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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 744, कुल 1299 में से

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पृष्ठ 744

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

अथ एकादशोऽध्यायः

अवतरणिका—

दसवें अध्यायके अन्तमें भगवान्ने अर्जुनपर विशेष कृपा करके कहा कि सम्पूर्ण जगत् अर्थात् अनन्त सृष्टियों मेरे किसी एक अंशमें हैं और वह मैं तेरा सारथि बना हुआ तेरे घोड़ोंकी लगाम और चानुक लेकर बैठा हूँ तथा तेरी आज्ञाका पालन कर रहा हूँ! जब सब विभूतियों और योग-(प्रभाव-) का महान् आधार मैं तेरे सामने बैठा हूँ, तब तुझे अलग-अलग विभूतियोंको जाननेकी क्या आवश्यकता है? इस बातको सुनकर जब अर्जुनकी दृष्टि भगवान्की महती कृपापर गयी, तब वे बड़े आश्चर्यमें डूब जाते हैं और बोल उठते हैं—

अर्जुन उवाच

मदनुग्रहाय परमं गृह्यमध्यात्मसञ्जितम् । यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥ १ ॥

अर्जुन बोले—

मदनुग्रहाय= केवल मुझपर कृपागृह्यम्= गोपनीयतेन= उससे
करनेके लियेअध्यात्म-मम= मेरा
त्वया= आपनेसञ्जितम्= अध्यात्म-विषयकअयम्= यह
यत्= जोवचः= वचनमोहः= मोह
परमम्= परमउक्तम्= कहे,विगतः= नष्ट हो गया है।

व्याख्या —[भगवान्की कृपाका अनुभव करके अर्जुन भावविभोर हो उठे और कृपाका रहस्य प्रकट करनेके लिये जब अत्यधिक प्रसन्नतासे बोले, तब नियमका खयाल न रहनेसे यह श्लोक तैंतीस अक्षरोंका आया है, जब कि गीताभरमें अनुष्टुप् छन्दवाले श्लोक बत्तीस अक्षरोंके ही आये हैं। तात्पर्य है कि अत्यधिक प्रसन्नता होनेपर नियमका ध्यान नहीं रहता।]

'मदनुग्रहाय' —मेरा भजन करनेवालोंपर कृपा करके मैं स्वयं उनके अज्ञानजन्य अन्धकारका नाश कर देता हूँ (गीता—दसवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)—यह बात भगवान्ने केवल कृपा-परवश होकर कही। इस बातका अर्जुनपर बड़ा प्रभाव पड़ा, जिससे अर्जुन भगवान्की स्तुति

करने लगे (दसवें अध्यायके बारहवेंसे पन्द्रहवें श्लोकतक)। ऐसी स्तुति उन्होंने पहले गीतामें कहीं नहीं की। उसीका लक्ष्य करके अर्जुन यहाँ कहते हैं कि केवल मेरेपर कृपा करनेके लिये ही आपने ऐसी बात कही है*।

'परमं गृह्यम्' —अपनी प्रधान-प्रधान विभूतियोंको कहनेके बाद भगवान्ने दसवें अध्यायके अन्तमें अपनी ओरसे कहा कि मैं अपने किसी अंशमें सम्पूर्ण जगत्को, अनन्त-कोटि ब्रह्माण्डोंको व्याप्त करके स्थित हूँ (दसवें अध्यायका बयालीसवाँ श्लोक) अर्थात् भगवान्ने खुद अपना परिचय दिया कि मैं कैसा हूँ। इसी बातको अर्जुन परम गोपनीय मानते हैं।

'अध्यात्मसञ्जितम्' —दसवें अध्यायके सातवें

  • ऐसे तो पहले अध्यायसे लेकर यहाँतक भगवान्ने जो कुछ कहा है वह सब कृपा-परवश होकर ही कहा है। वास्तवमें भगवान्की सम्पूर्ण क्रियाओंमें कृपा भरी रहती है, पर मनुष्य उसे पहचानता नहीं। भगवान्की कृपाको पहचाननेपर भगवत्तत्त्वका अनुभव बहुत सुगमतासे और शीघ्रतासे हो जाता है। अर्जुनका लक्ष्य भी जब भगवत्कृपाकी ओर जाता है, तब वे विभोर होकर कह उठते हैं कि आपकी कृपासे मेरा मोह नष्ट हो गया।