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भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 745

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ११ ]

श्लोकमें भगवान्ने कहा था कि जो मेरी विभूति और योगको तत्त्वसे जानता है अर्थात् सम्पूर्ण विभूतियोंके मूलमें भगवान् ही हैं और सम्पूर्ण विभूतियाँ भगवान्की सामर्थ्यसे ही प्रकट होती हैं तथा अन्तमें भगवान्में ही लीन हो जाती हैं—ऐसा तत्त्वसे जानता है, वह अविचल भक्तियोगसे युक्त हो जाता है। इसी बातको अर्जुन अध्यात्मसंज्ञित मान रहे हैं।

‘यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम’— सम्पूर्ण जगत् भगवान्ने किसी एक अंशमें है—इस बातपर पहले अर्जुनकी दृष्टि नहीं थी और वे स्वयं इस बातको जानते भी नहीं थे, यही उनका मोह था। परन्तु जब भगवान्ने कहा कि सम्पूर्ण जगत्को अपने एक अंशमें व्याप्त करके मैं तेरे सामने बैठा हूँ, तब अर्जुनकी इस तरफ

दृष्टि गयी कि भगवान् कितने विलक्षण हैं! उनके किसी एक अंशमें अनन्त सृष्टियाँ उत्पन्न होती हैं, उसमें स्थित रहती हैं और उसीमें लीन हो जाती हैं और वे वैसे-के-वैसे रहते हैं! इस मोहके नष्ट होते ही अर्जुनको यह खयाल आया कि पहले जो मैं इस बातको नहीं जानता था, वह मेरा मोह ही था। इसलिये अर्जुन यहाँ अपनी दृष्टिसे कहते हैं कि भगवान्! मेरा यह मोह सर्वथा चला गया है। परन्तु ऐसा कहनेपर भी भगवान्ने इसको (अर्जुनके मोहनाशको) स्वीकार नहीं किया; क्योंकि आगे उनचासवें श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा है कि तेरेको व्यथा और मूढ़भाव (मोह) नहीं होना चाहिये—‘मा ते व्यथा मा च विमूढभावः।’

परिशिष्ट भाव— अर्जुन कहते हैं कि आपने जो वचन कहे हैं, वे केवल मेरेपर कृपा करके ही कहे हैं, अपनी विद्वत्ता बतानेके लिये नहीं। इसमें केवल कृपाके अलावा और कोई हेतु नहीं है।

सम्पूर्ण प्राणियोंके आदि, मध्य तथा अन्तमें मैं ही हूँ (दसवें अध्यायका बीसवाँ श्लोक), मैं ही सम्पूर्ण प्राणियोंका बीज हूँ, (दसवें अध्यायका उन्तालीसवाँ श्लोक), ऐश्वर्य, शोभा और बलसे युक्त प्रत्येक वस्तुको मेरे ही योगके अंशसे उत्पन्न हुई समझो (दसवें अध्यायका चालीसवाँ श्लोक), मैं अपने एक अंशसे सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त करके स्थित हूँ, (दसवें अध्यायका बयालीसवाँ श्लोक)—इन वचनोंको सुननेसे अर्जुनको ऐसा लगा कि मेरा मोह नष्ट हो गया। परन्तु वास्तवमें उनका आंशिक मोह नष्ट हुआ है, पूरा नहीं।

सम्बन्ध—मोह कैसे नष्ट हो गया—इसीको आगेके श्लोकमें विस्तारसे कहते हैं।

भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया।

त्वतः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥ २ ॥

हि= क्योंकिविनाश= और (आपका)
कमलपत्राक्ष= हे कमलनयन !मया= मैंनेअव्ययम्
भूतानाम्= सम्पूर्ण प्राणियोंकेविस्तरशः= विस्तारपूर्वकमाहात्म्यम्
भवाप्ययौ= उत्पत्ति तथात्वतः= आपसे हीअपि
श्रुतौ= सुने हैं(सुना है)।

व्याख्या— भवाप्ययौ हि भूतानां त्वतः श्रुतौ विस्तरशो मया’—भगवान्ने पहले कहा था—मैं सम्पूर्ण जगत्का प्रभव और प्रलय हूँ, मेरे सिवाय अन्य कोई कारण नहीं है (सातवें अध्यायका छठा-सातवाँ श्लोक); सात्त्विक, राजस और तामस भाव मेरेसे ही होते हैं (सातवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक); प्राणियोंके अलग-अलग अनेक तरहके

भाव मेरेसे ही होते हैं (दसवें अध्यायका चौथा-पाँचवाँ श्लोक); सम्पूर्ण प्राणी मेरेसे ही होते हैं और मेरेसे ही सब चेष्टा करते हैं (दसवें अध्यायका आठवाँ श्लोक); प्राणियोंके आदि, मध्य तथा अन्तमें मैं ही हूँ (दसवें अध्यायका बीसवाँ श्लोक) और सम्पूर्ण सृष्टियोंके आदि, मध्य तथा अन्तमें मैं ही हूँ (दसवें अध्यायका

१-भगवान्ने अभीतक भक्तिकी जितनी बातें कही हैं, वे सब-की-सब परम गोपनीय अध्यात्म उपदेश हैं।

२-मोहके रहते हुए मोहका ज्ञान नहीं होता, प्रत्युत मोहके चले जानेपर ही मोहका ज्ञान होता है और ज्ञान होनेपर मोह रहता ही नहीं।