श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 771, कुल 1299 में से
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ११ ]
परिशिष्ट भाव —पिछले श्लोकमें नदियोंका और इस श्लोकमें पतंगोंका दृष्टान्त दिया गया है। पतंगे तो मोहवश लेनेकी इच्छासे खुद अग्नियमें जाते हैं, पर नदियाँ अपने-आपको देनेके लिये समुद्रमें जाती हैं। अतः जो मनुष्य, 'लेने' की इच्छा रखते हैं, वे पतंगोंके समान हैं और जो मनुष्य 'देने' की इच्छा रखते हैं, वे नदियोंके समान हैं, लेनेका भाव जड़ता है और देनेका भाव चेतनता है। लेनेकी भावनासे अशुभ कर्म और देनेकी भावनासे शुभ कर्म होते हैं। लेनेकी इच्छावालोंके लिये स्वर्ग हैं और देनेकी इच्छावालोंके लिये मोक्ष है। कारण कि लेनेका भाव बाँधनेवाला और देनेका भाव मुक्त करनेवाला होता है।
सम्बन्ध—पीछेके दो श्लोकोंमें दो दृष्टान्तोंसे दोनों समुदायोंका वर्णन करके अब सम्पूर्ण लोकोंका प्रसन्न करते हुए विश्वरूप भगवान्के भयानक रूपका वर्णन करते हैं।
लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदैनैर्ज्वलद्भिः ।
तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ॥ ३० ॥
| ज्वलद्भिः | = (आप अपने) | समन्तात् | = सब ओरसे | तेजोभिः | = अपने तेजसे |
|---|---|---|---|---|---|
| प्रज्वलित | लेलिह्यसे | = बार-बार चाट रहे हैं; | समग्रम् | = सम्पूर्ण | |
| वदैनः | = मुखोंद्वारा | जगत् | = जगत्को | ||
| समग्रान् | = सम्पूर्ण | विष्णो | = (और) हे विष्णो ! | आपूर्य | = परिपूर्ण |
| लोकान् | = लोकोंका | तव | = आपका | करके | |
| ग्रसमानः | = प्रसन्न करते हुए | उग्राः | = उग्र | प्रतपन्ति | = (सबको) |
| (उन्हें) | भासः | = प्रकाश | तपा रहा है। |
व्याख्या —'लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान् समग्रान्वदैनैर्ज्वलद्भिः'—आप सम्पूर्ण प्राणियोंका संहार कर रहे हैं और कोई इधर-उधर न चला जाय, इसलिये बार-बार जीभके लपेटेसे अपने प्रज्वलित मुखोंमें लेते हुए उनका प्रसन्न कर रहे हैं। तात्पर्य है कि कालरूप भगवान्की
जीभके लपेटसे कोई भी प्राणी बच नहीं सकता।
'तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो'—विराटरूप भगवान्का तेज बड़ा उग्र है। वह उग्र तेज सम्पूर्ण जगत्में परिपूर्ण होकर सबको संतप्त कर रहा है, व्यथित कर रहा है।
परिशिष्ट भाव —यहाँ 'लोकान्समग्रान्' (लोकमात्र) तथा 'जगत्समग्रम्' (जड़-चेतन, स्थावर-जंगमरूप जगन्मात्र) कहनेका तात्पर्य है कि यह सब कुछ भगवान्के ही समग्ररूपके अन्तर्गत है।
गीतामें भगवान्को भी समग्र कहा है—'असंशयं समग्रं माम्' (७।१), कर्मोंको भी समग्र कहा है—'यज्ञायाचरतः कर्म समग्रम्' (४।२३) और प्रस्तुत श्लोकमें संसारको भी समग्र कहा है। इसका तात्पर्य है कि सब भगवान्के ही रूप हैं।
सम्बन्ध —विराटरूप भगवान् अपने विलक्षण-विलक्षण रूपोंका दर्शन कराते ही चले गये। उनके भयंकर और अत्यन्त उग्ररूपके मुखोंमें सम्पूर्ण प्राणी और दोनों पक्षोंके योद्धा जाते देखकर अर्जुन बहुत घबरा गये। अतः अत्यन्त उग्ररूपधारी भगवान्का वास्तविक परिचय जाननेके लिये अर्जुन प्रश्न करते हैं।
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥ ३१ ॥
| मे | = मुझे यह | भवान् | = आप | ते | = आपको |
|---|---|---|---|---|---|
| आख्याहि | = बताइये कि | कः | = कौन हैं ? | नमः | = नमस्कार |
| उग्ररूपः | = उग्र रूपवाले | देववर | = हे देवताओंमें श्रेष्ठ ! | अस्तु | = हो । |