सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 820, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 820

श्लोक ६ ]

  • साधक-संजीवनी *

८१९

सातवाँ और आठवें अध्यायका चौदहवाँ श्लोक। यह सगुणोपासनाकी विलक्षणता है!

सगुणोपासनामें भक्त जगत्को मिथ्या मानकर उसके त्यागपर जोर नहीं देता; क्योंकि उसकी दृष्टिमें जड़-चेतन, सत्-असत् सब कुछ भगवान् ही हैं—‘सदसच्चाहमजुन’ (गीता ९।१९)। इसलिये सगुणकी उपासना समग्रकी उपासना है। गीताने सगुणको समग्र माना है और ब्रह्म, जीव, कर्म, अधिभूत, अधिदेव और अधियज्ञ—इन सबको समग्र भगवान्के ही अन्तर्गत माना है (गीता—सातवें अध्यायका उन्तीसवाँ-तीसवाँ श्लोक)। इसलिये गीताको देखनेसे ऐसा प्रतीत होता है कि निर्गुणोपासना (ब्रह्मकी उपासना) समग्र भगवान्के एक अंगकी उपासना है और सगुणोपासना स्वयं समग्र भगवान्की उपासना है—‘त्वां पर्युपासते’ (गीता १२।१), ‘मां ध्यायन्त उपासते’ (१२।६)।

जो समग्र, भगवान्के एक अंगकी उपासना करता है, उसको भी अन्तमें समग्रकी प्राप्ति होती है—‘ते प्राप्नुवन्ति मामेव’ (गीता १२।४), ‘ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्’ (१८।५५)। अतः जिसको निर्गुण अच्छा लगता हो, वह निर्गुणकी उपासना करे, पर उसको निर्गुणका आग्रह रखकर सगुणका तिरस्कार नहीं करना चाहिये। सगुणका तिरस्कार, निन्दा, खण्डन करना निर्गुणोपासकके लिये बहुत घातक है अर्थात् उसकी साधनाके सिद्ध होनेमें बहुत बाधक है। कारण कि अपरा प्रकृति भगवान्की है; अतः उसकी निन्दा करनेसे वह भगवान्की निन्दा होती है। गुणोंका खण्डन करनेसे गुणोंकी सत्ता आ जाती है, जो बाधक होती है; क्योंकि सत्ता माने बिना साधक निराकरण किसका करेगा? अतः साधक यदि दूसरेकी निन्दा, तिरस्कार न करके तत्परतापूर्वक अपने साधनमें लगा रहे तो आगे चलकर सभी साधक एक हो जाते हैं; क्योंकि तत्त्व एक ही है। सगुणकी उपेक्षा करनेसे साधक मुक्त तो हो सकता है, पर मतभेद नहीं मिट सकता। परन्तु सगुणकी उपेक्षा न रहनेसे मतभेद भी नहीं रहता और साधकको समग्रकी प्राप्ति हो जाती है।

ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्यस्य मत्पराः ।

अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥ ६ ॥

तु= परन्तुसन्यस्य= अर्पण करकेमाम्= मेरा
ये= जो(और)एव= ही
सर्वाणि= सम्पूर्णमत्पराः= मेरे परायण होकरध्यायन्तः= ध्यान करते हुए
कर्माणि= कर्मोंकोअनन्येन= अनन्य-उपासते= (मेरी) उपासना
मयि= मेरेयोगेन= योग-(सम्बन्ध-) सेकरते हैं।

व्याख्या —[ग्यारहवें अध्यायके पचपनवें श्लोकमें भगवान्ने अनन्य भक्तके लक्षणोंमें तीन विध्यात्मक (‘मत्कर्मकृत’, ‘मत्परमः’ और ‘मद्भक्तः’) और दो निषेधात्मक (‘संगवर्जितः’ और ‘निर्वैरः’) पद दिये थे। उन्हीं पदोंका संकेत इस श्लोकमें इस प्रकार किया गया है—

(१) ‘सर्वाणि कर्माणि मयि सन्यस्य’ पदोंसे ‘मत्कर्मकृत’ की ओर लक्ष्य है।

(२) ‘मत्पराः’ पदसे ‘मत्परमः’ का संकेत है।

(३) ‘अनन्येनैव योगेन’ पदोंमें ‘मद्भक्तः’ का लक्ष्य है।

(४) भगवान्में ही अनन्यतापूर्वक लगे रहनेके कारण उनकी कहीं भी आसक्ति नहीं होती; अतः वे ‘संगवर्जितः’ हैं।

(५) कहीं भी आसक्ति न रहनेके कारण उनके मनमें किसीके प्रति भी वैर, द्वेष, क्रोध आदिका भाव नहीं रहता, इसलिये ‘निर्वैरः’ पदका भाव भी इसीके अन्तर्गत आ जाता है। परन्तु भगवान्ने इसे महत्त्व देनेके लिये आगे तेरहवें श्लोकमें सिद्ध भक्तोंके लक्षणोंमें सबसे पहले ‘अद्वेष्टा’ पदका प्रयोग किया है। अतः साधकको किसीमें किंचिन्मात्र भी द्वेष नहीं रखना चाहिये।

‘ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्यस्य’—अब

  • वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ञानमद्वयम्। ब्रह्मोति परमात्मेति भगवानिति शब्दोते ॥

(श्रीमद्भगवद्गीता १।२।११)

‘तत्त्वज्ञ महापुरुष उस ज्ञानस्वरूप एवं अद्वितीय तत्त्वको ही ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्—इन तीन नामोंसे कहते हैं।’