श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 756, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक १४]
- साधक-संजीवनी *
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व्याख्या—तत्रैकरथं जगत्कृतं प्रविभक्तमनेकधा’— अनेक प्रकारके विभागोंमें विभक्त अर्थात् ये देवता हैं, ये मनुष्य हैं, ये पशु-पक्षी हैं, यह पृथ्वी है, ये समुद्र हैं, यह आकाश है, ये नक्षत्र हैं, आदि-आदि विभागोंके सहित (संकुचित नहीं, प्रत्युत विस्तारसहित) सम्पूर्ण चराचर जगत्को भगवान्के शरीरके भी एक देशमें अर्जुनने भगवान्के दिये हुए दिव्यचक्षुओंसे प्रत्यक्ष देखा। तात्पर्य यह हुआ कि भगवान् श्रीकृष्णके छोटे-से शरीरके भी एक अंशमें चर-अचर, स्थावर-जंगमसहित सम्पूर्ण संसार है। वह संसार भी अनेक ब्रह्माण्डोंके रूपमें, अनेक देवताओंके लोकोँके रूपमें, अनेक व्यक्तियों और पदार्थोंके रूपमें विभक्त और विस्तृत है—इस प्रकार अर्जुनने
परिशिष्ट भाव— अर्जुनने भगवान्के शरीरमें एक जगह स्थित जरायुज, अण्डज, उद्भिज्ज, स्वेदज; स्थावर-जंगम; नभचर-जलचर-थलचर; चौरासी लाख योनियाँ; चौदह भुवन आदि अनेक विभागोंमें विभक्त जगत्को देखा। जगत् भले ही अनन्त हो, पर है वह भगवान्के एक अंशमें ही (गीता—दसवें अध्यायका बयालीसवाँ श्लोक) ! अर्जुन भगवान्के शरीरमें जहाँ भी दृष्टि डालते हैं, वहाँ उनको अनन्त जगत् दीखता है!
सम्बन्ध— भगवान्के अलौकिक विराट्रूपको देखनेके बाद अर्जुनकी क्या दशा हुई—इसका वर्णन संजय आगेके श्लोकमें करते हैं।
ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः ।
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ॥ १४ ॥
| ततः | = भगवान्के विश्व-रूपको देखकर | विस्मयाविष्टः | = बहुत चकित हुए (और) | कृताञ्जलिः | = (वे) हाथ जोड़कर |
|---|---|---|---|---|---|
| सः | = वे | हृष्टरोमाः | = आश्चर्यके कारण उनका शरीर | देवम् | = विश्वरूप देवको |
| धनञ्जयः | = अर्जुन | रोमांचित हो गया। | शिरसा | = मस्तकसे | |
| प्रणम्य | = प्रणाम करके | ||||
| अभाषत | = बोले। |
व्याख्या—‘ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः’— अर्जुनने भगवान्के रूपके विषयमें जैसी कल्पना भी नहीं की थी, वैसा रूप देखकर उनको बड़ा आश्चर्य हुआ। भगवान्ने मेरेपर कृपा करके विलक्षण आध्यात्मिक बातें अपनी ओरसे बतायीं और अब कृपा करके मेरेको अपना विलक्षण रूप दिखा रहे हैं—इस
बातको लेकर अर्जुन प्रसन्नताके कारण रोमांचित हो उठे।
‘प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत’— भगवान्की विलक्षण कृपाको देखकर अर्जुनका ऐसा भाव उमड़ा कि मैं इसके बदलेमें क्या कृतज्ञता प्रकट करूँ? मेरे पास कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो मैं इनके अर्पण करूँ। मैं तो केवल
- श्रीमद्भागवतमें आया है कि एक बार यशोदाजीने कह्नैयाके छोटे-से मुखमें विश्वरूप देखा। इसपर विचार किया जाय तो अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंमेंसे एक ब्रह्माण्डमें एक भूमण्डल है। इस भूमण्डलमें भारतवर्ष, भारतवर्षमें एक माथुरमण्डल, माथुरमण्डलमें एक व्रजमण्डल, व्रजमण्डलमें एक नन्दगौव, नन्दगौवमें एक नन्दभवन और नन्दभवनमें एक जगह छोटा-सा कह्नैया खड़ा है। उस कह्नैयाको यशोदा मैया छड़ी लेकर धमकाती हैं कि ‘तूने माटी क्यों खायी? दिखा अपना मुख!’ कह्नैयाने अपना मुख खोलकर दिखाया तो उस छोटे-से मुखमें यशोदा मैयाने सम्पूर्ण जगत्को—नन्दगौवको और नन्दभवनमें अपने-आपको भी देखा—‘सहात्मानम्’ (श्रीमद्भागवत दसवाँ स्कन्ध, आठवाँ अध्याय, उन्तालीसवाँ श्लोक)। इसी तरह अर्जुनने भी भगवान्के शरीरके किसी अंशमें सम्पूर्ण जगत्को देखा।