श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ११ ]
देखनेकी बात आयी है। तात्पर्य है कि जो जाननेमें आता है, वह भी भगवान् है और जो देखनेमें आता है, वह भी भगवान् है। भगवान्के सिवाय कुछ भी नहीं है। इस ग्यारहवें अध्यायमें भगवान्के अलौकिक रूपको देखनेकी विलक्षणता है, विवेचनकी विलक्षणता नहीं है। इसलिये गीताके अन्तमें भी संजयने एक तो 'संवाद' की विलक्षणता कही है और एक 'रूप' की विलक्षणता कही है (अठारहवें अध्यायका छिहत्तरवाँ-सतहत्तरवाँ श्लोक)।
भगवान्का विराट्रूप अलौकिक था, इसलिये उसको देखनेके लिये भगवान्ने अर्जुनको अलौकिक चक्षु दिये।
सम्बन्ध—दिव्यचक्षु प्राप्त करके अर्जुने भगवान्का कैसा रूप देखा, यह बात संजय धृतराष्ट्रसे आगेके श्लोकमें कहते हैं।
सज्ज्य उवाच
एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः । दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् ॥ १ ॥
संजय बोले—
| राजन् | = हे राजन् ! | महायोगेश्वरः | = महायोगेश्वर | परमम् | = परम |
|---|---|---|---|---|---|
| एवम् | = ऐसा | हरिः | = भगवान् | ऐश्वरम् | = ऐश्वर |
| उक्त्वा | = कहकर | श्रीकृष्णे | रूपम् | = विराट्रूप | |
| ततः | = फिर | पार्थाय | = अर्जुनको | दर्शयामास | = दिखाया।* |
व्याख्या—एवमुक्त्वा ततो ……… परमं रूपमैश्वरम्—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने जो यह कहा था कि 'तू अपने चर्मचक्षुओंसे मुझे नहीं देख सकता, इसलिये मैं तेरेको दिव्यचक्षु देता हूँ, जिससे तू मेरे ईश्वर-सम्बन्धी योगको देख', उसीका संकेत यहाँ संजयने 'एवमुक्त्वा' पदसे किया है।
चौथे श्लोकमें अर्जुने भगवान्को 'योगेश्वर' कहा और यहाँ संजय भगवान्को 'महायोगेश्वर' कहते हैं। इसका तात्पर्य है कि भगवान्ने अर्जुनकी प्रार्थनासे बहुत अधिक अपना विश्वरूप दिखाया। भक्तकी थोड़ी-सी भी वास्तविक रुचि भगवान्की तरफ होनेपर भगवान् अपनी
परिशिष्ट भाव—भगवान्को 'महायोगेश्वर' कहनेका तात्पर्य है कि भगवान् सम्पूर्ण योगोंके ईश्वर हैं। ऐसा कोई भी योग नहीं है, जिसके ईश्वर (मालिक) भगवान् न हों अर्थात् सब योग भगवान्के ही अन्तर्गत हैं।
अर्जुनेने तो भगवान्को 'योगेश्वर' कहा था (इसी अध्यायका चौथा श्लोक), पर संजय भगवान्को 'महायोगेश्वर' कहते हैं। कारण कि संजय भगवान्को पहलेसे ही अर्जुनसे ज्यादा जानते थे। संजयसे भी ज्यादा वेदव्यासजी भगवान्को जानते थे। वेदव्यासजीकी कृपासे ही संजयने भगवान् और अर्जुनका संवाद सुना—'व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतदगृह्यमहं परम्' (गीता १८।७५)। वेदव्यासजीसे भी ज्यादा भगवान्को स्वयं भगवान् ही जानते हैं (गीता—दसवें अध्यायका दूसरा और पन्द्रहवाँ श्लोक)।
अपार शक्तिसे उसकी पूर्ति कर देते हैं।
तीसरे श्लोकमें अर्जुनेने जिस रूपके लिये 'रूपमैश्वरम्' कहा, उसी रूपके लिये यहाँ संजय 'परमं रूपमैश्वरम्' कहते हैं। इसका तात्पर्य है कि भगवान्का विश्वरूप बहुत ही विलक्षण है। सम्पूर्ण योगोंके महान् ईश्वर भगवान् श्रीकृष्णे ऐसा विलक्षण, अलौकिक, अदभुत विश्वरूप दिखाया, जिसको धैर्यशाली, जितेन्द्रिय, शूरवीर और भगवान्से प्राप्त दिव्यदृष्टिवाले अर्जुनको भी दुर्निरीक्ष्य कहना पड़ा (सत्रहवाँ श्लोक) और भयभीत होना पड़ा (पैंतालिसवाँ श्लोक), तथा भगवान्को भी 'व्यपेतभीः' कहकर अर्जुनको आश्वासन देना पड़ा (उनचासवाँ श्लोक)।
सम्बन्ध—अब संजय भगवान्के उस परम ऐश्वर-रूपका वर्णन आगेके दो श्लोकोंमें करते हैं।
- संजयको भी वेदव्यासजी महाराजसे दिव्यदृष्टि मिली हुई थी, इसलिये अर्जुनके साथ-ही-साथ उन्होंने भी भगवान्के विश्वरूपके दर्शन किये थे (गीता—अठारहवें अध्यायका सतहत्तरवाँ श्लोक)। अब संजय उसी विश्वरूपका धृतराष्ट्रसे वर्णन करते हैं।