श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १० ]
दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् ।
मौनं चैवासिम् गृह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् ॥ ३८ ॥
| दमयताम् | = दमन करनेवालोंमें | अस्मि | = मैं हूँ। | ज्ञानवताम् | = ज्ञानवानोंमें |
|---|---|---|---|---|---|
| दण्डः | = दण्डनीति (और) | गृह्यानाम् | = गोपनीय भावोंमें | ज्ञानम् | = ज्ञान |
| जिगीषताम् | = विजय चाहने- | ||||
| वालोंमें | मौनम् | = मौन | अहम् | = मैं | |
| नीतिः | = नीति | अस्मि | = मैं हूँ | एव | = ही |
| च | = और | अस्मि | = हूँ। |
व्याख्या —‘दण्डो दमयतामस्मि’—दुष्टोंको दुष्टतासे बचाकर सन्मार्गपर लानेके लिये दण्डनीति मुख्य है। इसलिये भगवान्ने इसको अपनी विभूति बताया है।
‘नीतिरस्मि जिगीषताम्’—नीतिका आश्रय लेनेसे ही मनुष्य विजय प्राप्त करता है और नीतिसे ही विजय ठहरती है। इसलिये नीतिको भगवान्ने अपनी विभूति बताया है।
‘मौनं चैवासिम् गृह्यानाम्’—गुप्त रखनेयोग्य जितने भाव हैं, उन सबमें मौन (वाणीका संयम अर्थात् चुप रहना) मुख्य है; क्योंकि चुप रहनेवालेके भावोंको हरेक व्यक्ति नहीं जान सकता। इसलिये गोपनीय भावोंमें
भगवान्ने मौनको अपनी विभूति बताया है।
‘ज्ञानं ज्ञानवतामहम्’—संसारमें कला-कौशल आदिको जाननेवालोंमें जो ज्ञान (जानकारी) है, वह भगवान्की विभूति है। तात्पर्य है कि ऐसा ज्ञान अपनेमें और दूसरोंमें देखनेमें आये, तो इसे भगवान्की ही विभूति माने।
यहाँ सामान्य शास्त्रज्ञानसे लेकर तत्त्वज्ञानतक सब-का-सब ज्ञान ‘ज्ञानं ज्ञानवतामहम्’ के अन्तर्गत ले सकते हैं।
इन सब विभूतियोंमें जो विलक्षणता है, वह इनकी व्यक्तिगत नहीं है, प्रत्युत परमात्माकी ही है। इसलिये परमात्माकी तरफ ही दृष्टि जानी चाहिये।
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन ।
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् ॥ ३९ ॥
| च | = और | अपि | = भी | अस्ति | = है, |
|---|---|---|---|---|---|
| अर्जुन | = हे अर्जुन! | अहम् | = मैं ही हूँ; | ||
| (क्योंकि) | यत् | = जो | |||
| सर्वभूतानाम् | = सम्पूर्ण प्राणियोंका | तत् | = वह | मया | = मेरे |
| यत् | = जो | चराचरम् | = चर-अचर (कोई) | विना | = बिना |
| बीजम् | = बीज (मूल कारण) | ||||
| है, | भूतम् | = प्राणी | स्यात् | = हो अर्थात् चर- | |
| अचर सब कुछ | |||||
| तत् | = वह बीज | न | = नहीं | मैं ही हूँ। |
व्याख्या —[भगवान्ने बीसवें श्लोकसे उन्तालीसवें श्लोकतक अपनी कुल बयासी विभूतियोंका वर्णन किया है; जैसे—बीसवें श्लोकमें चार, इक्कीसवें श्लोकमें चार, बाईसवें श्लोकमें चार, तेईसवें श्लोकमें चार, चौबीसवें श्लोकमें तीन, पचीसवें श्लोकमें चार, छब्बीसवें श्लोकमें चार, सत्ताईसवें श्लोकमें तीन, अट्ठाईसवें श्लोकमें चार, उन्तीसवें श्लोकमें चार, तीसवें श्लोकमें चार, इकतीसवें श्लोकमें चार, बत्तीसवें श्लोकमें पाँच, तैंतीसवें श्लोकमें चार, चौंतीसवें श्लोकमें नौ, पैंतीसवें श्लोकमें चार, छत्तीसवें श्लोकमें पाँच, सैंतीसवें श्लोकमें चार, अड़तीसवें
श्लोकमें चार और उन्तालीसवें श्लोकमें एक विभूतिका वर्णन किया है। ]
‘यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन’—यहाँ भगवान् समस्त विभूतियोंका सार बताते हैं कि सबका बीज अर्थात् कारण मैं ही हूँ। बीज कहनेका तात्पर्य है कि इस संसारका निमित्त कारण भी मैं हूँ और उपादान कारण भी मैं हूँ अर्थात् संसारको बनानेवाला भी मैं हूँ और संसाररूपसे बननेवाला भी मैं हूँ।
भगवान्ने सातवें अध्यायके दसवें श्लोकमें अपनेको ‘सनातन बीज’, नवें अध्यायके अठारहवें श्लोकमें ‘अव्यय