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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १० ]

पसीनेसे पैदा होनेवाले जूँ, लीख आदि तथा वर्षामें जमीनसे पैदा होनेवाले केंचुए आदि जीव। इन चार स्थानोंसे चौरासी लाख योनियों पैदा होती हैं। इन योनियोंमें दो तरहके जीव होते हैं—स्थायर और जंगम। वृक्ष, लता, दूब, घास आदि एक ही जगह रहनेवाले जीव 'स्थायर' हैं और मनुष्य, पशु, पक्षी आदि चलने-फिरनेवाले जीव 'जंगम' हैं। इन जीवोंमें भी कोई जलमें रहनेवाले हैं, कोई आकाशमें रहनेवाले हैं और कोई भूमिपर रहनेवाले हैं। इन चौरासी लाख योनियोंके सिवाय देवता, पितर, गन्धर्व, भूत, प्रेत, पिशाच, ब्रह्मराक्षस, पूतना, बालग्रह आदि कई योनियाँ हैं। इन सम्पूर्ण योनियोंके बीज अर्थात् मूल कारण भगवान् हैं। तात्पर्य है कि अनन्त ब्रह्माण्डोंमें अनन्त जीव हैं, पर उन सबका बीज एक ही है! इसलिये सब रूपोंमें एक भगवान् ही हैं—'वासुदेवः सर्वम्'।

जैसे बीजसे खेती होती है, ऐसे ही एक भगवान्से यह सम्पूर्ण संसार हुआ है। जिस प्रकार बाजरीसे बाजरी ही पैदा होती है, गेहूँसे गेहूँ ही होता है, पशुसे पशु ही होते हैं, मनुष्यसे मनुष्य ही होते हैं, इसी प्रकार भगवान्से भगवान् ही होते हैं अर्थात् संसाररूपसे भगवान् ही प्रकट होते हैं! जैसे सोनेसे बने गहने सोनारूप ही होते हैं, लोहेसे बने औजार लोहारूप ही होते हैं, मिट्टीसे बने बर्तन मिट्टीरूप ही होते हैं, रईसे बने वस्त्र रईरूप ही होते हैं, ऐसे ही भगवान्से होनेवाला संसार भी भगवद्रूप ही है।

लौकिक बीजसे तो एक ही प्रकारकी खेती पैदा होती है। जैसे, गेहूँके बीजसे गेहूँ ही पैदा होता है, ऐसा नहीं होता कि एक ही बीजसे गेहूँ भी पैदा हो जाय, बाजरी भी पैदा हो जाय, मोठ भी पैदा हो जाय, मूँग भी पैदा हो जाय। सबके बीज अलग-अलग होते हैं। परन्तु भगवान्रूपी बीज इतना विलक्षण बीज है कि उस एक ही बीजसे अनेक प्रकारकी सुष्ठि पैदा हो जाती है (गीता—चौदहवें अध्यायका चौथा श्लोक) और सब प्रकारकी सुष्ठि पैदा होनेपर भी उसमें कोई विकृति नहीं आती, वह ज्यों-का-त्यों रहता है; क्योंकि वह बीज 'अव्यय' है (गीता—नवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक) और 'सनातन' है। (गीता—सातवें अध्यायका दसवाँ श्लोक)।

सम्बन्ध—अब आगेके श्लोकमें भगवान् अपनी दिव्य विभूतियोंके कथनका उपसंहार करते हैं।

नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप।

एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ॥ ४० ॥

परन्तप | = हे परन्तप अर्जुन! | न | = नहीं | प्रोक्तः | = कहा है, ---|---|---|---|---|--- मम | = मेरी | अस्ति | = है। | एषः | = यह दिव्यानाम् | = दिव्य | मया | = मैंने (तुम्हारे सामने अपनी) | तु | = तो (केवल) विभूतीनाम् | = विभूतियोंका | विभूतेः | = विभूतियोंका जो | उद्देशतः | = संक्षेपसे नाममात्र कहा है। अन्तः | = अन्त | विस्तारः | = विस्तार | |

व्याख्या—'मम दिव्यानां * विभूतीनाम्'—'दिव्य' शब्द अलौकिकता, विलक्षणताका द्योतक है। साधकका मन जहाँ चला जाय, वहाँ भगवान्का चिन्तन करनेसे यह दिव्यता वहाँ प्रकट हो जायगी; क्योंकि भगवान्के समान दिव्य कोई है ही नहीं। देवता जो दिव्य कहे जाते हैं, वे भी नित्य ही भगवान्के दर्शनकी इच्छा रखते हैं—'नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः' (गीता ११।५२)। इससे यही सिद्ध होता है कि दिव्यातिदिव्य

तो एक भगवान् ही हैं। इसलिये भगवान्की जितनी भी विभूतियाँ हैं, तत्त्वसे वे सभी दिव्य हैं। परन्तु साधकके सामने उन विभूतियोंकी दिव्यता तभी प्रकट होती है, जब उसका उद्देश्य केवल एक भगवत्प्राप्तिका ही होता है और भगवतत्त्व जाननेके लिये राग-द्वेषसे रहित होकर उन विभूतियोंमें केवल भगवान्का ही चिन्तन करता है।

  • अर्जुनने पहले प्रार्थनाके रूपमें पूछा था—'वकुर्मह्यस्थेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः' (१०।१६)। भगवान्ने विभूतियोंका वर्णन आरम्भ करते हुए कहा—'हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः' (१०।१९)। और यहाँ उसका उपसंहार करते हुए भगवान् कहते हैं—'नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप' (१०।४०)। इस तरह प्रार्थना- (प्रश्न- ) में, उपक्रममें और उपसंहारमें—तीनों जगह 'दिव्य' पदकी एकता है।