श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 746, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ३ ]
- साधक-संजीवनी *
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बत्तीसाँ श्लोक)। इसीको लेकर अर्जुन यहाँ कहते हैं कि मैंने आपसे प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलयका वर्णन विस्तारसे सुना है। इसका तात्पर्य प्राणियोंकी उत्पत्ति और विनाश सुननेसे नहीं है, प्रत्युत इसका तात्पर्य यह सुननेसे है कि सभी प्राणी आपसे ही उत्पन्न होते हैं, आपमें ही रहते हैं और आपमें ही लीन हो जाते हैं अर्थात् सब कुछ आप ही हैं। 'माहात्म्यमपि चाव्ययम्'—आपने दसवें अध्यायके सातवें श्लोकमें बताया कि मेरी विभूति और योगको
तत्वसे जानता है, वह अविकम्प भक्तियोगसे युक्त हो जाता है। इस प्रकार आपकी विभूति और योगको तत्वसे जाननेका माहात्म्य भी मैंने सुना है। माहात्म्यको 'अव्यय' कहनेका तात्पर्य है कि भगवान्की विभूति और योगको तत्वसे जाननेपर भगवान्में जो भक्ति होती है, प्रेम होता है, भगवान्से अभिन्नता होती है, वह सब अव्यय है। कारण कि भगवान् अव्यय, नित्य हैं तो उनकी भक्ति, प्रेम भी अव्यय ही होगा।
परिशिष्ट भाव—इस श्लोकमें अर्जुन अपनी दृष्टिसे मोह नष्ट होनेका कारण बताते हैं। 'माहात्म्यमपि चाव्ययम्'—यहाँ 'अपि' पदसे ऐसा अर्थ निकलता है कि अर्जुनने भगवान्का विनाशी माहात्म्य भी सुना है और अविनाशी माहात्म्य भी सुना है। 'भवाप्ययौ हि भूतानाम्'—यह भगवान्का विनाशी अर्थात् परिवर्तनशील माहात्म्य है। मनुष्य भगवान्के साथ किसी भी प्रकारसे सम्बन्ध जोड़ ले तो वह कल्याण ही करेगा—यह भगवान्का अविनाशी अर्थात् अपरिवर्तनशील माहात्म्य है। तात्पर्य है कि सत्-असत् सब कुछ भगवान् ही हैं—'सदसच्चाहम्' (गीता ९।१९)।
सम्बन्ध—अब आगेके दो श्लोकोंमें अर्जुन विराटरूपके दर्शनके लिये भगवान्से प्रार्थना करते हैं।
एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर। द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥ ३ ॥
पुरुषोत्तम = हे पुरुषोत्तम! त्वम् = आप आत्मानम् = अपने-आपको यथा = जैसा आत्थ = कहते हैं, एतत् = यह (वास्तवमें) एवम् = ऐसा ही है। परमेश्वर = हे परमेश्वर! ते = आपके ऐश्वरम् = ईश्वर-सम्बन्धी रूपम् = रूपको (मैं) द्रष्टुम् = देखना इच्छामि = चाहता हूँ।
व्याख्या—पुरुषोत्तम'—यह सम्बोधन देनेका तात्पर्य है कि हे भगवन्! मेरी दृष्टिमें इस संसारमें आपके समान कोई उत्तम, श्रेष्ठ नहीं है अर्थात् आप ही सबसे उत्तम, श्रेष्ठ हैं। इस बातको आगे पन्द्रहवें अध्यायके अठारहवें श्लोकमें भगवान्ने भी कहा है कि मैं क्षरसे अतीत और अक्षरसे उत्तम हूँ; अतः मैं शास्त्र और वेदमं पुरुषोत्तम नामसे प्रसिद्ध हूँ। 'एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानम्'—हे पुरुषोत्तम! आपने (सातवें अध्यायसे दसवें अध्यायतक) मेरे प्रति अपने अलौकिक प्रभावका, सामर्थ्यका जो कुछ वर्णन किया, वह वास्तवमें ऐसा ही है। यह संसार मेरेसे ही उत्पन्न होता है और मेरेमें ही लीन हो जाता है (सातवें अध्यायका छठा श्लोक), मेरे सिवाय
इसका और कोई कारण नहीं है (सातवें अध्यायका सातवाँ श्लोक), सब कुछ वासुदेव ही है (सातवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक), ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधिज्ञरूपमें मैं ही हूँ (सातवें अध्यायका उनतीसवाँ-तीसवाँ श्लोक), अनन्य भक्तिसे प्रापणीय परम तत्त्व मैं ही हूँ (आठवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक), मेरेसे ही यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, पर मैं संसारमें और संसार मेरेमें नहीं है (नवें अध्यायका चौथा-पाँचवाँ श्लोक), सत् और असत्-रूपसे सब कुछ मैं ही हूँ (नवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक), मैं ही संसारका मूल कारण हूँ और मेरेसे ही सारा संसार सत्ता-स्फूर्ति पाता है (दसवें अध्यायका आठवाँ श्लोक), यह सारा संसार मेरे ही किसी एक अंशमें स्थित है (दसवें अध्यायका बयालीसवाँ श्लोक)