श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 772, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ३२ ]
- साधक-संजीवनी *
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| प्रसीद | = (आप) प्रसन्न होइये। | विज्ञातुम् | = तत्त्वसे जानना | तव | = आपकी |
|---|---|---|---|---|---|
| आद्यम् | = आदिरूप | इच्छामि | = चाहता हूँ; | प्रवृत्तिम् | = प्रवृत्तिको |
| भवन्तम् | = आपको (मैं) | हि | = क्योंकि (मैं) | न, प्रजानामि | = भलीभाँति नहीं जानता। |
व्याख्या— आख्याहि मे को भवानुग्रूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद—आप देवरूपसे भी दीख रहे हैं और उग्ररूपसे भी दीख रहे हैं; तो वास्तवमें ऐसे रूपोंको धारण करनेवाले आप कौन हैं?
अत्यन्त उग्र विराट् रूपको देखकर भयके कारण अर्जुन नमस्कारके सिवाय और करते भी क्या? जब अर्जुन भगवान् के ऐसे विराट् रूपको समझनेमें सर्वथा असमर्थ हो गये, तब अन्तमें कहते हैं कि हे देवताओंमें श्रेष्ठ! आपको नमस्कार है।
भगवान् अपनी जीभसे सबको अपने मुखोंमें लेकर बार-बार चाट रहे हैं, ऐसे भयंकर बर्तावको देखकर अर्जुन प्रार्थना करते हैं कि आप प्रसन्न हो जाइये।
‘विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्’— भगवान्का पहला अवतार विराट्-(संसार-) रूपमें ही हुआ था। इसलिये अर्जुन कहते हैं कि आदिनारायण! आपको मैं स्पष्टरूपसे नहीं जानता हूँ। मैं आपकी इस प्रवृत्तिको भी नहीं जानता हूँ कि आप यहाँ क्यों प्रकट हुए हैं? और आपके मुखोंमें हमारे पक्षके तथा
विपक्षके बहुत-से योद्धा प्रविष्ट होते जा रहे हैं; अतः वास्तवमें आप क्या करना चाहते हैं? तात्पर्य यह हुआ कि आप कौन हैं और क्या करना चाहते हैं—इस बातको मैं जानना चाहता हूँ और इसको आप ही स्पष्टरूपसे बताइये।
एक प्रश्न होता है कि भगवान्का पहला अवतार विराट्-(संसारके) रूपमें हुआ और अभी अर्जुन भगवान्के किसी एक देशमें विराट् रूप देख रहे हैं—ये दोनों विराट् रूप एक ही हैं या अलग-अलग? इसका उत्तर यह है कि वास्तविक बात तो भगवान् ही जानें, पर विचार करनेसे ऐसा प्रतीत होता है कि अर्जुनने जो विराट् रूप देखा था, उसीके अन्तर्गत यह संसाररूपी विराट् रूप भी था। जैसे कहा जाता है कि भगवान् सर्वव्यापी हैं, तो इसका तात्पर्य केवल इतना ही नहीं है कि भगवान् केवल सम्पूर्ण संसारमें ही व्याप्त हैं, प्रत्युत भगवान् संसारसे बाहर भी व्याप्त हैं। संसार तो भगवान् के किसी अंशमें है तथा ऐसी अनन्त सृष्टियाँ भगवान् के किसी अंशमें हैं। ऐसे ही अर्जुन जिस विराट्-रूपको देख रहे हैं, उसमें यह संसार भी है और इसके सिवाय और भी बहुत कुछ है।
परिशिष्ट भाव— भगवान् के ऐश्वर्ययुक्त उग्ररूपको श्रीकृष्णसे पूछ बैठते हैं कि आप कौन हैं!
देखकर अर्जुन इतने घबरा जाते हैं कि अपने ही सखा
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें अर्जुनने प्रार्थनापूर्वक जो प्रश्न किया था, उसका यथार्थ उत्तर भगवान् आगेके श्लोकमें देते हैं।
श्रीभगवानुवाच
कालोऽस्मि लोकक्षयकृतप्रवृद्धो लोकात्ममाहर्तुमिह प्रवृत्तः । ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥ ३२ ॥
श्रीभगवान् बोले—
| लोकक्षयकृत् | = (मैं) सम्पूर्ण लोकोंका नाश करनेवाला | समाहर्तुम् | = संहार करनेके लिये | अवस्थिताः | = खड़े हैं, |
|---|---|---|---|---|---|
| प्रवृद्धः | = बढ़ा हुआ | प्रवृत्तः | = (यहाँ) आया हूँ। | सर्वे | = (वे) सब |
| कालः | = काल | प्रत्यनीकेषु | = (तुम्हारे) प्रतिपक्षमें | त्वाम् | = तुम्हारे |
| अस्मि | = हूँ (और) | ये | = जो | ऋते | = (युद्ध किये) बिना |
| इह | = इस समय (मैं) | योधाः | = योद्धालोग | अपि | = भी |
| लोकान् | = (इन सब) | न | = नहीं | ||
| भविष्यन्ति | = रहेंगे। |