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भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 736

श्लोक ३१]

  • साधक-संजीवनी *

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बीज' और यहाँ केवल 'बीज' बताया है। इसका तात्पर्य है कि मैं ज्यों-का-त्यों रहता हुआ ही संसाररूपसे प्रकट हो जाता हूँ और संसाररूपसे प्रकट होनेपर भी मैं उसमें ज्यों-का-त्यों व्यापक रहता हूँ।

'न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्'— संसारमें जड़-चेतन, स्थावर-जंगम, चर-अचर आदि जो कुछ भी देखनेमें आता है, वह सब मेरे बिना नहीं हो सकता। सब मेरेसे ही होते हैं अर्थात् सब कुछ मैं-ही-मैं हूँ। इस वास्तविक मूल तत्त्वको जानकर साधककी इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि जहाँ-कहीं जायँ अथवा मन-बुद्धिमें संसारकी जो कुछ बात याद आये, उन सबको भगवान्का ही स्वरूप माने। ऐसा माननेसे साधकको भगवान्का ही चिन्तन होगा, दूसरेका नहीं; क्योंकि तत्त्वसे भगवान्के सिवाय दूसरा कोई है ही नहीं।

यहाँ भगवान्ने कहा है कि मेरे सिवाय चर-अचर कुछ नहीं है अर्थात् सब कुछ मैं ही हूँ और अठारहवें अध्यायके चालीसवें श्लोकमें कहा है कि सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंके सिवाय कुछ नहीं है अर्थात् सब गुणोंका ही कार्य है। इस भेदका तात्पर्य है कि यहाँ भक्तियोगका प्रकरण है। इस प्रकरणमें अर्जुने प्रश्न किया है कि मैं आपका कहाँ-कहाँ चिन्तन करूँ? इसलिये उत्तरमें भगवान्ने कहा कि तेरे मनमें जिस-जिसका चिन्तन होता है, वह सब मैं ही हूँ। परन्तु वहाँ (१८।४० में) सांख्ययोगका प्रकरण है। सांख्ययोगमें प्रकृति और पुरुष—दोनोंके विवेककी तथा प्रकृतिसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेकी प्रधानता है। प्रकृतिका कार्य होनेसे मात्र सृष्टि त्रिगुणमयी है। इसलिये वहाँ तीनों गुणोंसे रहित कोई नहीं है—ऐसा कहा गया है।

विशेष बात

भगवान्ने 'अहमात्मा गुडाकेश' (१०।२०)से लेकर 'बीजं तदहमर्जुन' (१०।३९) तक जो बयासी विभूतियाँ कही हैं, उनका तात्पर्य छोट-बड़ा, उत्तम-मध्यम-अधम

परिशिष्ट भाव —सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पत्तिके चार खानि (स्थान) हैं—१. जरायुज —जेरेके साथ पैदा होनेवाले मनुष्य, गाय, भैंस, भेड़, बकरी आदि; २. अण्डज —अण्डेसे पैदा होनेवाले पक्षी, साँप, गिलहरी, छिपकली आदि; ३. उद्भिज्ज —पृथ्वीका भेदन करके उपरकी तरफ निकलनेवाले वृक्ष, लता, दूब, घास, अनाज आदि; और ४. स्वेदज

बतानेमें नहीं है, प्रत्युत यह बतानेमें है कि कोई भी वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदि सामने आये तो उसमें भगवान्का ही चिन्तन होना चाहिये। कारण कि मूलमें अर्जुनका प्रश्न यही था कि आपका चिन्तन करता हुआ मैं आपको कैसे जानूँ और किन-किन भावोंमें मैं आपका चिन्तन करूँ? (सत्रहवाँ श्लोक)। उस प्रश्नके उत्तरमें चिन्तन करनेके लिये ही भगवान्ने अपनी विभूतियोंका संक्षिप्त वर्णन किया है।

जैसे यहाँ गीतामें भगवान्ने अर्जुनसे अपनी विभूतियाँ कही हैं, ऐसे ही श्रीमद्भगवतमें (ग्यारहवें स्कन्धके सोलहवें अध्यायमें) भगवान्ने उद्धवजीसे अपनी विभूतियाँ कही हैं। गीतामें कही कुछ विभूतियाँ भगवतमें नहीं आयी हैं और भगवतमें कही कुछ विभूतियाँ गीतामें नहीं आयी हैं। गीता और भगवतमें कही गयी कुछ विभूतियोंमें तो समानता है, पर कुछ विभूतियोंमें दोनों जगह अलग-अलग बात आयी है; जैसे—गीतामें भगवान्ने पुरोहितोंमें बृहस्पतिको अपनी विभूति बताया है—'पुरोधसां च मुखं मां विद्भिद पार्थ बृहस्पतिम्'(१०।२४) और भगवतमें भगवान्ने पुरोहितोंमें वसिष्ठजीको अपनी विभूति बताया है—'पुरोधसां वसिष्ठोऽहम्'(११।१६।२२)। अब शंका यह होती है कि गीता और भगवतकी विभूतियोंका वका एक होनेपर भी दोनोंमें एक समान बात क्यों नहीं मिलती? इसका समाधान यह है कि वास्तवमें विभूतियाँ कहनेमें भगवान्का तात्पर्य किसी वस्तु, व्यक्ति आदिकी महत्ता बतानेमें नहीं है, प्रत्युत अपना चिन्तन करानेमें है। अतः गीता और भगवत—दोनों ही जगह कही हुई विभूतियोंमें भगवान्का चिन्तन करना ही मुख्य है। इस दृष्टिसे जहाँ-जहाँ विशेषता दिखायी दे, वहाँ-वहाँ वस्तु, व्यक्ति आदिकी विशेषता न देखकर केवल भगवान्की ही विशेषता देखनी चाहिये और भगवान्की ही तरफ वृत्ति जानी चाहिये।

१-इदं गुणमयं विद्भि त्रिविधं मायया कृतम्॥ (श्रीमद्भा० ११।२८।७)

२-यच्च किंचिज्जगत्सर्वं दृश्यते श्रूयतेऽपि वा। अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः॥

(महानारायणोपनिषद् ११।६)

'यह जो कुछ भी जगत् देखने या सुननेमें आता है, इस सबको बाहर और भीतरसे व्याप्त करके भगवान् नारायण स्थित है।'