श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 804, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
अथ द्वादशोऽध्यायः
अवतरणिका—
श्रीभगवान्ने चौथे अध्यायके तैंतीसवें और चौँतीसवें श्लोकमें ज्ञानयोगकी श्रेष्ठता बताते हुए ज्ञानप्राप्तिके लिये प्रेरणा की। फिर ज्ञानकी महिमाका वर्णन किया। उसके बाद पाँचवें अध्यायके सोलहवें, सत्रहवें एवं चौबीसवेंसे छब्बीसवें श्लोकतक, छठे अध्यायके चौबीसवेंसे अट्ठाईसवें श्लोकतक और आठवें अध्यायके ग्यारहवेंसे तेरहवें श्लोकतक निर्गुण-निराकारकी उपासनाका महत्त्व बताया।
छठे अध्यायके सैंतालीसवें श्लोकमें साधक भक्तकी महिमा बतायी और सातवें अध्यायसे ग्यारहवें अध्यायतक जगह-जगह 'अहम्,' 'माम्' आदि पदोंद्वारा विशेषरूपसे सगुण-साकार एवं सगुण-निराकारकी उपासनाका महत्त्व बताया तथा अन्तमें ग्यारहवें अध्यायके चौवनवें-पचपनवें श्लोकोंमें अनन्य भक्तिकी महिमा एवं फलसहित उसके स्वरूपका वर्णन किया*।
उपर्युक्त वर्णनसे अर्जुनके मनमें यह जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि सगुण भगवान्की उपासना करनेवाले और निर्गुण ब्रह्मकी उपासना करनेवाले—दोनोंमेंसे कौन-से उपासक श्रेष्ठ हैं। इसी जिज्ञासाको लेकर अर्जुन प्रश्न करते हैं—
अर्जुन उवाच
एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते। ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्त्माः ॥ १ ॥
- इस अध्यायसे पहले साकार भगवान्के उपासकोंका वर्णन जिन श्लोकोंमें जिन पदोंके द्वारा हुआ है, उनका परिचय इस प्रकार है—
| अध्याय श्लोक | पद | अर्थ |
|---|---|---|
| ६ ४७ | 'मद्गतान्तरात्मनाः' श्रद्धावाभजते यो माम्' | ( जो श्रद्धावान् भक्त मेरेमें तल्लीन हुए मनसे मेरा भजन करता है)। |
| ७ १ | 'मव्यासक्तमनाः' यों योगं युञ्जन्मदाश्रयः' | ( मुझमें अनन्य प्रेमसे आसक्त मनवाला और मेरे आश्रित होकर भक्तियोगमें लगा हुआ )। |
| ७ २१-३० | 'मामाश्रित्य यतन्ति,' 'युक्तचेतसः' | ( 'युक्त चित्तवाले पुरुष मेरे शरण होकर साधन करते हैं। |
| ८ ७ | 'मव्यपितमनोबुद्धिः' | ( मेरेमें अपित किये हुए मन-बुद्धिवाला )। |
| ८ १४ | 'अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः' | ( मेरेमें अनन्यचित्त होकर जो नित्य-निरन्तर मेरा स्मरण करता है)। |
| ९ १४ | 'सततं कीर्तयन्तो मां यतन्श्रच दृढव्रताः' | ( दृढ़ निश्चयवाले भक्तजन निरन्तर मेरे नाम और गुणोंका कीर्तन करते हुए मेरी प्राप्तिके लिये यत्न करते हैं)। |
| ९ २२ | 'अनन्याश्रित्ययन्तो मां ये जनाः पर्युपासते' | ( अनन्यभावसे जो भक्तजन मेरा चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं)। |
| ९ ३० | 'भजते मामनन्यभाक्' | ( अनन्यभावसे मेरा भजन करता है)। |
| १० १ | 'मच्चिता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्' | ( मेरेमें मन लगाये रखनेवाले और मेरेमें प्राणोंको अर्पण करनेवाले भक्तजन आपसमें मेरे प्रभावको जानते हुए )। |
| ११ ५५ | 'मत्कर्मकुन्मत्परमो मद्भक्तः' | ( मेरे लिये ही सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्म करनेवाला, मेरे परायण और मेरा भक्त है)। |