आदि शुभ-कर्मोंसे ही देखा जा सकता है (इसी अध्यायका तिरपनवाँ श्लोक)। उनको तो अनन्यभक्तिके ही देखा जा सकता है (चौवनवाँ श्लोक)। अनन्यभक्तिके देवता और मनुष्य—दोनों ही भगवान् को देख सकते हैं।
'देवा अपि' कहनेका तात्पर्य है कि जिन पुण्योंके कारण देवताओंको ऊँचा पद मिला है, ऊँचे (दिव्य) भोग मिले हैं, उन पुण्योंके बलसे, पद आदिके बलसे वे भगवान् के दर्शन नहीं कर सकते। तात्पर्य है कि पुण्यकर्म ऊँचे लोक, ऊँचे भोग तो दे सकते हैं, पर भगवान् के दर्शन करानेकी उनमें सामर्थ्य नहीं है। भगवान् के दर्शनमें यह प्राकृत महत्त्व कुछ भी मूल्य नहीं रखता।
७९८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ११ ]
यथा | = जिस प्रकार (तुमने) | अहम् | = (चतुर्भुजरूपवाला) मैं | दानेन | = दानसे ---|---|---|---|---|--- माम् | = मुझे | न | = न तो | च | = और द्रष्टवान् | = देखा | वेदैः | = वेदोंसे, | न | = न असि | = है, | न | = न | इज्यया | = यज्ञसे ही एवंविधः | = इस प्रकारका | तपसा | = तपसे, | द्रष्टुम् | = देखा | | न | = न | शक्यः | = जा सकता हूँ।
व्याख्या—‘द्रष्टवानसि मां यथा’ —तुमने मेरा चतुर्भुजरूप मेरी कृपासे ही देखा है। तात्पर्य है कि मेरे दर्शन मेरी कृपासे ही हो सकते हैं, किसी योग्यतासे नहीं।
‘नाहं वेदेन तपसा न दानेन न चैज्यया शक्य एवंविधो द्रष्टुम्’ —यह एक सिद्धान्तकी बात है कि जो चीज किसी मूल्यसे खरीदी जाती है, वह चीज उस मूल्यसे कम मूल्यकी ही होती है। जैसे, कोई दूकानदार एक घड़ी सौ रुपयेमें बेचता है, तो उसने वह घड़ी कम मूल्यमें ली है, तभी तो वह सौ रुपयेमें देता है। इसी तरह अनेक वेदोंका अध्ययन करनेपर, बहुत बड़ी तपस्या करनेपर, बहुत बड़ा दान देनेपर तथा बहुत बड़ा यज्ञ-अनुष्ठान करनेपर भगवान् मिल जायेंगे—ऐसी बात नहीं है। कितनी ही महान् क्रिया क्यों न हो, कितनी ही योग्यता सम्पन्न क्यों न की जाय, उसके द्वारा भगवान् खरीदे नहीं जा सकते। वे सब-के-सब मिलकर भी भगवत्प्राप्तिका मूल्य नहीं हो सकते। उनके द्वारा भगवान्पर अधिकार नहीं जमाया जा सकता। अर्जुनने इसी अध्यायके तैतालौसवें श्लोकमें साफ कहा है कि त्रिलोकीमें आपके समान भी कोई नहीं है, फिर आपसे अधिक हो ही कैसे सकता है ? तात्पर्य है कि आपसे अधिक हुए बिना आपपर अधिकार नहीं किया जा सकता।
सांसारिक चीजोंमें तो अधिक योग्यतावाला कम योग्यतावालेपर आधिपत्य कर सकता है, अधिक बुद्धिमान् कम बुद्धिवालोंपर अपना रोब जमा सकता है, अधिक धनवान् निर्धनोपर अपनी अधिकता प्रकट कर सकता है; परन्तु भगवान् किसी बल, बुद्धि, योग्यता, व्यक्ति, वस्तु आदिसे खरीदे नहीं जा सकते। कारण कि जिस भगवान्के
संकल्पमात्रसे तत्काल अनन्त ब्रह्माण्डोंकी रचना हो जाती है, उसे एक ब्रह्माण्डके भी किसी अंशमें रहनेवाले किसी वस्तु, व्यक्ति आदिसे कैसे खरीदा जा सकता है ? तात्पर्य यह है कि भगवान्की प्राप्ति केवल भगवान्की कृपासे ही होती है। वह कृपा तब प्राप्त होती है, जब मनुष्य अपनी सामर्थ्य, समय, समझ, सामग्री आदिको भगवान्के सर्वथा अर्पण करके अपनेमें सर्वथा निर्बलता, अयोग्यताका अनुभव करता है अर्थात् अपने बल, योग्यता आदिका किंचिन्मात्र भी अभिमान नहीं करता। इस प्रकार जब वह सर्वथा निर्बल होकर अपने-आपको भगवान्के सर्वथा समर्पित करके अनन्यभावसे भगवान्को पुकारता है, तब भगवान् तत्काल प्रकट हो जाते हैं। कारण कि जबतक मनुष्यके अन्तःकरणमें प्राकृत वस्तु, योग्यता, बल, बुद्धि आदिका महत्त्व और सहारा रहता है, तबतक भगवान् अत्यन्त नजदीक होनेपर भी दूर दीखते हैं।
इस श्लोकमें जो दुर्लभता बतायी गयी है, वह चतुर्भुजरूपके लिये ही बतायी गयी है, विश्वरूपके लिये नहीं। अगर इसको विश्वरूपके लिये ही मान लिया जाय तो पुनरुक्ति-दोष आ जायगा; क्योंकि पहले अङ्गतालीसवें श्लोकमें विश्वरूपकी दुर्लभता बतायी जा चुकी है। दूसरी बात, आगेके श्लोकमें भगवान्ने अनन्यभक्तिसे अपनेको देखा जाना शक्य बताया है। विश्वरूपमें अनन्यभक्ति हो ही नहीं सकती, क्योंकि अर्जुन-जैसे शूरवीर पुरुष भगवान्से दिव्यदृष्टि प्राप्त करके भी विश्वरूपको देखकर भयभीत हो गये, तो उस रूपमें अनन्यभक्ति, अनन्यप्रेम, आकर्षण कैसे हो सकता है ? अर्थात् नहीं हो सकता।
सम्बन्ध—जब कोई किसी साधनसे, किसी योग्यतासे, किसी सामग्रीसे आपको प्राप्त नहीं कर सकता, तो फिर आप कैसे प्राप्त किये जाते हैं—इसका उत्तर भगवान् आगेके श्लोकमें देते हैं।
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन। ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप ॥५४॥
श्लोक ५४ ]
- साधक-संजीवनी *
७९९
| तु | = परन्तु | अनन्यया, | द्रष्टुम् | = (साकाररूपसे) | |
|---|---|---|---|---|---|
| परन्तप | = हे शत्रुतापन | भवत्या | = (केवल) अनन्य- | देखनेमें | |
| अर्जुन | = अर्जुन! | भक्तिसे ही | च | = तथा | |
| एवंविधः | = इस प्रकार | तत्त्वेन | = तत्त्वसे | प्रवेष्टुम् | = प्रवेश (प्राप्त) |
| अहम् | = (चतुर्भुजरूप- | ज्ञातुम् | = जाननेमें | करनेमें | |
| वाला) मैं | च | = और | शक्यः | = शक्य हूँ। |
व्याख्या —‘भवत्या त्वनन्यया शक्य अहमेवं-विधोर्जुन’—यहाँ ‘तु’ पद पहले बताये हुए साधनोंसे विलक्षण साधन बतानेके लिये आया है। भगवान् कहते हैं कि ‘हे अर्जुन! तुमने मेरा जैसा शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी चतुर्भुजरूप देखा है, वैसा रूपवाला मैं यज्ञ, दान, तप आदिके द्वारा नहीं देखा जा सकता, प्रत्युत अनन्यभक्तिके द्वारा ही देखा जा सकता हूँ।
अनन्यभक्तिका अर्थ है—केवल भगवान्का ही आश्रय हो, सहारा हो, आशा हो, विश्वास हो*। भगवान्के सिवाय किसी योग्यता, बल, बुद्धि आदिका किंचिन्मात्र भी सहारा न हो। इनका अन्तःकरणमें किंचिन्मात्र भी महत्त्व न हो। यह अनन्यभक्ति स्वयंसे ही होती है, मन-बुद्धि-इन्द्रियों आदिके द्वारा नहीं। तात्पर्य है कि केवल स्वयंकी व्याकुलतापूर्वक उत्कण्ठा हो, भगवान्के दर्शन बिना एक क्षण भी चैन न पड़े। ऐसी जो भीतरमें स्वयंकी बेचैनी है, वही भगवत्प्राप्तिमें खास कारण है। इस बेचैनीमें, व्याकुलतामें अनन्त जन्मोंके अनन्त पाप भस्म हो जाते हैं। ऐसी अनन्यभक्तिवालोंके लिये ही भगवान्ने कहा है—‘जो अनन्यचित्वाला भक्त नित्य-निरन्तर मेरा चिन्तन करता है, उसके लिये मैं सुलभ हूँ’ (गीता—आठवें अध्यायका चौदहवाँ श्लोक); और ‘जो अनन्यभक्त मेरा चिन्तन करते हुए उपासना करते हैं, उनका योगक्षेम मैं वहन करता हूँ (गीता—नवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)।
अनन्यभक्तिका दूसरा तात्पर्य यह है कि अपनेमें भजन-स्मरण करनेका, साधन करनेका, उत्कण्ठापूर्वक पुकारनेका जो कुछ सहारा है, वह सहारा किंचिन्मात्र भी न हो। फिर साधन किसलिये करना है? केवल अपना अभिमान मिटानेके लिये अर्थात् अपनेमें जो साधन करनेके बलका भान होता है, कि साधनके बलपर मैं अपना उद्धार
कर लूँगा, उसको मिटानेके लिये ही साधन करना है। तात्पर्य है कि भगवान्की प्राप्ति साधन करनेसे नहीं होती, प्रत्युत साधनका अभिमान गलनेसे होती है। साधनका अभिमान गल जानेसे साधकपर भगवान्की शुद्ध कृपा असर करती है अर्थात् उस कृपाके आनेमें कोई आड़ नहीं रहती और (उस कृपासे) भगवान्की प्राप्ति हो जाती है।
‘ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुम्’—ऐसी अनन्यभक्तिसे ही मैं तत्त्वसे जाना जा सकता हूँ, अनन्यभक्तिसे ही मैं देखा जा सकता हूँ और अनन्यभक्तिसे ही मैं प्राप्त किया जा सकता हूँ।
ज्ञानके द्वारा भी भगवान् तत्त्वसे जाने जा सकते हैं और प्राप्त किये जा सकते हैं (गीता—अठारहवें अध्यायका पचपनवाँ श्लोक), पर दर्शन देनेके लिये भगवान् बाध्य नहीं हैं।
‘ज्ञातुम्’ कहनेका तात्पर्य है कि मैं जैसा हूँ, वैसा-का-वैसा जाननेमें आ जाता हूँ। जाननेमें आनेका यह अर्थ नहीं है कि मैं उसकी बुद्धिके अन्तर्गत आ जाता हूँ, प्रत्युत उसकी जाननेकी शक्ति मेरेसे परिपूर्ण हो जाती है। तात्पर्य है कि वह मेरेको ‘वासुदेवः सर्वम्’ (गीता ७।११) और ‘सदसच्चाहम्’ (गीता ९।११)— इस तरह वास्तविक तत्त्वसे जान लेता है।
‘द्रष्टुम्’ कहनेका तात्पर्य है कि वह सगुणरूपसे अर्थात् विष्णु, राम, कृष्ण आदि जिस किसी भी रूपसे देखना चाहे, मेरेको देख सकता है।
‘प्रवेष्टुम्’ कहनेका तात्पर्य है कि वह भगवान्के साथ अपने-आपकी अभिन्नताका अनुभव कर लेता है अथवा उसका भगवान्की नित्यलीलामें प्रवेश हो जाता है। नित्यलीलामें प्रवेश होनेमें भक्तकी इच्छा और भगवान्की मरजी ही मुख्य होती है। यद्यपि भगवान्के सर्वथा शरण
- (१) एक भरोसो एक बल एक आस बिस्वास। एक राम घन स्याम हित चातक तुलसीदास॥ (दोहावली २७७)
(२) एक बानि करुनानिधान की। सो प्रिय जाकें गति न आन की॥ (मानस ३।१०।४)
८००
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ११ ]
होनेपर भक्तकी सब इच्छाएँ समाप्त हो जाती हैं, तथापि भगवान्की यह एक विलक्षणता है कि भक्तकी लीलामें प्रवेश होनेकी जो इच्छा रही है, उसको वे पूरी कर देते हैं। केवल पारमार्थिक इच्छाको ही पूरी करते हों, ऐसी बात नहीं; किन्तु भक्तकी पहले जो सांसारिक यत्किंचित् इच्छा रही हो, उसको भी भगवान् पूरी कर देते हैं। जैसे भगवर्दर्शनसे पूर्वकी इच्छाके अनुसार ध्रुवजीको छतीस हजार वर्षका राज्य मिला और विभीषणको एक कल्पका। तात्पर्य यह हुआ कि भगवान् भक्तकी इच्छाको पूरी कर देते हैं और फिर अपनी मरजीके अनुसार उसे वास्तविक पूर्णताकी प्राप्ति करा देते हैं, जिससे भक्तके लिये कुछ भी
करना, जानना और पाना शेष नहीं रहता।
विशेष बात
भक्तकी खुदकी जो उत्कट अभिलाषा है, उस अभिलाषामें ऐसी ताकत है कि वह भगवान्में भी भक्तसे मिलनेकी उत्कण्ठा पैदा कर देती है। भगवान्की इस उत्कण्ठामें बाधा देनेकी किसीमें भी सामर्थ्य नहीं है। अनन्त सामर्थ्यशाली भगवान्की जब भक्तकी तरफ कृपा उमड़ती है, तब वह कृपा भक्तके सम्पूर्ण विघ्नोंको दूर करके, भक्तकी योग्यता-अयोग्यताको किंचिन्मात्र भी न देखती हुई भगवान्को भी परवश कर देती है, जिससे भगवान् भक्तके सामने तत्काल प्रकट हो जाते हैं।
परिशिष्ट भाव— जहाँ भगवान्ने ज्ञानकी परानिष्ठा बतायी है, वहाँ ज्ञानसे केवल जानना और प्रवेश करना—ये दो ही बताये हैं—‘ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्’ (गीता १८।५५) परन्तु यहाँ भक्तिसे जानना, देखना और प्रवेश करना—ये तीनों बताये हैं। भक्तिसे भगवान्के दर्शन भी हो सकते हैं—यह भक्तिकी विशेषता है, जबकि ज्ञानकी परानिष्ठा होनेपर भी भगवान्के दर्शन नहीं होते। अतः भक्तिकी विशेष महिमा है। भक्तिमें समग्रकी प्राप्ति होती है।
ब्रह्मकी प्राप्तिमें जानना और प्रवेश करना—ये दो बातें हो सकती हैं, पर समग्रकी प्राप्तिमें जानना, प्रवेश करना और देखना—ये तीनों बातें होती हैं। कारण कि एकदेशीयमें एकदेशीयता होती है और समग्रमें समग्रता होती है।
सम्बन्ध—अब भगवान् अन्यभक्तिके साधनोंका वर्णन करते हैं।
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥ ५५ ॥
| पाण्डव | = हे पाण्डव! | (और) | सर्वभूतेषु | = प्राणिमात्रके साथ |
|---|---|---|---|---|
| यः | = जो | मद्भक्तः | = मेरा ही प्रेमी भक्त | निर्वैरः |
| मत्कर्मकृत् | = मेरे लिये ही कर्म करनेवाला, | सङ्गवर्जितः | = सर्वथा आसक्ति-रहित (और) | सः |
| मत्परमः | = मेरे ही परायण | माम् | ||
| एति | = प्राप्त होता है। |
व्याख्या—[इस श्लोकमें पाँच बातें आयी हैं। इन पाँचोंको ‘साधनपंचक’ भी कहते हैं। इन पाँचों बातोंके दो विभाग हैं। (१) भगवान्के साथ घनिष्ठता और (२) संसारके साथ सम्बन्ध-विच्छेद। पहले विभागमें ‘मत्कर्मकृत्’, ‘मत्परमः’ और ‘मद्भक्तः’—ये तीन बातें हैं; और दूसरे विभागमें ‘संगवर्जितः’ और ‘निर्वैरः सर्वभूतेषु’—ये दो बातें हैं।
‘मत्कर्मकृत्’—जो जप, कीर्तन, ध्यान, सत्संग, स्वाध्याय आदि भगवत्सम्बन्धी कर्मोंको और वर्ण, आश्रम, देश, काल, परिस्थिति आदिके अनुसार प्राप्त लौकिक
कर्मोंको केवल मेरे लिये ही अर्थात् मेरी प्रसन्नताके लिये ही करता है, वह ‘मत्कर्मकृत्’ है।
वास्तवमें देखा जाय तो कर्मके पारमार्थिक और लौकिक—ये दो बाह्यरूप होते हैं, पर भीतरमें ‘सब कर्म केवल भगवान्के लिये ही करने हैं’—ऐसा एक ही भाव रहता है, एक ही उद्देश्य रहता है। तात्पर्य यह हुआ कि भक्त शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिसे जो कुछ भी कर्म करता है, वह सब भगवान्के लिये ही करता है। कारण कि उसके पास शरीर, मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, योग्यता, करनेकी सामर्थ्य, समझ आदि जो कुछ है, वह सब-की-सब भगवान्की ही
श्लोक ५५ ]
- साधक-संजीवनी *
८०९
दी हुई है और भगवान्की ही है, तथा वह स्वयं भी भगवान्का ही है। वह तो केवल भगवान्की प्रसन्नताके लिये, भगवान्की आज्ञाके अनुसार, भगवान्की दी हुई शक्तिसे निमित्तमात्र बनकर कार्य करता है। यही उसका 'मत्कर्मकृत' होना है।
'मत्परमः'—जो मेरेको ही परमोत्कृष्ट समझकर केवल मेरे ही परायण रहता है अर्थात् जिसका परम प्रापणीय, परम ध्येय, परम आश्रय केवल मैं ही हूँ, ऐसा भक्त 'मत्परमः' है।
'मद्भक्तः'—जो केवल मेरा ही भक्त है अर्थात् जिसने मेरे साथ अटल सम्बन्ध जोड़ लिया है कि 'मैं केवल भगवान्का ही हूँ और केवल भगवान् ही मेरे हैं, तथा मैं अन्य किसीका भी नहीं हूँ और अन्य कोई भी मेरा नहीं है।' ऐसा होनेसे भगवान्में अतिशय प्रेम हो जाता है; क्योंकि जो अपना होता है, वह स्वतः प्रिय लगता है। प्रेमकी जागृतिमें अपनापन ही मुख्य है।
वह भक्त सब देशमें, सब कालमें, सम्पूर्ण वस्तु-व्यक्तियोंमें और अपने-आपमें सदा-सर्वदा प्रभुको ही परिपूर्ण देखता है। इस दृष्टिसे प्रभु सब देशमें होनेसे यहाँ भी हैं, सब कालमें होनेसे अभी भी हैं, सम्पूर्ण वस्तु-व्यक्तियोंमें होनेसे मेरेमें भी हैं और सबके होनेसे मेरे भी हैं—ऐसा भाव रखनेवाला ही 'मद्भक्तः' है।
'संगवर्जितः निर्वरः सर्वभूतेषु यः'—केवल भगवान्के लिये ही कर्म करनेसे, केवल भगवान्के ही परायण रहनेसे और केवल भगवान्का ही भक्त बननेसे क्या होता है? इसका उपर्युक्त पदोंसे वर्णन करते हैं कि वह 'संगवर्जितः' हो जाता है अर्थात् उसकी संसारमें आसक्ति, ममता और कामना नहीं रहती। आसक्ति, ममता और कामनासे ही संसारके साथ सम्बन्ध होता है। भगवान्में अनन्य प्रेम होते ही आसक्ति आदिका अत्यन्त अभाव हो जाता है।
दूसरी बात, जब भक्तको 'मैं भगवान्का ही अंश हूँ'—इस वास्तविकताका अनुभव हो जाता है, तब उसका भगवान्में प्रेम जाग्रत् हो जाता है। प्रेम जाग्रत् होनेपर रागका अत्यन्त अभाव हो जाता है। रागका अत्यन्त अभाव होनेसे और सर्वत्र भगवद्भाव होनेसे उसके शरीरके साथ कोई कितना ही दुर्व्यवहार करे, उसको मारे-पीटे, उसका अनिष्ट करे, तो भी उसके हृदयमें अनिष्ट करनेवालेके प्रति किञ्चिन्मात्र भी वैरभाव उत्पन्न नहीं होता। वह उसमें
भगवान्की ही मरजी, कृपा मानता है। ऐसे भक्तको भगवान्ने 'निर्वरः सर्वभूतेषु' कहा है।
'संगवर्जितः' और 'निर्वरः सर्वभूतेषु'—इन दोनोंका वर्णन करनेका तात्पर्य 'उसका संसारसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है' यह बतानेमें है। संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर स्वतःसिद्ध परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है।
'स मामेति'—ऐसा वह मेरा भक्त मेरेको ही प्राप्त हो जाता है। 'स मामेति' में तत्त्वसे जानना, दर्शन करना और प्राप्त होना—ये तीनों ही बातें आ जाती हैं, जो कि पीछेके (चौवनवें) श्लोकमें बतायी गयी हैं। तात्पर्य है कि जिस उद्देश्यसे मनुष्यजन्म हुआ है, वह उद्देश्य सर्वथा पूर्ण हो जाता है।
विशेष बात
श्रीभगवान्ने नवें अध्यायके अन्तमें कहा था—
ममना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवेच्छसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः॥
(९।३४)
ऐसा कहनेपर भी भगवान्के मनमें यह बात रह गयी कि मैं अपने रहस्यकी सब बात किस तरहसे, किस रीतिसे समझाऊँ? इसीको समझानेके लिये भगवान्ने दसवाँ और ग्यारहवाँ अध्याय कहा है।
जीवने उत्पत्ति-विनाशशील और नित्य परिवर्तनशील प्रकृति और प्रकृतिके कार्य शरीर-संसारका सहारा ले रखा है, जिससे यह अविनाशी और नित्य अपरिवर्तनशील भगवान्से विमुख हो रहा है। इस विमुखताको मिटाकर जीवको भगवान्के सममुख करनेमें ही इन दोनों—दसवें और ग्यारहवें अध्यायका तात्पर्य है।
इस मनुष्यके पास दो शक्तियाँ हैं—चिन्तन करनेकी और देखनेकी। इनमेंसे जो चिन्तन करनेकी शक्ति है, उसको भगवान्की विभूतियोंमें लगाना चाहिये। तात्पर्य है कि जिस किसी वस्तु, व्यक्ति आदिमें जो कुछ विशेषता, महत्ता, विलक्षणता, अलौकिकता दीखे और उसमें मन चला जाय, उस विशेषता आदिको भगवान्की ही मानकर वहाँ भगवान्का ही चिन्तन होना चाहिये। इसके लिये भगवान्ने दसवाँ अध्याय कहा है।
दूसरी जो देखनेकी शक्ति है, उसको भगवान्में लगाना चाहिये। तात्पर्य है कि जैसे भगवान्के दिव्य अविनाशी विराट्रूपमें अनेक रूप हैं, अनेक आकृतियाँ हैं, अनेक
८०२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ११ ]
तरहके दृश्य हैं, ऐसे ही यह संसार भी उस विराट्रूपका ही एक अंग है और इसमें अनेक नाम, रूप, आकृति आदिके रूपमें परमात्मा-ही-परमात्मा परिपूर्ण हैं। इस दृष्टिसे सबको परमात्मस्वरूप देखे। इसके लिये भगवान्ने ग्यारहवाँ अध्याय कहा है।
अर्जुनने भी इन दोनों दृष्टियोंके लिये दो बार प्रार्थना की है। दसवें अध्यायके सत्रहवें श्लोकमें अर्जुनने कहा कि 'हे भगवन्! मैं किन-किन भावोंमें आपका चिन्तन करूँ?' तो भगवान्ने चिन्तनशक्तिको लगानेके लिये अपनी विभूतियोंका
परिशिष्ट भाव —जिस भक्तिसे भगवान् चतुर्भुजरूपसे देखे जा सकते हैं, उस भक्तिका स्वरूप बताते हैं कि मनुष्य संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करके सर्वथा मेरे परायण हो जाय। 'मत्कर्मकृत'—यह स्थूलशरीरसे भगवान्के परायण होना है, 'मत्परमः'—यह सूक्ष्म तथा कारणशरीरसे भगवान्के परायण होना है, और 'मद्भक्तः'— यह स्वयंसे भगवान्के परायण होना है; क्योंकि 'मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं'—यह स्वयंकी स्वीकृति है।
'स मामेति' पदोंसे समग्रकी प्राप्ति बतायी गयी है।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूर्पनिषत्तु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विश्वरूपदर्शनयोगो नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ इस प्रकार ॐ, तत्, सत्—इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्रूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें 'विश्वरूपदर्शनयोग' नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११ ॥
अर्जुनने भगवान्से दिव्यदृष्टि प्राप्त करके भगवान्के जिस विश्वरूपके दर्शन किये थे, उसके वर्णनको पद्-सुनकर भगवान्के प्रभावको मान लेनेसे भगवान्के साथ योग-(सम्बन्ध-) का अनुभव हो जाता है। अतः ग्यारहवें अध्यायका नाम 'विश्वरूपदर्शनयोग' है।
ग्यारहवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच
(१) इस अध्यायमें 'अथैकादशोऽध्यायः' के तीन, 'अर्जुन उवाच' आदि पदोंके बाईस, श्लोकोंके आठ सौ इक्यावन और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदोंका योग आठ सौ नवासी है।
(२) 'अथैकादशोऽध्यायः' के सात, 'अर्जुन उवाच' आदि पदोंके सत्तर, श्लोकोंके दो हजार एक सौ तिरानवे और पुष्पिकाके पचास अक्षर हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण अक्षरोंका योग दो हजार तीन सौ बीस है। इस अध्यायके पचपन श्लोकोंमेंसे पहला श्लोक तैंतीस अक्षरोंका और पंद्रहवेंसे पचासवें श्लोकतकके छत्तीस श्लोक चौवालीस अक्षरोंके हैं। शेष अठारह श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं।
(३) इस अध्यायमें ग्यारह 'उवाच' हैं—चार 'अर्जुन उवाच', चार 'श्रीभगवानुवाच' और तीन 'संजय
वर्णन किया। ग्यारहवें अध्यायके आरम्भमें अर्जुनने कहा कि 'मैं आपके रूपको देखना चाहता हूँ' तो भगवान्ने अपना विश्वरूप दिखाया और उसको देखनेके लिये अर्जुनको दिव्यचक्षु दिये।
तात्पर्य यह हुआ कि साधकको अपनी चिन्तन और दर्शन-शक्तिको भगवान्के सिवाय दूसरी किसी भी जगह खर्च नहीं करनी चाहिये अर्थात् साधक चिन्तन करे तो परमात्माका ही चिन्तन करे और जिस किसीको देखे तो उसको परमात्मस्वरूप ही देखे।
उवाच।
ग्यारहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द
इस अध्यायमें पचपन श्लोक हैं। उनमें उन्नीस श्लोक 'अनुष्टुप्' छन्दके, तीन श्लोक 'उपेन्द्रवज्रा' छन्दके और तैंतीस श्लोक 'उपजाति' छन्दके हैं।
'अनुष्टुप्' छन्दवाले उन्नीस श्लोकोंमेंसे—पहले और पचपनवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'भगण' प्रयुक्त होनेसे 'भ-विपुला'; ग्यारहवें और तिरपनवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'नगण' प्रयुक्त होनेसे 'न-विपुला'; और दसवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'नगण' तथा तृतीय चरणमें 'भगण' प्रयुक्त होनेसे 'संकीर्ण-विपुला' छन्दवाले श्लोक हैं। शेष चौदह (दूसरेसे नवेंतक, बारहवेंसे चौदहवेंतक, इक्यावनवाँ, बावनवाँ और चौवनवाँ) श्लोक ठीक 'पध्यावक्त्र' अनुष्टुप् छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।
शेष छत्तीस श्लोकोंमेंसे—अट्ठाईसवाँ, उन्तीसवाँ और पैतालिसवाँ श्लोक 'उपेन्द्रवज्रा' तथा शेष तैंतीस (पन्द्रहवेंसे सत्ताईसवेंतक, तीसवेंसे चौवालीसवेंतक और छियालीसवेंसे पचासवेंतक) श्लोक ठीक 'उपजाति' छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
अथ द्वादशोऽध्यायः
अवतरणिका—
श्रीभगवान्ने चौथे अध्यायके तैंतीसवें और चौँतीसवें श्लोकमें ज्ञानयोगकी श्रेष्ठता बताते हुए ज्ञानप्राप्तिके लिये प्रेरणा की। फिर ज्ञानकी महिमाका वर्णन किया। उसके बाद पाँचवें अध्यायके सोलहवें, सत्रहवें एवं चौबीसवेंसे छब्बीसवें श्लोकतक, छठे अध्यायके चौबीसवेंसे अट्ठाईसवें श्लोकतक और आठवें अध्यायके ग्यारहवेंसे तेरहवें श्लोकतक निर्गुण-निराकारकी उपासनाका महत्त्व बताया।
छठे अध्यायके सैंतालीसवें श्लोकमें साधक भक्तकी महिमा बतायी और सातवें अध्यायसे ग्यारहवें अध्यायतक जगह-जगह 'अहम्,' 'माम्' आदि पदोंद्वारा विशेषरूपसे सगुण-साकार एवं सगुण-निराकारकी उपासनाका महत्त्व बताया तथा अन्तमें ग्यारहवें अध्यायके चौवनवें-पचपनवें श्लोकोंमें अनन्य भक्तिकी महिमा एवं फलसहित उसके स्वरूपका वर्णन किया*।
उपर्युक्त वर्णनसे अर्जुनके मनमें यह जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि सगुण भगवान्की उपासना करनेवाले और निर्गुण ब्रह्मकी उपासना करनेवाले—दोनोंमेंसे कौन-से उपासक श्रेष्ठ हैं। इसी जिज्ञासाको लेकर अर्जुन प्रश्न करते हैं—
अर्जुन उवाच
एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते। ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्त्माः ॥ १ ॥
- इस अध्यायसे पहले साकार भगवान्के उपासकोंका वर्णन जिन श्लोकोंमें जिन पदोंके द्वारा हुआ है, उनका परिचय इस प्रकार है—
| अध्याय श्लोक | पद | अर्थ |
|---|---|---|
| ६ ४७ | 'मद्गतान्तरात्मनाः' श्रद्धावाभजते यो माम्' | ( जो श्रद्धावान् भक्त मेरेमें तल्लीन हुए मनसे मेरा भजन करता है)। |
| ७ १ | 'मव्यासक्तमनाः' यों योगं युञ्जन्मदाश्रयः' | ( मुझमें अनन्य प्रेमसे आसक्त मनवाला और मेरे आश्रित होकर भक्तियोगमें लगा हुआ )। |
| ७ २१-३० | 'मामाश्रित्य यतन्ति,' 'युक्तचेतसः' | ( 'युक्त चित्तवाले पुरुष मेरे शरण होकर साधन करते हैं। |
| ८ ७ | 'मव्यपितमनोबुद्धिः' | ( मेरेमें अपित किये हुए मन-बुद्धिवाला )। |
| ८ १४ | 'अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः' | ( मेरेमें अनन्यचित्त होकर जो नित्य-निरन्तर मेरा स्मरण करता है)। |
| ९ १४ | 'सततं कीर्तयन्तो मां यतन्श्रच दृढव्रताः' | ( दृढ़ निश्चयवाले भक्तजन निरन्तर मेरे नाम और गुणोंका कीर्तन करते हुए मेरी प्राप्तिके लिये यत्न करते हैं)। |
| ९ २२ | 'अनन्याश्रित्ययन्तो मां ये जनाः पर्युपासते' | ( अनन्यभावसे जो भक्तजन मेरा चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं)। |
| ९ ३० | 'भजते मामनन्यभाक्' | ( अनन्यभावसे मेरा भजन करता है)। |
| १० १ | 'मच्चिता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्' | ( मेरेमें मन लगाये रखनेवाले और मेरेमें प्राणोंको अर्पण करनेवाले भक्तजन आपसमें मेरे प्रभावको जानते हुए )। |
| ११ ५५ | 'मत्कर्मकुन्मत्परमो मद्भक्तः' | ( मेरे लिये ही सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्म करनेवाला, मेरे परायण और मेरा भक्त है)। |
८०४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १२ ]
अर्जुन बोले—
| ये | = जो | त्वाम् | = आप (सगुण-साकार)-की | अव्यक्तम् | = निर्गुण-निराकारकी |
|---|---|---|---|---|---|
| भक्ताः | = भक्त | पर्युपासते | = उपासना करते हैं | अपि | = ही (उपासना करते हैं), |
| एवम् | = इस प्रकार (ग्यारहवें अध्यायके पंचपनवें श्लोकके अनुसार) | च | = और | तेषाम् | = उन दोनोंमेंसे |
| सततयुक्ताः | = निरन्तर आपमें लगे रहकर | ये | = जो | योगवित्ताः | = उत्तम योगवेत्ता |
| अक्षरम् | = अविनाशी | के | = कौन हैं ? |
व्याख्या—‘एवं सततयुक्ता ये भक्ताः’—ग्यारहवें अध्यायके पंचपनवें श्लोकमें भगवान्ने ‘यः’ और ‘सः’ पद जिस साधकके लिये प्रयुक्त किये हैं, उसी साधकके लिये अर्थात् सगुण-साकार भगवान्की उपासना करनेवाले सब साधकोंके लिये यहाँ ‘ये भक्ताः’ पद आये हैं।
यहाँ ‘एवम्’ पदसे ग्यारहवें अध्यायके पंचपनवें श्लोकका निर्देश किया गया है।
‘मैं भगवान्का ही हूँ’,—इस प्रकार भगवान्का होकर रहना ही ‘सततयुक्त’ होना है।
भगवान्में पूर्ण श्रद्धा रखनेवाले साधक भक्तोंका एकमात्र उद्देश्य भगवत्प्राप्ति होता है। अतः प्रत्येक (पारमार्थिक—भगवत्सम्बन्धी जप-ध्यानादि अथवा व्यावहारिक—शारीरिक और आजीविका-सम्बन्धी) क्रियामें उनका सम्बन्ध नित्य-निरन्तर भगवान्से बना रहता है। ‘सततयुक्ताः’ पद ऐसे ही साधक भक्तोंका वाचक है।
साधकसे यह एक बहुत बड़ी भूल होती है कि वह पारमार्थिक क्रियाओंको करते समय तो अपना सम्बन्ध
भगवान्से मानता है, पर व्यावहारिक क्रियाओंको करते समय वह अपना सम्बन्ध संसारसे मानता है। इस भूलका कारण है—समय-समयपर साधकके उद्देश्यमें होनेवाली भिन्नता। जबतक बुद्धिमें धन-प्राप्ति, मान-प्राप्ति, कुटुम्ब-पालन आदि भिन्न-भिन्न उद्देश्य बने रहते हैं, तबतक साधकका सम्बन्ध निरन्तर भगवान्के साथ नहीं रहता। अगर वह अपने जीवनके एकमात्र उद्देश्य भगवत्प्राप्तिको ठीक-ठीक पहचान ले, तो उसकी प्रत्येक क्रिया भगवत्प्राप्तिका साधन हो जायगी। भगवत्प्राप्तिका उद्देश्य हो जानेपर भगवान्का जप-स्मरण-ध्यानादि करते समय तो उसका सम्बन्ध भगवान्से ही है; किन्तु व्यावहारिक क्रियाओंको करते समय भी उसको नित्य-निरन्तर भगवान्में लगा हुआ ही समझना चाहिये।
अगर क्रियाके आरम्भ और अन्तमें साधकको भगवत्स्मृति है, तो क्रिया करते समय भी उसकी निरन्तर सम्बन्धात्मक भगवत्स्मृति रहती है—ऐसा मानना चाहिये। जैसे, बहीखातेमें जोड़ लगते समय व्यापारीकी वृत्ति इतनी
इस अध्यायसे पहले निराकार उपासकोंका वर्णन जिन श्लोकोंमें जिन पदोंके द्वारा हुआ है, उनका परिचय इस प्रकार है—
| अध्याय श्लोक | पद | अर्थ |
|---|---|---|
| ४ ३४ | ‘तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया’ | ( उस ज्ञानको तू तत्त्वदर्शी ज्ञानियोंके पास जाकर समझ, उनको साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करनेसे, उनकी सेवा करनेसे और सरलतापूर्वक प्रश्न करनेसे )। |
| ४ ३९ | ‘श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानम्’ | ( श्रद्धावान् पुरुष ज्ञानको प्राप्त होता है )। |
| ५ ८ | ‘नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्यते तत्त्वचित्’ | ( तत्त्वको जाननेवाला सांख्ययोगी निःसन्देह ऐसा माने कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ )। |
| ५ १३ | ‘नैव कुर्वन् कारयन्’ | ( कर्मोंको न करता हुआ, न करवाता हुआ )। |
| ५ २४—२६ | ‘ब्रह्मनिर्वाणम्’ | ( निर्वाण ब्रह्मको प्राप्त होता है )। |
| ६ २५ | ‘आत्मसंस्थं मनः कृत्वा’ | ( मनको परमात्मामें स्थित करके )। |
| ८ ११ | ‘यदक्षरं वेदविदो वदन्ति’ | ( वेदोंके ज्ञाता पुरुष जिस परमपदको ‘अक्षर’ कहते हैं )। |
| ८ १३ | ‘ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहर्न्मानुस्मरन्’ | ( ॐ—इस एक अक्षररूप ब्रह्मका उच्चारण और मुझ निर्गुण ब्रह्मका स्मरण करता हुआ )। |
| ९ १५ | ‘ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते’ | ( ज्ञानयोगी मुझ निर्गुण ब्रह्मका ज्ञानयज्ञके द्वारा पूजन करते हुए मेरी उपासना करते हैं )। |
श्लोक १ ]
- साधक-संजीवनी *
८०५
तल्लीन होती है कि मैं कौन हूँ और जोड़ क्यों लगा रहा हूँ—इसका भी ज्ञान नहीं रहता। केवल जोड़के अंकोंकी ओर ही उसका ध्यान रहता है। जोड़ शुरू करनेसे पहले उसके मनमें यह धारणा रहती है कि ‘मैं अमुक व्यापारी हूँ तथा अमुक कार्यके लिये जोड़ लगा रहा हूँ’ और जोड़ लगाना समाप्त करते ही पुनः उसमें उसी भावकी स्फुरणा हो जाती है कि ‘मैं अमुक व्यापारी हूँ और अमुक कार्य कर रहा था।’ अतः जिस समयमें वह तल्लीनतापूर्वक जोड़ लगा रहा है, उस समय भी ‘मैं अमुक व्यापारी हूँ और अमुक कार्य कर रहा हूँ’—इस भावकी विस्मृति दीखते हुए भी वस्तुतः ‘विस्मृति’ नहीं मानी जाती।
इसी प्रकार यदि कर्तव्य-कर्मके आरम्भ और अन्तमें साधकका यह भाव है कि ‘मैं भगवान्का ही हूँ और भगवान्के लिये ही कर्तव्य-कर्म कर रहा हूँ’, तथा इस भावमें उसे थोड़ी भी शंका नहीं है, तो जब वह अपने कर्तव्य-कर्ममें तल्लीनतापूर्वक लग जाता है, उस समय उसमें भगवान्की विस्मृति दीखते हुए भी वस्तुतः विस्मृति नहीं मानी जाती।
‘त्वाम् पर्युपासते’—यहाँ ‘त्वाम्’ पदसे उन सभी सगुण-साकार स्वरूपोंको ग्रहण कर लेना चाहिये, जिनको भगवान् भक्तोंके इच्छानुसार समय-समयपर धारण किया करते हैं और जो स्वरूप भगवान्ने भिन्न-भिन्न अवतारोंमें धारण किये हैं तथा भगवान्का जो स्वरूप दिव्यधाममें विराजमान है—जिसको भक्तलोग अपनी मान्यताके अनुसार अनेक रूपों और नामोंसे कहते हैं।
‘पर्युपासते’—पदका अर्थ है—‘परितः उपासते’ अर्थात् अच्छी तरह उपासना करते हैं। जैसे पतिव्रता स्त्री कभी पतिकी सेवामें अपने शरीरको अर्पण करके, कभी पतिकी अनुपस्थितिमें पतिका चिन्तन करके, कभी पतिके सम्बन्धसे सास-ससुर आदिकी सेवा करके और कभी पतिके लिये रसोई बनाना आदि घरेके कार्य करके सदा-सर्वदा पतिकी ही उपासना करती है, ऐसे ही साधक भक्त भी कभी भगवान्में तल्लीन होकर, कभी भगवान्का जप-स्मरण-चिन्तन करके, कभी सांसारिक प्राणियोंको भगवान्का ही मानकर उनकी सेवा करके और कभी भगवान्की आज्ञाके अनुसार सांसारिक कर्मोंको करके सदा-सर्वदा भगवान्की उपासनामें ही लगा रहता है। ऐसी उपासना ही अच्छी तरह की गयी उपासना है। ऐसे उपासकके हृदयमें उत्पन्न और नष्ट होनेवाले पदार्थों और क्रियाओंका
किंचिन्मात्र भी महत्त्व नहीं होता।
‘ये चाप्यक्षरमव्यक्तम्’—यहाँ ‘ये’ पद निर्गुण-निराकारकी उपासना करनेवाले साधकोंका वाचक है। अर्जुनेने श्लोकके पूर्वाङ्कमें जिस श्रेणीके सगुण-साकारके उपासकोंके लिये ‘ये’ पदका प्रयोग किया है, उसी श्रेणीके निर्गुण-निराकारके उपासकोंके लिये यहाँ ‘ये’ पदका प्रयोग किया गया है।
‘अक्षरम्’ पद अविनाशी सच्चिदानन्दधन परब्रह्मका वाचक है (इसकी व्याख्या इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें की जायगी)।
जो किसी इन्द्रियका विषय नहीं है, उसे ‘अव्यक्त’ कहते हैं। यहाँ ‘अव्यक्तम्’ पदके साथ ‘अक्षरम्’ विशेषण दिया गया है। अतः यह पद निर्गुण-निराकार ब्रह्मका वाचक है (इसकी व्याख्या इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें की जायगी)।
‘अपि’ पदसे ऐसा भाव प्रतीत होता है कि यहाँ साकार उपासकोंकी तुलना उर्हीं निराकार उपासकोंसे की गयी है, जो केवल निराकार ब्रह्मको श्रेष्ठ मानकर उसकी उपासना करते हैं।
‘तेषां के योगवित्ताः’—यहाँ ‘तेषाम्’ पद सगुण और निर्गुण दोनों प्रकारके उपासकोंके लिये आया है। इसी अध्यायके पाँचवें श्लोकमें ‘तेषाम्’ पद निर्गुण उपासकोंके लिये आया है, जबकि सातवें श्लोकमें ‘तेषाम्’ पद सगुण उपासकोंके लिये आया है।
इन पदोंसे अर्जुनका अभिप्राय यह है कि इन दो प्रकारके उपासकोंमें कौन-से उपासक श्रेष्ठ हैं।
‘साकार और निराकारके उपासकोंमें श्रेष्ठ कौन है?’—अर्जुनेके इस प्रश्नका भगवान्ने जो उत्तर दिया है, उसपर गहरा विचार करनेसे अर्जुनेके प्रश्नकी महत्ताका पता चलता है; जैसे—
इस अध्यायके दूसरे श्लोकसे चौदहवें अध्यायके बीसवें श्लोकतक भगवान् अविराम बोलते ही चले गये हैं। तिहत्तर श्लोकोंका इतना लम्बा प्रकरण गीतामें एकमात्र यही है। इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि भगवान् इस प्रकरणमें कोई अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बात समझाना चाहते हैं। साधकोंको साकार और निराकार स्वरूपमें एकताका बोध हो, उनके हृदयमें इन दोनों स्वरूपोंको प्राप्त करनेवाले साधनोंका सांगोपांग रहस्य प्रकट हो, सिद्ध भक्तों (गीता—बारहवें अध्यायके तेरहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक)
८०६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १२
और ज्ञानियों (गीता-चौदहवें अध्यायके बाईसवेंसे पचीसवें श्लोकतक)-के आदर्श लक्षणोंसे वे परिचित हों और संसारसे सम्बन्ध-विच्छेदकी विशेष महत्ता उनकी समझमें आ जाय-इन्हीं उद्देश्योंको सिद्ध करनेमें भगवान्की
विशेष रुचि मालूम देती है। तात्पर्य यह कि भगवान्के हृदयमें जीवोंके लिये जो परमल्याणकारी, अत्यन्त गोपनीय और उत्तमोत्तम भाव थे, उनको प्रकट करवानेका श्रेय अर्जुनके इस भगवत्प्रेरित प्रश्नको ही है।
परिशिष्ट भाव-'योगशास्त्र' होनेसे गीतामें 'योग' मुख्य है। अतः असली योगवेत्ता कौन है?-यह अर्जुनका प्रश्न है। योगवेत्ताओंकी तीन श्रेणियाँ हैं-(१) योगवित् अर्थात् योगी (२) योगवित्त अर्थात् दो योगियोंमें श्रेष्ठ योगी और (३) योगवित्तम अर्थात् सम्पूर्ण योगियोंमें श्रेष्ठ योगी। अर्जुनको 'योगवित्' और 'योगवित्त' के विषयमें सन्देह नहीं है, प्रत्युत 'योगवित्तम' के विषयमें सन्देह है।
सम्बन्ध-अर्जुनके सगुण और निर्गुण उपासकोंकी श्रेष्ठता-विषयक प्रश्नके उत्तरमें भगवान् निर्णय देते हैं।
श्रीभगवानुवाच
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः॥ २॥
श्रीभगवान् बोले-
मयि = मुझमें
मन: = मनको
आवेश्य = लगाकर
नित्ययुक्ता: = नित्य-निरन्तर मुझमें लगे हुए
ये = जो भक्त
परया = परम
श्रद्धया = श्रद्धासे
उपेता: = युक्त होकर
माम् = मेरी (सगुण-साकारकी)
उपासते = उपासना करते हैं,
ते = वे
मे = मेरे
मता: = मतमें
युक्ततमा: = सर्वश्रेष्ठ योगी हैं।
व्याख्या-[भगवान्ने ठीक यही निर्णय अर्जुनके बिना पूछे ही छठे अध्यायके सैंतालीसवें श्लोकमें दे दिया था। परन्तु उस विषयमें अपना प्रश्न न होनेके कारण अर्जुन उस निर्णयको पकड़ नहीं पाये। कारण कि स्वयंका प्रश्न न होनेसे सुनी हुई बात भी प्राय: लक्ष्यमें नहीं आती। इसलिये उन्होंने इस अध्यायके पहले श्लोकमें ऐसा प्रश्न किया।
इसी प्रकार अपने मनमें किसी विषयको जाननेकी पूर्ण अभिलाषा और उत्कण्ठाके अभावमें तथा अपना प्रश्न न होनेके कारण सत्संगमें सुनी हुई और शास्त्रोंमें पढ़ी हुई साधन-सम्बन्धी मार्मिक और महत्त्वपूर्ण बातें प्राय: साधकोंके लक्ष्यमें नहीं आतीं। अगर वही बात उनके प्रश्न करनेपर समझायी जाती है, तो वे उसको अपने लिये विशेषरूपसे कही गयी मानकर श्रद्धापूर्वक ग्रहण कर लेते हैं। प्राय: वे सुनी और पढ़ी हुई बातोंको अपने लिये न समझकर उनकी उपेक्षा कर देते हैं, जबकि उनमें उस बातके संस्कार सामान्यरूपसे रहते ही हैं, जो विशेष उत्कण्ठा होनेसे जाग्रत् भी हो सकते हैं। अतः साधकोंको चाहिये कि वे पढ़ें और सुनें, उसको अपने लिये ही मानकर जीवनमें उतारनेकी चेष्टा करें।]
'मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते'-मन वहीं लगता है, जहाँ प्रेम होता है। जिसमें प्रेम होता है, उसका चिन्तन स्वत: होता है।
'नित्ययुक्ता:' का तात्पर्य है कि साधक स्वयं भगवान्में लग जाय। 'भगवान् ही मेरे हैं और मैं भगवान्का ही हूँ'-यही स्वयंका भगवान्में लगना है। स्वयंका दृढ़ उद्देश्य भगवत्प्राप्ति होनेपर ही मन-बुद्धि स्वत: भगवान्में लगते हैं। इसके विपरीत स्वयंका उद्देश्य भगवत्प्राप्ति न हो तो मन-बुद्धिको भगवान्में लगानेका यत्न करनेपर भी वे पूरी तरह भगवान्में नहीं लगते। परन्तु जब स्वयं ही अपने आपको भगवान्का मान ले, तब तो मन-बुद्धि भगवान्में तल्लीन हो ही जाते हैं। स्वयं कर्ता है और मन-बुद्धि करण हैं। करण कर्ताके ही आश्रित रहते हैं। जब कर्ता भगवान्का हो जाय, तब मन-बुद्धिरूप करण स्वत: भगवान्में लगते हैं।
साधकसे भूल यह होती है कि वह स्वयं भगवान्में न लगकर अपने मन-बुद्धिको भगवान्में लगानेका अभ्यास करता है। स्वयं भगवान्में लगे बिना मन-बुद्धिको भगवान्में
श्लोक २ ]
- साधक-संजीवनी *
८०७
लगाना कठिन है। इसीलिये साधकोंकी यह व्यापक शिकायत रहती है कि मन-बुद्धि भगवान्में नहीं लगते। मन-बुद्धि एकाग्र होनेसे सिद्धि (समाधि आदि) तो हो सकती है, पर कल्याण स्वयंके भगवान्में लगनेसे ही होगा। उपासनाका तात्पर्य है—स्वयं-(अपने-आप-) को भगवान्के अर्पित करना कि मैं भगवान्का ही हूँ और भगवान् ही मेरे हैं। स्वयंको भगवान्के अर्पित करनेसे नाम-जप, चिन्तन, ध्यान, सेवा, पूजा आदि तथा शास्त्रविहित क्रियामात्र स्वतः भगवान्के लिये ही होती है।
शरीर प्रकृतिका और जीव परमात्माका अंश है। प्रकृतिके कार्य शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि और अहम्से तादात्म्य, ममता और कामना न करके केवल भगवान्को ही अपना माननेवाला यह कह सकता है कि मैं भगवान्का हूँ, भगवान् मेरे हैं। ऐसा कहने या माननेवाला भगवान्से कोई नया सम्बन्ध नहीं जोड़ता। चेतन और नित्य होनेके कारण जीवका भगवान्से सम्बन्ध स्वतःसिद्ध है। किन्तु उस नित्यसिद्ध वास्तविक सम्बन्धको भूलकर जीवने अपना सम्बन्ध प्रकृति एवं उसके कार्य शरीरसे मान लिया, जो अवास्तविक है। अतः जबतक प्रकृतिसे माना हुआ सम्बन्ध है, तभीतक भगवान्से अपना सम्बन्ध माननेकी आवश्यकता है। प्रकृतिसे माना हुआ सम्बन्ध टूटते ही भगवान्से अपना वास्तविक और नित्यसिद्ध सम्बन्ध प्रकट हो जाता है; उसकी स्मृति प्राप्त हो जाती है—‘नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा ’ (गीता १८।७३)।
जड़ता-(प्रकृति-) के सम्मुख होनेके कारण अर्थात् उससे सुखभोग करते रहनेके कारण जीव शरीरसे ‘मैं’ पनका सम्बन्ध जोड़ लेता है अर्थात् ‘मैं शरीर हूँ’ ऐसा मान लेता है। इस प्रकार शरीरसे माने हुए सम्बन्धके कारण वह वर्ण, आश्रम, जाति, नाम, व्यवसाय तथा बालकपन, जवानी आदि अवस्थाओंको बिना याद किये भी (स्वाभाविक रूपसे) अपनी ही मानता रहता है अर्थात् अपनेको उनसे अलग नहीं मानता।
जीवकी विजातीय शरीर और संसारके साथ (भूलसे की हुई) सम्बन्धकी मान्यता भी इतनी दृढ़ रहती है कि बिना याद किये सदा याद रहती है। अगर वह अपने
सजातीय (चेतन और नित्य) परमात्माके साथ अपने वास्तविक सम्बन्धको पहचान ले, तो किसी भी अवस्थामें परमात्माको नहीं भूल सकता। फिर उठते-बैठते, खाते-पीते, सोते-जागते हर समय प्रत्येक अवस्थामें भगवान्का स्मरण-चिन्तन स्वतः होने लगता है।
जिस साधकका उद्देश्य सांसारिक भोगोंका संग्रह और उनसे सुख लेना नहीं है, प्रत्युत एकमात्र परमात्माको प्राप्त करना ही है, उसके द्वारा भगवान्से अपने सम्बन्धकी पहचान आरम्भ हो गयी—ऐसा मान लेना चाहिये। इस सम्बन्धकी पूर्ण पहचानके बाद साधकमें मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर आदिके द्वारा सांसारिक भोग और उनका संग्रह करनेकी इच्छा बिलकुल नहीं रहती।
वास्तवमें एकमात्र भगवान्का होते हुए जीव जितने अंशमें प्रकृतिसे सुख-भोग प्राप्त करना चाहता है, उतने ही अंशमें उसने इस भगवत्सम्बन्धको दृढ़तापूर्वक नहीं पकड़ा है। उतने अंशमें उसका प्रकृतिके साथ ही सम्बन्ध है। इसलिये साधकको चाहिये कि वह प्रकृतिसे विमुख होकर अपने-आपको केवल भगवान्का ही माने, उन्हींके सम्मुख हो जाय।
‘श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः’ —साधककी श्रद्धा वहीं होगी, जिसे वह सर्वश्रेष्ठ समझेगा। श्रद्धा होनेपर अर्थात् बुद्धि लगनेपर वह अपने द्वारा निश्चित किये हुए सिद्धान्तके अनुसार स्वाभाविक जीवन बनायेगा और अपने सिद्धान्तसे कभी विचलित नहीं होगा।
जहाँ प्रेम होता है, वहाँ मन लगता है और जहाँ श्रद्धा होती है, वहाँ बुद्धि लगती है। प्रेममें प्रेमास्पदके संगकी तथा श्रद्धामें आज्ञापालनकी मुख्यता रहती है।
एकमात्र भगवान्में प्रेम होनेसे भक्तको भगवान्के साथ नित्य-निरन्तर सम्बन्धका अनुभव होता है, कभी वियोगका अनुभव होता ही नहीं। इसीलिये भगवान्के मतमें ऐसे भक्त ही वास्तवमें उत्तम योगवेत्ता हैं।
यहाँ ‘ते मे युक्ततमा मताः’ बहुवचनान्त पदसे जो बात कही गयी है, यही बात छठे अध्यायके सैंतालीसवें श्लोकमें ‘स मे युक्ततमो मतः ’ एकवचनान्त पदसे कही जा चुकी है*।
- ग्यारहवें अध्यायके चौवनवें श्लोकमें भगवान् कह चुके हैं कि अनन्य भक्तिके द्वारा साधक मुझे प्रत्यक्ष देख सकता है, तत्त्वसे जान सकता है और मुझे प्राप्त हो सकता है; परन्तु अठारहवें अध्यायके पचपनवें श्लोकमें भगवान्ने निर्गुण-उपासकोंके लिये अपनेको तत्त्वसे जानने और प्राप्त करनेकी ही बात कही है, दर्शन देनेकी बात नहीं कही। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि सगुण-उपासकोंको भगवान्के दर्शन भी होते हैं। यह उनकी विशेषता है।
८०८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १२ ]
परिशिष्ट भाव—‘स योगी परमो मतः’ (गीता ६।३२), ‘स मे युक्ततमो मतः’ (गीता ६।४७), ‘ते मे युक्ततमा मताः’ (गीता १२।२)—इस प्रकार भगवान्ने जो श्रेष्ठताकी बात कही है, इसका तात्पर्य यह है कि मनुष्य कर्मयोग, ज्ञानयोग आदि किसी भी मार्गसे चले, वास्तवमें श्रेष्ठ वही है, जिसको भक्ति प्राप्त हो गयी है। कर्मयोगी और ज्ञानयोगीको तो अन्तमें भक्ति प्राप्त होती है, पर भक्तियोगी आरम्भसे ही भक्तिमें लगा है (जो कि कर्मयोग तथा ज्ञानयोगका फल है), इसलिये वह सबसे श्रेष्ठ है।
ज्ञान और भक्ति—दोनों ही संसारका दुःख दूर करनेमें समान हैं; परन्तु दोनोंमें ज्ञानकी अपेक्षा भक्तिकी महिमा अधिक है। ज्ञानमें तो अखण्डरसकी प्राप्ति होती है, पर भक्तिमें अनन्तरसकी प्राप्ति होती है। अनन्तरसमें प्रतिक्षण बढ़नेवाला, लहरोंवाला, उछालवाला एक बहुत विलक्षण आनन्द है। जैसे संसारमें किसी वस्तुका ज्ञान होता है कि ‘ये रुपये हैं; यह घड़ी है’ आदि, तो यह ज्ञान केवल अज्ञान (अनज्ञानपने)-को मिटाता है, ऐसे ही तत्त्वज्ञान केवल अज्ञानको मिटाता है। अज्ञान मिटनेसे दुःख, भय, जन्म-मरणरूप बन्धन—ये सब मिट जाते हैं। परन्तु प्रेम (भक्ति) ज्ञानसे भी विलक्षण है। ज्ञान भगवान्तक नहीं पहुँचता, पर प्रेम भगवान्तक पहुँचता है। ज्ञानका अनुभव करनेवाला तो स्वयं होता है, पर प्रेमका अनुभव करनेवाले और ज्ञाता भगवान् होते हैं। भगवान् ज्ञानके भूखे नहीं हैं, प्रत्युत प्रेमके भूखे हैं। मुक्त होनेपर तो ज्ञानयोगी सन्तुष्ट, तृप्त हो जाता है (गीता—तीसरे अध्यायका सत्रहवाँ श्लोक)। पर प्रेम प्राप्त होनेपर भक्त सन्तुष्ट नहीं होता, प्रत्युत उसका आनन्द उत्तरोत्तर बढ़ता रहता है। अतः आखिरी तत्त्व प्रेम है, मुक्ति नहीं। जैसे ‘ये रुपये हैं’—ऐसा ज्ञान हो गया तो अनज्ञानपना मिट गया; परन्तु उनको पानेका लोभ हो जाय कि ‘और मिले, और मिले’ तो उसमें एक विशेष रस आता है। ऐसे ही भक्तिमें एक विशेष रस आता है। तात्पर्य है कि संसारमें जैसे रुपयोंमें आकर्षित करनेकी शक्ति लोभमें ही है, ऐसे ही भगवान्में आकर्षित करनेकी शक्ति प्रेममें ही है, ज्ञानमें नहीं। धनका लोभ तो अधिक पतन करता है, पर प्रेम ज्ञानसे भी अधिक उन्नत करता है। वस्तुके आकर्षणमें जो रस है, वह रस वस्तुमें और वस्तुके ज्ञानमें नहीं है।
विवेकमार्ग (ज्ञानयोग)-में सत् और असत्—दोनोंकी मान्यता साथ-साथ रहनेसे असत्की अति सूक्ष्म सत्ता अर्थात् अति सूक्ष्म अहम् दूरतक साथ रहता है। यह सूक्ष्म अहम् अथवा अहमका संस्कार मुक्त होनेपर भी रहता है। यह सूक्ष्म अहम् जन्म-मरण देनेवाला तो नहीं होता, पर यह ईश्वरसे अभिन्न होनेमें बाधक होता है। इसलिये विवेकमार्गमें ज्ञानियोंकी अथवा दार्शनिकोंकी मुक्ति तो हो सकती है, पर ईश्वरके साथ अभिन्नता अर्थात् प्रेम हो जाय—यह नियम नहीं है। इस सूक्ष्म अहमुके कारण ही दार्शनिकोंमें और उनके दर्शनोंमें परस्पर मतभेद रहता है। परन्तु विश्वासमार्ग (भक्तियोग)-में आरम्भसे ही भक्त एक ईश्वरके सिवाय और किसीकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं मानता। इसलिये वह ईश्वरके साथ अभिन्न हो जाता है। ईश्वरके साथ अभिन्न होनेपर अर्थात् प्रेमका उदय होनेपर सूक्ष्म अहम् तथा उससे पैदा होनेवाले सम्पूर्ण दार्शनिक मतभेद सर्वथा मिट जाते हैं। अर्थात् द्वैत, अद्वैत, द्वैताद्वैत, विशिष्टाद्वैत आदि जितने भी मतभेद हैं, वे सब वासुदेवरूप हो जाते हैं, जो कि वास्तवमें है। इसलिये ‘वासुदेवः सर्वम्’ का अनुभव करनेवाले प्रेमी भक्तके हृदयमें किसी एक मतका आग्रह नहीं रहता, प्रत्युत सबका समान आदर रहता है। किसी एक मतका आग्रह न होनेसे उसके द्वारा किसीका भी कभी अनादर नहीं होता। तात्पर्य यह हुआ कि ज्ञानकी एकतासे प्रेमकी एकता श्रेष्ठ है। ज्ञानमें परमात्मासे दूरी और भेद तो मिट जाते हैं, पर अभिन्नता (मिलन) नहीं होती। परन्तु प्रेममें दूरी, भेद और भिन्नता—तीनों ही मिट जाते हैं। इसलिये वास्तविक अद्वैत प्रेममें ही है। प्रेममें इतनी शक्ति है कि इसमें भक्त भगवान्का भी इष्ट हो जाता है। ज्ञानमार्गवाले मुक्तिको सबसे ऊँची चीज मानते हैं, फिर वे मुक्तिके भी आगेकी चीज प्रेम (प्रेमाभक्ति या पराभक्ति) को कैसे समझें? मुक्तियोंमें तो अखण्ड रस है, पर प्रेममें अनन्त (प्रतिक्षण वर्धमान) रस है। प्रेम मुक्ति, तत्त्वज्ञान, स्वरूप-बोध, आत्मसाक्षात्कार, कैवल्यसे भी आगेकी चीज है१!
भगवान्ने छठे अध्यायके सैतालीसवें श्लोकमें अपने सगुणरूपमें श्रद्धा-प्रेम रखनेवाले साधकको सम्पूर्ण योगियोंमें श्रेष्ठ बताया है। तात्पर्य यह है कि भगवान्को अपना मानकर उनके परायण रहनेवाला साधक ही भगवान्को विशेष प्रिय है।
१-प्रेम भगति जल बिनु रघुराई। अभिअंतर मल कबहुँ न जाई॥ (मानस, उत्तर० ४९।३)
२-द्वैतं मोहाय बोधात्प्रागजाते बोधे मनीषया। भक्त्यर्थं कल्पितं (स्वीकृतं) द्वैतमद्वैतादपि सुन्दरम्॥ (बोधसार, भक्ति० ४२)
श्लोक ३-४ ]
- साधक-संजीवनी *
८०९
कर्मयोग और ज्ञानयोग—ये दोनों लौकिक निष्ठाएँ हैं; (गीता—तीसरे अध्यायका तीसरा श्लोक) परन्तु भक्तियोग लौकिक निष्ठा अर्थात् प्राणीकी निष्ठा नहीं है। जो भगवान्में लग जाता है, वह भगवन्निष्ठ होता है अर्थात् उसकी निष्ठा अलौकिक होती है। उसके साधन और साध्य—दोनों भगवान् ही होते हैं। इसलिये भक्तियोग साधन भी है और साध्य भी, तभी कहा है—‘भक्त्या संजातया भक्त्या ’ (श्रीमद्भ्ग० ११।३।३१) अर्थात् भक्तिसे भक्ति पैदा होती है। श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन—यह नौ प्रकारकी ‘साधन भक्ति’ है* और इससे आगे प्रेमलक्षणा भक्ति ‘साध्य भक्ति’ है, जो कर्मयोग और ज्ञानयोग सबकी साध्य है (गीता—अठारहवें अध्यायका चौवनवाँ श्लोक)। यह साध्य भक्ति ही सर्वोपरि प्रापणीय तत्त्व है।
ज्ञानयोगमें साधक सत्-असत्के विवेकको महत्त्व देकर असत्का त्याग करता है। असत्का त्याग करनेसे त्यागीकी और त्याज्य वस्तुकी सत्ता भावरूपसे बहुत दूरतक साथ रहती है, इसलिये ज्ञानयोगमें असत्का सर्वथा त्याग बहुत देरीसे होता है। कर्मयोगमें साधक असत् वस्तुओंको त्याज्य न मानकर सेवा-सामग्री मानता है। त्याग करनेमें निकृष्ट वस्तु तो सुगमतासे छूटती है, पर अच्छी वस्तुको छोड़ना कठिन होता है। अतः अच्छी वस्तुका त्याग करनेकी अपेक्षा उसको दूसरेकी सेवामें लगाना सुगम पड़ता है। निष्कामभावपूर्वक दूसरोंकी सेवामें लगानेसे असत्का त्याग सुगमतासे और जल्दी हो जाता है। भक्तियोगमें जगत्को भगवान्का अथवा भगवत्स्वरूप माननेसे जगत् (असत्) बहुत शीघ्र लुप्त हो जाता है और भगवान् रह जाते हैं। इस प्रकार ज्ञानयोगकी अपेक्षा कर्मयोगमें असत् (जड़ता)—का शीघ्र त्याग होता है और कर्मयोगकी अपेक्षा भक्तियोगमें असत्का शीघ्र त्याग होता है; क्योंकि भक्तिमें असत् रहता ही नहीं—‘सदसच्चाहम् ’ (गीता ९।१९)। अतः ज्ञानयोगसे कर्मयोग श्रेष्ठ है—‘तयोस्तु कर्मसन्त्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ’ (गीता ५।२) और कर्मयोगसे भक्तियोग श्रेष्ठ है—‘योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना। श्रद्धावाभजते यो मां स मे युक्ततमो मतः। ’ (गीता ६।४७)।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने सगुण-उपासकोंको सर्वश्रेष्ठ योगी बताया। इसपर यह प्रश्न हो सकता है कि क्या निर्गुण-उपासक सर्वश्रेष्ठ योगी नहीं हैं? इसके उत्तरमें भगवान् कहते हैं।
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते। सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥ ३ ॥ सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः। ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥ ४ ॥
| तु | = और | कूटस्थम् | = निर्विकार, | सर्वभूतहिते | = प्राणिमात्रके |
|---|---|---|---|---|---|
| ये | = जो (अपने) | अचलम् | = अचल, | हितमें | |
| इन्द्रियग्रामम् | = इन्द्रिय-समूहको | ध्रुवम् | = ध्रुव, | रताः | = प्रीति रखनेवाले |
| सन्नियम्य | = भलीभाँति वशमें | ||||
| करके | अक्षरम् | = अक्षर | (और) | ||
| अचिन्त्यम् | = चिन्तनमें न आनेवाले, | च | = और | सर्वत्र | = सब जगह |
| सर्वत्रगम् | = सब जगह परिपूर्ण, | अव्यक्तम् | = अव्यक्तकी | समबुद्धयः | = समबुद्धिवाले मनुष्य |
| अनिर्देश्यम् | = देखनेमें न | ||||
| आनेवाले, | पर्युपासते | = तत्परतासे | |||
| उपासना करते हैं, | माम् | = मुझे | |||
| ते | = वे | एव | = ही | ||
| प्राप्नुवन्ति | = प्राप्त होते हैं। |
‘बोधसे पहलेका द्वैत मोहमें डालता है, पर बोध हो जानेपर भक्तिके लिये स्वीकृत द्वैत-अद्वैतसे भी अधिक सुन्दर होता है।’
- श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्। अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥
(श्रीमद्भ्ग० ७।५।२३)
८१०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १२ ]
व्याख्या—‘तु’— यहाँ ‘तु’ पद साकार-उपासकोंसे निराकार-उपासकोंको भिन्नता दिखानेके लिये आया है।
‘सन्वियन्नेन्द्रियग्रामम्’—‘सम्’ और ‘नि’— दो उपसर्गोंसे युक्त ‘सन्वियम्’ पद देकर भगवान्ने यह बताया है कि सभी इन्द्रियोंको सम्यक् प्रकारसे एवं पूर्णतः वशमें करे, जिससे वे किसी अन्य विषयमें न जायँ। इन्द्रियाँ अच्छी प्रकारसे पूर्णतः वशमें न होनेपर निर्गुण-तत्त्वकी उपासनमें कठिन्ता होती है। सगुण-उपासनमें तो ध्यानका विषय सगुण भगवान् होनेसे इन्द्रियाँ भगवान्में लग सकती हैं; क्योंकि भगवान्के सगुण स्वरूपमें इन्द्रियोंको अपने विषय प्राप्त हो जाते हैं। अतः सगुण-उपासनमें इन्द्रिय-संयमकी आवश्यकता होते हुए भी इसकी उतनी अधिक आवश्यकता नहीं है, जितनी निर्गुण-उपासनमें है। निर्गुण-उपासनमें चिन्तनका कोई आधार न रहनेसे इन्द्रियोंका सम्यक् संयम हुए बिना (आसक्ति रहनेपर) विषयोंमें मन जा सकता है और विषयोंका चिन्तन होनेसे पतन होनेकी अधिक सम्भावना रहती है (गीता—दूसरे अध्यायका बासठवाँ-तिरसठवाँ श्लोक)। अतः निर्गुणोपासकके लिये सभी इन्द्रियोंको विषयोंसे हटाते हुए सम्यक् प्रकारसे पूर्णतः वशमें करना आवश्यक है। इन्द्रियोंको केवल बाहरसे ही वशमें नहीं करना है, प्रत्युत विषयोंके प्रति साधकके अन्तःकरणमें भी राग नहीं रहना चाहिये; क्योंकि जबतक विषयोंमें राग है, तबतक ब्रह्मकी प्राप्ति कठिन है (गीता—पन्द्रहवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)।
गीतामें इन्द्रियोंको वशमें करनेकी बात विशेषरूपसे जितनी निर्गुणोपासना तथा कर्मयोगमें आयी है, उतनी सगुणोपासनमें नहीं।
‘अचिन्त्यम्’— मन-बुद्धिका विषय न होनेके कारण ‘अचिन्त्यम्’ पद निर्गुण-निराकार ब्रह्मका वाचक है; क्योंकि मन-बुद्धि प्रकृतिका कार्य होनेसे सम्पूर्ण प्रकृतिको भी अपना विषय नहीं बना सकते, फिर प्रकृतिसे अतीत परमात्मा इनका विषय बन ही कैसे सकता है!
प्राकृतिक पदार्थमात्र चिन्त्य है और परमात्मा प्रकृतिसे अतीत होनेके कारण सम्पूर्ण चिन्त्य पदार्थोंसे भी अतीत, विलक्षण हैं। प्रकृतिकी सहायताके बिना उनका चिन्तन, वर्णन नहीं किया जा सकता। अतः परमात्माको स्वयं- (करण-निरपेक्ष ज्ञान-) से ही जाना जा सकता है; प्रकृतिके कार्य मन-बुद्धि आदि (करण-सापेक्ष ज्ञान)-से नहीं।
‘सर्वत्रगम्’— सब देश, काल, वस्तु और व्यक्तियोंमें परिपूर्ण होनेसे ब्रह्म ‘सर्वत्रगम्’ है। सर्वव्यापी होनेके कारण
वह सीमित मन-बुद्धि-इन्द्रियोंसे ग्रहण नहीं किया जा सकता।
‘अनिर्देश्यम्’— जिसे इदंतासे नहीं बताया जा सकता अर्थात् जो भाषा, वाणी आदिका विषय नहीं है, वह ‘अनिर्देश्यम्’ है। निर्देश (संकेत) उसीका किया जा सकता है, जो जाति, गुण, क्रिया एवं सम्बन्धसे युक्त हो और देश, काल, वस्तु एवं व्यक्तिसे परिच्छिन्न हो; परन्तु जो चिन्मय तत्त्व सर्वत्र परिपूर्ण हो, उसका संकेत जड़ भाषा, वाणीसे कैसे किया जा सकता है?
‘कूटस्थम्’— यह पद निर्विकार, सदा एकरस रहने-वाले सच्चिदानन्दधन ब्रह्मका वाचक है। सभी देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदिमें रहते हुए भी वह तत्त्व सदा निर्विकार और निलिप्त रहता है। उसमें कभी किंचिन्मात्र भी कोई परिवर्तन नहीं होता। इसलिये वह ‘कूटस्थ’ है। कूट- (अहरन-) में तरह-तरहके गहने, अस्त्र, औजार आदि पदार्थ गढ़े जाते हैं, पर वह ज्यों-का-त्यों रहता है। इसी प्रकार संसारके भिन्न-भिन्न प्राणी-पदार्थोंकी उत्पत्ति, स्थिति और विनाश होनेपर भी परमात्मा सदा ज्यों-के-त्यों रहते हैं।
‘अचलम्’— यह पद आने-जानेको क्रियासे सर्वथा रहित ब्रह्मका वाचक है। प्रकृति चल है और ब्रह्म अचल है।
‘ध्रुवम्’— जिसकी सत्ता निश्चित (सत्य) और नित्य है, उसको ‘ध्रुव’ कहते हैं। सच्चिदानन्दधन ब्रह्म सत्तरूपसे सर्वत्र विद्यमान रहनेसे ‘ध्रुवम्’ है।
निर्गुण ब्रह्मके आठों विशेषणोंमें सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषण ‘ध्रुवम्’ है। ब्रह्मके लिये अनिर्देश्य, अचिन्त्य आदि निषेधात्मक विशेषण देनेसे कोई ऐसा न समझ ले कि वह है ही नहीं, इसलिये यहाँ ‘ध्रुवम्’ विशेषण देकर उस तत्त्वकी निश्चित सत्ता बताया गयी है। उस तत्त्वका कभी कहीं किंचिन्मात्र भी अभाव नहीं होता। उसकी सत्तासे ही असत्- (संसार-) को सत्ता मिल रही है—‘जासु सत्यता तं जडं माया । भास सत्य इव मोह सहाया ॥ (मानस १।१९७।४)।
‘अक्षरम्’— जिसका कभी क्षरण अर्थात् विनाश नहीं होता तथा जिसमें कभी कोई कमी नहीं आती, वह सच्चिदानन्दधन ब्रह्म ‘अक्षरम्’ है।
‘अव्यक्तम्’— जो व्यक्त न हो अर्थात् मन-बुद्धि-इन्द्रियोंका विषय न हो और जिसका कोई रूप या आकार न हो, उसको ‘अव्यक्तम्’ कहा गया है।
‘पर्युपासते’— यह पद यहाँ निर्गुण-उपासकोंकी सम्यक् उपासनाका बोधक है। शरीरसहित सम्पूर्ण पदार्थ