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भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 821

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १२ ]

यहाँसे निर्गुणोपासनाकी अपेक्षा सगुणोपासनाकी सुगमता बतानेके लिये ‘तु’ पदसे प्रकरण-भेद करते हैं।

यद्यपि ‘कर्मणि’ पद स्वयं ही बहुवचनान्त होनेसे सम्पूर्ण कर्मोंका बोध कराता है, तथापि इसके साथ ‘सर्वाणि’ विशेषण देकर मन, वाणी, शरीरसे होनेवाले सभी लौकिक (शरीर-निर्वाह और आजीविका-सम्बन्धी) एवं पारमार्थिक (जप-ध्यान-सम्बन्धी) शास्त्रविहित कर्मोंका समावेश किया गया है (गीता—नवें अध्यायका सताईसवाँ श्लोक)।

यहाँ ‘मयि सन्यस्य’ पदोंसे भगवान्का आशय क्रियाओंका स्वरूपसे त्याग करनेका नहीं है। कारण कि एक तो स्वरूपसे कर्मोंका त्याग सम्भव नहीं (गीता—तीसरे अध्यायका पाँचवाँ और अठारहवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)। दूसरे, यदि सगुणोपासक मोहपूर्वक शास्त्रविहित क्रियाओंका स्वरूपसे त्याग करता है, तो उसका यह त्याग ‘तामस’ होगा (गीता—अठारहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक) और यदि दुःखरूप समझकर शारीरिक क्लेशके भयसे वह उनका त्याग करता है, तो यह त्याग ‘राजस’ होगा (गीता—अठारहवें अध्यायका आठवाँ श्लोक)। अतः इस रीतिसे त्याग करनेपर कर्मोंसे सम्बन्ध नहीं छूटेगा। कर्मबन्धनसे मुक्त होनेके लिये यह आवश्यक है कि साधक कर्मोंमें ममता, आसक्ति और फलेच्छाका त्याग करे; क्योंकि ममता, आसक्ति और फलेच्छासे किये गये कर्म ही बाँधनेवाले होते हैं।

यदि साधकका लक्ष्य भगवत्प्राप्ति होता है, तो वह पदार्थोंकी इच्छा नहीं करता और अपने-आपको भगवान्का समझनेके कारण उसकी ममता शरीरादिसे हटकर एक भगवान्में ही हो जाती है। स्वयं भगवान्के अपित होनेसे उसके सम्पूर्ण कर्म भी भगवदपित हो जाते हैं।

भगवान्के लिये कर्म करनेके विषयमें कई प्रकार हैं, जिनको गीतामें ‘मदपंण कर्म’, ‘मदर्थ कर्म’ और ‘मत्कर्म’ नामसे कहा गया है।

१—‘मदपंण कर्म’ उन कर्मोंको कहते हैं, जिनका उद्देश्य पहले कुछ और हो; किन्तु कर्म करते समय अथवा कर्म करनेके बाद उनको भगवान्के अर्पण कर दिया जाय।

२—‘मदर्थ कर्म’ वे कर्म हैं, जो आरम्भसे ही भगवान्के लिये किये जायँ अथवा जो भगवत्सेवारूप हों। भगवत्प्राप्तिके लिये कर्म करना भगवान्की आज्ञा मानकर कर्म करना, और भगवान्की प्रसन्नताके लिये कर्म

करना—ये सभी भगवदर्थ कर्म हैं।

३—भगवान्का ही काम समझकर सम्पूर्ण लौकिक (व्यापार, नौकरी आदि) और भगवत्सम्बन्धी (जप, ध्यान आदि) कर्मोंको करना ‘मत्कर्म’ है।

वास्तवमें कर्म कैसे भी किये जायँ, उनका उद्देश्य एकमात्र भगवत्प्राप्ति ही होना चाहिये।

उपर्युक्त तीनों ही प्रकारों—(मदपंण-कर्म, मदर्थ-कर्म, मत्कर्म—)से सिद्धि प्राप्त करनेवाले साधकका कर्मोंसे किंचित्मात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता; क्योंकि उसमें न तो फलेच्छा और कर्तृत्वाभिमान है और न पदार्थोंमें और शरीर, मन, बुद्धि तथा इन्द्रियोंमें ममता ही है। जब कर्म करनेके साधन शरीर, मन, बुद्धि आदि ही अपने नहीं हैं, तो फिर कर्मोंमें ममता हो ही कैसे सकती है। इस प्रकार कर्मोंसे सर्वथा मुक्त हो जाना ही वास्तविक समर्पण है। सिद्ध पुरुषोंकी क्रियाओंका स्वतः ही समर्पण होता है और साधक पूर्ण समर्पणका उद्देश्य रखकर वैसे ही कर्म करनेकी चेष्टा करता है।

जैसे भक्तियोगी अपनी क्रियाओंको भगवान्के अर्पण करके कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है, ऐसे ही ज्ञानयोगी क्रियाओंको प्रकृतिसे हुई समझकर अपनेको उनसे सर्वथा असंग और निर्लिप्त अनुभव करके कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है।

‘मत्पराः’—परायण होनेका अर्थ है—भगवान्को परमपूज्य और सर्वश्रेष्ठ समझकर भगवान्के प्रति समर्पण-भावसे रहना। सर्वथा भगवान्के परायण होनेसे सगुण-उपासक अपने-आपको भगवान्का यन्त्र समझता है। अतः शुभ क्रियाओंको वह भगवान्के द्वारा करवायी हुई मानता है तथा संसारका उद्देश्य न रहनेके कारण उसमें भोगोंकी कामना नहीं रहती और कामना न रहनेके कारण उससे अशुभ क्रियाएँ होती ही नहीं।

‘अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते’—इन पदोंमें इष्ट-सम्बन्धी और उपाय-सम्बन्धी—दोनों प्रकारकी अनन्यताका संकेत है अर्थात् उन भक्तोंके इष्ट भगवान् ही हैं; उनके सिवाय अन्य कोई साध्य उनकी दृष्टिमें है ही नहीं और उनकी प्राप्तिके लिये आश्रय भी उन्हींका है। वे भगवत्कृपासे ही साधनकी सिद्धि मानते हैं, अपने पुरुषार्थ या साधनके बलसे नहीं। वे उपाय भी भगवान्को मानते हैं और उपेय भी। वे एक भगवान्का ही लक्ष्य, ध्येय रखकर उपासना अर्थात् जप, ध्यान, कीर्तन आदि करते हैं।

‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई’—इस प्रकार केवल भगवान्से ही सम्बन्ध मानना ‘अनन्ययोग’ है।