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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 802

श्लोक ५५ ]

  • साधक-संजीवनी *

८०९

दी हुई है और भगवान्की ही है, तथा वह स्वयं भी भगवान्का ही है। वह तो केवल भगवान्की प्रसन्नताके लिये, भगवान्की आज्ञाके अनुसार, भगवान्की दी हुई शक्तिसे निमित्तमात्र बनकर कार्य करता है। यही उसका 'मत्कर्मकृत' होना है।

'मत्परमः'—जो मेरेको ही परमोत्कृष्ट समझकर केवल मेरे ही परायण रहता है अर्थात् जिसका परम प्रापणीय, परम ध्येय, परम आश्रय केवल मैं ही हूँ, ऐसा भक्त 'मत्परमः' है।

'मद्भक्तः'—जो केवल मेरा ही भक्त है अर्थात् जिसने मेरे साथ अटल सम्बन्ध जोड़ लिया है कि 'मैं केवल भगवान्का ही हूँ और केवल भगवान् ही मेरे हैं, तथा मैं अन्य किसीका भी नहीं हूँ और अन्य कोई भी मेरा नहीं है।' ऐसा होनेसे भगवान्में अतिशय प्रेम हो जाता है; क्योंकि जो अपना होता है, वह स्वतः प्रिय लगता है। प्रेमकी जागृतिमें अपनापन ही मुख्य है।

वह भक्त सब देशमें, सब कालमें, सम्पूर्ण वस्तु-व्यक्तियोंमें और अपने-आपमें सदा-सर्वदा प्रभुको ही परिपूर्ण देखता है। इस दृष्टिसे प्रभु सब देशमें होनेसे यहाँ भी हैं, सब कालमें होनेसे अभी भी हैं, सम्पूर्ण वस्तु-व्यक्तियोंमें होनेसे मेरेमें भी हैं और सबके होनेसे मेरे भी हैं—ऐसा भाव रखनेवाला ही 'मद्भक्तः' है।

'संगवर्जितः निर्वरः सर्वभूतेषु यः'—केवल भगवान्के लिये ही कर्म करनेसे, केवल भगवान्के ही परायण रहनेसे और केवल भगवान्का ही भक्त बननेसे क्या होता है? इसका उपर्युक्त पदोंसे वर्णन करते हैं कि वह 'संगवर्जितः' हो जाता है अर्थात् उसकी संसारमें आसक्ति, ममता और कामना नहीं रहती। आसक्ति, ममता और कामनासे ही संसारके साथ सम्बन्ध होता है। भगवान्में अनन्य प्रेम होते ही आसक्ति आदिका अत्यन्त अभाव हो जाता है।

दूसरी बात, जब भक्तको 'मैं भगवान्का ही अंश हूँ'—इस वास्तविकताका अनुभव हो जाता है, तब उसका भगवान्में प्रेम जाग्रत् हो जाता है। प्रेम जाग्रत् होनेपर रागका अत्यन्त अभाव हो जाता है। रागका अत्यन्त अभाव होनेसे और सर्वत्र भगवद्भाव होनेसे उसके शरीरके साथ कोई कितना ही दुर्व्यवहार करे, उसको मारे-पीटे, उसका अनिष्ट करे, तो भी उसके हृदयमें अनिष्ट करनेवालेके प्रति किञ्चिन्मात्र भी वैरभाव उत्पन्न नहीं होता। वह उसमें

भगवान्की ही मरजी, कृपा मानता है। ऐसे भक्तको भगवान्ने 'निर्वरः सर्वभूतेषु' कहा है।

'संगवर्जितः' और 'निर्वरः सर्वभूतेषु'—इन दोनोंका वर्णन करनेका तात्पर्य 'उसका संसारसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है' यह बतानेमें है। संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर स्वतःसिद्ध परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है।

'स मामेति'—ऐसा वह मेरा भक्त मेरेको ही प्राप्त हो जाता है। 'स मामेति' में तत्त्वसे जानना, दर्शन करना और प्राप्त होना—ये तीनों ही बातें आ जाती हैं, जो कि पीछेके (चौवनवें) श्लोकमें बतायी गयी हैं। तात्पर्य है कि जिस उद्देश्यसे मनुष्यजन्म हुआ है, वह उद्देश्य सर्वथा पूर्ण हो जाता है।

विशेष बात

श्रीभगवान्ने नवें अध्यायके अन्तमें कहा था—

ममना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।

मामेवेच्छसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः॥

(९।३४)

ऐसा कहनेपर भी भगवान्के मनमें यह बात रह गयी कि मैं अपने रहस्यकी सब बात किस तरहसे, किस रीतिसे समझाऊँ? इसीको समझानेके लिये भगवान्ने दसवाँ और ग्यारहवाँ अध्याय कहा है।

जीवने उत्पत्ति-विनाशशील और नित्य परिवर्तनशील प्रकृति और प्रकृतिके कार्य शरीर-संसारका सहारा ले रखा है, जिससे यह अविनाशी और नित्य अपरिवर्तनशील भगवान्से विमुख हो रहा है। इस विमुखताको मिटाकर जीवको भगवान्के सममुख करनेमें ही इन दोनों—दसवें और ग्यारहवें अध्यायका तात्पर्य है।

इस मनुष्यके पास दो शक्तियाँ हैं—चिन्तन करनेकी और देखनेकी। इनमेंसे जो चिन्तन करनेकी शक्ति है, उसको भगवान्की विभूतियोंमें लगाना चाहिये। तात्पर्य है कि जिस किसी वस्तु, व्यक्ति आदिमें जो कुछ विशेषता, महत्ता, विलक्षणता, अलौकिकता दीखे और उसमें मन चला जाय, उस विशेषता आदिको भगवान्की ही मानकर वहाँ भगवान्का ही चिन्तन होना चाहिये। इसके लिये भगवान्ने दसवाँ अध्याय कहा है।

दूसरी जो देखनेकी शक्ति है, उसको भगवान्में लगाना चाहिये। तात्पर्य है कि जैसे भगवान्के दिव्य अविनाशी विराट्रूपमें अनेक रूप हैं, अनेक आकृतियाँ हैं, अनेक