श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १२ ]
१०—हृदयमें पदार्थोंका आदर रहते हुए भी यदि वे प्राणियोंकी सेवामें लग जाते हैं तो उन्हें पदार्थोंका त्याग करनेमें कठिनाई नहीं होती। सत्यात्रोंके लिये पदार्थोंके त्यागमें तो और भी सुगमता है। फिर भगवान्के लिये तो पदार्थोंका त्याग बहुत ही सुगमतासे हो सकता है।
११—इस साधनमें विवेक और वैराग्यकी उतनी आवश्यकता नहीं है, जितनी प्रेम और विश्वासकी है। जैसे, कौरवोंके प्रति द्वेष-वृत्ति रहते हुए भी द्रौपदीके पुकारनेमात्रसे भगवान् प्रकट हो जाते थे;१ क्योंकि वह भगवान्को अपना मानती थी। भगवान् तो अपने साथ भक्तके प्रेम और विश्वासको ही देखते हैं, उसके दोषोंको नहीं। भगवान्के साथ अपनापनका सम्बन्ध जोड़ना उतना कठिन नहीं (क्योंकि भगवान्की ओरसे अपनापन स्वतःसिद्ध
‘अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्विरवाप्यते’—‘देहै’, ‘देहभूत्’ आदि पदोंका अर्थ साधारणतया ‘देहधारी पुरुष’ लिया जाता है। प्रसंगानुसार इनका अर्थ ‘जीव’ और ‘आत्मा’ भी लिया जाता है। यहाँ ‘देहवद्विः’२ पदका अर्थ ‘देहाभिमानी मनुष्य’ लेना चाहिये; क्योंकि निर्गुण-उपासकोंके लिये इसी श्लोकके पूर्वार्धमें ‘अव्यक्तासक्तचेतसाम्’ पद आया है, जिससे यह प्रतीत होता है कि वे निर्गुण-उपासनाको श्रेष्ठ तो मानते हैं; परन्तु उनका चित्त देहाभिमानके कारण निर्गुण-तत्त्वमें आविष्ट नहीं हुआ है। देहाभिमानके कारण ही उन्हें साधनमें अधिक क्लेश होता है।
निर्गुण-उपासनामें देहाभिमान ही मुख्य बाधा है—
परिशिष्ट भाव —निर्गुणोपासनामें जो देहसहित है, वह ‘उपासक’ (जीव) है और जो देहरहित है, वह ‘उपास्य’ (ब्रह्म) है। देहके साथ माना हुआ सम्बन्ध ही जीव और ब्रह्मकी एकतामें खास बाधक है। इसलिये देहाभिमानीके लिये निर्गुणोपासनाकी सिद्धि कठिनातासे तथा देरीसे होती है। परन्तु सगुणोपासनामें भगवान्की विमुखता बाधक है, देहाभिमान बाधक नहीं है। इसलिये सगुणोपासक संसारसे विमुख होकर भगवान्के सम्मुख हो जाता है, साधनके आश्रित न होकर भगवान्के आश्रित हो जाता है। अतः भगवान् कृपा करके उसका शीघ्र ही उद्धार कर देते हैं (गीता—बारहवें अध्यायका
१—यह बात उन भक्तोंके लिये है, जिनके स्मरणमात्रसे भगवान् प्रकट हो जाते हैं, सर्वसाधारणके लिये नहीं है। जो भक्त सर्वथा भगवान्पर निर्भर हो जाता है एवं जिसकी भगवान्के साथ इतनी प्रगाढ़ आत्मीयता होती है कि केवल स्मरणसे भगवान् प्रकट हो जाते हैं, उसके दोष दूर करनेका दायित्व भगवान्पर आ जाता है।
२—यहाँ ‘देह’ शब्दमें ‘भूमिनिन्दाप्रशंसासु नित्ययोगेऽतिशयाने। संसर्गेऽस्ति विवक्षायां भवन्ति मनुबादयः ॥’—इस कारिकाके अनुसार संसर्ग अर्थमें ‘तदस्यास्त्यस्मिन्निति मनुप्’ (५।२।१४), इस पाणिनिसूत्रसे ‘मनुप्’ प्रत्यय किया गया है। ‘देहवद्विः’ पदका अर्थ है—वे मनुष्य, जिनका देहके साथ दृढ़तापूर्वक सम्बन्ध माना हुआ है।
छठे अध्यायके सप्ताईसवें श्लोकमें ‘ब्रह्मभूत’ होनेपर सुखपूर्वक ब्रह्मकी प्राप्ति बतायी गयी है, जबकि यहाँ ‘देहभूत’ होनेके कारण दुःखपूर्वक ब्रह्मकी प्राप्ति बतायी गयी है।
है), जितना कि पात्र बनना कठिन है। विवेककी किंचिन्मात्र भी कमी रही तो क्रियार्थ प्रकृतिके अर्पण नहीं होगी और साधक कर्तृत्वाभिमान रहनेसे कर्म-बन्धनमें बँध जायगा।
१०—जबतक साधकके चित्तमें पदार्थोंका किंचिन्मात्र भी आदर तथा अपने कहलानेवाले शरीर और नाममें अहंता-ममता है, तबतक उसके लिये पदार्थोंको मायामय समझकर उनका त्याग करना कठिन होता है।
११—यह साधक पात्र बननेपर ही तत्त्वको प्राप्त कर सकेगा। पात्र बननेके लिये विवेक और तीव्र वैराग्यकी आवश्यकता होगी, जिनको आसक्ति रहते हुए प्राप्त करना कठिन है।
‘देहाभिमाननि सवै दोषाः प्रादुर्भवन्ति’—इस बाधाकी ओर ध्यान दिलानेके लिये ही भगवान्ने ‘देहवद्विः’ पद दिया है। इस देहाभिमानको दूर करनेके लिये ही (अर्जुनके पूछे बिना ही) भगवान्ने तेरहवाँ और चौदहवाँ अध्याय कहा है। उनमें भी तेरहवें अध्यायका प्रथम श्लोक देहाभिमान मिटानेके लिये ही कहा गया है।
ब्रह्मके निर्गुण-निराकार स्वरूपकी प्राप्तिको यहाँ ‘अव्यक्ता गतिः’ कहा गया है। साधारण मनुष्योंकी स्थिति व्यक्त अर्थात् देहमें होती है। इसलिये उन्हें अव्यक्तमें स्थित होनेमें कठिनाईका अनुभव होता है। यदि साधक अपनेको देहवाला न माने, तो उसकी अव्यक्तमें सुगमता और शीघ्रतापूर्वक स्थिति हो सकती है।