श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ११ ]
परिशिष्ट भाव —दूसरे अध्यायमें तो भगवान्के अंश जीवका सब कुछ आश्चर्यमय बताया गया है (गीता—दूसरे अध्यायका उन्तीसवाँ श्लोक), यहाँ भगवान्का सब कुछ आश्चर्यमय बताते हैं। भगवान्को ज्यों देखें, त्यों—ही विलक्षणता दीखती चली जाती है। भगवान्की विलक्षणता अनन्त है।
सम्बन्ध—अब संजय विश्वरूपके प्रकाशका वर्णन करते हैं।
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता । यदि भाः सदृशी सा स्याद्वासस्तस्य महात्मनः ॥ १२ ॥
| दिवि | = (अगर) आकाशमें | सा | = उन सबका | भासः | = प्रकाशके |
|---|---|---|---|---|---|
| युगपत् | = एक साथ | भाः | = प्रकाश (मिलकर) | सदृशी | = समान |
| सूर्यसहस्रस्य | = हजारों सूर्योंका | तस्य | = उस | यदि | = शायद ही |
| उत्थिता | = उदय | महात्मनः | = महात्मा-(विराट्रूप परमात्मा-) | स्यात् | = हो अर्थात् नहीं |
| भवेत् | = हो जाय, (तो भी) | के | हो सकता। |
व्याख्या —‘दिवि सूर्यसहस्रस्य ..... तस्य महात्मनः’—जैसे आकाशमें हजारों तारे एक साथ उदित होनेपर भी उन सबका मिला हुआ प्रकाश एक चन्द्रमाके प्रकाशके सदृश नहीं हो सकता और हजारों चन्द्रमाओंका मिला हुआ प्रकाश एक सूर्यके प्रकाशके सदृश नहीं हो सकता, ऐसे ही आकाशमें हजारों सूर्य एक साथ उदित होनेपर भी उन सबका मिला हुआ प्रकाश विराट् भगवान्के प्रकाशके सदृश नहीं हो सकता। तात्पर्य यह हुआ कि हजारों सूर्योंका प्रकाश भी विराट् भगवान्के प्रकाशका उपमेय नहीं हो सकता। इस प्रकार जब हजारों सूर्योंके प्रकाशको उपमेय बनानेमें भी दिव्यदृष्टिवाले संजयको
संकोच होता है, तब वह प्रकाश विराट्रूप भगवान्के प्रकाशका उपमान हो ही कैसे सकता है! कारण कि सूर्यका प्रकाश भौतिक है, जब कि विराट् भगवान्का प्रकाश दिव्य है। भौतिक प्रकाश कितना ही बड़ा क्यों न हो, दिव्य प्रकाशके सामने वह तुच्छ ही है। भौतिक प्रकाश और दिव्य प्रकाशकी जाति अलग-अलग होनेसे उनकी आपसमें तुलना नहीं की जा सकती। हाँ, अंगुलिनिर्देशकी तरह भौतिक प्रकाशसे दिव्य प्रकाशका संकेत किया जा सकता है। यहाँ संजय भी हजारों सूर्योंके भौतिक प्रकाशकी कल्पना करके विराट्रूप भगवान्के प्रकाश-(तेज-) का लक्ष्य कराते हैं।
परिशिष्ट भाव —हजारों सूर्योंका प्रकाश मिलकर भी भगवान्के प्रकाशकी बराबरी नहीं कर सकता; क्योंकि सूर्योंमें जो तेज है, वह भी भगवान्से ही आया है (गीता—पन्द्रहवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक)। अगर हजारों सूर्योंका प्रकाश हो तो भी है तो भौतिक ही, जबकि भगवान्का प्रकाश भौतिक नहीं है, प्रत्युत दिव्य है।
सम्बन्ध—पीछेके श्लोकोंमें विश्वरूप भगवान्के दिव्यरूप, अवयव और तेजका वर्णन करके अब संजय अर्जुनद्वारा विश्वरूपका दर्शन करनेकी बात कहते हैं।
तत्रैकस्थं जगत्कृतस्नं प्रविभक्तमनेकधा । अपश्यददेवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥ १३ ॥
| तदा | = उस समय | तत्र | = उस | प्रविभक्तम् | = विभागोंमें विभक्त |
|---|---|---|---|---|---|
| पाण्डवः | = अर्जुने | शरीरे | = शरीरमें | कृतस्नम् | = सम्पूर्ण |
| देवदेवस्य | = देवोंके देव भगवान्के | एकस्थम् | = एक जगह स्थित | जगत् | = जगत्को |
| अनेकधा | = अनेक प्रकारके | अपश्यत् | = देखा। |