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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

श्लोक ५५ ]

  • साधक-संजीवनी *

८०९

दी हुई है और भगवान्की ही है, तथा वह स्वयं भी भगवान्का ही है। वह तो केवल भगवान्की प्रसन्नताके लिये, भगवान्की आज्ञाके अनुसार, भगवान्की दी हुई शक्तिसे निमित्तमात्र बनकर कार्य करता है। यही उसका 'मत्कर्मकृत' होना है।

'मत्परमः'—जो मेरेको ही परमोत्कृष्ट समझकर केवल मेरे ही परायण रहता है अर्थात् जिसका परम प्रापणीय, परम ध्येय, परम आश्रय केवल मैं ही हूँ, ऐसा भक्त 'मत्परमः' है।

'मद्भक्तः'—जो केवल मेरा ही भक्त है अर्थात् जिसने मेरे साथ अटल सम्बन्ध जोड़ लिया है कि 'मैं केवल भगवान्का ही हूँ और केवल भगवान् ही मेरे हैं, तथा मैं अन्य किसीका भी नहीं हूँ और अन्य कोई भी मेरा नहीं है।' ऐसा होनेसे भगवान्में अतिशय प्रेम हो जाता है; क्योंकि जो अपना होता है, वह स्वतः प्रिय लगता है। प्रेमकी जागृतिमें अपनापन ही मुख्य है।

वह भक्त सब देशमें, सब कालमें, सम्पूर्ण वस्तु-व्यक्तियोंमें और अपने-आपमें सदा-सर्वदा प्रभुको ही परिपूर्ण देखता है। इस दृष्टिसे प्रभु सब देशमें होनेसे यहाँ भी हैं, सब कालमें होनेसे अभी भी हैं, सम्पूर्ण वस्तु-व्यक्तियोंमें होनेसे मेरेमें भी हैं और सबके होनेसे मेरे भी हैं—ऐसा भाव रखनेवाला ही 'मद्भक्तः' है।

'संगवर्जितः निर्वरः सर्वभूतेषु यः'—केवल भगवान्के लिये ही कर्म करनेसे, केवल भगवान्के ही परायण रहनेसे और केवल भगवान्का ही भक्त बननेसे क्या होता है? इसका उपर्युक्त पदोंसे वर्णन करते हैं कि वह 'संगवर्जितः' हो जाता है अर्थात् उसकी संसारमें आसक्ति, ममता और कामना नहीं रहती। आसक्ति, ममता और कामनासे ही संसारके साथ सम्बन्ध होता है। भगवान्में अनन्य प्रेम होते ही आसक्ति आदिका अत्यन्त अभाव हो जाता है।

दूसरी बात, जब भक्तको 'मैं भगवान्का ही अंश हूँ'—इस वास्तविकताका अनुभव हो जाता है, तब उसका भगवान्में प्रेम जाग्रत् हो जाता है। प्रेम जाग्रत् होनेपर रागका अत्यन्त अभाव हो जाता है। रागका अत्यन्त अभाव होनेसे और सर्वत्र भगवद्भाव होनेसे उसके शरीरके साथ कोई कितना ही दुर्व्यवहार करे, उसको मारे-पीटे, उसका अनिष्ट करे, तो भी उसके हृदयमें अनिष्ट करनेवालेके प्रति किञ्चिन्मात्र भी वैरभाव उत्पन्न नहीं होता। वह उसमें

भगवान्की ही मरजी, कृपा मानता है। ऐसे भक्तको भगवान्ने 'निर्वरः सर्वभूतेषु' कहा है।

'संगवर्जितः' और 'निर्वरः सर्वभूतेषु'—इन दोनोंका वर्णन करनेका तात्पर्य 'उसका संसारसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है' यह बतानेमें है। संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर स्वतःसिद्ध परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है।

'स मामेति'—ऐसा वह मेरा भक्त मेरेको ही प्राप्त हो जाता है। 'स मामेति' में तत्त्वसे जानना, दर्शन करना और प्राप्त होना—ये तीनों ही बातें आ जाती हैं, जो कि पीछेके (चौवनवें) श्लोकमें बतायी गयी हैं। तात्पर्य है कि जिस उद्देश्यसे मनुष्यजन्म हुआ है, वह उद्देश्य सर्वथा पूर्ण हो जाता है।

विशेष बात

श्रीभगवान्ने नवें अध्यायके अन्तमें कहा था—

ममना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।

मामेवेच्छसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः॥

(९।३४)

ऐसा कहनेपर भी भगवान्के मनमें यह बात रह गयी कि मैं अपने रहस्यकी सब बात किस तरहसे, किस रीतिसे समझाऊँ? इसीको समझानेके लिये भगवान्ने दसवाँ और ग्यारहवाँ अध्याय कहा है।

जीवने उत्पत्ति-विनाशशील और नित्य परिवर्तनशील प्रकृति और प्रकृतिके कार्य शरीर-संसारका सहारा ले रखा है, जिससे यह अविनाशी और नित्य अपरिवर्तनशील भगवान्से विमुख हो रहा है। इस विमुखताको मिटाकर जीवको भगवान्के सममुख करनेमें ही इन दोनों—दसवें और ग्यारहवें अध्यायका तात्पर्य है।

इस मनुष्यके पास दो शक्तियाँ हैं—चिन्तन करनेकी और देखनेकी। इनमेंसे जो चिन्तन करनेकी शक्ति है, उसको भगवान्की विभूतियोंमें लगाना चाहिये। तात्पर्य है कि जिस किसी वस्तु, व्यक्ति आदिमें जो कुछ विशेषता, महत्ता, विलक्षणता, अलौकिकता दीखे और उसमें मन चला जाय, उस विशेषता आदिको भगवान्की ही मानकर वहाँ भगवान्का ही चिन्तन होना चाहिये। इसके लिये भगवान्ने दसवाँ अध्याय कहा है।

दूसरी जो देखनेकी शक्ति है, उसको भगवान्में लगाना चाहिये। तात्पर्य है कि जैसे भगवान्के दिव्य अविनाशी विराट्रूपमें अनेक रूप हैं, अनेक आकृतियाँ हैं, अनेक

८०२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ११ ]

तरहके दृश्य हैं, ऐसे ही यह संसार भी उस विराट्‌रूपका ही एक अंग है और इसमें अनेक नाम, रूप, आकृति आदिके रूपमें परमात्मा-ही-परमात्मा परिपूर्ण हैं। इस दृष्टिसे सबको परमात्मस्वरूप देखे। इसके लिये भगवान्‌ने ग्यारहवाँ अध्याय कहा है।

अर्जुनने भी इन दोनों दृष्टियोंके लिये दो बार प्रार्थना की है। दसवें अध्यायके सत्रहवें श्लोकमें अर्जुनने कहा कि 'हे भगवन्! मैं किन-किन भावोंमें आपका चिन्तन करूँ?' तो भगवान्‌ने चिन्तनशक्तिको लगानेके लिये अपनी विभूतियोंका

परिशिष्ट भाव —जिस भक्तिसे भगवान्‌ चतुर्भुजरूपसे देखे जा सकते हैं, उस भक्तिका स्वरूप बताते हैं कि मनुष्य संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करके सर्वथा मेरे परायण हो जाय। 'मत्कर्मकृत'—यह स्थूलशरीरसे भगवान्‌के परायण होना है, 'मत्परमः'—यह सूक्ष्म तथा कारणशरीरसे भगवान्‌के परायण होना है, और 'मद्भक्तः'— यह स्वयंसे भगवान्‌के परायण होना है; क्योंकि 'मैं भगवान्‌का हूँ और भगवान्‌ मेरे हैं'—यह स्वयंकी स्वीकृति है।

'स मामेति' पदोंसे समग्रकी प्राप्ति बतायी गयी है।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूर्पनिषत्तु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विश्वरूपदर्शनयोगो नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ इस प्रकार ॐ, तत्, सत्—इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्‌रूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें 'विश्वरूपदर्शनयोग' नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११ ॥

अर्जुनने भगवान्‌से दिव्यदृष्टि प्राप्त करके भगवान्‌के जिस विश्वरूपके दर्शन किये थे, उसके वर्णनको पद्-सुनकर भगवान्‌के प्रभावको मान लेनेसे भगवान्‌के साथ योग-(सम्बन्ध-) का अनुभव हो जाता है। अतः ग्यारहवें अध्यायका नाम 'विश्वरूपदर्शनयोग' है।

ग्यारहवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच

(१) इस अध्यायमें 'अथैकादशोऽध्यायः' के तीन, 'अर्जुन उवाच' आदि पदोंके बाईस, श्लोकोंके आठ सौ इक्यावन और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदोंका योग आठ सौ नवासी है।

(२) 'अथैकादशोऽध्यायः' के सात, 'अर्जुन उवाच' आदि पदोंके सत्तर, श्लोकोंके दो हजार एक सौ तिरानवे और पुष्पिकाके पचास अक्षर हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण अक्षरोंका योग दो हजार तीन सौ बीस है। इस अध्यायके पचपन श्लोकोंमेंसे पहला श्लोक तैंतीस अक्षरोंका और पंद्रहवेंसे पचासवें श्लोकतकके छत्तीस श्लोक चौवालीस अक्षरोंके हैं। शेष अठारह श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं।

(३) इस अध्यायमें ग्यारह 'उवाच' हैं—चार 'अर्जुन उवाच', चार 'श्रीभगवानुवाच' और तीन 'संजय

वर्णन किया। ग्यारहवें अध्यायके आरम्भमें अर्जुनने कहा कि 'मैं आपके रूपको देखना चाहता हूँ' तो भगवान्‌ने अपना विश्वरूप दिखाया और उसको देखनेके लिये अर्जुनको दिव्यचक्षु दिये।

तात्पर्य यह हुआ कि साधकको अपनी चिन्तन और दर्शन-शक्तिको भगवान्‌के सिवाय दूसरी किसी भी जगह खर्च नहीं करनी चाहिये अर्थात् साधक चिन्तन करे तो परमात्माका ही चिन्तन करे और जिस किसीको देखे तो उसको परमात्मस्वरूप ही देखे।

उवाच।

ग्यारहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द

इस अध्यायमें पचपन श्लोक हैं। उनमें उन्नीस श्लोक 'अनुष्टुप्' छन्दके, तीन श्लोक 'उपेन्द्रवज्रा' छन्दके और तैंतीस श्लोक 'उपजाति' छन्दके हैं।

'अनुष्टुप्' छन्दवाले उन्नीस श्लोकोंमेंसे—पहले और पचपनवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'भगण' प्रयुक्त होनेसे 'भ-विपुला'; ग्यारहवें और तिरपनवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'नगण' प्रयुक्त होनेसे 'न-विपुला'; और दसवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'नगण' तथा तृतीय चरणमें 'भगण' प्रयुक्त होनेसे 'संकीर्ण-विपुला' छन्दवाले श्लोक हैं। शेष चौदह (दूसरेसे नवेंतक, बारहवेंसे चौदहवेंतक, इक्यावनवाँ, बावनवाँ और चौवनवाँ) श्लोक ठीक 'पध्यावक्त्र' अनुष्टुप् छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।

शेष छत्तीस श्लोकोंमेंसे—अट्ठाईसवाँ, उन्तीसवाँ और पैतालिसवाँ श्लोक 'उपेन्द्रवज्रा' तथा शेष तैंतीस (पन्द्रहवेंसे सत्ताईसवेंतक, तीसवेंसे चौवालीसवेंतक और छियालीसवेंसे पचासवेंतक) श्लोक ठीक 'उपजाति' छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

अथ द्वादशोऽध्यायः

अवतरणिका—

श्रीभगवान्ने चौथे अध्यायके तैंतीसवें और चौँतीसवें श्लोकमें ज्ञानयोगकी श्रेष्ठता बताते हुए ज्ञानप्राप्तिके लिये प्रेरणा की। फिर ज्ञानकी महिमाका वर्णन किया। उसके बाद पाँचवें अध्यायके सोलहवें, सत्रहवें एवं चौबीसवेंसे छब्बीसवें श्लोकतक, छठे अध्यायके चौबीसवेंसे अट्ठाईसवें श्लोकतक और आठवें अध्यायके ग्यारहवेंसे तेरहवें श्लोकतक निर्गुण-निराकारकी उपासनाका महत्त्व बताया।

छठे अध्यायके सैंतालीसवें श्लोकमें साधक भक्तकी महिमा बतायी और सातवें अध्यायसे ग्यारहवें अध्यायतक जगह-जगह 'अहम्,' 'माम्' आदि पदोंद्वारा विशेषरूपसे सगुण-साकार एवं सगुण-निराकारकी उपासनाका महत्त्व बताया तथा अन्तमें ग्यारहवें अध्यायके चौवनवें-पचपनवें श्लोकोंमें अनन्य भक्तिकी महिमा एवं फलसहित उसके स्वरूपका वर्णन किया*।

उपर्युक्त वर्णनसे अर्जुनके मनमें यह जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि सगुण भगवान्की उपासना करनेवाले और निर्गुण ब्रह्मकी उपासना करनेवाले—दोनोंमेंसे कौन-से उपासक श्रेष्ठ हैं। इसी जिज्ञासाको लेकर अर्जुन प्रश्न करते हैं—

अर्जुन उवाच

एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते। ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्त्माः ॥ १ ॥

  • इस अध्यायसे पहले साकार भगवान्के उपासकोंका वर्णन जिन श्लोकोंमें जिन पदोंके द्वारा हुआ है, उनका परिचय इस प्रकार है—
अध्याय श्लोकपदअर्थ
६ ४७'मद्गतान्तरात्मनाः' श्रद्धावाभजते यो माम्'( जो श्रद्धावान् भक्त मेरेमें तल्लीन हुए मनसे मेरा भजन करता है)।
७ १'मव्यासक्तमनाः' यों योगं युञ्जन्मदाश्रयः'( मुझमें अनन्य प्रेमसे आसक्त मनवाला और मेरे आश्रित होकर भक्तियोगमें लगा हुआ )।
७ २१-३०'मामाश्रित्य यतन्ति,' 'युक्तचेतसः'( 'युक्त चित्तवाले पुरुष मेरे शरण होकर साधन करते हैं।
८ ७'मव्यपितमनोबुद्धिः'( मेरेमें अपित किये हुए मन-बुद्धिवाला )।
८ १४'अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः'( मेरेमें अनन्यचित्त होकर जो नित्य-निरन्तर मेरा स्मरण करता है)।
९ १४'सततं कीर्तयन्तो मां यतन्श्रच दृढव्रताः'( दृढ़ निश्चयवाले भक्तजन निरन्तर मेरे नाम और गुणोंका कीर्तन करते हुए मेरी प्राप्तिके लिये यत्न करते हैं)।
९ २२'अनन्याश्रित्ययन्तो मां ये जनाः पर्युपासते'( अनन्यभावसे जो भक्तजन मेरा चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं)।
९ ३०'भजते मामनन्यभाक्'( अनन्यभावसे मेरा भजन करता है)।
१० १'मच्चिता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्'( मेरेमें मन लगाये रखनेवाले और मेरेमें प्राणोंको अर्पण करनेवाले भक्तजन आपसमें मेरे प्रभावको जानते हुए )।
११ ५५'मत्कर्मकुन्मत्परमो मद्भक्तः'( मेरे लिये ही सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्म करनेवाला, मेरे परायण और मेरा भक्त है)।

८०४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १२ ]

अर्जुन बोले—

ये= जोत्वाम्= आप (सगुण-साकार)-कीअव्यक्तम्= निर्गुण-निराकारकी
भक्ताः= भक्तपर्युपासते= उपासना करते हैंअपि= ही (उपासना करते हैं),
एवम्= इस प्रकार (ग्यारहवें अध्यायके पंचपनवें श्लोकके अनुसार)= औरतेषाम्= उन दोनोंमेंसे
सततयुक्ताः= निरन्तर आपमें लगे रहकरये= जोयोगवित्ताः= उत्तम योगवेत्ता
अक्षरम्= अविनाशीके= कौन हैं ?

व्याख्या—‘एवं सततयुक्ता ये भक्ताः’—ग्यारहवें अध्यायके पंचपनवें श्लोकमें भगवान्ने ‘यः’ और ‘सः’ पद जिस साधकके लिये प्रयुक्त किये हैं, उसी साधकके लिये अर्थात् सगुण-साकार भगवान्की उपासना करनेवाले सब साधकोंके लिये यहाँ ‘ये भक्ताः’ पद आये हैं।

यहाँ ‘एवम्’ पदसे ग्यारहवें अध्यायके पंचपनवें श्लोकका निर्देश किया गया है।

‘मैं भगवान्का ही हूँ’,—इस प्रकार भगवान्का होकर रहना ही ‘सततयुक्त’ होना है।

भगवान्में पूर्ण श्रद्धा रखनेवाले साधक भक्तोंका एकमात्र उद्देश्य भगवत्प्राप्ति होता है। अतः प्रत्येक (पारमार्थिक—भगवत्सम्बन्धी जप-ध्यानादि अथवा व्यावहारिक—शारीरिक और आजीविका-सम्बन्धी) क्रियामें उनका सम्बन्ध नित्य-निरन्तर भगवान्से बना रहता है। ‘सततयुक्ताः’ पद ऐसे ही साधक भक्तोंका वाचक है।

साधकसे यह एक बहुत बड़ी भूल होती है कि वह पारमार्थिक क्रियाओंको करते समय तो अपना सम्बन्ध

भगवान्से मानता है, पर व्यावहारिक क्रियाओंको करते समय वह अपना सम्बन्ध संसारसे मानता है। इस भूलका कारण है—समय-समयपर साधकके उद्देश्यमें होनेवाली भिन्नता। जबतक बुद्धिमें धन-प्राप्ति, मान-प्राप्ति, कुटुम्ब-पालन आदि भिन्न-भिन्न उद्देश्य बने रहते हैं, तबतक साधकका सम्बन्ध निरन्तर भगवान्के साथ नहीं रहता। अगर वह अपने जीवनके एकमात्र उद्देश्य भगवत्प्राप्तिको ठीक-ठीक पहचान ले, तो उसकी प्रत्येक क्रिया भगवत्प्राप्तिका साधन हो जायगी। भगवत्प्राप्तिका उद्देश्य हो जानेपर भगवान्का जप-स्मरण-ध्यानादि करते समय तो उसका सम्बन्ध भगवान्से ही है; किन्तु व्यावहारिक क्रियाओंको करते समय भी उसको नित्य-निरन्तर भगवान्में लगा हुआ ही समझना चाहिये।

अगर क्रियाके आरम्भ और अन्तमें साधकको भगवत्स्मृति है, तो क्रिया करते समय भी उसकी निरन्तर सम्बन्धात्मक भगवत्स्मृति रहती है—ऐसा मानना चाहिये। जैसे, बहीखातेमें जोड़ लगते समय व्यापारीकी वृत्ति इतनी

इस अध्यायसे पहले निराकार उपासकोंका वर्णन जिन श्लोकोंमें जिन पदोंके द्वारा हुआ है, उनका परिचय इस प्रकार है—

अध्याय श्लोकपदअर्थ
४ ३४‘तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया’( उस ज्ञानको तू तत्त्वदर्शी ज्ञानियोंके पास जाकर समझ, उनको साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करनेसे, उनकी सेवा करनेसे और सरलतापूर्वक प्रश्न करनेसे )।
४ ३९‘श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानम्’( श्रद्धावान् पुरुष ज्ञानको प्राप्त होता है )।
५ ८‘नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्यते तत्त्वचित्’( तत्त्वको जाननेवाला सांख्ययोगी निःसन्देह ऐसा माने कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ )।
५ १३‘नैव कुर्वन् कारयन्’( कर्मोंको न करता हुआ, न करवाता हुआ )।
५ २४—२६‘ब्रह्मनिर्वाणम्’( निर्वाण ब्रह्मको प्राप्त होता है )।
६ २५‘आत्मसंस्थं मनः कृत्वा’( मनको परमात्मामें स्थित करके )।
८ ११‘यदक्षरं वेदविदो वदन्ति’( वेदोंके ज्ञाता पुरुष जिस परमपदको ‘अक्षर’ कहते हैं )।
८ १३‘ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहर्न्मानुस्मरन्’( ॐ—इस एक अक्षररूप ब्रह्मका उच्चारण और मुझ निर्गुण ब्रह्मका स्मरण करता हुआ )।
९ १५‘ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते’( ज्ञानयोगी मुझ निर्गुण ब्रह्मका ज्ञानयज्ञके द्वारा पूजन करते हुए मेरी उपासना करते हैं )।

श्लोक १ ]

  • साधक-संजीवनी *

८०५

तल्लीन होती है कि मैं कौन हूँ और जोड़ क्यों लगा रहा हूँ—इसका भी ज्ञान नहीं रहता। केवल जोड़के अंकोंकी ओर ही उसका ध्यान रहता है। जोड़ शुरू करनेसे पहले उसके मनमें यह धारणा रहती है कि ‘मैं अमुक व्यापारी हूँ तथा अमुक कार्यके लिये जोड़ लगा रहा हूँ’ और जोड़ लगाना समाप्त करते ही पुनः उसमें उसी भावकी स्फुरणा हो जाती है कि ‘मैं अमुक व्यापारी हूँ और अमुक कार्य कर रहा था।’ अतः जिस समयमें वह तल्लीनतापूर्वक जोड़ लगा रहा है, उस समय भी ‘मैं अमुक व्यापारी हूँ और अमुक कार्य कर रहा हूँ’—इस भावकी विस्मृति दीखते हुए भी वस्तुतः ‘विस्मृति’ नहीं मानी जाती।

इसी प्रकार यदि कर्तव्य-कर्मके आरम्भ और अन्तमें साधकका यह भाव है कि ‘मैं भगवान्का ही हूँ और भगवान्के लिये ही कर्तव्य-कर्म कर रहा हूँ’, तथा इस भावमें उसे थोड़ी भी शंका नहीं है, तो जब वह अपने कर्तव्य-कर्ममें तल्लीनतापूर्वक लग जाता है, उस समय उसमें भगवान्की विस्मृति दीखते हुए भी वस्तुतः विस्मृति नहीं मानी जाती।

‘त्वाम् पर्युपासते’—यहाँ ‘त्वाम्’ पदसे उन सभी सगुण-साकार स्वरूपोंको ग्रहण कर लेना चाहिये, जिनको भगवान् भक्तोंके इच्छानुसार समय-समयपर धारण किया करते हैं और जो स्वरूप भगवान्ने भिन्न-भिन्न अवतारोंमें धारण किये हैं तथा भगवान्का जो स्वरूप दिव्यधाममें विराजमान है—जिसको भक्तलोग अपनी मान्यताके अनुसार अनेक रूपों और नामोंसे कहते हैं।

‘पर्युपासते’—पदका अर्थ है—‘परितः उपासते’ अर्थात् अच्छी तरह उपासना करते हैं। जैसे पतिव्रता स्त्री कभी पतिकी सेवामें अपने शरीरको अर्पण करके, कभी पतिकी अनुपस्थितिमें पतिका चिन्तन करके, कभी पतिके सम्बन्धसे सास-ससुर आदिकी सेवा करके और कभी पतिके लिये रसोई बनाना आदि घरेके कार्य करके सदा-सर्वदा पतिकी ही उपासना करती है, ऐसे ही साधक भक्त भी कभी भगवान्में तल्लीन होकर, कभी भगवान्का जप-स्मरण-चिन्तन करके, कभी सांसारिक प्राणियोंको भगवान्का ही मानकर उनकी सेवा करके और कभी भगवान्की आज्ञाके अनुसार सांसारिक कर्मोंको करके सदा-सर्वदा भगवान्की उपासनामें ही लगा रहता है। ऐसी उपासना ही अच्छी तरह की गयी उपासना है। ऐसे उपासकके हृदयमें उत्पन्न और नष्ट होनेवाले पदार्थों और क्रियाओंका

किंचिन्मात्र भी महत्त्व नहीं होता।

‘ये चाप्यक्षरमव्यक्तम्’—यहाँ ‘ये’ पद निर्गुण-निराकारकी उपासना करनेवाले साधकोंका वाचक है। अर्जुनेने श्लोकके पूर्वाङ्कमें जिस श्रेणीके सगुण-साकारके उपासकोंके लिये ‘ये’ पदका प्रयोग किया है, उसी श्रेणीके निर्गुण-निराकारके उपासकोंके लिये यहाँ ‘ये’ पदका प्रयोग किया गया है।

‘अक्षरम्’ पद अविनाशी सच्चिदानन्दधन परब्रह्मका वाचक है (इसकी व्याख्या इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें की जायगी)।

जो किसी इन्द्रियका विषय नहीं है, उसे ‘अव्यक्त’ कहते हैं। यहाँ ‘अव्यक्तम्’ पदके साथ ‘अक्षरम्’ विशेषण दिया गया है। अतः यह पद निर्गुण-निराकार ब्रह्मका वाचक है (इसकी व्याख्या इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें की जायगी)।

‘अपि’ पदसे ऐसा भाव प्रतीत होता है कि यहाँ साकार उपासकोंकी तुलना उर्हीं निराकार उपासकोंसे की गयी है, जो केवल निराकार ब्रह्मको श्रेष्ठ मानकर उसकी उपासना करते हैं।

‘तेषां के योगवित्ताः’—यहाँ ‘तेषाम्’ पद सगुण और निर्गुण दोनों प्रकारके उपासकोंके लिये आया है। इसी अध्यायके पाँचवें श्लोकमें ‘तेषाम्’ पद निर्गुण उपासकोंके लिये आया है, जबकि सातवें श्लोकमें ‘तेषाम्’ पद सगुण उपासकोंके लिये आया है।

इन पदोंसे अर्जुनका अभिप्राय यह है कि इन दो प्रकारके उपासकोंमें कौन-से उपासक श्रेष्ठ हैं।

‘साकार और निराकारके उपासकोंमें श्रेष्ठ कौन है?’—अर्जुनेके इस प्रश्नका भगवान्ने जो उत्तर दिया है, उसपर गहरा विचार करनेसे अर्जुनेके प्रश्नकी महत्ताका पता चलता है; जैसे—

इस अध्यायके दूसरे श्लोकसे चौदहवें अध्यायके बीसवें श्लोकतक भगवान् अविराम बोलते ही चले गये हैं। तिहत्तर श्लोकोंका इतना लम्बा प्रकरण गीतामें एकमात्र यही है। इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि भगवान् इस प्रकरणमें कोई अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बात समझाना चाहते हैं। साधकोंको साकार और निराकार स्वरूपमें एकताका बोध हो, उनके हृदयमें इन दोनों स्वरूपोंको प्राप्त करनेवाले साधनोंका सांगोपांग रहस्य प्रकट हो, सिद्ध भक्तों (गीता—बारहवें अध्यायके तेरहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक)

८०६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १२

और ज्ञानियों (गीता-चौदहवें अध्यायके बाईसवेंसे पचीसवें श्लोकतक)-के आदर्श लक्षणोंसे वे परिचित हों और संसारसे सम्बन्ध-विच्छेदकी विशेष महत्ता उनकी समझमें आ जाय-इन्हीं उद्देश्योंको सिद्ध करनेमें भगवान्की

विशेष रुचि मालूम देती है। तात्पर्य यह कि भगवान्के हृदयमें जीवोंके लिये जो परमल्याणकारी, अत्यन्त गोपनीय और उत्तमोत्तम भाव थे, उनको प्रकट करवानेका श्रेय अर्जुनके इस भगवत्प्रेरित प्रश्नको ही है।

परिशिष्ट भाव-'योगशास्त्र' होनेसे गीतामें 'योग' मुख्य है। अतः असली योगवेत्ता कौन है?-यह अर्जुनका प्रश्न है। योगवेत्ताओंकी तीन श्रेणियाँ हैं-(१) योगवित् अर्थात् योगी (२) योगवित्त अर्थात् दो योगियोंमें श्रेष्ठ योगी और (३) योगवित्तम अर्थात् सम्पूर्ण योगियोंमें श्रेष्ठ योगी। अर्जुनको 'योगवित्' और 'योगवित्त' के विषयमें सन्देह नहीं है, प्रत्युत 'योगवित्तम' के विषयमें सन्देह है।

सम्बन्ध-अर्जुनके सगुण और निर्गुण उपासकोंकी श्रेष्ठता-विषयक प्रश्नके उत्तरमें भगवान् निर्णय देते हैं।

श्रीभगवानुवाच

मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।

श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः॥ २॥

श्रीभगवान् बोले-

मयि = मुझमें

मन: = मनको

आवेश्य = लगाकर

नित्ययुक्ता: = नित्य-निरन्तर मुझमें लगे हुए

ये = जो भक्त

परया = परम

श्रद्धया = श्रद्धासे

उपेता: = युक्त होकर

माम् = मेरी (सगुण-साकारकी)

उपासते = उपासना करते हैं,

ते = वे

मे = मेरे

मता: = मतमें

युक्ततमा: = सर्वश्रेष्ठ योगी हैं।

व्याख्या-[भगवान्ने ठीक यही निर्णय अर्जुनके बिना पूछे ही छठे अध्यायके सैंतालीसवें श्लोकमें दे दिया था। परन्तु उस विषयमें अपना प्रश्न न होनेके कारण अर्जुन उस निर्णयको पकड़ नहीं पाये। कारण कि स्वयंका प्रश्न न होनेसे सुनी हुई बात भी प्राय: लक्ष्यमें नहीं आती। इसलिये उन्होंने इस अध्यायके पहले श्लोकमें ऐसा प्रश्न किया।

इसी प्रकार अपने मनमें किसी विषयको जाननेकी पूर्ण अभिलाषा और उत्कण्ठाके अभावमें तथा अपना प्रश्न न होनेके कारण सत्संगमें सुनी हुई और शास्त्रोंमें पढ़ी हुई साधन-सम्बन्धी मार्मिक और महत्त्वपूर्ण बातें प्राय: साधकोंके लक्ष्यमें नहीं आतीं। अगर वही बात उनके प्रश्न करनेपर समझायी जाती है, तो वे उसको अपने लिये विशेषरूपसे कही गयी मानकर श्रद्धापूर्वक ग्रहण कर लेते हैं। प्राय: वे सुनी और पढ़ी हुई बातोंको अपने लिये न समझकर उनकी उपेक्षा कर देते हैं, जबकि उनमें उस बातके संस्कार सामान्यरूपसे रहते ही हैं, जो विशेष उत्कण्ठा होनेसे जाग्रत् भी हो सकते हैं। अतः साधकोंको चाहिये कि वे पढ़ें और सुनें, उसको अपने लिये ही मानकर जीवनमें उतारनेकी चेष्टा करें।]

'मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते'-मन वहीं लगता है, जहाँ प्रेम होता है। जिसमें प्रेम होता है, उसका चिन्तन स्वत: होता है।

'नित्ययुक्ता:' का तात्पर्य है कि साधक स्वयं भगवान्में लग जाय। 'भगवान् ही मेरे हैं और मैं भगवान्का ही हूँ'-यही स्वयंका भगवान्में लगना है। स्वयंका दृढ़ उद्देश्य भगवत्प्राप्ति होनेपर ही मन-बुद्धि स्वत: भगवान्में लगते हैं। इसके विपरीत स्वयंका उद्देश्य भगवत्प्राप्ति न हो तो मन-बुद्धिको भगवान्में लगानेका यत्न करनेपर भी वे पूरी तरह भगवान्में नहीं लगते। परन्तु जब स्वयं ही अपने आपको भगवान्का मान ले, तब तो मन-बुद्धि भगवान्में तल्लीन हो ही जाते हैं। स्वयं कर्ता है और मन-बुद्धि करण हैं। करण कर्ताके ही आश्रित रहते हैं। जब कर्ता भगवान्का हो जाय, तब मन-बुद्धिरूप करण स्वत: भगवान्में लगते हैं।

साधकसे भूल यह होती है कि वह स्वयं भगवान्में न लगकर अपने मन-बुद्धिको भगवान्में लगानेका अभ्यास करता है। स्वयं भगवान्में लगे बिना मन-बुद्धिको भगवान्में

श्लोक २ ]

  • साधक-संजीवनी *

८०७

लगाना कठिन है। इसीलिये साधकोंकी यह व्यापक शिकायत रहती है कि मन-बुद्धि भगवान्‌में नहीं लगते। मन-बुद्धि एकाग्र होनेसे सिद्धि (समाधि आदि) तो हो सकती है, पर कल्याण स्वयंके भगवान्‌में लगनेसे ही होगा। उपासनाका तात्पर्य है—स्वयं-(अपने-आप-) को भगवान्‌के अर्पित करना कि मैं भगवान्‌का ही हूँ और भगवान्‌ ही मेरे हैं। स्वयंको भगवान्‌के अर्पित करनेसे नाम-जप, चिन्तन, ध्यान, सेवा, पूजा आदि तथा शास्त्रविहित क्रियामात्र स्वतः भगवान्‌के लिये ही होती है।

शरीर प्रकृतिका और जीव परमात्माका अंश है। प्रकृतिके कार्य शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि और अहम्से तादात्म्य, ममता और कामना न करके केवल भगवान्‌को ही अपना माननेवाला यह कह सकता है कि मैं भगवान्‌का हूँ, भगवान्‌ मेरे हैं। ऐसा कहने या माननेवाला भगवान्‌से कोई नया सम्बन्ध नहीं जोड़ता। चेतन और नित्य होनेके कारण जीवका भगवान्‌से सम्बन्ध स्वतःसिद्ध है। किन्तु उस नित्यसिद्ध वास्तविक सम्बन्धको भूलकर जीवने अपना सम्बन्ध प्रकृति एवं उसके कार्य शरीरसे मान लिया, जो अवास्तविक है। अतः जबतक प्रकृतिसे माना हुआ सम्बन्ध है, तभीतक भगवान्‌से अपना सम्बन्ध माननेकी आवश्यकता है। प्रकृतिसे माना हुआ सम्बन्ध टूटते ही भगवान्‌से अपना वास्तविक और नित्यसिद्ध सम्बन्ध प्रकट हो जाता है; उसकी स्मृति प्राप्त हो जाती है—‘नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा ’ (गीता १८।७३)।

जड़ता-(प्रकृति-) के सम्मुख होनेके कारण अर्थात् उससे सुखभोग करते रहनेके कारण जीव शरीरसे ‘मैं’ पनका सम्बन्ध जोड़ लेता है अर्थात् ‘मैं शरीर हूँ’ ऐसा मान लेता है। इस प्रकार शरीरसे माने हुए सम्बन्धके कारण वह वर्ण, आश्रम, जाति, नाम, व्यवसाय तथा बालकपन, जवानी आदि अवस्थाओंको बिना याद किये भी (स्वाभाविक रूपसे) अपनी ही मानता रहता है अर्थात् अपनेको उनसे अलग नहीं मानता।

जीवकी विजातीय शरीर और संसारके साथ (भूलसे की हुई) सम्बन्धकी मान्यता भी इतनी दृढ़ रहती है कि बिना याद किये सदा याद रहती है। अगर वह अपने

सजातीय (चेतन और नित्य) परमात्माके साथ अपने वास्तविक सम्बन्धको पहचान ले, तो किसी भी अवस्थामें परमात्माको नहीं भूल सकता। फिर उठते-बैठते, खाते-पीते, सोते-जागते हर समय प्रत्येक अवस्थामें भगवान्‌का स्मरण-चिन्तन स्वतः होने लगता है।

जिस साधकका उद्देश्य सांसारिक भोगोंका संग्रह और उनसे सुख लेना नहीं है, प्रत्युत एकमात्र परमात्माको प्राप्त करना ही है, उसके द्वारा भगवान्‌से अपने सम्बन्धकी पहचान आरम्भ हो गयी—ऐसा मान लेना चाहिये। इस सम्बन्धकी पूर्ण पहचानके बाद साधकमें मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर आदिके द्वारा सांसारिक भोग और उनका संग्रह करनेकी इच्छा बिलकुल नहीं रहती।

वास्तवमें एकमात्र भगवान्‌का होते हुए जीव जितने अंशमें प्रकृतिसे सुख-भोग प्राप्त करना चाहता है, उतने ही अंशमें उसने इस भगवत्सम्बन्धको दृढ़तापूर्वक नहीं पकड़ा है। उतने अंशमें उसका प्रकृतिके साथ ही सम्बन्ध है। इसलिये साधकको चाहिये कि वह प्रकृतिसे विमुख होकर अपने-आपको केवल भगवान्‌का ही माने, उन्हींके सम्मुख हो जाय।

‘श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः’ —साधककी श्रद्धा वहीं होगी, जिसे वह सर्वश्रेष्ठ समझेगा। श्रद्धा होनेपर अर्थात् बुद्धि लगनेपर वह अपने द्वारा निश्चित किये हुए सिद्धान्तके अनुसार स्वाभाविक जीवन बनायेगा और अपने सिद्धान्तसे कभी विचलित नहीं होगा।

जहाँ प्रेम होता है, वहाँ मन लगता है और जहाँ श्रद्धा होती है, वहाँ बुद्धि लगती है। प्रेममें प्रेमास्पदके संगकी तथा श्रद्धामें आज्ञापालनकी मुख्यता रहती है।

एकमात्र भगवान्‌में प्रेम होनेसे भक्तको भगवान्‌के साथ नित्य-निरन्तर सम्बन्धका अनुभव होता है, कभी वियोगका अनुभव होता ही नहीं। इसीलिये भगवान्‌के मतमें ऐसे भक्त ही वास्तवमें उत्तम योगवेत्ता हैं।

यहाँ ‘ते मे युक्ततमा मताः’ बहुवचनान्त पदसे जो बात कही गयी है, यही बात छठे अध्यायके सैंतालीसवें श्लोकमें ‘स मे युक्ततमो मतः ’ एकवचनान्त पदसे कही जा चुकी है*।

  • ग्यारहवें अध्यायके चौवनवें श्लोकमें भगवान्‌ कह चुके हैं कि अनन्य भक्तिके द्वारा साधक मुझे प्रत्यक्ष देख सकता है, तत्त्वसे जान सकता है और मुझे प्राप्त हो सकता है; परन्तु अठारहवें अध्यायके पचपनवें श्लोकमें भगवान्‌ने निर्गुण-उपासकोंके लिये अपनेको तत्त्वसे जानने और प्राप्त करनेकी ही बात कही है, दर्शन देनेकी बात नहीं कही। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि सगुण-उपासकोंको भगवान्‌के दर्शन भी होते हैं। यह उनकी विशेषता है।

८०८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १२ ]

परिशिष्ट भाव—‘स योगी परमो मतः’ (गीता ६।३२), ‘स मे युक्ततमो मतः’ (गीता ६।४७), ‘ते मे युक्ततमा मताः’ (गीता १२।२)—इस प्रकार भगवान्ने जो श्रेष्ठताकी बात कही है, इसका तात्पर्य यह है कि मनुष्य कर्मयोग, ज्ञानयोग आदि किसी भी मार्गसे चले, वास्तवमें श्रेष्ठ वही है, जिसको भक्ति प्राप्त हो गयी है। कर्मयोगी और ज्ञानयोगीको तो अन्तमें भक्ति प्राप्त होती है, पर भक्तियोगी आरम्भसे ही भक्तिमें लगा है (जो कि कर्मयोग तथा ज्ञानयोगका फल है), इसलिये वह सबसे श्रेष्ठ है।

ज्ञान और भक्ति—दोनों ही संसारका दुःख दूर करनेमें समान हैं; परन्तु दोनोंमें ज्ञानकी अपेक्षा भक्तिकी महिमा अधिक है। ज्ञानमें तो अखण्डरसकी प्राप्ति होती है, पर भक्तिमें अनन्तरसकी प्राप्ति होती है। अनन्तरसमें प्रतिक्षण बढ़नेवाला, लहरोंवाला, उछालवाला एक बहुत विलक्षण आनन्द है। जैसे संसारमें किसी वस्तुका ज्ञान होता है कि ‘ये रुपये हैं; यह घड़ी है’ आदि, तो यह ज्ञान केवल अज्ञान (अनज्ञानपने)-को मिटाता है, ऐसे ही तत्त्वज्ञान केवल अज्ञानको मिटाता है। अज्ञान मिटनेसे दुःख, भय, जन्म-मरणरूप बन्धन—ये सब मिट जाते हैं। परन्तु प्रेम (भक्ति) ज्ञानसे भी विलक्षण है। ज्ञान भगवान्तक नहीं पहुँचता, पर प्रेम भगवान्तक पहुँचता है। ज्ञानका अनुभव करनेवाला तो स्वयं होता है, पर प्रेमका अनुभव करनेवाले और ज्ञाता भगवान् होते हैं। भगवान् ज्ञानके भूखे नहीं हैं, प्रत्युत प्रेमके भूखे हैं। मुक्त होनेपर तो ज्ञानयोगी सन्तुष्ट, तृप्त हो जाता है (गीता—तीसरे अध्यायका सत्रहवाँ श्लोक)। पर प्रेम प्राप्त होनेपर भक्त सन्तुष्ट नहीं होता, प्रत्युत उसका आनन्द उत्तरोत्तर बढ़ता रहता है। अतः आखिरी तत्त्व प्रेम है, मुक्ति नहीं। जैसे ‘ये रुपये हैं’—ऐसा ज्ञान हो गया तो अनज्ञानपना मिट गया; परन्तु उनको पानेका लोभ हो जाय कि ‘और मिले, और मिले’ तो उसमें एक विशेष रस आता है। ऐसे ही भक्तिमें एक विशेष रस आता है। तात्पर्य है कि संसारमें जैसे रुपयोंमें आकर्षित करनेकी शक्ति लोभमें ही है, ऐसे ही भगवान्में आकर्षित करनेकी शक्ति प्रेममें ही है, ज्ञानमें नहीं। धनका लोभ तो अधिक पतन करता है, पर प्रेम ज्ञानसे भी अधिक उन्नत करता है। वस्तुके आकर्षणमें जो रस है, वह रस वस्तुमें और वस्तुके ज्ञानमें नहीं है।

विवेकमार्ग (ज्ञानयोग)-में सत् और असत्—दोनोंकी मान्यता साथ-साथ रहनेसे असत्की अति सूक्ष्म सत्ता अर्थात् अति सूक्ष्म अहम् दूरतक साथ रहता है। यह सूक्ष्म अहम् अथवा अहमका संस्कार मुक्त होनेपर भी रहता है। यह सूक्ष्म अहम् जन्म-मरण देनेवाला तो नहीं होता, पर यह ईश्वरसे अभिन्न होनेमें बाधक होता है। इसलिये विवेकमार्गमें ज्ञानियोंकी अथवा दार्शनिकोंकी मुक्ति तो हो सकती है, पर ईश्वरके साथ अभिन्नता अर्थात् प्रेम हो जाय—यह नियम नहीं है। इस सूक्ष्म अहमुके कारण ही दार्शनिकोंमें और उनके दर्शनोंमें परस्पर मतभेद रहता है। परन्तु विश्वासमार्ग (भक्तियोग)-में आरम्भसे ही भक्त एक ईश्वरके सिवाय और किसीकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं मानता। इसलिये वह ईश्वरके साथ अभिन्न हो जाता है। ईश्वरके साथ अभिन्न होनेपर अर्थात् प्रेमका उदय होनेपर सूक्ष्म अहम् तथा उससे पैदा होनेवाले सम्पूर्ण दार्शनिक मतभेद सर्वथा मिट जाते हैं। अर्थात् द्वैत, अद्वैत, द्वैताद्वैत, विशिष्टाद्वैत आदि जितने भी मतभेद हैं, वे सब वासुदेवरूप हो जाते हैं, जो कि वास्तवमें है। इसलिये ‘वासुदेवः सर्वम्’ का अनुभव करनेवाले प्रेमी भक्तके हृदयमें किसी एक मतका आग्रह नहीं रहता, प्रत्युत सबका समान आदर रहता है। किसी एक मतका आग्रह न होनेसे उसके द्वारा किसीका भी कभी अनादर नहीं होता। तात्पर्य यह हुआ कि ज्ञानकी एकतासे प्रेमकी एकता श्रेष्ठ है। ज्ञानमें परमात्मासे दूरी और भेद तो मिट जाते हैं, पर अभिन्नता (मिलन) नहीं होती। परन्तु प्रेममें दूरी, भेद और भिन्नता—तीनों ही मिट जाते हैं। इसलिये वास्तविक अद्वैत प्रेममें ही है। प्रेममें इतनी शक्ति है कि इसमें भक्त भगवान्का भी इष्ट हो जाता है। ज्ञानमार्गवाले मुक्तिको सबसे ऊँची चीज मानते हैं, फिर वे मुक्तिके भी आगेकी चीज प्रेम (प्रेमाभक्ति या पराभक्ति) को कैसे समझें? मुक्तियोंमें तो अखण्ड रस है, पर प्रेममें अनन्त (प्रतिक्षण वर्धमान) रस है। प्रेम मुक्ति, तत्त्वज्ञान, स्वरूप-बोध, आत्मसाक्षात्कार, कैवल्यसे भी आगेकी चीज है१!


भगवान्ने छठे अध्यायके सैतालीसवें श्लोकमें अपने सगुणरूपमें श्रद्धा-प्रेम रखनेवाले साधकको सम्पूर्ण योगियोंमें श्रेष्ठ बताया है। तात्पर्य यह है कि भगवान्को अपना मानकर उनके परायण रहनेवाला साधक ही भगवान्को विशेष प्रिय है।

१-प्रेम भगति जल बिनु रघुराई। अभिअंतर मल कबहुँ न जाई॥ (मानस, उत्तर० ४९।३)

२-द्वैतं मोहाय बोधात्प्रागजाते बोधे मनीषया। भक्त्यर्थं कल्पितं (स्वीकृतं) द्वैतमद्वैतादपि सुन्दरम्॥ (बोधसार, भक्ति० ४२)

श्लोक ३-४ ]

  • साधक-संजीवनी *

८०९

कर्मयोग और ज्ञानयोग—ये दोनों लौकिक निष्ठाएँ हैं; (गीता—तीसरे अध्यायका तीसरा श्लोक) परन्तु भक्तियोग लौकिक निष्ठा अर्थात् प्राणीकी निष्ठा नहीं है। जो भगवान्में लग जाता है, वह भगवन्निष्ठ होता है अर्थात् उसकी निष्ठा अलौकिक होती है। उसके साधन और साध्य—दोनों भगवान् ही होते हैं। इसलिये भक्तियोग साधन भी है और साध्य भी, तभी कहा है—‘भक्त्या संजातया भक्त्या ’ (श्रीमद्भ्ग० ११।३।३१) अर्थात् भक्तिसे भक्ति पैदा होती है। श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन—यह नौ प्रकारकी ‘साधन भक्ति’ है* और इससे आगे प्रेमलक्षणा भक्ति ‘साध्य भक्ति’ है, जो कर्मयोग और ज्ञानयोग सबकी साध्य है (गीता—अठारहवें अध्यायका चौवनवाँ श्लोक)। यह साध्य भक्ति ही सर्वोपरि प्रापणीय तत्त्व है।

ज्ञानयोगमें साधक सत्-असत्के विवेकको महत्त्व देकर असत्का त्याग करता है। असत्का त्याग करनेसे त्यागीकी और त्याज्य वस्तुकी सत्ता भावरूपसे बहुत दूरतक साथ रहती है, इसलिये ज्ञानयोगमें असत्का सर्वथा त्याग बहुत देरीसे होता है। कर्मयोगमें साधक असत् वस्तुओंको त्याज्य न मानकर सेवा-सामग्री मानता है। त्याग करनेमें निकृष्ट वस्तु तो सुगमतासे छूटती है, पर अच्छी वस्तुको छोड़ना कठिन होता है। अतः अच्छी वस्तुका त्याग करनेकी अपेक्षा उसको दूसरेकी सेवामें लगाना सुगम पड़ता है। निष्कामभावपूर्वक दूसरोंकी सेवामें लगानेसे असत्का त्याग सुगमतासे और जल्दी हो जाता है। भक्तियोगमें जगत्को भगवान्का अथवा भगवत्स्वरूप माननेसे जगत् (असत्) बहुत शीघ्र लुप्त हो जाता है और भगवान् रह जाते हैं। इस प्रकार ज्ञानयोगकी अपेक्षा कर्मयोगमें असत् (जड़ता)—का शीघ्र त्याग होता है और कर्मयोगकी अपेक्षा भक्तियोगमें असत्का शीघ्र त्याग होता है; क्योंकि भक्तिमें असत् रहता ही नहीं—‘सदसच्चाहम् ’ (गीता ९।१९)। अतः ज्ञानयोगसे कर्मयोग श्रेष्ठ है—‘तयोस्तु कर्मसन्त्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ’ (गीता ५।२) और कर्मयोगसे भक्तियोग श्रेष्ठ है—‘योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना। श्रद्धावाभजते यो मां स मे युक्ततमो मतः। ’ (गीता ६।४७)।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने सगुण-उपासकोंको सर्वश्रेष्ठ योगी बताया। इसपर यह प्रश्न हो सकता है कि क्या निर्गुण-उपासक सर्वश्रेष्ठ योगी नहीं हैं? इसके उत्तरमें भगवान् कहते हैं।

ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते। सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥ ३ ॥ सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः। ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥ ४ ॥

तु= औरकूटस्थम्= निर्विकार,सर्वभूतहिते= प्राणिमात्रके
ये= जो (अपने)अचलम्= अचल,हितमें
इन्द्रियग्रामम्= इन्द्रिय-समूहकोध्रुवम्= ध्रुव,रताः= प्रीति रखनेवाले
सन्नियम्य= भलीभाँति वशमें
करकेअक्षरम्= अक्षर(और)
अचिन्त्यम्= चिन्तनमें न आनेवाले,= औरसर्वत्र= सब जगह
सर्वत्रगम्= सब जगह परिपूर्ण,अव्यक्तम्= अव्यक्तकीसमबुद्धयः= समबुद्धिवाले मनुष्य
अनिर्देश्यम्= देखनेमें न
आनेवाले,पर्युपासते= तत्परतासे
उपासना करते हैं,माम्= मुझे
ते= वेएव= ही
प्राप्नुवन्ति= प्राप्त होते हैं।

‘बोधसे पहलेका द्वैत मोहमें डालता है, पर बोध हो जानेपर भक्तिके लिये स्वीकृत द्वैत-अद्वैतसे भी अधिक सुन्दर होता है।’

  • श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्। अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥

(श्रीमद्भ्ग० ७।५।२३)

८१०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १२ ]

व्याख्या—‘तु’— यहाँ ‘तु’ पद साकार-उपासकोंसे निराकार-उपासकोंको भिन्नता दिखानेके लिये आया है।

‘सन्वियन्नेन्द्रियग्रामम्’—‘सम्’ और ‘नि’— दो उपसर्गोंसे युक्त ‘सन्वियम्’ पद देकर भगवान्ने यह बताया है कि सभी इन्द्रियोंको सम्यक् प्रकारसे एवं पूर्णतः वशमें करे, जिससे वे किसी अन्य विषयमें न जायँ। इन्द्रियाँ अच्छी प्रकारसे पूर्णतः वशमें न होनेपर निर्गुण-तत्त्वकी उपासनमें कठिन्ता होती है। सगुण-उपासनमें तो ध्यानका विषय सगुण भगवान् होनेसे इन्द्रियाँ भगवान्में लग सकती हैं; क्योंकि भगवान्के सगुण स्वरूपमें इन्द्रियोंको अपने विषय प्राप्त हो जाते हैं। अतः सगुण-उपासनमें इन्द्रिय-संयमकी आवश्यकता होते हुए भी इसकी उतनी अधिक आवश्यकता नहीं है, जितनी निर्गुण-उपासनमें है। निर्गुण-उपासनमें चिन्तनका कोई आधार न रहनेसे इन्द्रियोंका सम्यक् संयम हुए बिना (आसक्ति रहनेपर) विषयोंमें मन जा सकता है और विषयोंका चिन्तन होनेसे पतन होनेकी अधिक सम्भावना रहती है (गीता—दूसरे अध्यायका बासठवाँ-तिरसठवाँ श्लोक)। अतः निर्गुणोपासकके लिये सभी इन्द्रियोंको विषयोंसे हटाते हुए सम्यक् प्रकारसे पूर्णतः वशमें करना आवश्यक है। इन्द्रियोंको केवल बाहरसे ही वशमें नहीं करना है, प्रत्युत विषयोंके प्रति साधकके अन्तःकरणमें भी राग नहीं रहना चाहिये; क्योंकि जबतक विषयोंमें राग है, तबतक ब्रह्मकी प्राप्ति कठिन है (गीता—पन्द्रहवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)।

गीतामें इन्द्रियोंको वशमें करनेकी बात विशेषरूपसे जितनी निर्गुणोपासना तथा कर्मयोगमें आयी है, उतनी सगुणोपासनमें नहीं।

‘अचिन्त्यम्’— मन-बुद्धिका विषय न होनेके कारण ‘अचिन्त्यम्’ पद निर्गुण-निराकार ब्रह्मका वाचक है; क्योंकि मन-बुद्धि प्रकृतिका कार्य होनेसे सम्पूर्ण प्रकृतिको भी अपना विषय नहीं बना सकते, फिर प्रकृतिसे अतीत परमात्मा इनका विषय बन ही कैसे सकता है!

प्राकृतिक पदार्थमात्र चिन्त्य है और परमात्मा प्रकृतिसे अतीत होनेके कारण सम्पूर्ण चिन्त्य पदार्थोंसे भी अतीत, विलक्षण हैं। प्रकृतिकी सहायताके बिना उनका चिन्तन, वर्णन नहीं किया जा सकता। अतः परमात्माको स्वयं- (करण-निरपेक्ष ज्ञान-) से ही जाना जा सकता है; प्रकृतिके कार्य मन-बुद्धि आदि (करण-सापेक्ष ज्ञान)-से नहीं।

‘सर्वत्रगम्’— सब देश, काल, वस्तु और व्यक्तियोंमें परिपूर्ण होनेसे ब्रह्म ‘सर्वत्रगम्’ है। सर्वव्यापी होनेके कारण

वह सीमित मन-बुद्धि-इन्द्रियोंसे ग्रहण नहीं किया जा सकता।

‘अनिर्देश्यम्’— जिसे इदंतासे नहीं बताया जा सकता अर्थात् जो भाषा, वाणी आदिका विषय नहीं है, वह ‘अनिर्देश्यम्’ है। निर्देश (संकेत) उसीका किया जा सकता है, जो जाति, गुण, क्रिया एवं सम्बन्धसे युक्त हो और देश, काल, वस्तु एवं व्यक्तिसे परिच्छिन्न हो; परन्तु जो चिन्मय तत्त्व सर्वत्र परिपूर्ण हो, उसका संकेत जड़ भाषा, वाणीसे कैसे किया जा सकता है?

‘कूटस्थम्’— यह पद निर्विकार, सदा एकरस रहने-वाले सच्चिदानन्दधन ब्रह्मका वाचक है। सभी देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदिमें रहते हुए भी वह तत्त्व सदा निर्विकार और निलिप्त रहता है। उसमें कभी किंचिन्मात्र भी कोई परिवर्तन नहीं होता। इसलिये वह ‘कूटस्थ’ है। कूट- (अहरन-) में तरह-तरहके गहने, अस्त्र, औजार आदि पदार्थ गढ़े जाते हैं, पर वह ज्यों-का-त्यों रहता है। इसी प्रकार संसारके भिन्न-भिन्न प्राणी-पदार्थोंकी उत्पत्ति, स्थिति और विनाश होनेपर भी परमात्मा सदा ज्यों-के-त्यों रहते हैं।

‘अचलम्’— यह पद आने-जानेको क्रियासे सर्वथा रहित ब्रह्मका वाचक है। प्रकृति चल है और ब्रह्म अचल है।

‘ध्रुवम्’— जिसकी सत्ता निश्चित (सत्य) और नित्य है, उसको ‘ध्रुव’ कहते हैं। सच्चिदानन्दधन ब्रह्म सत्तरूपसे सर्वत्र विद्यमान रहनेसे ‘ध्रुवम्’ है।

निर्गुण ब्रह्मके आठों विशेषणोंमें सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषण ‘ध्रुवम्’ है। ब्रह्मके लिये अनिर्देश्य, अचिन्त्य आदि निषेधात्मक विशेषण देनेसे कोई ऐसा न समझ ले कि वह है ही नहीं, इसलिये यहाँ ‘ध्रुवम्’ विशेषण देकर उस तत्त्वकी निश्चित सत्ता बताया गयी है। उस तत्त्वका कभी कहीं किंचिन्मात्र भी अभाव नहीं होता। उसकी सत्तासे ही असत्- (संसार-) को सत्ता मिल रही है—‘जासु सत्यता तं जडं माया । भास सत्य इव मोह सहाया ॥ (मानस १।१९७।४)।

‘अक्षरम्’— जिसका कभी क्षरण अर्थात् विनाश नहीं होता तथा जिसमें कभी कोई कमी नहीं आती, वह सच्चिदानन्दधन ब्रह्म ‘अक्षरम्’ है।

‘अव्यक्तम्’— जो व्यक्त न हो अर्थात् मन-बुद्धि-इन्द्रियोंका विषय न हो और जिसका कोई रूप या आकार न हो, उसको ‘अव्यक्तम्’ कहा गया है।

‘पर्युपासते’— यह पद यहाँ निर्गुण-उपासकोंकी सम्यक् उपासनाका बोधक है। शरीरसहित सम्पूर्ण पदार्थ

श्लोक ३-४]

  • साधक-संजीवनी *

८१९

और कर्मोंमें वासना तथा अहंभावका अभाव तथा भावरूप सच्चिदानन्दघन परमात्मामें अभिनभावसे नित्य-निरन्तर दृढ़ स्थित रहना ही उपासना करना है।

इन श्लोकोंमें आठ विशेषणोंसे जिस विशेष वस्तु-तत्त्वका लक्ष्य कराया गया है और उससे जो विशेष वस्तु समझमें आती है, वह बुद्धिविशिष्ट ब्रह्मका ही स्वरूप है, जो कि पूर्ण नहीं है; क्योंकि (लक्षण और विशेषणोंसे रहित) निर्गुण-निर्विशेष ब्रह्मका स्वरूप (जो बुद्धिसे अतीत है) किसी भी प्रकारसे पूर्णतया बुद्धि आदिका विषय नहीं हो सकता। हाँ, इन विशेषणोंका लक्ष्य रखकर जो उपासना की जाती है, वह निर्गुण ब्रह्मकी ही उपासना है और इसके परिणाममें प्राप्ति भी निर्गुण ब्रह्मकी ही होती है।

विशेष बात

परमात्माको तत्त्वसे समझानेके लिये दो प्रकारके विशेषण दिये जाते हैं—निषेधात्मक और विध्यात्मक। परमात्माके अक्षर, अनिर्देश्य, अत्युक्त, अचिन्त्य, अचल, अव्यय, असीम, अपार, अविनाशी आदि विशेषण ‘निषेधात्मक’ हैं और सर्वव्यापी, कूटस्थ, ध्रुव, सत्, चित्, आनन्द आदि विशेषण ‘विध्यात्मक’ हैं। परमात्माके निषेधात्मक विशेषणोंका तात्पर्य प्रकृतिसे परमात्माकी ‘असंगता’ बताना है और विध्यात्मक विशेषणोंका तात्पर्य परमात्माकी स्वतन्त्र ‘सत्ता’ बताना है।

परमात्मतत्त्व सांसारिक प्रवृत्ति और निवृत्ति—दोनोंसे परे (सहज निवृत्त) और दोनोंको समानरूपसे प्रकाशित करनेवाला है। ऐसे निरपेक्ष परमात्मतत्त्वका लक्ष्य करानेके लिये और बुद्धिको परमात्माके नजदीक पहुँचानेके लिये ही भिन्न-भिन्न विशेषणोंसे परमात्माका वर्णन (लक्ष्य) किया जाता है।

गीतामें परमात्मा और जीवात्माके स्वरूपका वर्णन प्रायः समान ही मिलता है। परमात्माके लिये यहाँ जो विशेषण दिये गये हैं, वही विशेषण गीतामें जीवात्माके लिये भी दिये गये हैं; जैसे—दूसरे अध्यायके चौबीसवें-पचीसवें श्लोकोंमें ‘सर्वगतः’, ‘अचलः’, ‘अव्यक्तः’, ‘अचिन्त्यः’ आदि और पन्द्रहवें अध्यायके सोलहवें श्लोकमें ‘कूटस्थः’ एवं ‘अक्षरः’ विशेषण जीवात्माके लिये आये हैं। इसी प्रकार सातवें अध्यायके पचीसवें श्लोकमें ‘अव्ययम्’ विशेषण परमात्माके लिये और चौदहवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें ‘अव्ययम्’ विशेषण

जीवात्माके लिये आया है।

संसारमें व्यापकरूपसे भी परमात्मा और जीवात्माको समान बताया गया है; जैसे—आठवें अध्यायके बाईसवें तथा अठारहवें अध्यायके छियालीसवें श्लोकमें ‘येन सर्वमिदं तत्म्’ पदोंसे और नवें अध्यायके चौथे श्लोकमें ‘मया तत्मिदं सर्वम्’ पदोंसे परमात्माको सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त बताया गया है। इसी प्रकार दूसरे अध्यायके सत्रहवें श्लोकमें ‘येन सर्वमिदं तत्म्’ पदोंसे जीवात्माको भी सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त बताया गया है।

जैसे नेत्रोंकी दृष्टि आपसमें नहीं टकराती अथवा व्यापक होनेपर भी शब्द परस्पर नहीं टकराते। ऐसे ही (द्वैतमतके अनुसार) सम्पूर्ण जगत्में समानरूपसे व्याप्त होनेपर भी निरवयव होनेसे परमात्मा और जीवात्माकी सर्वव्यापकता आपसमें नहीं टकराती।

‘सर्वभूतहिते रताः’—कर्मयोगके साधनमें आसक्ति, ममता, कामना और स्वार्थके त्यागकी मुख्यता है। मनुष्य जब शरीर, धन, सम्पत्ति आदि पदार्थोंको ‘अपना’ और ‘अपने लिये’ न मानकर उनको दूसरोंकी सेवामें लगाता है; तब उसकी आसक्ति, ममता, कामना और स्वार्थभावका त्याग स्वतः हो जाता है। जिसका उद्देश्य प्राणिमात्रकी सेवा करना ही है, वह अपने शरीर और पदार्थोंको (दीन-दुःखी, अभावग्रस्त) प्राणियोंकी सेवामें लगायेगा ही। शरीरको दूसरोंकी सेवामें लगानेसे ‘अहंता’ और पदार्थोंको दूसरोंकी सेवामें लगानेसे ‘ममता’ नष्ट होती है। साधकका पहलसे ही यह लक्ष्य होता है कि जो पदार्थ सेवामें लग रहे हैं, वे सैक्यके ही हैं। अतः कर्मयोगके साधनमें सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें रत रहना अत्यन्त आवश्यक है। इसलिये ‘सर्वभूतहिते रताः’ पदका प्रयोग कर्मयोगका आचरण करनेवालेके सम्बन्धमें करना ही अधिक युक्तिसंगत है। परन्तु भगवान्ने इस पदका प्रयोग यहाँ तथा पाँचवें अध्यायके पचीसवें श्लोकमें—दोनों ही स्थानोंपर ज्ञानयोगियोंके सम्बन्धमें किया है। इससे यही सिद्ध होता है कि कर्मसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये कर्मयोगकी प्रणालीको अपनानेकी आवश्यकता ज्ञानयोगमें भी है।

एक बात खास ध्यान देनेकी है। शरीर, पदार्थ और क्रियासे जो सेवा की जाती है, वह सीमित ही होती है; क्योंकि सम्पूर्ण पदार्थ और क्रियाएँ मिलकर भी सीमित ही हैं। परन्तु सेवामें प्राणिमात्रके हितका भाव असीम होनेसे

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १२ ]

सेवा भी असीम हो जाती है। अतः पदार्थोंके अपने पास रहते हुए भी (उनमें आसक्ति, ममता आदि न करके) उनको सम्पूर्ण प्राणियोंका मानकर उन्हींकी सेवामें लगाना है; क्योंकि वे पदार्थ समष्टिके ही हैं। ऐसा असीम भाव होनेपर जड़तासे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जानेके कारण साधकको असीम तत्त्व-(परमात्मा-) की प्राप्ति हो जाती है। कारण कि पदार्थोंको व्यक्तिगत (अपना) माननेसे ही मनुष्यमें परिच्छिन्नता (एकदेशीयता) तथा विषमता रहती है और पदार्थोंको व्यक्तिगत न मानकर सम्पूर्ण प्राणियोंके हितका भाव रखनेसे परिच्छिन्नता तथा विषमता मिट जाती है। इसके विपरीत साधारण मनुष्यका ममतावाले प्राणियोंकी सेवा करनेका सीमित भाव रहनेसे वह चाहे अपना सर्वस्व उनकी सेवामें क्यों न लगा दे, तो भी पदार्थोंमें तथा जिनकी सेवा करे, उनमें आसक्ति, ममता आदि रहनेसे (सीमित भावके कारण) उसे असीम परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति नहीं होती। अतः असीम परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिके लिये प्राणिमात्रके हितमें रति अर्थात् प्रीतिरूप असीम भावका होना आवश्यक है। 'सर्वभूतहिते रताः' पद उसी भावको व्यक्त करते हैं।

ज्ञानयोगका साधक जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद करना चाहता तो है; परन्तु जबतक उसके हृदयमें नाशवान् पदार्थोंका आदर है, तबतक पदार्थोंको मायामय अथवा स्वप्नवत् समझकर उनका ऐसे ही त्याग कर देना उसके लिये कठिन है। परन्तु कर्मयोगका साधक पदार्थोंको दूसरोंकी सेवामें लगाकर उनका त्याग ज्ञानयोगीकी अपेक्षा सुगमतापूर्वक कर सकता है। ज्ञानयोगीमें तीव्र वैराग्य होनेसे ही पदार्थोंका त्याग हो सकता है; परन्तु कर्मयोगी थोड़े वैराग्यमें ही पदार्थोंका त्याग (परहितमें) कर सकता है। प्राणियोंके हितमें पदार्थोंका सदुपयोग करनेसे जड़तासे सुगमतापूर्वक सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। भगवान्ने यहाँ 'सर्वभूतहिते रताः' पद देकर यही बताया है कि प्राणिमात्रके हितमें रत रहनेसे पदार्थोंके प्रति आदरबुद्धि रहते हुए भी जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद सुगमतापूर्वक हो जायगा। प्राणिमात्रका हित करनेके लिये कर्मयोग ही सुगम उपाय है।

निर्गुण-उपासकोंकी साधनाके अन्तर्गत अनेक अवान्तर भेद होते हुए भी मुख्य भेद दो हैं—(१) जड़-चेतन और चर-अचरके रूपमें जो कुछ प्रतीत होता है, वह सब आत्मा या ब्रह्म है और (२) जो कुछ दृश्यवर्ग प्रतीत होता है, वह अनित्य, क्षणभंगुर और असत् है—इस प्रकार

संसारका बाध करनेपर जो तत्त्व शेष रह जाता है, वह आत्मा या ब्रह्म है।

पहली साधनामें 'सब कुछ ब्रह्म है' इतना सीख लेने मात्रसे ज्ञाननिष्ठा सिद्ध नहीं होती। जबतक अन्तःकरणमें राग अर्थात् काम-क्रोधादि विकार हैं, तबतक ज्ञाननिष्ठाका सिद्ध होना बहुत कठिन है। जैसे राग मिटानेके लिये कर्मयोगीके लिये सभी प्राणियोंके हितमें रति होना आवश्यक है, ऐसे ही निर्गुण-उपासना करनेवाले साधकोंके लिये भी प्राणिमात्रके हितमें रति होना आवश्यक है—तभी राग मिटकर ज्ञाननिष्ठा सिद्ध हो सकती है। इसी बातका लक्ष्य करानेके लिये यहाँ 'सर्वभूतहिते रताः' पद आये हैं।

दूसरी साधनामें, जो साधक संसारसे उदासीन रहकर एकात्ममें ही तत्त्वका चिन्तन करते रहते हैं, उनके लिये कर्मोंका स्वरूपसे त्याग सहायक तो होता है; परन्तु केवल कर्मोंका स्वरूपसे त्याग कर देनेमात्रसे ही सिद्धि प्राप्त नहीं होती (गीता—तीसरे अध्यायका चौथा श्लोक), प्रत्युत सिद्धि प्राप्त करनेके लिये भोगोंसे वैराग्य और शरीर-इन्द्रिय-मन-बुद्धिमें अपनेपनेके त्यागकी अत्यन्त आवश्यकता है। इसलिये वैराग्य और निर्ममताके लिये 'सर्वभूतहिते रताः' होना आवश्यक है।

ज्ञानयोगका साधक प्रायः समाजसे दूर, असंग रहता है। अतः उसमें व्यक्तित्व रह जाता है, जिसे दूर करनेके लिये संसारमात्रके हितका भाव रहना अत्यन्त आवश्यक है।

वास्तवमें असंगता शरीरसे ही होनी चाहिये। समाजसे असंगता होनेपर अहंभाव दृढ़ होता है, अर्थात् मिटता नहीं। जबतक साधक अपनेको शरीरसे स्पष्टतः अलग अनुभव नहीं कर लेता, तबतक संसारसे अलग रहनेमात्रसे उसका लक्ष्य सिद्ध नहीं होता; क्योंकि शरीर भी संसारका ही अंग है और शरीरमें तादात्म्य और ममताका न रहना ही उससे वस्तुतः अलग होना है। तादात्म्य और ममता मिटानेके लिये साधकको प्राणिमात्रके हितमें लगना आवश्यक है।

दूसरी बात यह है कि साधक सर्वदा एकात्ममें ही रहे, यह सम्भव भी नहीं है; क्योंकि शरीर-निर्वाहके लिये उसे व्यवहार-क्षेत्रमें आना ही पड़ता है और वैराग्यमें कमी होनेपर उसके व्यवहारमें अभिमानके कारण कठोरता आनेकी सम्भावना रहती है तथा कठोरता आनेसे उसके व्यक्तित्व-(अहंभाव-) का नाश नहीं होता। अतः उसे तत्त्वकी प्राप्तिमें कठिनता होती है। व्यवहारमें कहीं कठोरता न आ जाय, इसके लिये भी यह जरूरी है कि साधक सभी प्राणियोंके

श्लोक ३-४ ]

  • साधक-संजीवनी *

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हितमें रत रहे। ऐसे ज्ञानयोगके साधकद्वारा सेवाकार्यका विस्तार चाहे न हो; परन्तु भगवान् कहते हैं कि वह भी (सभी प्राणियोंके हितमें रति होनेके कारण) मेरेको प्राप्त कर लेगा।

सगुणोपासक और निर्गुणोपासक—दोनों ही प्रकारके साधकोंके लिये सम्पूर्ण प्राणियोंके हितका भाव रखना जरूरी है। सम्पूर्ण प्राणियोंके हितसे अलग अपना हित माननेसे 'अहम्' अर्थात् व्यक्तित्व बना रहता है, जो साधकके लिये आगे चलकर बाधक होता है। वास्तवमें कल्याण 'अहम्' के मिटनेपर ही होता है। अपने लिये किये जानेवाले साधनसे 'अहम्' बना रहता है, इसलिये 'अहम्'को पूर्णतया मिटानेके लिये साधकको प्रत्येक क्रिया (खाना, पीना, सोना आदि एवं जप, ध्यान, पाठ, स्वाध्याय आदि भी) संसारमात्रके हितके लिये ही करनी चाहिये। संसारके हितमें ही अपना हित निहित है। भगवान्की मात्र शक्ति परहितमें लग रही है। अतः जो सबके हितमें लगेगा, भगवान्की शक्ति उसके साथ हो जायगी।

केवल दूसरेके लिये वस्तुओंको देना और शरीरसे सेवा कर देना ही सेवा नहीं है, प्रत्युत अपने लिये कुछ भी न चाहकर दूसरेका हित कैसे हो, उसको सुख कैसे मिले—इस भावसे कर्म करना ही सेवा है। अपनेको सेवक कहलानेका भाव भी मनमें नहीं रहना चाहिये। सेवा तभी हो सकती है, जब सेवक जिसकी सेवा करता है, उसे अपनेसे अभिन्न (अपने शरीरकी तरह) मानता है और बदलेमें उससे कुछ भी लेना नहीं चाहता।

जैसे मनुष्य बिना किसीके उपदेश दिये अपने शरीरकी सेवा स्वतः ही बड़ी सावधानीसे करता है और सेवा करनेका अभिमान भी नहीं करता, ऐसे ही सर्वत्र भगवद्वुद्धि होनेसे भक्तकी स्वतः सबके हितमें रति रहती है (गीता—छठे अध्यायका बत्तीसवाँ श्लोक)। उनके द्वारा प्राणिमात्रका कल्याण होता है; परन्तु उनके मनमें लेशमात्र भी ऐसा भाव नहीं होता कि हम किसीका कल्याण कर रहे हैं। उनमें अहंताका सर्वथा अभाव हो जाता है, अतः ऐसे जीवन्मुक्त महापुरुषोंको आदर्श मानकर साधकको चाहिये कि सर्वत्र आत्मबुद्धि करके संसारके किसी भी प्राणीको किंचिन्मात्र भी दुःख न पहुँचाकर उनके हितमें सदा तत्परतासे स्वाभाविक ही रत रहे।

'सर्वत्र समबुद्धयः' —इस पदका भाव यह है कि निर्गुण-निराकार ब्रह्मके उपासकोंकी दृष्टि सम्पूर्ण प्राणी-

पदार्थोंमें परिपूर्ण परमात्मापर ही रहनेके कारण विषम नहीं होती; क्योंकि परमात्मा सम है (गीता—पाँचवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)।

यहाँ भगवान् ज्ञाननिष्ठावाले उपासकोंके लिये इस पदका प्रयोग करके एक विशेष भाव प्रकट करते हैं कि ज्ञानमार्गियोंके लिये एकात्ममें रहकर तत्त्वका चिन्तन करना ही एकमात्र साधन नहीं है; क्योंकि 'समबुद्धयः ' पदकी सार्थकता विशेषरूपसे व्यवहारकालमें ही होती है। दूसरी बात, संसारसे हटकर शरीरको निर्जन स्थानमें ले जाना ही सर्वथा एकात्म-सेवन नहीं है; क्योंकि शरीर भी तो संसारका ही एक अंग है। शरीर और संसारको अलग-अलग देखना विषमबुद्धि है। अतः शरीर और संसारको एक देखनेपर ही समबुद्धि हो सकती है। वास्तविक एकात्मकी सिद्धि तो परमात्मतत्त्वके अतिरिक्त अन्य सभी पदार्थों अर्थात् शरीर और संसारकी सत्ताका अभाव होनेसे ही होती है। साधन करनेके लिये एकात्म भी उपयोगी है; परन्तु सर्वथा एकात्मसेवी साधकके द्वारा व्यवहारकालमें भूल होना सम्भव है। शरीरमें अपनापन न होना ही वास्तविक एकात्म है। अतः साधकको चाहिये कि वास्तविक एकात्मको लक्ष्यमें रखकर अर्थात् शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धिसे अपनी अहंता-ममता हटाकर सर्वत्र परिपूर्ण ब्रह्ममें अभिन्न भावसे स्थित रहे। ऐसे साधक ही वास्तवमें समबुद्धि हैं।

गीतामें समबुद्धिका तात्पर्य 'समदर्शन' है न कि 'समवर्तन'। पाँचवें अध्यायके अठारहवें श्लोकमें भगवान्ने विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण तथा गाय, हाथी, कुत्ता और चाण्डाल—इन पाँच प्राणियोंके नाम गिनाये हैं, जिनके साथ व्यवहारमें किसी भी प्रकारसे समता होनी सम्भव नहीं। वहाँ भी 'समदर्शनः ' पद प्रयुक्त हुआ है। इससे यह तात्पर्य निकलता है कि सबके प्रति व्यवहार कभी समान नहीं हो सकता। व्यवहार एक समान कोई कर सकता भी नहीं और होना चाहिये भी नहीं। व्यवहारमें भिन्नता होनी आवश्यक है। व्यवहारमें साधककी विभिन्न प्राणी-पदार्थोंकी आकृति और उपयोगितापर दृष्टि रहते हुए भी वास्तवमें उसकी दृष्टि उन प्राणी-पदार्थोंमें परिपूर्ण परमात्मापर ही रहती है। जैसे विभिन्न प्रकारके गहनोंसे तत्त्व-(सोने-) में कोई अन्तर नहीं आता, ऐसे ही विभिन्न प्रकारके व्यवहारसे साधककी तत्त्व-दृष्टिमें कोई अन्तर नहीं आता। सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति साधकमें आन्तरिक समता रहती है। यहाँ 'समबुद्धयः ' पदसे उस

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १२ ]

आन्तरिक समताकी ओर ही लक्ष्य कराया गया है।

सिद्ध महापुरुषोंकी दृष्टिमें एक परमात्माके सिवाय दूसरी सत्ता न रहनेके कारण वे सदा और सर्वत्र 'समबुद्धि' ही हैं। सिद्ध महापुरुषोंकी स्वतःसिद्ध स्थिति ही साधकोंके लिये आदर्श होती है और उसीको लक्ष्य करके वे चलते हैं। साधकोंकी दृष्टिमें परमात्माके सिवाय अन्य पदार्थोंकी जितने अंशमें सत्ता रहती है, उतने ही अंशमें उनकी बुद्धिमें समता नहीं रहती। अतः साधककी बुद्धिमें अन्य पदार्थोंकी स्वतन्त्र सत्ता जैसे-जैसे कम होती जायगी, वैसे-वैसे ही उसकी बुद्धि सम होती जायगी।

साधक अपनी बुद्धिसे सर्वत्र परमात्माको देखनेकी चेष्टा करता है, जबकि सिद्ध महापुरुषोंकी बुद्धिमें परमात्मा स्वाभाविकरूपसे इतनी घनतासे परिपूर्ण हैं कि उनके लिये परमात्माके सिवाय और कुछ है ही नहीं। इसलिये उनकी बुद्धिका विषय परमात्मा नहीं है, प्रत्युत उनकी बुद्धि ही परमात्मासे परिपूर्ण है। अतः वे 'सर्वत्र समबुद्धयः' हैं।

'ते प्राप्नुवन्ति मामेव'—निर्गुणके उपासक कहीं यह समझ लें कि निर्गुण तत्त्व कोई दूसरा है और सगुण कोई दूसरा है, इसलिये भगवान् यह स्पष्ट करते हैं कि निर्गुण ब्रह्म मुझसे भिन्न नहीं है (गीता—नवें अध्यायका चौथा और चौदहवें अध्यायका सत्ताईसवाँ श्लोक)। सगुण और निर्गुण दोनों मेरे ही स्वरूप हैं।

इन दोनों श्लोकोंमें भगवान्ने निर्गुण-उपासकोंके लिये चार बातें बतायी हैं, (१) निर्गुण-तत्त्वका स्वरूप क्या है, (२) साधककी स्थिति क्या है, (३) उपासनाका स्वरूप

परिशिष्ट भाव—भगवान्ने यहाँ ब्रह्मके जो लक्षण (अचिन्त्य, कूटस्थ, अचल, अक्षर, अव्यक्त आदि) बताये हैं, वे ही लक्षण जीवात्माके भी बताये हैं; जैसे—'अचिन्त्य' (दूसरे अध्यायका पचीसवाँ श्लोक), 'कूटस्थ' (पन्द्रहवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक), 'अचल' (दूसरे अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक), 'अक्षर' (पन्द्रहवें अध्यायका सोलहवाँ और अठारहवाँ श्लोक), 'अव्यक्त' (दूसरे अध्यायका पचीसवाँ श्लोक) आदि। दोनोंके समान लक्षण बतानेका तात्पर्य है कि जीव और ब्रह्म—दोनों स्वरूपसे एक ही हैं। देहके साथ सम्बन्ध होनेसे (अनेक रूपसे) जो 'जीव' है, वही देहके साथ सम्बन्ध न होनेसे (एक रूपसे) 'ब्रह्म' है अर्थात् जीव केवल शरीरकी उपाधिसे, देहाभिमानके कारण ही अलग है, अन्यथा वह ब्रह्म ही है। इसलिये ब्रह्मकी प्राप्ति होनेपर उपासकको उपास्यसे सधर्मता प्राप्त हो जाती है—'इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः' (गीता १४।२)।

'ते प्राप्नुवन्ति मामेव'—सगुण (गुणसहित) और निर्गुण (गुणरहित)—दोनों विशेषणोंमें विशेष्य (तत्त्व) तो एक ही हुआ, इसलिये भगवान्ने निर्गुणके उपासकोंको भी अपनी ही प्राप्ति बतायी है। भगवान्के कथनका तात्पर्य है कि निर्गुण-निराकार रूप भी मेरा ही है, मेरे समग्ररूपसे अलग नहीं है।

'सर्वभूतहिते रताः'—जगत्, जीव और परमात्मा—तीनों ही दृष्टियोंसे हम सब एक हैं। तात्पर्य है कि सम्पूर्ण शरीर अपरा प्रकृतिके अन्तर्गत होनेसे एक हैं और सम्पूर्ण जीव परा प्रकृतिके अन्तर्गत होनेसे एक हैं। इसलिये जब साधककी सम्पूर्ण प्राणियोंमें समबुद्धि हो जाती है—'सर्वत्र समबुद्धयः' और वह अपने शरीरकी तरह ही सम्पूर्ण प्राणियोंको अपना

क्या है और (४) साधक क्या प्राप्त करता है।

(१) अर्जुनने इसी अध्यायके पहले श्लोकके उत्तरार्धमें जिस निर्गुण-तत्त्वके लिये 'अक्षरम्' और 'अव्यक्तम्' दो विशेषण प्रयुक्त करके प्रश्न किया था, उसी तत्त्वका विस्तारसे वर्णन करनेके लिये भगवान्ने छः और विशेषण अर्थात् कुल आठ विशेषण दिये, जिनमें पाँच निषेधात्मक (अक्षरम्, अनिर्देश्यम्, अव्यक्तम्, अचिन्त्यम् और अचलम्) तथा तीन विध्यात्मक (सर्वत्रगम्, कूटस्थम् और ध्रुवम्) विशेषण हैं।

(२) सब देश, काल, वस्तु और व्यक्तियोंमें परिपूर्ण तत्त्वपर दृष्टि रहनेसे निर्गुण-उपासकोंकी सर्वत्र समबुद्धि होती है। देहाभिमान और भोगोंकी पृथक् सत्ता माननेके कारण ही भोग भोगनेकी इच्छा होती है और भोग भोगे जाते हैं। परन्तु इन निर्गुण-उपासकोंकी दृष्टिमें एक परमात्माके अतिरिक्त अन्य किसी वस्तुकी पृथक् (स्वतन्त्र) सत्ता न होनेके कारण उनकी बुद्धिमें भोगोंका महत्त्व नहीं रहता। अतः वे सुगमतापूर्वक इन्द्रियोंका संयम कर लेते हैं। सर्वत्र समबुद्धिवाले होनेके कारण उनकी सब प्राणियोंके हितमें रति रहती है। इसलिये वे 'सर्वभूतहिते रताः' हैं।

(३) साधकका सब समय उस निर्गुण-तत्त्वकी ओर दृष्टि रखना (तत्त्वके सममुख रहना) ही 'उपासना' है।

(४) भगवान् कहते हैं कि ऐसे साधकोंको जो निर्गुण-ब्रह्म प्राप्त होता है, वह मैं ही हूँ। तात्पर्य यह है कि सगुण और निर्गुण एक ही तत्त्व है।

श्लोक ५ ]

  • साधक-संजीवनी *

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मानने लगता है—‘आत्मीयम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन’ (गीता ६।३२), तब उसकी सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें प्रीति हो जाती है। कारण कि सम्पूर्ण प्राणियोंको अपना ही शरीर माननेसे वह किसीको भी बुरा नहीं समझता, किसीका भी बुरा नहीं चाहता और किसीका भी बुरा नहीं करता। इस प्रकार बुराईका त्याग होनेपर उसके द्वारा स्वतः दूसरोंका हित होता है। इतना ही नहीं, जैसे अपने दाँतोंसे अपनी जीभ कट जाय तो दाँतोंपर क्रोध करके उनको कोई नहीं तोड़ता, ऐसे ही जो सब प्राणियोंको अपना मानता है, उसका कोई बुरा भी करता है, तो भी उसके मनमें उसका बुरा करनेका भाव नहीं आता—‘उमा संत कइ इहइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई॥’ (मानस, सुन्दर० ४१।४)। बुराईका त्याग होनेपर दूसरोंकी जो सेवा होती है, वह बड़े-से-बड़े दान-पुण्यसे भी नहीं हो सकती। इसलिये बुराईका त्याग भलाईका मूल है। जिसने बुराईका त्याग कर दिया है, वही ‘सर्वभूतहिते रताः’ हो सकता है।

सम्बन्ध—अर्जुनके प्रश्नके उत्तरमें भगवान्ने दूसरे श्लोकमें सगुण-उपासकोंको सर्वश्रेष्ठ बताया और तीसरे-चौथे श्लोकोंमें निर्गुण-उपासकोंको अपनी प्राप्तिकी बात कही। अब दोनों प्रकारकी उपासनाओंके अवान्तर भेद तथा कठिनाई एवं सुगमताका वर्णन आगेके तीन श्लोकोंमें करते हैं।

क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् ।

अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्धिरवाप्यते ॥५॥

अव्यक्तासक्त-क्लेशः= कष्टअव्यक्ता= अव्यक्त-विषयक
चेतसाम्अधिकतरः= अधिक होता है;गतिः= गति
चित्वालेहि= क्योंकिदुःखम्= कठिनातसे
तेषाम्देहवद्धिः= देहाभिमानियोंकेअवाप्यते= प्राप्त की
(अपने साधनमें)द्वाराजाती है।

व्याख्या—‘क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्त-चेतसाम्’—अव्यक्तमें आसक्त चित्वाले—इस विशेषणसे यहाँ उन साधकोंकी बात कही गयी है, जो निर्गुण-उपासनाको श्रेष्ठ तो मानते हैं, पर जिनका चित्त निर्गुण-तत्त्वमें आविष्ट नहीं हुआ है। तत्त्वमें आविष्ट होनेके लिये साधकमें तीन बातोंकी आवश्यकता होती है—रुचि, विश्वास और योग्यता। शास्त्रों और गुरुजनोंके द्वारा निर्गुण-तत्त्वकी महिमा सुननेसे जिनकी (निराकारमें आसक्त चित्वाला होने और निर्गुण-उपासनाको श्रेष्ठ माननेके कारण) उसमें कुछ रुचि तो पैदा हो जाती है और वे विश्वासपूर्वक साधन आरम्भ भी कर देते हैं; परन्तु वैराग्यकी कमी और देहाभिमानके कारण जिनका चित्त तत्त्वमें प्रविष्ट नहीं होता—ऐसे साधकोंके लिये यहाँ ‘अव्यक्तासक्तचेतसाम्’ पदका प्रयोग हुआ है।

भगवान्ने छठे अध्यायके सताईसवें-अट्ठाईसवें श्लोकोंमें बताया है कि ‘ब्रह्मभूत’ अर्थात् ब्रह्ममें अभिन्नभावसे स्थित साधकको सुखपूर्वक ब्रह्मकी प्राप्ति होती है। परन्तु यहाँ इस श्लोकमें ‘क्लेशः अधिकतरः’ पदोंसे यह स्पष्ट किया है कि इन साधकोंका चित्त ब्रह्मभूत साधकोंकी तरह

निर्गुण-तत्त्वमें सर्वथा तल्लीन नहीं हो पाया है। अतः उन्हें अव्यक्तमें ‘आविष्ट’ चित्वाला न कहकर ‘आसक्त’ चित्वाला कहा गया है। तात्पर्य यह है कि इन साधकोंकी आसक्ति तो देहमें होती है, पर अव्यक्तकी महिमा सुनकर वे निर्गुणोपासनाको ही श्रेष्ठ मानकर उसमें आसक्त हो जाते हैं; जबकि आसक्ति देहमें ही हुआ करती है, अव्यक्तमें नहीं।

तेरहवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें ‘अव्यक्तम्’ पद प्रकृतिके अर्थमें आया है तथा और भी कई जगह वह प्रकृतिके लिये ही प्रयुक्त हुआ है; परन्तु यहाँ ‘अव्यक्तासक्तचेतसाम्’ पदमें ‘अव्यक्त’ का अर्थ प्रकृति नहीं, प्रत्युत निर्गुण-निराकार ब्रह्म है। कारण यह है कि इसी अध्यायके पहले श्लोकमें अर्जुनने ‘त्वाम्’ पदसे सगुण-साकार स्वरूपके और ‘अव्यक्तम्’ पदसे निर्गुण-निराकार स्वरूपके विषयमें ही प्रश्न किया है। उपासनाका विषय भी परमात्मा ही है, न कि प्रकृति; क्योंकि प्रकृति और प्रकृतिका कार्य तो त्याज्य है। इसलिये उसी प्रश्नके उत्तरमें भगवान्ने ‘अव्यक्त’ पदका (व्यक्त रूपके विपरीत) निर्गुण-निराकार स्वरूपके अर्थमें ही प्रयोग किया है। अतः यहाँ प्रकृतिका प्रसंग न होनेके कारण ‘अव्यक्त’ पदका अर्थ

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १२ ]

प्रकृति नहीं लिया जा सकता।

नवें अध्यायके चौथे श्लोकमें 'अव्यक्तमूर्तिना' पद सगुण-निराकार स्वरूपके लिये आया है। ऐसी दशामें यह प्रश्न हो सकता है कि यहाँ भी 'अव्यक्तासक्तचेतसाम्' पदका अर्थ 'सगुण-निराकारमें आसक्त चित्तवाले पुरुष' ही क्यों न ले लिया जाय? परन्तु ऐसा अर्थ भी नहीं लिया जा सकता; क्योंकि इसी अध्यायके पहले श्लोकमें अर्जुनके प्रश्नमें 'त्वाम्' पद सगुण-साकारके लिये और 'अव्यक्तम्' पदके साथ 'अक्षरम्' पद निर्गुण-निराकारके लिये आया है। ब्रह्म क्या है?—अर्जुनके इस प्रश्नके उत्तरमें आठवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान् बता चुके हैं कि 'परम अक्षर ब्रह्म है' अर्थात् वहाँ भी 'अक्षरम्' पद

निर्गुण-निराकारके लिये ही आया है। इसलिये अर्जुनने 'अव्यक्तम् अक्षरम्' पदोंसे जिस निर्गुण-ब्रह्मके विषयमें प्रश्न किया था, उसीके उत्तरमें यहाँ ('अक्षर' विशेषण होनेसे) 'अव्यक्त' पदसे निर्गुण-निराकार ब्रह्म ही लेना चाहिये, सगुण-निराकार नहीं।

'क्लेशोऽधिकतरः' पदका भाव यह है कि जिन साधकोंका चित्त निर्गुण-तत्त्वमें तल्लीन नहीं होता, ऐसे निर्गुण-उपासकोंको देहाभिमानके कारण अपनी साधनामें विशेष कष्ट अर्थात् कठिनाई होती है*। गौणरूपसे इस पदका भाव यह है कि साधनाकी प्रारम्भिक अवस्थासे लेकर अन्तिम अवस्थातकके सभी निर्गुण-उपासकोंको सगुण-उपासकोंसे अधिक कठिनाई होती है।

विशेष बात

अब सगुण-उपासनाकी सुगमताओं और निर्गुण-उपासनाकी कठिनताओंका विवेचन किया जाता है—

सगुण-उपासनाकी सुगमताएँ

१—सगुण-उपासनामें उपास्यतत्त्वके सगुण-साकार होनेके कारण साधकके मन-इन्द्रियोंके लिये भगवान्के स्वरूप, नाम, लीला, कथा आदिका आधार रहता है। भगवान्के परायण होनेसे उसके मन-इन्द्रियाँ भगवान्के स्वरूप एवं लीलाओंके चिन्तन, कथा-श्रवण, भगवत्सेवा और पूजनमें अपेक्षाकृत सरलतासे लग जाते हैं (गीता—आठवें अध्यायका चौदहवाँ श्लोक)। इसलिये उसके द्वारा सांसारिक विषय-चिन्तनकी सम्भावना कम रहती है।

२—सांसारिक आसक्ति ही साधनमें क्लेश देती है। परन्तु सगुणोपासक इसको दूर करनेके लिये भगवान्के ही आश्रित रहता है। वह अपनेमें भगवान्का ही बल मानता

निर्गुण-उपासनाकी कठिनताएँ

१—निर्गुण-उपासनामें उपास्यतत्त्वके निर्गुण-निराकार होनेके कारण साधकके मन-इन्द्रियोंके लिये कोई आधार नहीं रहता। आधार न होने तथा वैराग्यकी कमीके कारण इन्द्रियोंके द्वारा विषय-चिन्तनकी अधिक सम्भावना रहती है।

२—देहमें जितनी अधिक आसक्ति होती है, साधनमें उतना ही अधिक क्लेश मालूम देता है। निर्गुणोपासक उसे विवेकके द्वारा हटानेकी चेष्टा करता है। विवेकका आश्रय लेकर साधन करते हुए वह अपने ही साधन-बलको महत्त्व देता है। बँदरीका छोटा बच्चा जैसे (अपने

  • साधक मुख्यतः दो प्रकारके होते हैं—

एक तो वे साधक हैं, जो सत्संग, श्रवण और शास्त्राध्ययनके फलस्वरूप साधनमें प्रवृत्त होते हैं। इनको अपने साधनमें अधिक क्लेश होता है।

दूसरे वे साधक हैं, जिनकी साधनमें स्वाभाविक रुचि तथा संसारसे स्वाभाविक वैराग्य होता है। इनको अपने साधनमें कम क्लेश होता है।

यहाँ यह शंका हो सकती है कि साधक दो ही प्रकारके क्यों होते हैं? इसका समाधान यह है कि गीतामें योगभ्रष्ट पुरुषकी गतिके वर्णनमें भगवान्ने दो ही गतियोंका वर्णन किया है—

(१) कुछ योगभ्रष्ट पुरुष पुण्यलोकोंमें जाते हैं और वहाँ भोग भोगकर लौटनेपर शुद्ध आचरणवाले श्रीमानोंके घरमें जन्म लेते हैं और पुनः साधनरत होकर परमात्माको प्राप्त होते हैं (गीता—छठे अध्यायका इकतालीसवाँ, चौवालीसवाँ और पैतालीसवाँ श्लोक)।

(२) कुछ योगभ्रष्ट पुरुष सीधे ज्ञानवान् योगियोंके ही कुलमें जन्म लेते हैं और फिर साधन करके परमात्माको प्राप्त होते हैं। ऐसे कुलमें जन्म होना 'दुर्लभतर' है (गीता—छठे अध्यायका बयालीसवाँ-तैतालीसवाँ श्लोक)।

श्लोक ५ ]

  • साधक-संजीवनी *

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है। बिल्लीका बच्चा जैसे माँपर निर्भर रहता है, ऐसे ही यह साधक भी भगवान्पर निर्भर रहता है। भगवान् ही उसकी सँभाल करते हैं (गीता ९।२२)।

सुनु मुनि तोहि कहउँ सहोसा।

भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा॥

करउँ सदा तिन कै रखवारी।

जिमि बालक राखइ महतारी॥

(मानस ३।४३।२-३)

अतः उसकी सांसारिक आसक्ति सुगमतासे मिट जाती है।

३—ऐसे उपासकोंके लिये गीतामें भगवान्ने ‘नचिरात्’ आदि पदोंसे शीघ्र ही अपनी प्राप्ति बतायी है (गीता—बारहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक)।

४—सगुण-उपासकोंके अज्ञानरूप अन्धकारको भगवान् ही मिटा देते हैं (गीता—दसवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)।

५—उनका उद्धार भगवान् करते हैं (गीता—बारहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक)।

६—ऐसे उपासकोंमें यदि कोई सूक्ष्म दोष रह जाता है, तो (भगवान्पर निर्भर होनेसे) सर्वज्ञ भगवान् कृपा करके उसको दूर कर देते हैं (गीता—अठारहवें अध्यायका अठ्ठावनवाँ और छाछठवाँ श्लोक)।

७—ऐसे उपासकोंकी उपासना भगवान्की ही उपासना है। भगवान् सदा-सर्वदा पूर्ण हैं ही। अतः भगवान्की पूर्णतामें किंचिन्मात्र भी संदेह न रहनेके कारण उनमें सुगमतासे श्रद्धा हो जाती है। श्रद्धा होनेसे वे नित्य-निरन्तर भगवत्परायण हो जाते हैं। अतः भगवान् ही उन उपासकोंको बुद्धियोग प्रदान करते हैं, जिससे उन्हें भगवत्प्राप्ति हो जाती है (गीता—दसवें अध्यायका दसवाँ श्लोक)।

८—ऐसे उपासक भगवान्को परम कृपालु मानते हैं। अतः उनकी कृपाके आश्रयसे वे सब कठिनाइयोंको पार कर जाते हैं। यही कारण है कि उनका साधन सुगम हो जाता है और भगवत्-कृपाके बलसे वे शीघ्र ही भगवत्प्राप्ति कर लेते हैं (गीता—अठारहवें अध्यायके छप्पनवेंसे अठ्ठावनवें श्लोकतक)।

९—मनुष्यमें कर्म करनेका अभ्यास तो रहता ही है (गीता—तीसरे अध्यायका पाँचवाँ श्लोक), इसलिये भक्तको अपने कर्म भगवान्के प्रति करनेमें केवल भाव ही बदलना पड़ता है; कर्म तो वे ही रहते हैं। अतः भगवान्के लिये कर्म करनेसे भक्त कर्म-बन्धनसे सुगमतापूर्वक मुक्त हो

जाता है (गीता—अठारहवें अध्यायका छियालीसवाँ श्लोक)। बलपर निर्भर होनेसे अपनी माँको पकड़े रहता है और अपनी पकड़से ही अपनी रक्षा मानता है, ऐसे ही यह साधक अपने साधनके बलपर अपनी उन्नति मानता है (गीता—अठारहवें अध्यायके इक्यावनवेंसे तिरपनवें श्लोकतक)। इसीलिये श्रीरामचरितमानसमें भगवान्ने इसको अपने समझदार पुत्रकी उपमा दी है—

मोरेँ प्रौढ़ तनय सम ग्यानी।

बालक सुत सम दास अमानी॥

(३।४३।४)

३—ज्ञानयोगियोंके द्वारा लक्ष्यप्राप्तिके प्रसंगमें चौथे अध्यायके उन्तालीसवें श्लोकमें ‘अचिरेण’ पद तत्त्वज्ञानके अनन्तर शान्तिकी प्राप्तिके लिये आया है, न कि तत्त्वज्ञानकी प्राप्तिके लिये।

४—निर्गुण-उपासक तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति स्वयं करते हैं (गीता—तेरहवें अध्यायका चौतीसवाँ श्लोक)।

५—ये अपना उद्धार (निर्गुण-तत्त्वकी प्राप्ति) स्वयं करते हैं (गीता—पाँचवें अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक)।

६—ऐसे उपासकोंमें यदि कोई कमी रह जाती है, तो उस कमीका अनुभव उनको विलम्बसे होता है और कमीको ठीक-ठीक पहचाननेमें भी कठिनाई होती है। हाँ, कमीको ठीक-ठीक पहचान लेनेपर ये भी उसे दूर कर सकते हैं।

७—चौथे अध्यायके चौतीसवें और तेरहवें अध्यायके सातवें श्लोकमें भगवान्ने ज्ञानयोगियोंको ज्ञानप्राप्तिके लिये गुरुकी उपासनाकी आज्ञा दी है। अतः निर्गुण-उपासनामें गुरुकी आवश्यकता भी है; किंतु गुरुकी पूर्णताका निश्चित पता न होनेपर अथवा गुरुके पूर्ण न होनेपर स्थिर श्रद्धा होनेमें कठिनाई होती है तथा साधनकी सफलतामें भी विलम्बकी सम्भावना रहती है।

८—ऐसे उपासक उपास्य-तत्त्वको निर्गुण, निराकार और उदासीन मानते हैं। अतः उन्हें भगवान्की कृपाका वैसा अनुभव नहीं होता। वे तत्त्वप्राप्तिमें आनेवाले विचारोंको अपनी साधनाके बलपर ही दूर करनेमें कठिनाईका अनुभव करते हैं। फलस्वरूप तत्त्वकी प्राप्तिमें भी उन्हें विलम्ब हो सकता है।

९—ज्ञानयोगी अपनी क्रियाओंको सिद्धान्ततः प्रकृतिके अर्पण करता है; किन्तु पूर्ण विवेक जाग्रत् होनेपर ही उसकी क्रियाएँ प्रकृतिके अर्पण हो सकती हैं। यदि

८१८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १२ ]

१०—हृदयमें पदार्थोंका आदर रहते हुए भी यदि वे प्राणियोंकी सेवामें लग जाते हैं तो उन्हें पदार्थोंका त्याग करनेमें कठिनाई नहीं होती। सत्यात्रोंके लिये पदार्थोंके त्यागमें तो और भी सुगमता है। फिर भगवान्के लिये तो पदार्थोंका त्याग बहुत ही सुगमतासे हो सकता है।

११—इस साधनमें विवेक और वैराग्यकी उतनी आवश्यकता नहीं है, जितनी प्रेम और विश्वासकी है। जैसे, कौरवोंके प्रति द्वेष-वृत्ति रहते हुए भी द्रौपदीके पुकारनेमात्रसे भगवान् प्रकट हो जाते थे;१ क्योंकि वह भगवान्को अपना मानती थी। भगवान् तो अपने साथ भक्तके प्रेम और विश्वासको ही देखते हैं, उसके दोषोंको नहीं। भगवान्के साथ अपनापनका सम्बन्ध जोड़ना उतना कठिन नहीं (क्योंकि भगवान्की ओरसे अपनापन स्वतःसिद्ध

‘अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्विरवाप्यते’—‘देहै’, ‘देहभूत्’ आदि पदोंका अर्थ साधारणतया ‘देहधारी पुरुष’ लिया जाता है। प्रसंगानुसार इनका अर्थ ‘जीव’ और ‘आत्मा’ भी लिया जाता है। यहाँ ‘देहवद्विः’२ पदका अर्थ ‘देहाभिमानी मनुष्य’ लेना चाहिये; क्योंकि निर्गुण-उपासकोंके लिये इसी श्लोकके पूर्वार्धमें ‘अव्यक्तासक्तचेतसाम्’ पद आया है, जिससे यह प्रतीत होता है कि वे निर्गुण-उपासनाको श्रेष्ठ तो मानते हैं; परन्तु उनका चित्त देहाभिमानके कारण निर्गुण-तत्त्वमें आविष्ट नहीं हुआ है। देहाभिमानके कारण ही उन्हें साधनमें अधिक क्लेश होता है।

निर्गुण-उपासनामें देहाभिमान ही मुख्य बाधा है—

परिशिष्ट भाव —निर्गुणोपासनामें जो देहसहित है, वह ‘उपासक’ (जीव) है और जो देहरहित है, वह ‘उपास्य’ (ब्रह्म) है। देहके साथ माना हुआ सम्बन्ध ही जीव और ब्रह्मकी एकतामें खास बाधक है। इसलिये देहाभिमानीके लिये निर्गुणोपासनाकी सिद्धि कठिनातासे तथा देरीसे होती है। परन्तु सगुणोपासनामें भगवान्की विमुखता बाधक है, देहाभिमान बाधक नहीं है। इसलिये सगुणोपासक संसारसे विमुख होकर भगवान्के सम्मुख हो जाता है, साधनके आश्रित न होकर भगवान्के आश्रित हो जाता है। अतः भगवान् कृपा करके उसका शीघ्र ही उद्धार कर देते हैं (गीता—बारहवें अध्यायका

१—यह बात उन भक्तोंके लिये है, जिनके स्मरणमात्रसे भगवान् प्रकट हो जाते हैं, सर्वसाधारणके लिये नहीं है। जो भक्त सर्वथा भगवान्पर निर्भर हो जाता है एवं जिसकी भगवान्के साथ इतनी प्रगाढ़ आत्मीयता होती है कि केवल स्मरणसे भगवान् प्रकट हो जाते हैं, उसके दोष दूर करनेका दायित्व भगवान्पर आ जाता है।

२—यहाँ ‘देह’ शब्दमें ‘भूमिनिन्दाप्रशंसासु नित्ययोगेऽतिशयाने। संसर्गेऽस्ति विवक्षायां भवन्ति मनुबादयः ॥’—इस कारिकाके अनुसार संसर्ग अर्थमें ‘तदस्यास्त्यस्मिन्निति मनुप्’ (५।२।१४), इस पाणिनिसूत्रसे ‘मनुप्’ प्रत्यय किया गया है। ‘देहवद्विः’ पदका अर्थ है—वे मनुष्य, जिनका देहके साथ दृढ़तापूर्वक सम्बन्ध माना हुआ है।

छठे अध्यायके सप्ताईसवें श्लोकमें ‘ब्रह्मभूत’ होनेपर सुखपूर्वक ब्रह्मकी प्राप्ति बतायी गयी है, जबकि यहाँ ‘देहभूत’ होनेके कारण दुःखपूर्वक ब्रह्मकी प्राप्ति बतायी गयी है।

है), जितना कि पात्र बनना कठिन है। विवेककी किंचिन्मात्र भी कमी रही तो क्रियार्थ प्रकृतिके अर्पण नहीं होगी और साधक कर्तृत्वाभिमान रहनेसे कर्म-बन्धनमें बँध जायगा।

१०—जबतक साधकके चित्तमें पदार्थोंका किंचिन्मात्र भी आदर तथा अपने कहलानेवाले शरीर और नाममें अहंता-ममता है, तबतक उसके लिये पदार्थोंको मायामय समझकर उनका त्याग करना कठिन होता है।

११—यह साधक पात्र बननेपर ही तत्त्वको प्राप्त कर सकेगा। पात्र बननेके लिये विवेक और तीव्र वैराग्यकी आवश्यकता होगी, जिनको आसक्ति रहते हुए प्राप्त करना कठिन है।

‘देहाभिमाननि सवै दोषाः प्रादुर्भवन्ति’—इस बाधाकी ओर ध्यान दिलानेके लिये ही भगवान्ने ‘देहवद्विः’ पद दिया है। इस देहाभिमानको दूर करनेके लिये ही (अर्जुनके पूछे बिना ही) भगवान्ने तेरहवाँ और चौदहवाँ अध्याय कहा है। उनमें भी तेरहवें अध्यायका प्रथम श्लोक देहाभिमान मिटानेके लिये ही कहा गया है।

ब्रह्मके निर्गुण-निराकार स्वरूपकी प्राप्तिको यहाँ ‘अव्यक्ता गतिः’ कहा गया है। साधारण मनुष्योंकी स्थिति व्यक्त अर्थात् देहमें होती है। इसलिये उन्हें अव्यक्तमें स्थित होनेमें कठिनाईका अनुभव होता है। यदि साधक अपनेको देहवाला न माने, तो उसकी अव्यक्तमें सुगमता और शीघ्रतापूर्वक स्थिति हो सकती है।

श्लोक ६ ]

  • साधक-संजीवनी *

८१९

सातवाँ और आठवें अध्यायका चौदहवाँ श्लोक। यह सगुणोपासनाकी विलक्षणता है!

सगुणोपासनामें भक्त जगत्को मिथ्या मानकर उसके त्यागपर जोर नहीं देता; क्योंकि उसकी दृष्टिमें जड़-चेतन, सत्-असत् सब कुछ भगवान् ही हैं—‘सदसच्चाहमजुन’ (गीता ९।१९)। इसलिये सगुणकी उपासना समग्रकी उपासना है। गीताने सगुणको समग्र माना है और ब्रह्म, जीव, कर्म, अधिभूत, अधिदेव और अधियज्ञ—इन सबको समग्र भगवान्के ही अन्तर्गत माना है (गीता—सातवें अध्यायका उन्तीसवाँ-तीसवाँ श्लोक)। इसलिये गीताको देखनेसे ऐसा प्रतीत होता है कि निर्गुणोपासना (ब्रह्मकी उपासना) समग्र भगवान्के एक अंगकी उपासना है और सगुणोपासना स्वयं समग्र भगवान्की उपासना है—‘त्वां पर्युपासते’ (गीता १२।१), ‘मां ध्यायन्त उपासते’ (१२।६)।

जो समग्र, भगवान्के एक अंगकी उपासना करता है, उसको भी अन्तमें समग्रकी प्राप्ति होती है—‘ते प्राप्नुवन्ति मामेव’ (गीता १२।४), ‘ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्’ (१८।५५)। अतः जिसको निर्गुण अच्छा लगता हो, वह निर्गुणकी उपासना करे, पर उसको निर्गुणका आग्रह रखकर सगुणका तिरस्कार नहीं करना चाहिये। सगुणका तिरस्कार, निन्दा, खण्डन करना निर्गुणोपासकके लिये बहुत घातक है अर्थात् उसकी साधनाके सिद्ध होनेमें बहुत बाधक है। कारण कि अपरा प्रकृति भगवान्की है; अतः उसकी निन्दा करनेसे वह भगवान्की निन्दा होती है। गुणोंका खण्डन करनेसे गुणोंकी सत्ता आ जाती है, जो बाधक होती है; क्योंकि सत्ता माने बिना साधक निराकरण किसका करेगा? अतः साधक यदि दूसरेकी निन्दा, तिरस्कार न करके तत्परतापूर्वक अपने साधनमें लगा रहे तो आगे चलकर सभी साधक एक हो जाते हैं; क्योंकि तत्त्व एक ही है। सगुणकी उपेक्षा करनेसे साधक मुक्त तो हो सकता है, पर मतभेद नहीं मिट सकता। परन्तु सगुणकी उपेक्षा न रहनेसे मतभेद भी नहीं रहता और साधकको समग्रकी प्राप्ति हो जाती है।

ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्यस्य मत्पराः ।

अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥ ६ ॥

तु= परन्तुसन्यस्य= अर्पण करकेमाम्= मेरा
ये= जो(और)एव= ही
सर्वाणि= सम्पूर्णमत्पराः= मेरे परायण होकरध्यायन्तः= ध्यान करते हुए
कर्माणि= कर्मोंकोअनन्येन= अनन्य-उपासते= (मेरी) उपासना
मयि= मेरेयोगेन= योग-(सम्बन्ध-) सेकरते हैं।

व्याख्या —[ग्यारहवें अध्यायके पचपनवें श्लोकमें भगवान्ने अनन्य भक्तके लक्षणोंमें तीन विध्यात्मक (‘मत्कर्मकृत’, ‘मत्परमः’ और ‘मद्भक्तः’) और दो निषेधात्मक (‘संगवर्जितः’ और ‘निर्वैरः’) पद दिये थे। उन्हीं पदोंका संकेत इस श्लोकमें इस प्रकार किया गया है—

(१) ‘सर्वाणि कर्माणि मयि सन्यस्य’ पदोंसे ‘मत्कर्मकृत’ की ओर लक्ष्य है।

(२) ‘मत्पराः’ पदसे ‘मत्परमः’ का संकेत है।

(३) ‘अनन्येनैव योगेन’ पदोंमें ‘मद्भक्तः’ का लक्ष्य है।

(४) भगवान्में ही अनन्यतापूर्वक लगे रहनेके कारण उनकी कहीं भी आसक्ति नहीं होती; अतः वे ‘संगवर्जितः’ हैं।

(५) कहीं भी आसक्ति न रहनेके कारण उनके मनमें किसीके प्रति भी वैर, द्वेष, क्रोध आदिका भाव नहीं रहता, इसलिये ‘निर्वैरः’ पदका भाव भी इसीके अन्तर्गत आ जाता है। परन्तु भगवान्ने इसे महत्त्व देनेके लिये आगे तेरहवें श्लोकमें सिद्ध भक्तोंके लक्षणोंमें सबसे पहले ‘अद्वेष्टा’ पदका प्रयोग किया है। अतः साधकको किसीमें किंचिन्मात्र भी द्वेष नहीं रखना चाहिये।

‘ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्यस्य’—अब

  • वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ञानमद्वयम्। ब्रह्मोति परमात्मेति भगवानिति शब्दोते ॥

(श्रीमद्भगवद्गीता १।२।११)

‘तत्त्वज्ञ महापुरुष उस ज्ञानस्वरूप एवं अद्वितीय तत्त्वको ही ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्—इन तीन नामोंसे कहते हैं।’

८२०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १२ ]

यहाँसे निर्गुणोपासनाकी अपेक्षा सगुणोपासनाकी सुगमता बतानेके लिये ‘तु’ पदसे प्रकरण-भेद करते हैं।

यद्यपि ‘कर्मणि’ पद स्वयं ही बहुवचनान्त होनेसे सम्पूर्ण कर्मोंका बोध कराता है, तथापि इसके साथ ‘सर्वाणि’ विशेषण देकर मन, वाणी, शरीरसे होनेवाले सभी लौकिक (शरीर-निर्वाह और आजीविका-सम्बन्धी) एवं पारमार्थिक (जप-ध्यान-सम्बन्धी) शास्त्रविहित कर्मोंका समावेश किया गया है (गीता—नवें अध्यायका सताईसवाँ श्लोक)।

यहाँ ‘मयि सन्यस्य’ पदोंसे भगवान्का आशय क्रियाओंका स्वरूपसे त्याग करनेका नहीं है। कारण कि एक तो स्वरूपसे कर्मोंका त्याग सम्भव नहीं (गीता—तीसरे अध्यायका पाँचवाँ और अठारहवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)। दूसरे, यदि सगुणोपासक मोहपूर्वक शास्त्रविहित क्रियाओंका स्वरूपसे त्याग करता है, तो उसका यह त्याग ‘तामस’ होगा (गीता—अठारहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक) और यदि दुःखरूप समझकर शारीरिक क्लेशके भयसे वह उनका त्याग करता है, तो यह त्याग ‘राजस’ होगा (गीता—अठारहवें अध्यायका आठवाँ श्लोक)। अतः इस रीतिसे त्याग करनेपर कर्मोंसे सम्बन्ध नहीं छूटेगा। कर्मबन्धनसे मुक्त होनेके लिये यह आवश्यक है कि साधक कर्मोंमें ममता, आसक्ति और फलेच्छाका त्याग करे; क्योंकि ममता, आसक्ति और फलेच्छासे किये गये कर्म ही बाँधनेवाले होते हैं।

यदि साधकका लक्ष्य भगवत्प्राप्ति होता है, तो वह पदार्थोंकी इच्छा नहीं करता और अपने-आपको भगवान्का समझनेके कारण उसकी ममता शरीरादिसे हटकर एक भगवान्में ही हो जाती है। स्वयं भगवान्के अपित होनेसे उसके सम्पूर्ण कर्म भी भगवदपित हो जाते हैं।

भगवान्के लिये कर्म करनेके विषयमें कई प्रकार हैं, जिनको गीतामें ‘मदपंण कर्म’, ‘मदर्थ कर्म’ और ‘मत्कर्म’ नामसे कहा गया है।

१—‘मदपंण कर्म’ उन कर्मोंको कहते हैं, जिनका उद्देश्य पहले कुछ और हो; किन्तु कर्म करते समय अथवा कर्म करनेके बाद उनको भगवान्के अर्पण कर दिया जाय।

२—‘मदर्थ कर्म’ वे कर्म हैं, जो आरम्भसे ही भगवान्के लिये किये जायँ अथवा जो भगवत्सेवारूप हों। भगवत्प्राप्तिके लिये कर्म करना भगवान्की आज्ञा मानकर कर्म करना, और भगवान्की प्रसन्नताके लिये कर्म

करना—ये सभी भगवदर्थ कर्म हैं।

३—भगवान्का ही काम समझकर सम्पूर्ण लौकिक (व्यापार, नौकरी आदि) और भगवत्सम्बन्धी (जप, ध्यान आदि) कर्मोंको करना ‘मत्कर्म’ है।

वास्तवमें कर्म कैसे भी किये जायँ, उनका उद्देश्य एकमात्र भगवत्प्राप्ति ही होना चाहिये।

उपर्युक्त तीनों ही प्रकारों—(मदपंण-कर्म, मदर्थ-कर्म, मत्कर्म—)से सिद्धि प्राप्त करनेवाले साधकका कर्मोंसे किंचित्मात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता; क्योंकि उसमें न तो फलेच्छा और कर्तृत्वाभिमान है और न पदार्थोंमें और शरीर, मन, बुद्धि तथा इन्द्रियोंमें ममता ही है। जब कर्म करनेके साधन शरीर, मन, बुद्धि आदि ही अपने नहीं हैं, तो फिर कर्मोंमें ममता हो ही कैसे सकती है। इस प्रकार कर्मोंसे सर्वथा मुक्त हो जाना ही वास्तविक समर्पण है। सिद्ध पुरुषोंकी क्रियाओंका स्वतः ही समर्पण होता है और साधक पूर्ण समर्पणका उद्देश्य रखकर वैसे ही कर्म करनेकी चेष्टा करता है।

जैसे भक्तियोगी अपनी क्रियाओंको भगवान्के अर्पण करके कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है, ऐसे ही ज्ञानयोगी क्रियाओंको प्रकृतिसे हुई समझकर अपनेको उनसे सर्वथा असंग और निर्लिप्त अनुभव करके कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है।

‘मत्पराः’—परायण होनेका अर्थ है—भगवान्को परमपूज्य और सर्वश्रेष्ठ समझकर भगवान्के प्रति समर्पण-भावसे रहना। सर्वथा भगवान्के परायण होनेसे सगुण-उपासक अपने-आपको भगवान्का यन्त्र समझता है। अतः शुभ क्रियाओंको वह भगवान्के द्वारा करवायी हुई मानता है तथा संसारका उद्देश्य न रहनेके कारण उसमें भोगोंकी कामना नहीं रहती और कामना न रहनेके कारण उससे अशुभ क्रियाएँ होती ही नहीं।

‘अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते’—इन पदोंमें इष्ट-सम्बन्धी और उपाय-सम्बन्धी—दोनों प्रकारकी अनन्यताका संकेत है अर्थात् उन भक्तोंके इष्ट भगवान् ही हैं; उनके सिवाय अन्य कोई साध्य उनकी दृष्टिमें है ही नहीं और उनकी प्राप्तिके लिये आश्रय भी उन्हींका है। वे भगवत्कृपासे ही साधनकी सिद्धि मानते हैं, अपने पुरुषार्थ या साधनके बलसे नहीं। वे उपाय भी भगवान्को मानते हैं और उपेय भी। वे एक भगवान्का ही लक्ष्य, ध्येय रखकर उपासना अर्थात् जप, ध्यान, कीर्तन आदि करते हैं।

‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई’—इस प्रकार केवल भगवान्से ही सम्बन्ध मानना ‘अनन्ययोग’ है।