श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ११ ]
तपस्वतापूर्वक लगा रहे, तो समय पाकर उसकी उस सुखसे स्वतः अस्त्रि हो जायगी। परन्तु जो उस सुखसे सावधानीपूर्वक असंग रहता है, उसे शीघ्र ही वास्तविक तत्त्वका अनुभव हो जाता है।
सम्बन्ध—विश्वरूपदर्शनके लिये भगवान्की कृपाके सिवाय दूसरा कोई साधन नहीं है—इस बातका आगेके श्लोकमें विशेषतासे वर्णन करते हैं।
न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रेः ।
एवंप्रः शक्य अहं नूलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥ ४८ ॥
| कुरुप्रवीर | = हे कुरुश्रेष्ठ ! | अनुष्ठानसे, | च | = और |
|---|---|---|---|---|
| नूलोके | = मनुष्यलोकमें | न शास्त्रोंके | न | = न |
| एवंप्रः | = इस प्रकारके | अध्ययनसे*, | क्रियाभिः | = मात्र क्रियाओंसे |
| विश्वरूपवाला | न | त्वदन्येन | = तैरे (कृपापात्रके) | |
| अहम् | = मैं | दानैः | सिवाय और | |
| न, | न | किसीके द्वारा | ||
| वेदयज्ञाध्ययनैः | = न वेदोंके | उग्रेः | द्रष्टुम् | = देखा जा |
| पाठसे, न यज्ञोंके | तपोभिः | शक्यः | = सकता हूँ। |
व्याख्या—‘कुरुप्रवीर’—यहाँ अर्जुनके लिये ‘कुरुप्रवीर’ सम्बोधन देनेका अभिप्राय है कि सम्पूर्ण कुरुवंशियोंमें मेरेसे उपदेश सुननेकी, मेरे रूपको देखनेकी और जाननेकी तेरी जिज्ञासा हुई, तो यह कुरुवंशियोंमें तुम्हारी श्रेष्ठता है। तात्पर्य यह हुआ कि भगवान्को देखनेकी, जाननेकी इच्छा होना ही वास्तवमें मनुष्यकी श्रेष्ठता है।
‘न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रेः’—वेदोंका अध्ययन किया जाय, यज्ञोंका विधि-विधानसे अनुष्ठान किया जाय, शास्त्रोंका अध्ययन किया जाय, बड़े-बड़े दान किये जायँ, बड़ी उग्र (कठिन-से-कठिन) तपस्याएँ की जायँ और तीर्थ, व्रत आदि शुभ-कर्म किये जायँ—ये सब-के-सब कर्म विश्वरूपदर्शनमें हेतु नहीं बन सकते। कारण कि जितने भी कर्म किये जाते हैं, उन सबका आरम्भ और समाप्ति होती है। अतः उन कर्मोंसे मिलनेवाला फल भी आदि और अन्तवाला ही होता है। अतः ऐसे कर्मोंसे भगवान्के अनन्त, असीम, अव्यय, दिव्य विश्वरूपके दर्शन कैसे हो सकते हैं? उसके दर्शन तो केवल भगवान्की कृपासे ही होते हैं। कारण कि भगवान् नित्य हैं और उनकी कृपा भी नित्य है। अतः नित्य
कृपासे ही अर्जुनको भगवान्के नित्य, अव्यय, दिव्य विश्वरूपके दर्शन हुए हैं। तात्पर्य यह हुआ कि उनमेंसे एक-एकमें अथवा सभी साधनोंमें यह सामर्थ्य नहीं है कि वे विराट्रूपके दर्शन करा सकें। विराट्रूपके दर्शन तो केवल भगवान्की कृपासे, प्रसन्नतासे ही हो सकते हैं।
गीतामें प्रायः यज्ञ, दान और तप—इन तीनोंका ही वर्णन आता है। आठवें अध्यायके अट्टाईसवें श्लोकमें और इसी अध्यायके तिरपनवें श्लोकमें वेद, यज्ञ, दान और तप—इन चारोंका वर्णन आया है और यहाँ वेद, यज्ञ, दान, तप और क्रिया—इन पाँचोंका वर्णन आया है। आठवें अध्यायके अट्टाईसवें श्लोकमें सप्तमी विभक्ति और बहुवचन तथा यहाँके श्लोकमें तृतीया विभक्ति और बहुवचनका प्रयोग हुआ है, जब कि दूसरी जगह प्रायः प्रथमा विभक्ति और एकवचनका प्रयोग आता है।
यहाँ तृतीया विभक्ति और बहुवचन देनेका तात्पर्य यह है कि इन वेद, यज्ञ, दान आदि साधनोंमेंसे एक-एक साधन विशेषतासे बहुत बार किया जाय अथवा सभी साधन विशेषतासे बहुत बार किये जायँ, तो भी वे सब-के-सब साधन विश्वरूपदर्शनके कारण नहीं बन सकते अर्थात् इनके द्वारा विश्वरूप नहीं देखा जा सकता। कारण कि विश्वरूपका
- अगर ‘वेदयज्ञाध्ययनैः’ पदका अर्थ ‘वेदोंका अध्ययन और यज्ञोंका अनुष्ठान’ लिया जाय तो वेदोंके अध्ययनके अन्तर्गत शास्त्रोंका अध्ययन भी आ जाता है; क्योंकि सभी शास्त्र वेदोंका ही अनुगमन करते हैं। परन्तु खुलासा करनेके लिये यहाँ शास्त्रोंका अध्ययन अलगसे लिया गया है।