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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ११ ]

तरहके दृश्य हैं, ऐसे ही यह संसार भी उस विराट्‌रूपका ही एक अंग है और इसमें अनेक नाम, रूप, आकृति आदिके रूपमें परमात्मा-ही-परमात्मा परिपूर्ण हैं। इस दृष्टिसे सबको परमात्मस्वरूप देखे। इसके लिये भगवान्‌ने ग्यारहवाँ अध्याय कहा है।

अर्जुनने भी इन दोनों दृष्टियोंके लिये दो बार प्रार्थना की है। दसवें अध्यायके सत्रहवें श्लोकमें अर्जुनने कहा कि 'हे भगवन्! मैं किन-किन भावोंमें आपका चिन्तन करूँ?' तो भगवान्‌ने चिन्तनशक्तिको लगानेके लिये अपनी विभूतियोंका

परिशिष्ट भाव —जिस भक्तिसे भगवान्‌ चतुर्भुजरूपसे देखे जा सकते हैं, उस भक्तिका स्वरूप बताते हैं कि मनुष्य संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करके सर्वथा मेरे परायण हो जाय। 'मत्कर्मकृत'—यह स्थूलशरीरसे भगवान्‌के परायण होना है, 'मत्परमः'—यह सूक्ष्म तथा कारणशरीरसे भगवान्‌के परायण होना है, और 'मद्भक्तः'— यह स्वयंसे भगवान्‌के परायण होना है; क्योंकि 'मैं भगवान्‌का हूँ और भगवान्‌ मेरे हैं'—यह स्वयंकी स्वीकृति है।

'स मामेति' पदोंसे समग्रकी प्राप्ति बतायी गयी है।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूर्पनिषत्तु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विश्वरूपदर्शनयोगो नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ इस प्रकार ॐ, तत्, सत्—इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्‌रूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें 'विश्वरूपदर्शनयोग' नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११ ॥

अर्जुनने भगवान्‌से दिव्यदृष्टि प्राप्त करके भगवान्‌के जिस विश्वरूपके दर्शन किये थे, उसके वर्णनको पद्-सुनकर भगवान्‌के प्रभावको मान लेनेसे भगवान्‌के साथ योग-(सम्बन्ध-) का अनुभव हो जाता है। अतः ग्यारहवें अध्यायका नाम 'विश्वरूपदर्शनयोग' है।

ग्यारहवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच

(१) इस अध्यायमें 'अथैकादशोऽध्यायः' के तीन, 'अर्जुन उवाच' आदि पदोंके बाईस, श्लोकोंके आठ सौ इक्यावन और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदोंका योग आठ सौ नवासी है।

(२) 'अथैकादशोऽध्यायः' के सात, 'अर्जुन उवाच' आदि पदोंके सत्तर, श्लोकोंके दो हजार एक सौ तिरानवे और पुष्पिकाके पचास अक्षर हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण अक्षरोंका योग दो हजार तीन सौ बीस है। इस अध्यायके पचपन श्लोकोंमेंसे पहला श्लोक तैंतीस अक्षरोंका और पंद्रहवेंसे पचासवें श्लोकतकके छत्तीस श्लोक चौवालीस अक्षरोंके हैं। शेष अठारह श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं।

(३) इस अध्यायमें ग्यारह 'उवाच' हैं—चार 'अर्जुन उवाच', चार 'श्रीभगवानुवाच' और तीन 'संजय

वर्णन किया। ग्यारहवें अध्यायके आरम्भमें अर्जुनने कहा कि 'मैं आपके रूपको देखना चाहता हूँ' तो भगवान्‌ने अपना विश्वरूप दिखाया और उसको देखनेके लिये अर्जुनको दिव्यचक्षु दिये।

तात्पर्य यह हुआ कि साधकको अपनी चिन्तन और दर्शन-शक्तिको भगवान्‌के सिवाय दूसरी किसी भी जगह खर्च नहीं करनी चाहिये अर्थात् साधक चिन्तन करे तो परमात्माका ही चिन्तन करे और जिस किसीको देखे तो उसको परमात्मस्वरूप ही देखे।

उवाच।

ग्यारहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द

इस अध्यायमें पचपन श्लोक हैं। उनमें उन्नीस श्लोक 'अनुष्टुप्' छन्दके, तीन श्लोक 'उपेन्द्रवज्रा' छन्दके और तैंतीस श्लोक 'उपजाति' छन्दके हैं।

'अनुष्टुप्' छन्दवाले उन्नीस श्लोकोंमेंसे—पहले और पचपनवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'भगण' प्रयुक्त होनेसे 'भ-विपुला'; ग्यारहवें और तिरपनवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'नगण' प्रयुक्त होनेसे 'न-विपुला'; और दसवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'नगण' तथा तृतीय चरणमें 'भगण' प्रयुक्त होनेसे 'संकीर्ण-विपुला' छन्दवाले श्लोक हैं। शेष चौदह (दूसरेसे नवेंतक, बारहवेंसे चौदहवेंतक, इक्यावनवाँ, बावनवाँ और चौवनवाँ) श्लोक ठीक 'पध्यावक्त्र' अनुष्टुप् छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।

शेष छत्तीस श्लोकोंमेंसे—अट्ठाईसवाँ, उन्तीसवाँ और पैतालिसवाँ श्लोक 'उपेन्द्रवज्रा' तथा शेष तैंतीस (पन्द्रहवेंसे सत्ताईसवेंतक, तीसवेंसे चौवालीसवेंतक और छियालीसवेंसे पचासवेंतक) श्लोक ठीक 'उपजाति' छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।