श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 754, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक १०-११ ]
- साधक-संजीवनी *
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अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् । अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ॥ १० ॥ दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् । सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ॥ ११ ॥
अनेकवक्त्रनयनम् = जिनके अनेक मुख और नेत्र हैं, अनेकाद्भुतदर्शनम् = अनेक तरहके अद्भुत दर्शन हैं, अनेकदिव्याभरणम् = अनेक अलौकिक आभूषण हैं, दिव्यानेकोद्यतायुधम् = हाथोंमें उठाये हुए अनेक दिव्य आयुध हैं दिव्यमाल्याम्बरधरम् = (तथा) जिनके गलेमें दिव्य मालाएँ हैं, जो अलौकिक वस्त्र पहेने हुए हैं,
व्याख्या—‘अनेकवक्त्रनयनम्’—विराट् रूपसे प्रकट हुए भगवान् के जितने मुख और नेत्र दीख रहे हैं, वे सब-के-सब दिव्य हैं। विराट् रूपमें जितने प्राणी दीख रहे हैं, उनके मुख, नेत्र, हाथ, पैर आदि सब-के-सब अंग विराट् रूप भगवान् के हैं। कारण कि भगवान् स्वयं ही विराट् रूपसे प्रकट हुए हैं।
‘अनेकाद्भुतदर्शनम्’—भगवान् के विराट् रूपमें जितने रूप दीखते हैं, जितनी आकृतियाँ दीखती हैं, जितने रंग दीखते हैं, जितनी उनकी विचित्र रूपसे बनावट दीखती है, वह सब-की-सब अद्भुत दीख रही है।
‘अनेकदिव्याभरणम्’—विराट् रूपमें दीखनेवाले अनेक रूपोंके हाथोंमें, पैरोंमें, कानोंमें, नाकोंमें और गलोंमें जितने गहने हैं, आभूषण हैं, वे सब-के-सब दिव्य हैं। कारण कि भगवान् स्वयं ही गहनोंके रूपमें प्रकट हुए हैं।
‘दिव्यानेकोद्यतायुधम्’—विराट् रूप भगवान् ने अपने हाथोंमें चक्र, गदा, धनुष, बाण, परिघ आदि अनेक प्रकारके जो आयुध (अस्त्र-शस्त्र) उठा रखे हैं, वे सब-के-सब दिव्य हैं।
‘दिव्यमाल्याम्बरधरम्’—विराट् रूप भगवान् ने गलेमें फूलोंकी, सोनेकी, चाँदीकी, मोतियोंकी, रत्नोंकी, गुंजाओं आदिकी अनेक प्रकारकी मालाएँ धारण कर रखी हैं। वे सभी दिव्य हैं। उन्होंने अपने शरीरोंपर लाल, पीले, हरे, सफेद, कपिश आदि अनेक रंगोंके वस्त्र पहन रखे हैं, जो सभी दिव्य हैं।
‘दिव्यगन्धानुलेपनम्’—विराट् रूप भगवान् ने ललाटपर
दिव्यगन्धानुलेपनम् = जिनके ललाट तथा शरीरपर दिव्य चन्दन, कुंकुम आदि लगा हुआ है, सर्वाश्चर्यमयम् = ऐसे सम्पूर्ण आश्चर्यमय, अनन्तम् = अनन्त रूपोंवाले (तथा) विश्वतोमुखम् = सब तरफ मुखोंवाले देवम् = देव-(अपने दिव्य स्वरूप-) को (भगवान् ने दिखाया)।
कस्तूरी, चन्दन, कुंकुम आदि गन्धके जितने तिलक किये हैं तथा शरीरपर जितने लेप किये हैं, वे सब-के-सब दिव्य हैं।
‘सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम्’—इस प्रकार देखते ही चकित कर देनेवाले, अनन्तरूपवाले तथा चारों तरफ मुख-ही-मुखवाले अपने परम ऐश्वर्यमय रूपको भगवान् ने अर्जुनको दिखाया।
जैसे, कोई व्यक्ति दूर बैठे ही अपने मनसे चिन्तन करता है कि मैं हरिद्वारमें हूँ तथा गंगाजीमें स्नान कर रहा हूँ, तो उस समय उसको गंगाजी, पुल, घाटपर खड़े स्त्री-पुरुष आदि दीखने लगते हैं तथा मैं गंगाजीमें स्नान कर रहा हूँ—ऐसा भी दीखने लगता है। वास्तवमें वहाँ न हरिद्वार है और न गंगाजी है; परन्तु उसका मन ही उन सब रूपोंमें बना हुआ उसको दीखता है। ऐसे ही एक भगवान् ही अनेक रूपोंमें, उन रूपोंमें पहेने हुए गहनोंके रूपमें, अनेक प्रकारके आयुधोंके रूपमें, अनेक प्रकारकी मालाओंके रूपमें, अनेक प्रकारके वस्त्रोंके रूपमें प्रकट हुए हैं। इसलिये भगवान् के विराट् रूपमें सब कुछ दिव्य है।
श्रीमद्भागवतमें आता है कि जब ब्रह्माजी बछड़ों और ग्वालबालोंको चुराकर ले गये, तब भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं ही बछड़े और ग्वालबाल बन गये। बछड़े और ग्वालबाल ही नहीं, प्रत्युत उनके बेंत, सींग, बाँसुरी, वस्त्र, आभूषण आदि भी भगवान् स्वयं ही बन गये (श्रीमद्भागवत, दसवाँ स्कन्ध, तेरहवाँ अध्याय, उन्नीसवाँ श्लोक)।