श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 738, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ४० ]
- साधक-संजीवनी *
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‘नान्तोऽस्ति’—भगवान्की दिव्य विभूतियोंका अन्त नहीं है। कारण कि भगवान् अनन्त हैं तो उनकी विभूतियाँ, गुण, लीलाएँ आदि भी अनन्त हैं—‘हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता’ (मानस १। १४०। ५)। इसलिये भगवान्ने विभूतियोंके उपक्रममें और उपसंहारमें—दोनों ही जगह कहा है कि मेरी विभूतियोंके विस्तारका अन्त नहीं है। श्रीमद्भागवतमें भगवान्ने अपनी विभूतियोंके विषयमें कहा है कि ‘मेरे द्वारा परमाणुओंकी संख्या समयसे गिनी जा सकती है, पर करोड़ों ब्रह्माण्डोंको रचनेवाली मेरी विभूतियोंका अन्त नहीं पाया जा सकता।’
भगवान् अनन्त, असीम और अगाध हैं। संख्याकी दृष्टिसे भगवान् ‘अनन्त’ हैं अर्थात् उनकी गणना परार्द्धतक नहीं हो सकती। सीमाकी दृष्टिसे भगवान् ‘असीम’ हैं। सीमा दो तरहकी होती है—कालकृत और देशकृत। अमुक समय पैदा हुआ और अमुक समयतक रहेगा—यह कालकृत सीमा हुई; और यहाँसे लेकर वहाँतक—यह देशकृत सीमा हुई। भगवान् ऐसे सीमामें बँधे हुए नहीं हैं। तलकी दृष्टिसे भगवान् ‘अगाध’ हैं। अगाध शब्दमें ‘गाध’ नाम ‘तल’ का है; जैसे, जलमें नीचेका तल होता है। अगाधका
अर्थ हुआ—जिसका तल है ही नहीं, ऐसा अथाह गहरा।
‘एष दृहेश्तः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया’—अठारहवें श्लोकमें अर्जुनने कहा कि आप अपनी दिव्य विभूतियोंको विस्तारसे कहिये, तो उत्तरमें भगवान्ने कहा कि मेरी विभूतियोंके विस्तारका अन्त नहीं है। ऐसा कहकर भी भगवान्ने अर्जुनकी जिज्ञासाके कारण कृपापूर्वक अपनी विभूतियोंका विस्तारसे वर्णन किया। परन्तु यह विस्तार केवल लौकिक दृष्टिसे ही है। इसलिये भगवान् यहाँ कह रहे हैं कि मैंने यहाँ जो विभूतियोंका विस्तार किया है, वह विस्तार केवल तेरी दृष्टिसे ही है। मेरी दृष्टिसे तो यह विस्तार भी वास्तवमें बहुत ही संक्षेपसे (नाममात्रका) है; क्योंकि मेरी विभूतियोंका अन्त नहीं है।
[इस अध्यायमें बतायी गयी सम्पूर्ण विभूतियाँ सबके काम नहीं आतीं, प्रत्युत ऐसी अनेक दूसरी विभूतियाँ भी काममें आती हैं, जिनका यहाँ वर्णन नहीं हुआ है। अतः साधकको चाहिये कि जहाँ-जहाँ किसी विशेषताको लेकर मन खिंचता हो, वहाँ-वहाँ उस विशेषताको भगवान्की ही माने और भगवान्का ही चिन्तन करे; चाहे वह विभूति यहाँ भगवान्द्वारा कही गयी हो अथवा न कही गयी हो।]
परिशिष्ट भाव —गीतामें भगवान्ने कारणरूपसे सत्रह विभूतियाँ (सातवें अध्यायके आठवेंसे बारहवें श्लोकतक), कार्य-कारणरूपसे सौतीस विभूतियाँ (नवें अध्यायके सोलहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक), भावरूपसे बीस विभूतियाँ (दसवें अध्यायका चौथा-पाँचवाँ श्लोक), व्यक्तिरूपसे पचीस विभूतियाँ (दसवें अध्यायका छठा श्लोक), मुख्यरूपसे तथा अधिपतिरूपसे इक्यासी विभूतियाँ (दसवें अध्यायके बीसवेंसे अड़तीसवें श्लोकतक), साररूपसे एक विभूति (दसवें अध्यायका उन्तालीसवाँ श्लोक) और प्रभावरूपसे तेरह विभूतियाँ (पन्द्रहवें अध्यायके बारहवेंसे पन्द्रहवें श्लोकतक) बतायी हैं। इन सबका तात्पर्य यही है कि एक भगवान्के सैवाय कुछ नहीं है। सब रूपोंमें एक भगवान्-ही-भगवान् हैं। सब भगवान्का ही समग्ररूप है। असत् परिवर्तनशील है और सत् अपरिवर्तनशील है। ये सत् (परा) और असत् (अपरा)—दोनों ही भगवान्की विभूतियाँ हैं—‘सदसच्चाहमर्जुन’ (गीता ९। १९)। तात्पर्य है कि विभूतिरूपसे साक्षात् भगवान् ही हैं। अतः जिसमें हमारा आकर्षण होता है, वह वास्तवमें भगवान्का ही आकर्षण है। परंतु भोगबुद्धिके कारण वह आकर्षण भगवत्प्रेममें परिणत न होकर काम, आसक्तिमें परिणत हो जाता है, जो संसारमें बाँधनेवाला है।
गीतामें भगवान्ने ब्रह्मको भी ‘माम्’ (अपना स्वरूप) कहा है (आठवें अध्यायका तेरहवाँ श्लोक), देवताओंको भी ‘माम्’ कहा है (नवें अध्यायका तेईसवाँ श्लोक), इन्द्रको भी ‘माम्’ कहा है (नवें अध्यायका बीसवाँ श्लोक), उत्तम गतिको भी ‘माम्’ कहा है (सातवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक), क्षेत्रज्ञ-(जीवात्मा-)को भी ‘माम्’ कहा है (तेरहवें अध्यायका दूसरा श्लोक), सबके शरीरमें रहनेवाले अन्तर्यामीको भी ‘माम्’ कहा है (सोलहवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक), सम्पूर्ण प्राणियोंके बीजको भी ‘माम्’ कहा है (सातवें अध्यायका दसवाँ श्लोक) आदि। तात्पर्य है कि सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार तथा मनुष्य, देवता, पशु, पक्षी, भूत, प्रेत, पिशाच आदि जो कुछ भी है, वह सब मिलकर भगवान्का ही समग्ररूप है अर्थात् सब भगवान्की ही विभूतियाँ हैं, उनका ही ऐश्वर्य है। ये सब-की-सब
१-संख्यान परमाणूनां कालेन क्रियते मया। न तथा मे विभूतीनां सृजतोऽण्डानि कोटिशः ॥ (श्रीमद्भा० ११। १६। ३९)
२-सर्वे च देवा मनवस्समस्तासप्तर्षयो ये मनुमूनवश्च। इन्द्रश्च योऽयं त्रिदशेशभूतो विष्णोरशेषास्तु विभूतयस्ताः ॥
(विष्णुपुराण ३। १। ४६)