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भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 805

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १२ ]

अर्जुन बोले—

ये= जोत्वाम्= आप (सगुण-साकार)-कीअव्यक्तम्= निर्गुण-निराकारकी
भक्ताः= भक्तपर्युपासते= उपासना करते हैंअपि= ही (उपासना करते हैं),
एवम्= इस प्रकार (ग्यारहवें अध्यायके पंचपनवें श्लोकके अनुसार)= औरतेषाम्= उन दोनोंमेंसे
सततयुक्ताः= निरन्तर आपमें लगे रहकरये= जोयोगवित्ताः= उत्तम योगवेत्ता
अक्षरम्= अविनाशीके= कौन हैं ?

व्याख्या—‘एवं सततयुक्ता ये भक्ताः’—ग्यारहवें अध्यायके पंचपनवें श्लोकमें भगवान्ने ‘यः’ और ‘सः’ पद जिस साधकके लिये प्रयुक्त किये हैं, उसी साधकके लिये अर्थात् सगुण-साकार भगवान्की उपासना करनेवाले सब साधकोंके लिये यहाँ ‘ये भक्ताः’ पद आये हैं।

यहाँ ‘एवम्’ पदसे ग्यारहवें अध्यायके पंचपनवें श्लोकका निर्देश किया गया है।

‘मैं भगवान्का ही हूँ’,—इस प्रकार भगवान्का होकर रहना ही ‘सततयुक्त’ होना है।

भगवान्में पूर्ण श्रद्धा रखनेवाले साधक भक्तोंका एकमात्र उद्देश्य भगवत्प्राप्ति होता है। अतः प्रत्येक (पारमार्थिक—भगवत्सम्बन्धी जप-ध्यानादि अथवा व्यावहारिक—शारीरिक और आजीविका-सम्बन्धी) क्रियामें उनका सम्बन्ध नित्य-निरन्तर भगवान्से बना रहता है। ‘सततयुक्ताः’ पद ऐसे ही साधक भक्तोंका वाचक है।

साधकसे यह एक बहुत बड़ी भूल होती है कि वह पारमार्थिक क्रियाओंको करते समय तो अपना सम्बन्ध

भगवान्से मानता है, पर व्यावहारिक क्रियाओंको करते समय वह अपना सम्बन्ध संसारसे मानता है। इस भूलका कारण है—समय-समयपर साधकके उद्देश्यमें होनेवाली भिन्नता। जबतक बुद्धिमें धन-प्राप्ति, मान-प्राप्ति, कुटुम्ब-पालन आदि भिन्न-भिन्न उद्देश्य बने रहते हैं, तबतक साधकका सम्बन्ध निरन्तर भगवान्के साथ नहीं रहता। अगर वह अपने जीवनके एकमात्र उद्देश्य भगवत्प्राप्तिको ठीक-ठीक पहचान ले, तो उसकी प्रत्येक क्रिया भगवत्प्राप्तिका साधन हो जायगी। भगवत्प्राप्तिका उद्देश्य हो जानेपर भगवान्का जप-स्मरण-ध्यानादि करते समय तो उसका सम्बन्ध भगवान्से ही है; किन्तु व्यावहारिक क्रियाओंको करते समय भी उसको नित्य-निरन्तर भगवान्में लगा हुआ ही समझना चाहिये।

अगर क्रियाके आरम्भ और अन्तमें साधकको भगवत्स्मृति है, तो क्रिया करते समय भी उसकी निरन्तर सम्बन्धात्मक भगवत्स्मृति रहती है—ऐसा मानना चाहिये। जैसे, बहीखातेमें जोड़ लगते समय व्यापारीकी वृत्ति इतनी

इस अध्यायसे पहले निराकार उपासकोंका वर्णन जिन श्लोकोंमें जिन पदोंके द्वारा हुआ है, उनका परिचय इस प्रकार है—

अध्याय श्लोकपदअर्थ
४ ३४‘तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया’( उस ज्ञानको तू तत्त्वदर्शी ज्ञानियोंके पास जाकर समझ, उनको साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करनेसे, उनकी सेवा करनेसे और सरलतापूर्वक प्रश्न करनेसे )।
४ ३९‘श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानम्’( श्रद्धावान् पुरुष ज्ञानको प्राप्त होता है )।
५ ८‘नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्यते तत्त्वचित्’( तत्त्वको जाननेवाला सांख्ययोगी निःसन्देह ऐसा माने कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ )।
५ १३‘नैव कुर्वन् कारयन्’( कर्मोंको न करता हुआ, न करवाता हुआ )।
५ २४—२६‘ब्रह्मनिर्वाणम्’( निर्वाण ब्रह्मको प्राप्त होता है )।
६ २५‘आत्मसंस्थं मनः कृत्वा’( मनको परमात्मामें स्थित करके )।
८ ११‘यदक्षरं वेदविदो वदन्ति’( वेदोंके ज्ञाता पुरुष जिस परमपदको ‘अक्षर’ कहते हैं )।
८ १३‘ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहर्न्मानुस्मरन्’( ॐ—इस एक अक्षररूप ब्रह्मका उच्चारण और मुझ निर्गुण ब्रह्मका स्मरण करता हुआ )।
९ १५‘ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते’( ज्ञानयोगी मुझ निर्गुण ब्रह्मका ज्ञानयज्ञके द्वारा पूजन करते हुए मेरी उपासना करते हैं )।