श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 806, कुल 1299 में से
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- साधक-संजीवनी *
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तल्लीन होती है कि मैं कौन हूँ और जोड़ क्यों लगा रहा हूँ—इसका भी ज्ञान नहीं रहता। केवल जोड़के अंकोंकी ओर ही उसका ध्यान रहता है। जोड़ शुरू करनेसे पहले उसके मनमें यह धारणा रहती है कि ‘मैं अमुक व्यापारी हूँ तथा अमुक कार्यके लिये जोड़ लगा रहा हूँ’ और जोड़ लगाना समाप्त करते ही पुनः उसमें उसी भावकी स्फुरणा हो जाती है कि ‘मैं अमुक व्यापारी हूँ और अमुक कार्य कर रहा था।’ अतः जिस समयमें वह तल्लीनतापूर्वक जोड़ लगा रहा है, उस समय भी ‘मैं अमुक व्यापारी हूँ और अमुक कार्य कर रहा हूँ’—इस भावकी विस्मृति दीखते हुए भी वस्तुतः ‘विस्मृति’ नहीं मानी जाती।
इसी प्रकार यदि कर्तव्य-कर्मके आरम्भ और अन्तमें साधकका यह भाव है कि ‘मैं भगवान्का ही हूँ और भगवान्के लिये ही कर्तव्य-कर्म कर रहा हूँ’, तथा इस भावमें उसे थोड़ी भी शंका नहीं है, तो जब वह अपने कर्तव्य-कर्ममें तल्लीनतापूर्वक लग जाता है, उस समय उसमें भगवान्की विस्मृति दीखते हुए भी वस्तुतः विस्मृति नहीं मानी जाती।
‘त्वाम् पर्युपासते’—यहाँ ‘त्वाम्’ पदसे उन सभी सगुण-साकार स्वरूपोंको ग्रहण कर लेना चाहिये, जिनको भगवान् भक्तोंके इच्छानुसार समय-समयपर धारण किया करते हैं और जो स्वरूप भगवान्ने भिन्न-भिन्न अवतारोंमें धारण किये हैं तथा भगवान्का जो स्वरूप दिव्यधाममें विराजमान है—जिसको भक्तलोग अपनी मान्यताके अनुसार अनेक रूपों और नामोंसे कहते हैं।
‘पर्युपासते’—पदका अर्थ है—‘परितः उपासते’ अर्थात् अच्छी तरह उपासना करते हैं। जैसे पतिव्रता स्त्री कभी पतिकी सेवामें अपने शरीरको अर्पण करके, कभी पतिकी अनुपस्थितिमें पतिका चिन्तन करके, कभी पतिके सम्बन्धसे सास-ससुर आदिकी सेवा करके और कभी पतिके लिये रसोई बनाना आदि घरेके कार्य करके सदा-सर्वदा पतिकी ही उपासना करती है, ऐसे ही साधक भक्त भी कभी भगवान्में तल्लीन होकर, कभी भगवान्का जप-स्मरण-चिन्तन करके, कभी सांसारिक प्राणियोंको भगवान्का ही मानकर उनकी सेवा करके और कभी भगवान्की आज्ञाके अनुसार सांसारिक कर्मोंको करके सदा-सर्वदा भगवान्की उपासनामें ही लगा रहता है। ऐसी उपासना ही अच्छी तरह की गयी उपासना है। ऐसे उपासकके हृदयमें उत्पन्न और नष्ट होनेवाले पदार्थों और क्रियाओंका
किंचिन्मात्र भी महत्त्व नहीं होता।
‘ये चाप्यक्षरमव्यक्तम्’—यहाँ ‘ये’ पद निर्गुण-निराकारकी उपासना करनेवाले साधकोंका वाचक है। अर्जुनेने श्लोकके पूर्वाङ्कमें जिस श्रेणीके सगुण-साकारके उपासकोंके लिये ‘ये’ पदका प्रयोग किया है, उसी श्रेणीके निर्गुण-निराकारके उपासकोंके लिये यहाँ ‘ये’ पदका प्रयोग किया गया है।
‘अक्षरम्’ पद अविनाशी सच्चिदानन्दधन परब्रह्मका वाचक है (इसकी व्याख्या इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें की जायगी)।
जो किसी इन्द्रियका विषय नहीं है, उसे ‘अव्यक्त’ कहते हैं। यहाँ ‘अव्यक्तम्’ पदके साथ ‘अक्षरम्’ विशेषण दिया गया है। अतः यह पद निर्गुण-निराकार ब्रह्मका वाचक है (इसकी व्याख्या इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें की जायगी)।
‘अपि’ पदसे ऐसा भाव प्रतीत होता है कि यहाँ साकार उपासकोंकी तुलना उर्हीं निराकार उपासकोंसे की गयी है, जो केवल निराकार ब्रह्मको श्रेष्ठ मानकर उसकी उपासना करते हैं।
‘तेषां के योगवित्ताः’—यहाँ ‘तेषाम्’ पद सगुण और निर्गुण दोनों प्रकारके उपासकोंके लिये आया है। इसी अध्यायके पाँचवें श्लोकमें ‘तेषाम्’ पद निर्गुण उपासकोंके लिये आया है, जबकि सातवें श्लोकमें ‘तेषाम्’ पद सगुण उपासकोंके लिये आया है।
इन पदोंसे अर्जुनका अभिप्राय यह है कि इन दो प्रकारके उपासकोंमें कौन-से उपासक श्रेष्ठ हैं।
‘साकार और निराकारके उपासकोंमें श्रेष्ठ कौन है?’—अर्जुनेके इस प्रश्नका भगवान्ने जो उत्तर दिया है, उसपर गहरा विचार करनेसे अर्जुनेके प्रश्नकी महत्ताका पता चलता है; जैसे—
इस अध्यायके दूसरे श्लोकसे चौदहवें अध्यायके बीसवें श्लोकतक भगवान् अविराम बोलते ही चले गये हैं। तिहत्तर श्लोकोंका इतना लम्बा प्रकरण गीतामें एकमात्र यही है। इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि भगवान् इस प्रकरणमें कोई अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बात समझाना चाहते हैं। साधकोंको साकार और निराकार स्वरूपमें एकताका बोध हो, उनके हृदयमें इन दोनों स्वरूपोंको प्राप्त करनेवाले साधनोंका सांगोपांग रहस्य प्रकट हो, सिद्ध भक्तों (गीता—बारहवें अध्यायके तेरहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक)