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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

७१०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १० ]

रहनेवालातमः= अन्धकारकोदीपकके द्वारा
अहम् = मैं (उनके)भास्वता= देदीप्यमाननाशयामि = नष्ट कर देता
अज्ञानजन्म = अज्ञानजन्मज्ञानदीपेन= ज्ञानरूपहूँ।

व्याख्या—‘तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः’— उन भक्तोंके हृदयमें कुछ भी सांसारिक इच्छा नहीं होती। इतना ही नहीं, उनके भीतर मुझे छोड़कर मुक्तिककी भी इच्छा नहीं होती। अभिप्राय है कि वे न तो सांसारिक चीजें चाहते हैं और न पारमार्थिक चीजें (मुक्ति, तत्त्वबोध आदि) ही चाहते हैं। वे तो केवल प्रेमसे मेरा भजन ही करते हैं। उनके इस निष्कामभाव और प्रेमपूर्वक भजन करनेको देखकर मेरा हृदय द्रवित हो जाता है। मैं चाहता हूँ कि मेरे द्वारा उनकी कुछ सेवा बन जाय, वे मेरेसे कुछ ले लें। परन्तु वे मेरेसे कुछ लेते नहीं तो द्रवित हृदय होनेके कारण केवल उनपर कृपा करनेके लिये कृपा-परवश होकर मैं उनके अज्ञानजन्म अन्धकारको दूर कर देता हूँ। मेरे द्रवित हृदय होनेका कारण यह है कि मेरे भक्तोंमें किसी प्रकारकी किंचिन्मात्र भी कमी न रहे।

‘आत्मभावस्थः’— मनुष्य अपना जो होनापन मानते हैं कि ‘मैं हूँ’ तो यह होनापन प्रायः प्रकृति-(शरीर-) के साथ सम्बन्ध जोड़कर ही मानते हैं अर्थात् तादात्म्यके कारण शरीरके बदलनेमें अपना बदलना मानते हैं, जैसे—मैं बालक हूँ, मैं जवान हूँ, मैं बलवान् हूँ, मैं निर्बल हूँ इत्यादि। परन्तु इन विशेषणोंको छोड़कर तत्वकी दृष्टिसे इन प्राणियोंका अपना जो होनापन है, वह प्रकृतिसे रहित है। इसी होनेपनमें सदा रहनेवाले प्रभुके लिये यहाँ ‘आत्मभावस्थः’ पद आया है।

‘भास्वता ज्ञानदीपेन नाशयामि’— प्रकाशमान ज्ञानदीपकके द्वारा उन प्राणियोंके अज्ञानजन्म अन्धकारका नाश कर देता हूँ। तात्पर्य है कि जिस अज्ञानके कारण ‘मैं कौन हूँ और मेरा स्वरूप क्या है?’ ऐसा जो अनजानपना रहता है, उस अज्ञानका मैं नाश कर देता हूँ अर्थात् तत्वबोध करा देता हूँ। जिस तत्वबोधकी महिमा शास्त्रोंमें गायी गयी है, उसके लिये उनको श्रवण, मनन, निदिध्यासन

आदि साधन नहीं करने पड़ते, कोई परिश्रम नहीं करना पड़ता, प्रत्युत मैं स्वयं उनको तत्वबोध करा देता हूँ।

विशेष बात

भक्त जब अनन्यभावसे केवल भगवान्में लगे रहते हैं, तब सांसारिक सिद्धि-असिद्धिमें सम रहना—यह ‘समता’ भी भगवान् देते हैं और जिसके समान पवित्र कोई नहीं है, वह ‘तत्वबोध’ (स्वरूपज्ञान) भी भगवान् स्वयं देते हैं। भगवान्के स्वयं देनेका तात्पर्य है कि भक्तोंको इनके लिये इच्छा और प्रयत्न नहीं करना पड़ता; प्रत्युत भगवत्कृपासे उनमें समता स्वतः आ जाती है। उनको तत्वबोध स्वतः हो जाता है। कारण कि जहाँ भक्तिरूपी माँ होगी, वहाँ उसके वैराग्य और ज्ञानरूपी बेटे रहेंगे ही। इसलिये भक्तिके आनेपर समता—संसारसे वैराग्य और अपने स्वरूपका बोध—ये दोनों स्वतः आ जाते हैं। इसका तात्पर्य है कि जो साधनजन्म पूर्णता होती है, उसकी अपेक्षा भगवान्द्वारा की हुई पूर्णता बहुत विलक्षण होती है। इसमें अपूर्णताकी गंध भी नहीं रहती।

जैसे भगवान् अनन्यभावसे भजन करनेवाले भक्तोंका योगक्षेम वहन करते हैं (गीता—नवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक), ऐसे ही जो केवल भगवान्के ही परायण हैं, ऐसे प्रेमी भक्तोंको (उनके न चाहनेपर भी और उनके लिये कुछ भी बाकी न रहनेपर भी) भगवान् समता और तत्वबोध देते हैं। यह सब देनेपर भी भगवान् उन भक्तोंके ऋणी ही बने रहते हैं। भागवतमें भगवान्ने गोपियोंके लिये कहा है कि ‘मेरे साथ सर्वथा निर्दोष (अनिन्द्य) सम्बन्ध जोड़नेवाली गोपियोंका मेरेपर जो एहसान है, ऋण है, उसको मैं देवताओंके समान लम्बी आयु पाकर भी नहीं चुका सकता। कारण कि बड़े-बड़े ऋषि-मुनि, त्यागी आदि भी घरकी जिस अपनापनरूपी बेड़ियोंको सुगमतासे नहीं तोड़ पाते, उनको उन्होंने तोड़ डाला है।’

भक्त भगवान्के भजनमें इतने तल्लीन रहते हैं कि

१-(१) सलोक्वसाष्टिसामीप्यसारुप्यैकत्वमप्युत। दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जनाः॥ (श्रीमद्भा० ३।२१।१३)

‘मेरे प्रेमी भक्तगण मेरी सेवाको छोड़कर सलोक्व, साष्टि, सामीप्य, सारुप्य और सायुज्य (इन पाँच प्रकारकी) मुक्तियोंको देनेपर भी नहीं लेते।’

(२) अस बिचारि हरि भगत सयाने। मुक्ति निरादर भगति लुभाने॥ (मानस ७।१११।४)

२-न पारयेऽहं निरवद्यसंयुजां स्वसाधुकृत्यं विबुधायुषापि वः। या मा भजन् दुर्जगेहशृङ्खलाः संवृच्य तद् वः प्रतियातु साधुना॥

(श्रीमद्भा० १०।३२।२२)

श्लोक ११ ]

  • साधक-संजीवनी *

७११

उनको यह पता ही नहीं रहता कि हमारेमें समता आयी है, हमें स्वरूपका बोध हुआ है। अगर कभी पता लग भी जाता है तो वे आश्चर्य करते हैं कि ये समता और बोध कहाँसे आये! वे 'अपनेमें कोई विशेषता न दीखे' इसके

लिये भगवान्से प्रार्थना करते हैं कि 'हे नाथ! आप समता, बोध ही नहीं, दुनियाके उद्धारका अधिकार भी दे दें, तो भी मेरेको कुछ मालूम नहीं होना चाहिये कि मेरेमें यह विशेषता है। मैं केवल आपके भजन-चिन्तनमें ही लगा रहूँ।'

परिशिष्ट भाव —यद्यपि कर्मयोग तथा ज्ञानयोग—दोनों साधन हैं और भक्तियोग साध्य है, तथापि भगवान् अपने भक्तोंको कर्मयोग भी दे देते हैं—'ददामि बुद्धियोगं तम्' और ज्ञानयोग भी दे देते हैं—'ज्ञानदीपेन भास्वता'। अपरा और परा—दोनों प्रकृतियाँ भगवान्की ही हैं। इसलिये भगवान् कृपा करके अपने भक्तको अपराकी प्रधानतासे होनेवाला कर्मयोग और पराकी प्रधानतासे होनेवाला ज्ञानयोग—दोनों प्रदान करते हैं। अतः भक्तको कर्मयोगका प्रापणीय तत्त्व 'निष्कामभाव' और ज्ञानयोगका प्रापणीय तत्त्व 'स्वरूपबोध'—दोनों ही सुगमतासे प्राप्त हो जाते हैं। कर्मयोग प्राप्त होनेपर भक्तके द्वारा संसारका उपकार होता है और ज्ञानयोग प्राप्त होनेपर भक्तका देहाभिमान दूर हो जाता है।

भक्त भगवान्के चिन्तनमें, प्रेममें ही सन्तुष्ट और मग्न रहता है। उसको न तो अपनेमें कोई कमी दीखती है और न कुछ पानेकी आवश्यकता प्रतीत होती है। जैसे बालक सर्वथा मॉके ही आश्रित रहता है तो उसकी दृष्टि अपनी कमियोंकी तरफ जाती ही नहीं! मॉ ही उसका ख्याल रखती है, उसको स्नान कराती है, मैले कपड़े उतारकर स्वच्छ कपड़े पहनाती है। ऐसे ही भक्त सर्वथा भगवान्के ही आश्रित हो जाता है कि 'मैं जैसा भी हूँ, भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं'। वह अपनी तरफ देखता ही नहीं। इसलिये भगवान् ही उसके भीतर स्थित अज्ञानको तत्त्वज्ञानके द्वारा नष्ट कर देते हैं। बालकमें तो मूढ़ता विशेष रहती है, पर भक्तमें विवेक विशेष रहता है।

भक्तका खास कर्तव्य है—भगवान्को अपना मानना। भक्त अपने कर्तव्यका पालन करता है तो भगवान् भी अपने कर्तव्यका पालन करते हैं और उसके बिना माँगें, बिना चाहे, अपनी तरफसे कर्मयोग और ज्ञानयोग—दोनोंकी सामर्थ्य प्रदान कर देते हैं, जिससे उसमें किसी प्रकारकी कमी न रहे।

कर्मयोगमें शान्तरस, ज्ञानयोगमें अखण्डरस और भक्तियोगमें अनन्तरस है। शान्तरस और अखण्डरसमें अनन्तरस नहीं है, पर अनन्तरसमें शान्तरस भी है और अखण्डरस भी है।

कर्मयोग और ज्ञानयोग लौकिक साधन हैं तथा भक्तियोग अलौकिक साधन है। अलौकिककी प्राप्ति होनेपर लौकिककी प्राप्ति भगवत्कृपासे स्वतः हो जाती है, पर लौकिककी प्राप्ति होनेपर अलौकिककी प्राप्ति नहीं होती। कारण कि अलौकिकमें तो लौकिक आ जाता है, पर लौकिकमें अलौकिक नहीं आता।

ज्ञानी तो भक्तसे रहित हो सकता है, पर भक्त ज्ञानसे रहित नहीं हो सकता। गोपियोंने श्रुतियोंका अध्ययन भी नहीं किया था, ज्ञानी महापुरुषोंका संग भी नहीं किया था और व्रत, तप आदि भी नहीं किये थे, फिर भी उनमें विलक्षण ज्ञान था! तात्पर्य है कि भक्तको स्वरूपका भी बोध हो जाता है। 'वासुदेवः सर्वम्' का बोध तो उसको है ही!

'आत्मभावस्थः' —जीवमें भगवान् रहते हैं; क्योंकि वह भगवान्का ही अंश है। वास्तवमें भगवान् ही जीवरूपसे प्रकट हुए हैं; क्योंकि भगवान्की परा प्रकृति होनेसे जीव भगवान्से अभिन्न है। उपनिषद्में आया है कि शरीरोंकी रचना करके भगवान् आप ही उनमें प्रविष्ट हो गये—'तत्पृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्' (तैत्तिरीय० २।६)।

१-मम दरसन फल परम अनुपा। जीव पाव निज सहज सरूपा ॥ (मानस, अरण्य० ३६।५)

२-ते नाधौतश्रुतिगणा नोपासितमहत्तमाः। अव्रतातपतपसः सत्संगान्मापुगातः ॥ (श्रीमद्भा० ११।१२।७)

'उन्होंने न तो वेदोंका अध्ययन किया था और न विधिपूर्वक महापुरुषोंकी उपासना ही की थी। इसी प्रकार उन्होंने कृच्छ्रचन्द्रायण आदि व्रत और कोई तपस्या भी नहीं की थी। बस, केवल सत्संग-(प्रेम-) के प्रभावसे ही वे मुझे प्राप्त हो गये।'

३-न खलु गोपिकानन्दनो भवानखिलदेहिनामन्तरात्मदृक्।

विखनसाथितो विश्वगुप्तये सख उदेयिवान् सात्त्वात् कुले ॥ (श्रीमद्भा० १०।३१।४)

(गोपियाँ कहती हैं—) 'हे सखे! आप निश्चय ही केवल यशोदाके पुत्र ही नहीं हैं, प्रत्युत सम्पूर्ण प्राणियोंकी अन्तरात्माके साक्षी हैं। ब्रह्माजीकी प्रार्थना सुनकर विश्वकी रक्षाके लिये ही आप यदुकुलमें अवतीर्ण हुए हैं।'

७१२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १० ]

सम्बन्ध—भक्तोंपर भगवान्की अलौकिक, विलक्षण कृपाकी बात सुनकर अर्जुनकी दृष्टि भगवान्की कृपाकी तरफ जाती है और कृपासे प्रभावित होकर वे आगेके चार श्लोकोंमें भगवान्की स्तुति करते हैं।

अर्जुन उवाच

परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्। पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ॥ १२ ॥ आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा। असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे ॥ १३ ॥

अर्जुन बोले—

परम्= परमपुरुषम्= पुरुष,देवलः= देवल
ब्रह्म= ब्रह्म,आदिदेवम्= आदिदेव,तथा= तथा
परम्= परमअजम्= अजन्मा (और)व्यासः= व्यास
धाम= धाम
(और)विभुम्= सर्वव्यापक हैं—आहुः= कहते हैं
परमम्= महान्त्वाम्= (ऐसा) आपको= और
पवित्रम्= पवित्रसर्वे= सब-के-सबस्वयम्= स्वयं
आप
भवान्= आप ही हैं।ऋषयः= ऋषि,एव= भी
शाश्वतम्= (आप) शाश्वत,देवर्षिः= देवर्षि,मे= मेरे प्रति
दिव्यम्= दिव्यनारदः= नारद,ब्रवीषि= कहते हैं।
असितः= असित,

व्याख्या—‘परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्’— अपने सामने बैठे हुए भगवान्की स्तुति करते हुए अर्जुन कहते हैं कि मेरे पूछनेपर जिसको आपने परम ब्रह्म (गीता—आठवें अध्यायका तीसरा श्लोक) कहा है, वह परम ब्रह्म आप ही हैं। जिसमें सब संसार स्थित रहता है, वह परम धाम अर्थात् परम स्थान आप ही हैं (गीता—नवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)। जिसको पवित्रोंमें भी पवित्र कहा है—‘पवित्राणां पवित्रं यः’ वह महान् पवित्र

भी आप ही हैं।

‘पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं ’” स्वयं चैव ब्रवीषि मे’—ग्रन्थोंमें ऋषियोंने, देवर्षि नारदने, असित और उनके पुत्र देवल ऋषिने तथा महर्षि व्यासजीने आपको शाश्वत, दिव्य पुरुष, आदिदेव, अजन्मा और विभु कहा है।

आत्माके रूपमें ‘शाश्वत’ (गीता—दूसरे अध्यायका बीसवाँ श्लोक), सगुण-निराकारके रूपमें ‘दिव्य पुरुष’ (गीता—आठवें अध्यायका दसवाँ श्लोक), देवताओं

१-मार्कण्डेय ऋषिने कहा है—‘श्रीकृष्ण यज्ञोंके यज्ञ, तपोंके तप और भूत-भविष्यत्-वर्तमानरूप हैं।’

(महा०, भीष्म० ६८।३)

भृगु ऋषिने कहा है—‘ये देवताओंके देवता और परम पुरातन विष्णु हैं।’ (महा०, भीष्म० ६८।४)

अंगिरा ऋषिने कहा है—‘ये सम्पूर्ण प्राणियोंकी रचना करनेवाले हैं।’ (महा०, भीष्म० ६८।६)

सनत्कुमार आदिने कहा है—‘इनके मस्तकसे आकाश और भुजाओंसे पृथ्वी व्याप्त है। तीनों लोक इनके उदरमें स्थित हैं। ये सनातन पुरुष हैं। तपसे अन्तःकरण शुद्ध होनेपर ही साधक इन्हें जान सकते हैं। आत्मसाक्षात्कारसे तृप्त हुए ऋषियोंमें भी ये परमोत्कृष्ट हैं। युद्धमें कभी पीठ न दिखानेवाले उदार राजर्षियोंकी भी ये ही परमगति हैं।’ (महा०, भीष्म० ६८।८—१०)

२-देवर्षि नारदजीने कहा है—‘भगवान् श्रीकृष्ण सम्पूर्ण लोकोंको उत्पन्न करनेवाले और सम्पूर्ण भावोंको जाननेवाले हैं। ये साध्यों और देवताओंके ईश्वरोंके भी ईश्वर हैं।’ (महा०, भीष्म० ६८।९)

३-असित और देवल ऋषिने कहा है—‘भगवान् श्रीकृष्ण ही प्रजाकी सृष्टिमें प्रजापति और सम्पूर्ण लोकोंके एकमात्र रचयिता हैं।’ (महा०, वन० १२।५०)

४-महर्षि व्यासजीने कहा है—‘आप वसुओंके वासुदेव, इन्द्रको इन्द्रत्व देनेवाले और देवताओंके भी परम देवता हैं।’

(महा०, भीष्म० ६८।५)

श्लोक १४]

  • साधक-संजीवनी *

७१३

और महर्षियों आदिके रूपमें 'आदिदेव' (गीता—दसवें अध्यायका दूसरा श्लोक), मूढ़लोग मेरेको अज नहीं जानते (गीता—सातवें अध्यायका पचीसवाँ श्लोक) तथा असम्मूढ़लोग मेरेको अज जानते हैं (गीता—दसवें

अध्यायका तीसरा श्लोक)— इस रूपमें 'अज' और मैं अत्यकरूपसे सारे संसारमें व्यापक हूँ (गीता—नवें अध्यायका चौथा श्लोक)—इस रूपमें 'विभु' स्वयं आपने मेरे प्रति कहा है।

परिशिष्ट भाव —निर्गुण-निराकारके लिये 'परं ब्रह्म', सगुण-निराकारके लिये 'परं धाम' और सगुण-साकारके लिये 'पवित्रं परमं भवान्' पदोंका प्रयोग करके अर्जुन भगवान्से मानो यह कहते हैं कि समग्र परमात्मा आप ही हैं (गीता—सातवें अध्यायका उन्तीसवाँ-तीसवाँ श्लोक और आठवें अध्यायका पहलेसे चौथे श्लोकतक)।

जो स्वयं भी शुद्ध हो और दूसरोंको भी शुद्ध करे, वह 'परम पवित्र' है। भगवान् परम पवित्र हैं और उनके नाम, रूप आदि सब भी परम पवित्र हैं। चौथे अध्यायके अड़तीसवें श्लोकमें ज्ञानको इस लोकमें सबसे पवित्र बताया गया है—'न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते'। परन्तु वह ज्ञान भी समग्र भगवान्के अन्तर्गत है। अतः भगवान् ज्ञानसे भी अधिक पवित्र हैं।

सर्वमेतदूतं मन्ये यन्मां वदसि केशव।

न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः ॥ १४ ॥

केशव= हे केशव !ऋतम्= सत्यहि= तो
माम्= मुझसे (आप)मन्ये= मानता हूँ।देवाः= देवता
यत्= जो कुछभगवन्= हे भगवन् !विदुः= जानते हैं (और)
वदसि= कह रहे हैं,ते= आपके= न
एतत्= यहव्यक्तिम्= प्रकट होनेकोदानवाः= दानव ही
सर्वम्= सब (में)= नजानते हैं।

व्याख्या —'सर्वमेतदूतं मन्ये यन्मां वदसि केशव'—'क' नाम ब्रह्माका है, 'अ' नाम विष्णुका है, 'ईश' नाम शंकरका है और 'व' नाम वपु अर्थात् स्वरूपका है। इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु और शंकर जिसके स्वरूप हैं, उसको 'केशव' कहते हैं। अर्जुनका यहाँ 'केशव' सम्बोधन देनेका तात्पर्य है कि आप ही संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और संहार करनेवाले हैं।

सातवेंसे नवें अध्यायतक मेरे प्रति आप 'यत्'—जो कुछ कहते आये हैं, वह सब मैं सत्य मानता हूँ; और 'एतत्'—अभी दसवें अध्यायमें आपने जो विभूति तथा योगका वर्णन किया है, वह सब भी मैं सत्य मानता हूँ। तात्पर्य है कि आप ही सबके उत्पादक और संचालक हैं। आपसे भिन्न कोई भी ऐसा नहीं हो सकता। आप ही सर्वोपरि हैं। इस प्रकार सबके मूलमें आप ही हैं—इसमें मेरेको कोई सन्देह नहीं है।

भक्तिमार्गमें विश्वासकी मुख्यता है। भगवान्ने पहले श्लोकमें अर्जुनको परम वचन सुननेके लिये आज्ञा दी थी, उसी परम वचनको अर्जुन यहाँ 'ऋतम्' अर्थात् सत्य

कहकर उसपर विश्वास प्रकट करते हैं।

'न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः'—आपने (गीता—चौथे अध्यायके पाँचवें श्लोकमें) कहा है कि मेरे और तेरे बहुत-से जन्म बीत चुके हैं, उन सबको मैं जानता हूँ, तू नहीं जानता। इसी प्रकार आपने (दसवें अध्यायके दूसरे श्लोकमें) कहा है कि मेरे प्रकट होनेको देवता और महर्षि भी नहीं जानते। अपने प्रकट होनेके विषयमें आपने जो कुछ कहा है, वह सब ठीक ही है। कारण कि मनुष्योंकी अपेक्षा देवताओंमें जो दिव्यता है, वह दिव्यता भगवत्त्वको जाननेमें कुछ भी काम नहीं आती। वह दिव्यता प्राकृत—उत्पन्न और नष्ट होनेवाली है। इसलिये वे आपके प्रकट होनेके तत्त्वको, हेतुको पूरा-पूरा नहीं जान सकते। जब देवता भी नहीं जान सकते, तो दानव जान ही कैसे सकते हैं? फिर भी यहाँ 'दानवाः' पद देनेका तात्पर्य यह है कि दानवोंके पास बहुत विलक्षण-विलक्षण माया है, जिससे वे विचित्र प्रभाव दिखा सकते हैं। परन्तु उस माया-शक्तिसे वे भगवान्को नहीं जान सकते। भगवान्के सामने दानवोंकी माया कुण्ठित हो जाती है।

७१४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १० ]

कारण कि प्रकृति और प्रकृतिकी जितनी शक्तियाँ हैं, उन सबसे भगवान् अतीत हैं। भगवान् अनन्त हैं, असीम हैं और दानवोंकी माया-शक्ति कितनी ही विलक्षण होनेपर भी प्राकृत, सीमित और उत्पत्ति-विनाशशील है। सीमित और नाशवान् वस्तुके द्वारा असीम और अविनाशी तत्त्वको कैसे जाना जा सकता है।

तात्पर्य यह हुआ कि मनुष्य, देवता, दानव आदि कोई भी अपनी शक्तिसे, सामर्थ्यसे, योग्यतासे, बुद्धिसे भगवान्को

परिशिष्ट भाव— भगवान्को अपनी शक्तिसे कोई जान नहीं सकता, प्रत्युत भगवान्की कृपासे ही जान सकता है—

सोइ जानइ जेहि देहु जनाई॥ जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥ तुम्हरिहि कृपां तुम्हहि रघुनंदन॥ जानहि भगत भगत उर चंदन॥

(मानस २।१२७।२)

भगवान्के यहाँ बुद्धिके चमत्कार, सिद्धियाँ नहीं चल सकतीं। बड़े-बड़े भौतिक आविष्कारोंसे कोई भगवान्को नहीं जान सकता।

स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम।

भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥ १५ ॥

भूतभावन= हे भूतभावन !पुरुषोत्तम= हे पुरुषोत्तम !आत्मना= अपने-आपसे
भूतेश= हे भूतेश !त्वम्= आपआत्मनाम्= अपने-
देवदेव= हे देवदेव !स्वयम्= स्वयंआपको
जगत्पते= हे जगत्पते !एव= हीवेत्थ= जानते हैं।

व्याख्या— ‘भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते पुरुषोत्तम’—सम्पूर्ण प्राणियोंको संकल्पमात्रसे उत्पन्न करनेवाले होनेसे आप ‘भूतभावन’ हैं; सम्पूर्ण प्राणियोंके और देवताओंके मालिक होनेसे आप ‘भूतेश’ और ‘देवदेव’ हैं; जड़-चेतन, स्थावर-जंगममात्र जगत्का पालन-पोषण करनेवाले होनेसे आप ‘जगत्पति’ हैं; और सम्पूर्ण पुरुषोंमें उत्तम होनेसे आप लोकमें और वेदमें ‘पुरुषोत्तम’ नामसे कहे गये हैं (गीता—पन्द्रहवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)।

इस श्लोकमें पाँच सम्बोधन आये हैं। इतने सम्बोधन गीताभरमें दूसरे किसी भी श्लोकमें नहीं आये। कारण है

१-काव्यमें भी भगवान्को ‘पुरुषोत्तम’ नामसे कहा गया है—

‘हरिर्यथैकः पुरुषोत्तमः स्मृतः’ (रघुवंश ३।४९)

२-यहाँ भूतभावन, भूतेश, देवदेव, जगत्पते और पुरुषोत्तम—इन पाँच सम्बोधनोंको क्रमशः सूर्य, शिव, गणेश, शक्ति और विष्णु—इन ईश्वरकोटिके पाँच देवताओंका वाचक मान सकते हैं। इन सम्बोधनोंका प्रयोग करके अर्जुन भगवान्से मानो यह कहते हैं कि ये पाँचों देवता मूलतः आप ही हैं।

नहीं जान सकते। कारण कि मनुष्य आदिमें जितनी जाननेकी योग्यता, सामर्थ्य, विशेषता है, वह सब प्राकृत है और भगवान् प्रकृतिसे अतीत हैं। त्याग, वैराग्य, तप, स्वाध्याय आदि अन्तःकरणको निर्मल करनेवाले हैं, पर इनके बलसे भी भगवान्को नहीं जान सकते। भगवान्को तो अनन्यभावसे उनके शरण होकर उनकी कृपासे ही जान सकते हैं (गीता—दसवें अध्यायका ग्यारहवाँ और ग्यारहवें अध्यायका चौवनवाँ श्लोक)।

‘स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वम्’—भगवान्

अपने-आपको अपने-आपसे ही जानते हैं। अपने-

आपको जाननेमें उन्हें किसी प्राकृत साधनकी

आवश्यकता नहीं होती। अपने-आपको जाननेमें उनकी

अपनी कोई वृत्ति पैदा नहीं होती, कोई जिज्ञासा भी नहीं

होती, किसी करण-(अन्तःकरण और बहिःकरण-)

की

श्लोक १६ ]

  • साधक-संजीवनी *

७१५

आवश्यकता भी नहीं होती। उनमें शरीर-शरीरीका भाव भी नहीं है। वे तो स्वतः-स्वाभाविक अपने-आपसे ही अपने-आपको जानते हैं। उनका यह ज्ञान करण-निरपेक्ष है, करण-सापेक्ष नहीं।

इस श्लोकका भाव यह है कि जैसे भगवान् अपने-आपको अपने-आपसे ही जानते हैं, ऐसे ही भगवान्‌के अंश

परिशिष्ट भाव —आप स्वयं ही अपने-आपसे अपने-आपको जानते हैं—इसका तात्पर्य है कि जाननेवाले भी आप ही हैं, जाननेमें आनेवाले भी आप ही हैं और जानना भी आप ही हैं अर्थात् सब कुछ आप ही हैं। जब आपके सिवाय और कोई है ही नहीं तो फिर कौन किसको जाने?

तत्त्वको जाननेकी चेष्टा करेंगे तो तत्त्वसे दूर हो जायेंगे; क्योंकि तत्त्वको ज्ञेय (जाननेका विषय) बनायेंगे, तभी तो उसको जानना चाहेंगे! तत्त्व तो सबका ज्ञाता है, ज्ञेय नहीं। सबके ज्ञाताका कोई और ज्ञाता नहीं हो सकता। जैसे, आँखसे सबको देखते हैं, पर आँखसे आँखको नहीं देख सकते; क्योंकि आँखकी देखनेकी शक्ति इन्द्रियका विषय नहीं है अर्थात् इन्द्रियाँ खुद अतीन्द्रिय हैं। अतः वह परमात्मतत्त्व स्वयं ही स्वयंका ज्ञाता है।

सम्बन्ध—विभूतियोंका ज्ञान भगवान्‌में दृढ़ भक्ति करानेवाला है (गीता १०।७)। अतः अब आगेके तीन श्लोकोंमें अर्जुन भगवान्‌से विभूतियोंको विस्तारसे कहनेके लिये प्रार्थना करते हैं।

वक्तुमहंस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः।

याभिर्विभूतिभिलोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ॥ १६ ॥

हि= इसलियेलोकोंकोविभूतियोंका
याभिः= जिनव्याप्य= व्याप्त करके
विभूतिभिः= विभूतियोंसेतिष्ठसि= स्थित हैं,
त्वम्= आप(उन सभी)
इमान्= इनदिव्याः,
लोकान्= सम्पूर्णआत्मविभूतयः= अपनी दिव्य
अशेषेण = सम्पूर्णतासे
वक्तुम् = वर्णन
करनेमें
अहंसि = (आप ही)
समर्थ हैं।

व्याख्या —‘याभिर्विभूतिभिलोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि’—भगवान्‌ने पहले (सातवें श्लोकमें) यह बात कही थी कि जो मनुष्य मेरी विभूतियोंको और योगको तत्त्वसे जानता है, उसका मेरेमें अटल भक्तियोग हो जाता है। उसे सुनेपर अर्जुनके मनमें आया कि भगवान्‌में दृढ़ भक्ति होनेका यह बहुत सुगम और श्रेष्ठ उपाय है; क्योंकि भगवान्‌की विभूतियोंको और योगको तत्त्वसे जाननेपर मनुष्यका मन भगवान्‌की तरफ स्वाभाविक ही खिंच जाता है और भगवान्‌में उसकी स्वाभाविक ही भक्ति जाग्रत्‌ हो जाती है। अर्जुन अपना कल्याण चाहते हैं और कल्याणके लिये उनको भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ उपाय दीखती है। इसलिये अर्जुन कहते हैं कि जिन विभूतियोंसे आप सम्पूर्ण लोकोंको व्याप्त करके स्थित हैं, उन अलौकिक, विलक्षण विभूतियोंका विस्तारपूर्वक सम्पूर्णतासे वर्णन कीजिये। कारण कि उनको

१-‘नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा’ (बृहदारण्यक० ३।७।२३)

‘इससे भिन्न कोई द्रष्टा नहीं है।’

‘विज्ञातारमे केन विजानीयात्’ (बृहदारण्यक० २।४।१४)

‘सबके विज्ञाताको किसके द्वारा जाना जाय?’

२-इन्द्रियोंको देखनेवाली इन्द्रियाँ नहीं हैं, मन है। मनको देखनेवाला मन नहीं है, बुद्धि है। बुद्धिको देखनेवाली बुद्धि नहीं है, अहम् है। अहम्‌को देखनेवाला अहम्‌ नहीं है, स्वयं है। स्वयंको देखनेवाला स्वयं ही है।

७१६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १० ]

कहनेमें आप ही समर्थ हैं; आपके सिवाय उन विभूतियोंको और कोई नहीं कह सकता।

‘वक्तुमहैत्यशेषेण’ —आपने पहले (सातवें, नवें और यहाँ दसवें अध्यायके आरम्भमें) अपनी विभूतियाँ बतायीं और उनको जाननेका फल दृढ़ भक्तियोग होना बताया।

अतः मैं भी आपकी सब विभूतियोंको जान जाऊँ और मेरा भी आपमें दृढ़ भक्तियोग हो जाय, इसलिये आप

परिशिष्ट भाव —अर्जुन भगवान्से कहते हैं कि अपनी सम्पूर्ण विभूतियोंका आप ही वर्णन कर सकते हैं; क्योंकि

आप स्वयं ही अपने-आपको जानते हैं (गीता—इसी अध्यायका पन्द्रहवाँ श्लोक)। दूसरा आपको जान ले—यह सम्भव

ही नहीं है (इसी अध्यायका दूसरा और चौदहवाँ श्लोक)। अतः आप स्वयं ही अपनी पूरी-की-पूरी विभूतियोंको

कह दें, जिससे मेरेको अविचल भक्तियोगकी प्राप्ति हो जाय।

अपनी विभूतियोंको पूरी-की-पूरी कह दें, बाकी कुछ न रखें।

‘दिव्या ह्यात्मविभूतयः’ —विभूतियोंको दिव्य कहनेका तात्पर्य है कि संसारमें जो कुछ विशेषता दीखती है वह मूलमें दिव्य परमात्माकी ही है, संसारकी नहीं। अतः

संसारकी विशेषता देखना भोग है और परमात्माकी विशेषता देखना विभूति है, योग है।

कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्।

केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥ १७ ॥

योगिन्= हे योगिन्!कथम्= कैसेमया= मेरे द्वारा
सदा= निरन्तरविद्याम्= जानूँ?चिन्त्यः, असि= चिन्तन किये
परिचिन्तयन्= सांगोपांग चिन्तन करता हुआ= औरजा सकते हैं अर्थात्
अहम्= मैंभगवन्= हे भगवन्!किन-किन भावोंमें
त्वाम्= आपकोकेषु, केषु= किन-किनमैं आपका चिन्तन
भावेषु= भावोंमें (आप)करूँ?

व्याख्या —‘कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्’—सातवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि जो मेरी विभूति और योगको तत्त्वसे जानता है, वह अविचल भक्तियोगसे युक्त हो जाता है। इसलिये अर्जुन भगवान्से पूछते हैं कि हरदम चिन्तन करता हुआ मैं आपको कैसे जानूँ?

‘केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया’ —आठवें अध्यायके चौदहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि जो अनन्यचित्त होकर नित्य-निरन्तर मेरा स्मरण करता है, उस योगीको मैं सुलभतासे प्राप्त हो जाता हूँ। फिर नवें अध्यायके बाईसवें श्लोकमें कहा कि जो अनन्य भक्त निरन्तर मेरा चिन्तन करते रहते हैं, उनका योगक्षेम मैं वहन करता हूँ। इस प्रकार चिन्तनकी महिमा सुनकर अर्जुन कहते हैं कि जिस चिन्तनसे मैं आपको तत्त्वसे जान जाऊँ, वह चिन्तन मैं कहाँ-कहाँ करूँ? किस वस्तु, व्यक्ति, देश,

काल, घटना, परिस्थिति आदिमें मैं आपका चिन्तन करूँ? [यहाँ चिन्तन करना साधन है और भगवान्को तत्त्वसे जानना साध्य है।]

यहाँ अर्जुने तो पूछा है कि मैं कहाँ-कहाँ, किस-किस वस्तु, व्यक्ति, स्थान आदिमें आपका चिन्तन करूँ, पर भगवान्ने आगे उत्तर यह दिया है कि जहाँ-जहाँ भी तू चिन्तन करता है, वहाँ-वहाँ ही तू मेरेको समझ। तात्पर्य यह है कि मैं तो सब वस्तु, व्यक्ति, देश, काल आदिमें परिपूर्ण हूँ। इसलिये किसी विशेषता, महत्ता, सुन्दरता आदिको लेकर जहाँ-जहाँ तेरा मन जाता है, वहाँ-वहाँ मेरा ही चिन्तन कर अर्थात् वहाँ उस विशेषता आदिको मेरी ही समझ। कारण कि संसारकी विशेषताको माननेसे संसारका चिन्तन होगा, पर मेरी विशेषताको माननेसे मेरा ही चिन्तन होगा। इस प्रकार संसारका चिन्तन मेरे चिन्तनमें परिणत होना चाहिये।

परिशिष्ट भाव —अर्जुनके प्रश्नका तात्पर्य है कि हे भगवन्! आप किन-किन रूपोंमें प्रकट हुए हैं, जिन रूपोंमें मैं आपका चिन्तन कर सकूँ? अर्जुने यह प्रश्न सुगमतापूर्वक भगवत्प्राप्तिके उद्देश्यसे किया है। अर्जुन साधकमात्रके प्रतिनिधि हैं; अतः उनका प्रश्न साधकोंके लिये है।

श्लोक १८ ]

  • साधक-संजीवनी *

७१७

अर्जुन भगवान् श्रीकृष्णको तो जानते थे, पर उनके समग्ररूपको नहीं जानते थे। उनमें भगवान्के समग्ररूपको जाननेकी जिज्ञासा थी। इसलिये वे पूछते हैं कि मैं आपके समग्ररूपको कैसे जानूँ? किन रूपोंमें मैं आपका चिन्तन करूँ? इससे सिद्ध होता है कि विभूतियाँ गौण नहीं हैं, प्रत्युत भगवत्प्राप्तिका माध्यम होनेसे मुख्य हैं। विभूतिरूपसे साक्षात् भगवान् ही हैं। जबतक मनुष्य भगवान्को नहीं जानता, तबतक उसमें गौण अथवा मुख्यकी भावना रहती है। भगवान्को जाननेपर गौण अथवा मुख्यकी भावना नहीं रहती; क्योंकि भगवान्के सिवाय कुछ है ही नहीं, फिर उसमें क्या गौण और क्या मुख्य? तात्पर्य है कि गौण अथवा मुख्य साधककी दृष्टिमें है, भगवान् और सिद्धकी दृष्टिमें नहीं।

विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन।

भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ॥ १८ ॥

जनार्दन= हे जनार्दन!विस्तरेण= विस्तारसेशृण्वतः= सुनते-सुनते
आत्मनः= (आप) अपनेभूयः= फिरमे= मेरी
योगम्= योग-(सामर्थ्य- )
कोकथय= कहिये;तृप्तिः= तृप्ति
= औरहि= क्योंकि= नहीं
विभूतिम्= विभूतियोंकोअमृतम्= (आपके) अमृतमय
वचनअस्ति= हो
रही है।

व्याख्या—‘विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन’— भगवान्ने सातवें और नवें अध्यायमें ज्ञान-विज्ञानका विषय खूब कह दिया। इतना कहनेपर भी उनकी तृप्ति नहीं हुई, इसलिये दसवाँ अध्याय अपनी ओरसे ही कहना शुरू कर दिया। भगवान्ने दसवाँ अध्याय आरम्भ करते हुए कहा कि ‘तू फिर मेरे परम वचनको सुन।’ ऐसा सुनकर भगवान्की कृपा और महत्त्वकी तरफ अर्जुनकी दृष्टि विशेषतासे जाती है और वे भगवान्से फिर सुनानेके लिये प्रार्थना करते हैं। अर्जुन कहते हैं कि ‘आप अपने योग और विभूतियोंको विस्तारपूर्वक फिरसे कहिये; क्योंकि आपके अमृतमय वचन सुनते हुए तृप्ति नहीं हो रही है। मन करता है कि सुनता ही चला जाऊँ।’

भगवान्की विभूतियोंको सुननेसे भगवान्में प्रत्यक्ष आकर्षण बढ़ता देखकर अर्जुनको लगा कि इन विभूतियोंका ज्ञान होनेसे भगवान्के प्रति मेरा विशेष आकर्षण हो जायगा और भगवान्में सहज ही मेरी दृढ़ भक्ति हो जायगी। इसलिये अर्जुन विस्तारपूर्वक फिरसे कहनेके लिये प्रार्थना करते हैं।

‘भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्’— अर्जुन श्रेयका साधन चाहते हैं (गीता—दूसरे अध्यायका सातवाँ, तीसरे अध्यायका दूसरा और पाँचवें अध्यायका पहला श्लोक), और भगवान्ने विभूति एवं योगको तत्त्वसे जाननेका फल अपनेमें दृढ़ भक्ति होना बताया (गीता—

दसवें अध्यायका सातवाँ श्लोक)। इसलिये अर्जुनको विभूतियोंको जाननेवाली बात बहुत सरल लगी कि मेरेको कोई नया काम नहीं करना है, नया चिन्तन नहीं करना है, प्रत्युत जहाँ-कहीं विशेषता आदिको लेकर मनका स्वाभाविक खिंचाव होता है, वहाँ उस विशेषताको भगवान्की मानना है। इससे मनकी वृत्तियोंका प्रवाह संसारमें न होकर भगवान्में हो जायगा, जिससे मेरी भगवान्में दृढ़ भक्ति हो जायगी और मेरा सुगमतासे कल्याण हो जायगा। कितनी सीधी, सरल और सुगम बात है! इसलिये अर्जुन विभूतियोंको फिर कहनेके लिये प्रार्थना करते हैं।

जैसे, कोई भोजन करने बैठे और भोजनमें कोई वस्तु प्रिय (बढ़िया) मालूम दे, तो उसमें उसकी रुचि बढ़ती है और वह बार-बार उस प्रिय वस्तुको माँगता है। पर उस रुचिमें दो बाधाएँ लगती हैं—एक तो वह वस्तु अगर कम मात्रामें होती है तो पूरी तृप्तिपूर्वक नहीं मिलती; और दूसरी, वह वस्तु अधिक मात्रामें होनेपर भी पेट भर जानेसे अधिक नहीं खायी जा सकती! परन्तु भगवान्की विभूतियोंका और अर्जुनकी विभूतियाँ सुननेकी रुचिका अन्त ही नहीं आता। कानोंके द्वारा अमृतमय वचनोंको सुनते हुए न तो उन वचनोंका अन्त आता है, और न उनको सुनते हुए तृप्ति ही होती है। अतः अर्जुन भगवान्से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि आप ऐसे अमृतमय वचन सुनाते ही जाइये।

७१८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १० ]

परिशिष्ट भाव —जैसे भूखेको अन्न और प्यासेको जल अच्छा लगता है, ऐसे ही जिज्ञासु अर्जुनको भगवान्के वचन बहुत विलक्षण लगते हैं। उनको भगवान्के वचन ज्यों-ज्यों विलक्षण दीखते हैं, त्यों-ही-त्यों उनका भगवान्के प्रति विशेष भाव प्रकट होता जाता है।

सम्बन्ध —अर्जुनकी प्रार्थना स्वीकार करके भगवान् अब आगेके श्लोकसे अपनी विभूतियों और योगको कहना आरम्भ करते हैं।

श्रीभगवानुवाच

हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।

प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥ १९ ॥

श्रीभगवान् बोले—

हन्त= हॉ, ठीक है।प्राधान्यतः= प्रधानतासेमे= मेरी विभूतियोंके
दिव्याः,(संक्षेपसे)विस्तरस्य= विस्तारका
आत्मविभूतयः= मैं अपनी दिव्यकथयिष्यामि= कहूँगा;अन्तः= अन्त
विभूतियोंकोहि= क्योंकि= नहीं
ते= तेरे लियेकुरुश्रेष्ठ= हे कुरुश्रेष्ठ !अस्ति= है।

व्याख्या —‘हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्म-विभूतयः’—योग और विभूति कहनेके लिये अर्जुनकी जो प्रार्थना है, उसको ‘हन्त’ अव्ययसे स्वीकार करते हुए भगवान् कहते हैं कि मैं अपनी दिव्य, अलौकिक, विलक्षण विभूतियोंको तेरे लिये कहूँगा (योगकी बात भगवान्ने आगे इकतालिसवें श्लोकमें कही है)।

‘दिव्याः’ कहनेका तात्पर्य है कि जिस किसी वस्तु, व्यक्ति, घटना आदिमें जो कुछ भी विशेषता दीखती है, वह वस्तुतः भगवान्की ही है। इसलिये उसको भगवान्की ही देखना दिव्यता है और वस्तु, व्यक्ति आदिकी देखना अदिव्यता अर्थात् लौकिकता है।

‘प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे’—जब अर्जुनने कहा कि भगवन्! आप अपनी विभूतियोंको विस्तारसे, पूरी-की-पूरी कह दें, तब भगवान् कहते हैं कि मैं अपनी विभूतियोंको संक्षेपसे कहूँगा; क्योंकि मेरी

विभूतियोंका अन्त नहीं है। पर आगे ग्यारहवें अध्यायमें जब अर्जुन बड़े संकोचसे कहते हैं कि मैं आपका विश्वरूप देखना चाहता हूँ; अगर मेरे द्वारा वह रूप देखा जाना शक्य है तो दिखा दीजिये, तब भगवान् कहते हैं—‘पश्य मे पार्थ रूपाणि’ (११।५) अर्थात् तू मेरे रूपोंको देख ले। रूपोंमें कितने रूप? क्या दो-चार? नहीं-नहीं, सैकड़ों-हजारों रूपोंको देख! इस प्रकार यहाँ अर्जुनकी विस्तारसे विभूतियाँ कहनेकी प्रार्थना सुनकर भगवान् संक्षेपसे विभूतियाँ सुननेके लिये कहते हैं और वहाँ अर्जुनकी एक रूप दिखानेकी प्रार्थना सुनकर भगवान् सैकड़ों-हजारों रूप देखनेके लिये कहते हैं!

यह एक बड़े आश्चर्यकी बात है कि सुननेमें तो आदमी बहुत सुन सकता है, पर उतना नेत्रोंसे देख नहीं सकता; क्योंकि देखनेकी शक्ति कानोंकी अपेक्षा सीमित होती है। फिर भी जब अर्जुनने सम्पूर्ण विभूतियोंको सुननेमें अपनी

१-द्रष्टव्य—‘गीता-दर्पण’ पुस्तकका बारहवाँ लेख—‘गीतामें भगवान्का विविध रूपोंमें प्रकट होना’।

२-कानका विषय है शब्द और शब्द दो तरहका होता है—वर्णाम्बक और ध्वन्यात्मक। कानके द्वारा शब्दोंको सुनकर हमें प्रत्यक्षका भी ज्ञान होता है और अप्रत्यक्ष-(स्वर्ग, नरक आदि-) का भी ज्ञान होता है। इसीलिये वेदान्त-प्रक्रिया-(श्रवण, मनन, निदिध्यासन आदिमें) ‘श्रवण’ सबसे पहले आया है। ऐसे ही भक्तिमें भी (श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन आदिमें) ‘श्रवण’ पहले आया है। शास्त्रोंमें जिस परमात्मतत्त्वका वर्णन किया गया है, उसका ज्ञान (परोक्ष ज्ञान) हमें कानोंसे ही होता है अर्थात् कानोंसे सुनकर ही उसके अनुसार करने, मानने या जाननेसे हम उस परमात्मतत्त्वका साक्षात्कार करते हैं।

शब्दमें अचिन्त्य शक्ति है—

शब्दशकेरचित्यत्वाच्छब्दादेवापरोक्षधीः । प्रसुप्तः पुरुषो यद्वच्छब्देनावबुध्यते ॥ (सदाचारानुसन्धानम् १९)

श्लोक २० ]

  • साधक-संजीवनी *

७१९

सामर्थ्य बतायी तो भगवान्ने संक्षेपसे सुननेके लिये कहा; और जब अर्जुनने एक रूपको देखनेमें नम्रतापूर्वक अपनी असमर्थता प्रकट की तो भगवान्ने अनेक रूप देखनेके लिये कहा! इसका कारण यह है कि गीतामें अर्जुनका भगवद्विषयक ज्ञान उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है। इस दसवें अध्यायमें जब भगवान्ने यह कहा कि मेरी विभूतियोंका अन्त नहीं है, तब अर्जुनकी दृष्टि भगवान्की अनन्तताकी तरफ चली गयी। उन्होंने समझा कि भगवान्के विषयमें तो मैं कुछ भी नहीं जानता; क्योंकि भगवान् अनन्त हैं, असीम हैं, अपार हैं। परन्तु अर्जुनने भूलसे कह दिया कि आप अपनी सब-की-सब विभूतियाँ कह दीजिये। इसलिये अर्जुन आगे चलकर सावधान हो जाते हैं और नम्रतापूर्वक एक रूपको दिखानेके लिये ही भगवान्से प्रार्थना करते हैं। नेत्रोंकी शक्ति सीमित होते हुए भी भगवान् दिव्य चक्षु प्रदान करके अर्थात् चर्मचक्षुओंमें विशेष शक्ति प्रदान करके

अपने अनेक रूपोंको देखनेकी आज्ञा देते हैं।

दूसरी बात, वक्ताकी व्यक्तिगत बात पूछी जाय और अपनी अज्ञता तथा अयोग्यतापूर्वक अपने जाननेके लिये प्रार्थना की जाय—इन दोनोंमें फरक होता है। यहाँ अर्जुनने विस्तारपूर्वक विभूतियाँ कहनेके लिये कहकर भगवान्की थाह लेनी चाही, तो भगवान्ने कह दिया कि मैं तो संक्षेपसे कहूँगा; क्योंकि मेरी विभूतियोंकी थाह नहीं है। ग्यारहवें अध्यायमें अर्जुनने अपनी अज्ञता और अयोग्यता प्रकट करते हुए भगवान्से अपना अव्यय रूप दिखानेकी प्रार्थना की, तो भगवान्ने अपने अनन्तरूप देखनेके लिये आज्ञा दी और उनको देखनेकी सामर्थ्य (दिव्य दृष्टि) भी दी! इसलिये साधकको किंचिन्मात्र भी अपना आग्रह, अहंकार न रखकर और अपनी सामर्थ्य, बुद्धि न लगाकर केवल भगवान्पर ही सर्वथा निर्भर हो जाना चाहिये; क्योंकि भगवान्की निर्भरतासे जो चीज मिलती है, वह अपार मिलती है।

परिशिष्ट भाव —भगवान् अनन्त हैं; अतः उनकी विभूतियाँ भी अनन्त हैं। इस कारण भगवान्की विभूतियोंके विस्तारको न तो कोई कह सकता है और न कोई सुन ही सकता है। अगर कोई कह-सुन ले तो फिर वे अनन्त कैसे रहेंगी? इसलिये भगवान् कहते हैं कि मैं अपनी विभूतियोंको संक्षेपसे कहूँगा।

अर्जुनको ‘कुरुश्रेष्ठ’ कहनेमें भगवान्का तात्पर्य है कि तेरे मनमें मेरेको जाननेकी इच्छा हो गयी, इसलिये तू श्रेष्ठ है!

सम्बन्ध—विभूतियाँ और योग—इन दोनोंमेंसे पहले भगवान् बीसवें श्लोकसे उन्तालीसवें श्लोकतक अपनी बयासी विभूतियोंका वर्णन करते हैं।

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः।

अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च॥ २०॥

मनुष्य सोता है तो नींदमें इन्द्रियाँ संकुचित होकर मनमें, मन संकुचित होकर बुद्धिमें और बुद्धि संकुचित होकर अज्ञान- (अविद्या- ) में लीन हो जाती है। इस तरह यद्यपि नींदमें इन्द्रियाँ बहुत छिपी रहती हैं, तथापि सोये हुए आदमीका नाम लेकर पुकारा जाय तो वह जग जाता है। शब्दमें इतनी शक्ति है कि वह अविद्यामें लीन हुएको भी जगा देता है। अतः शब्दमें अनन्त शक्ति है। दृष्टि तो पदार्थतक जाकर रुक जाती है। पर शब्द केवल कानतक ही नहीं जाता, प्रत्युत स्वयंतक चला जाता है।

नेत्रोंमें रूप पकड़ जाता है। जैसे दर्पणमें मुख देखते समय काँचके भीतर रूप चला जाता है तो उसमें मुख दिखायी देने लगता है, ऐसे ही आँखमें भी एक काँच है, जिसके भीतर पदार्थका रूप चला जाता है तो वह पदार्थ दिखायी देने लगता है। नेत्रोंमें एक विशेष शक्ति यह है कि वे पहले रूपको पकड़ें हुए ही दूसरे रूपको देख लेते हैं, इसी कारण जब बिजलीसे पंखा चलता है, तब उसके तीनों पर अलग-अलग घूमनेपर भी नेत्रोंको (अलग-अलग पर घूमते दिखायी न देकर) एक चक्र-सा दिखायी देता है। ऐसे होते हुए भी कानोंमें जितनी शक्ति है, उतनी नेत्रोंमें नहीं है।

इन्द्रियाँ केवल अपने-अपने विषयोंको ही पकड़ सकती हैं, परमात्मतत्त्वको नहीं पकड़ सकती; क्योंकि परमात्मतत्त्व इन्द्रियोंका विषय नहीं है। परमात्मतत्त्व स्वयंका विषय है अर्थात् उसका ज्ञान स्वयंसे ही होता है। इसलिये अर्जुनने इस अध्यायमें कहा है कि आप स्वयंको स्वयंसे ही जानते हैं—‘स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वम्’ (गीता १०।१५)। दूसरे अध्यायमें भगवान्ने बताया है कि मनमें आयी हुई सम्पूर्ण कामनाओंको छोड़नेपर मनुष्य अपनेसे ही अपने-आपमें सन्तुष्ट होता है—‘प्रजहाति यदा कामात्मर्त्यार्थ मनोगतान्। आत्मन्येवात्मना तुष्टः’ (२।५५)। तात्पर्य यह हुआ कि परमात्मतत्त्वका ज्ञान करण-निर्पेक्ष है। उस ज्ञानको आँखें नहीं पकड़ सकती, पर कान शब्दोंके द्वारा पकड़ करके स्वयंतक पहुँचा देता है।

७२०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १० ]

गुडाकेश= हे नींदको जीतनेवाले= तथासर्वभूताशय-
अर्जुन!अन्तः= अन्तमेंस्थितः
भूतानाम्= सम्पूर्ण प्राणियोंकेअहम्= मैंकरण- (हृदय- )में स्थित
आदिः= आदि,एव= ही हूँआत्मा
मध्यम्= मध्य= औरअहम्
= मैं ही हूँ।

व्याख्या —[ भगवान्का चिन्तन दो तरहसे होता है— (१) साधक अपना जो इष्ट मानता है, उसके सिवाय दूसरा कोई भी चिन्तन न हो। कभी हो भी जाय तो मनको वहाँसे हटाकर अपने इष्टदेवके चिन्तनमें ही लगा दे; और (२) मनमें सांसारिक विशेषताको लेकर चिन्तन हो, तो उस विशेषताको भगवान्की ही विशेषता समझे। इस दूसरे चिन्तनके लिये ही यहाँ विभूतियोंका वर्णन है। तात्पर्य है कि किसी विशेषताको लेकर जहाँ-कहीं वृत्ति जाय, वहाँ भगवान्का ही चिन्तन होना चाहिये, उस वस्तु-व्यक्तिका नहीं। इसीके लिये भगवान् विभूतियोंका वर्णन कर रहे हैं। ]

‘अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च’* —यहाँ भगवान्ने अपनी सम्पूर्ण विभूतियोंका सार कहा है कि सम्पूर्ण प्राणियोंके आदि, मध्य तथा अन्तमें मैं ही हूँ। यह नियम है कि जो वस्तु उत्पत्ति-विनाशशील होती है, उसके आरम्भ और अन्तमें जो तत्त्व रहता है, वही तत्त्व उसके मध्यमें भी रहता है (चाहे दीखे या न दीखे) अर्थात् जो वस्तु जिस तत्त्वसे उत्पन्न होती है और जिसमें लीन होती है, उस वस्तुके आदि, मध्य और अन्तमें (सब समयमें) वही तत्त्व रहता है। जैसे, सोनेसे बने गहने पहले सोनारूप होते हैं और अन्तमें (गहनोंके सोनेमें लीन होनेपर) सोनारूप ही रहते हैं तथा बीचमें भी सोनारूप ही रहते हैं। केवल नाम, आकृति, उपयोग, माप, तौल आदि अलग-अलग होते हैं; और इनके अलग-अलग होते हुए भी गहने सोना ही रहते हैं। ऐसे ही सम्पूर्ण प्राणी आदिमें भी परमात्मस्वरूप थे और अन्तमें लीन होनेपर भी परमात्मस्वरूप रहेंगे तथा मध्यमें नाम, रूप, आकृति, क्रिया, स्वभाव आदि अलग-अलग होनेपर भी तत्त्वतः

परमात्मस्वरूप ही हैं—यह बतानेके लिये ही यहाँ भगवान्ने अपनेको सम्पूर्ण प्राणियोंके आदि, मध्य और अन्तमें कहा है।

भगवान्ने विभूतियोंके इस प्रकारणमें आदि, मध्य और अन्तमें—तीन जगह साररूपसे अपनी विभूतियोंका वर्णन किया है। पहले इस बीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि ‘सम्पूर्ण प्राणियोंके आदि, मध्य और अन्तमें मैं ही हूँ,’ बीचके बत्तीसवें श्लोकमें कहा कि ‘सम्पूर्ण सर्गोंके आदि, मध्य और अन्तमें मैं ही हूँ,’ और अन्तके उन्तालीसवें श्लोकमें कहा कि ‘सम्पूर्ण प्राणियोंका जो बीज है, वह मैं ही हूँ; क्योंकि मेरे बिना कोई भी चर-अचर प्राणी नहीं है।’ चिन्तन करनेके लिये यही विभूतियोंका सार है। तात्पर्य यह है कि किसी विशेषता आदिको लेकर जो विभूतियाँ कही गयी हैं, उन विभूतियोंके अतिरिक्त भी जो कुछ दिखायी दे, वह भी भगवान्की ही विभूति है—यह बतानेके लिये भगवान्ने अपनेको सम्पूर्ण चराचर प्राणियोंके आदि, मध्य तथा अन्तमें विद्यमान कहा है। तत्त्वसे सब कुछ परमात्मा ही है—‘वासुदेवः सर्वम्’—इस लक्ष्यको बतानेके लिये ही विभूतियाँ कही गयी हैं।

इस बीसवें श्लोकमें भगवान्ने प्राणियोंमें जो आत्मा है, जीवोंका जो स्वरूप है, उसको अपनी विभूति बताया है। फिर बत्तीसवें श्लोकमें भगवान्ने सृष्टिरूपसे अपनी विभूति बताया कि जो जड़-चेतन, स्थावर-जंगम सृष्टि है, उसके आदिमें ‘मैं एक ही बहुत रूपोंमें हो जाऊँ’ (‘बहु स्यां प्रजायेयेति’ छान्दोग्य० ६।२।३)—ऐसा संकल्प करता हूँ और अन्तमें मैं ही शेष रहता हूँ—‘शिष्यते शेषसंज्ञः’ (श्रीमद्भ० १०।३।२५)। अतः बीचमें भी सब कुछ मैं ही हूँ—‘वासुदेवः सर्वम्’ (गीता ७।१९) ‘सदसच्चाहमर्जुन’

  • यहाँ ‘आदिः’ और ‘अन्तः’ शब्दका प्रयोग पुँल्लिंगमें और ‘मध्यम्’ शब्दका प्रयोग नपुंसकलिंगमें किया गया है। इसका तात्पर्य है कि आदिमें अकेले परमपुरुष भगवान् रहते हैं—‘अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः’ (गीता १०।२), और अन्तमें भी अकेले परमपुरुष भगवान् रहते हैं—‘शिष्यते शेषसंज्ञः’ (श्रीमद्भ० १०।३।२५)। इसलिये भगवान्ने ‘आदि’ और ‘अन्त’ शब्दका प्रयोग पुँल्लिंगमें किया है। परन्तु मध्यमें अर्थात् सृष्टिके समय पुँल्लिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसकलिंग तीनों लिंगोंवाले व्यक्ति, वस्तु, पदार्थ, क्रिया, भाव आदि रहते हैं। अतः इन तीनों लिंगोंमें नपुंसकलिंग ही शेष रहता है अर्थात् नपुंसकलिंगके अन्तर्गत ही तीनों लिंग आ जाते हैं। इसलिये भगवान्ने यहाँ और आगे बत्तीसवें श्लोकमें भी ‘मध्य’ शब्दका प्रयोग नपुंसकलिंगमें किया है।

श्लोक २१ ]

  • साधक-संजीवनी *

७२९

(गीता ९।१९); क्योंकि जो तत्त्व आदि और अन्तमें होता है, वही तत्त्व बीचमें होता है। अन्तमें उनालीसवें श्लोकमें भगवान्ने बीज-(कारण-) रूपसे अपनी विभूति बतायी कि मैं ही सबका बीज हूँ, मेरे बिना कोई भी प्राणी नहीं है। इस प्रकार इन तीन जगह—तीन श्लोकोंमें मुख्य विभूतियाँ बतायी गयी हैं और अन्य श्लोकोंमें जो समुदायमें मुख्य हैं, जिनका समुदायपर आधिपत्य है, जिनमें कोई विशेषता है, उनको लेकर विभूतियाँ बतायी गयी हैं। परन्तु साधकको चाहिये कि वह इन विभूतियोंकी महत्ता, विशेषता, सुन्दरता, आधिपत्य आदिकी तरफ खयाल न करे, प्रत्युत ये सब विभूतियाँ भगवान्से ही प्रकट होती हैं, इनमें जो महत्ता आदि है, वह केवल भगवान्की है; ये विभूतियाँ भगवत्स्वरूप ही हैं—इस तरफ खयाल रखे। कारण कि अर्जुनका प्रश्न भगवान्के चिन्तनके विषयमें है

(सत्रहवाँ श्लोक), किसी वस्तु, व्यक्तिके चिन्तनके विषयमें नहीं।

‘अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः’—साधक इन विभूतियोंका उपयोग कैसे करे? इसे बताते हैं कि जब साधककी दृष्टि प्राणियोंकी तरफ चली जाय, तब वह ‘सम्पूर्ण प्राणियोंमें आत्मारूपसे भगवान् ही हैं’—इस तरह भगवान्का चिन्तन करे। जब किसी विचारक साधककी दृष्टि सृष्टिकी तरफ चली जाय, तब वह ‘उत्पत्ति-विनाशशील और हरदम परिवर्तनशील सृष्टिके आदि, मध्य तथा अन्तमें एक भगवान् ही हैं’ इस तरह भगवान्का चिन्तन करे। कभी प्राणियोंके मूलकी तरफ उसकी दृष्टि चली जाय, तब वह ‘बीजरूपसे भगवान् ही हैं, भगवान्के बिना कोई भी चर-अचर प्राणी नहीं है और हो सकता भी नहीं’—इस तरह भगवान्का चिन्तन करे।

परिशिष्ट भाव —सम्पूर्ण प्राणियोंके आदि, मध्य तथा अन्तमें भगवान् ही हैं—इसका तात्पर्य यह है कि एक भगवान्के सिवाय और कुछ है ही नहीं अर्थात् सब कुछ भगवान् ही हैं।

भगवान् श्रीकृष्ण समग्र हैं और आत्मा उनकी विभूति है। आत्मा भगवान्की ‘परा प्रकृति’ है और अन्तःकरण ‘अपरा प्रकृति’ है (गीता—सातवें अध्यायका चौथा, पाँचवाँ श्लोक)। परा और अपरा—दोनों ही भगवान्से अभिन्न हैं।

आदित्यानामहं विष्णुज्योतिषां रविरंशुमान्।

मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ॥ २१ ॥

अहम्= मैंअंशुमान्= किरणोंवाला(और)
आदित्यानाम्= अदितिके पुत्रोंमेंरविः= सूर्य हूँ।नक्षत्राणाम्
विष्णुः= विष्णु (वामन)अहम्= मैं
ज्योतिषाम्= (और) प्रकाशमानमरुताम्= मरुतोंकाशशी
वस्तुओंमेंमरीचिः= तेजअस्मि

व्याख्या —[इन विभूतियोंमें षष्ठीका प्रयोग किया गया है। षष्ठीका प्रयोग निर्धारण अर्थात् मुख्यताके अर्थमें भी होता है और सम्बन्धके अर्थमें भी। जहाँ निर्धारणमें षष्ठी होती है, वहाँ हिन्दीकी ‘मै’ विभक्तिका प्रयोग होता है, और जहाँ सम्बन्धमें षष्ठी होती है, वहाँ हिन्दीकी ‘का’, ‘की’ विभक्तियोंका प्रयोग होता है। उदाहरणार्थ, इस श्लोकके पूर्वार्धमें निर्धारणके अर्थमें और उत्तरार्धमें सम्बन्धके अर्थमें षष्ठीका प्रयोग हुआ है।]

‘आदित्यानामहं विष्णुः’—अदितिके भाता, मित्र आदि जितने पुत्र हैं, उनमें ‘विष्णु’ अर्थात् वामन मुख्य हैं। भगवान्ने ही वामनरूपसे अवतार लेकर दैत्योंकी सम्पत्तिको

दानरूपसे लिया और उसे अदितिके पुत्रों-(देवताओं-)को दे दिया*।

‘ज्योतिषां रविरंशुमान्’—चन्द्रमा, नक्षत्र, तारा, अग्नि आदि जितनी भी प्रकाशमान चीजें हैं, उनमें किरणोंवाला सूर्य मेरी विभूति है; क्योंकि प्रकाश करनेमें सूर्यकी मुख्यता है। सूर्यके प्रकाशसे ही सभी प्रकाशमान होते हैं।

‘मरीचिर्मरुतामस्मि’—सत्त्वज्योति, आदित्य, हरित आदि नामोंवाले जो उनचास मरुत हैं, उनका मुख्य तेज मैं हूँ। उस तेजके प्रभावसे ही इन्द्रके द्वारा दितिके गर्भके सात टुकड़े करनेपर और उन सातोंके फिर सात-सात टुकड़े करनेपर भी वे मेरे नहीं प्रत्युत एकसे उनचास हो गये।

  • बारह महिनोंमें जो बारह आदित्य होते हैं, उनमें कार्तिक मासके सूर्यका नाम भी ‘विष्णु’ है।

७२२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १० ]

‘नक्षत्राणामहं शशी’—अश्विनी, भरणी, कृत्तिका आदि जो सत्ताईस नक्षत्र हैं, उन सबका अधिपति चन्द्रमा मैं हूँ।

इन विभूतियोंमें जो विशेषता—महत्ता है, वह वास्तवमें भगवान्की है।

[ इस प्रकरणमें जिन विभूतियोंका वर्णन आया है,

उनको भगवान्ने विभूतिरूपसे ही कहा है, अवताररूपसे नहीं; जैसे—अदितिके पुत्रोंमें वामन मैं हूँ (इक्कीसवाँ श्लोक), शस्त्रधारियोंमें राम मैं हूँ (इकतीसवाँ श्लोक), वृष्णिर्वशियोंमें वासुदेव (कृष्ण) और पाण्डवोंमें धनंजय (अर्जुन) मैं हूँ (सैंतीसवाँ श्लोक) इत्यादि। कारण कि यहाँ प्रसंग विभूतियोंका है। ]

वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः ।

इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ॥ २२ ॥

वेदानाम्= (मैं)वासवः= इन्द्र= और
वेदोंमेंअस्मि= हूँ,भूतानाम्= प्राणियोंकी
सामवेदः= सामवेदइन्द्रियाणाम्= इन्द्रियोंमेंचेतना= चेतना
अस्मि= हूँ,मनः= मनअस्मि= हूँ।
देवानाम्= देवताओंमेंअस्मि= हूँ

व्याख्या— ‘वेदानां सामवेदोऽस्मि’—वेदोंकी जो ऋचाएँ स्वरसहित गायी जाती हैं, उनका नाम सामवेद है। सामवेदमें इन्द्ररूपसे भगवान्की स्तुतिका वर्णन है। इसलिये सामवेद भगवान्की विभूति है।

‘देवानामस्मि वासवः’ —सूर्य, चन्द्रमा आदि जितने भी देवता हैं, उन सबमें इन्द्र मुख्य है और सबका अधिपति है। इसलिये भगवान्ने उसको अपनी विभूति बताया है।

‘इन्द्रियाणां मनश्चास्मि’ —नेत्र, कान आदि सब इन्द्रियोंमें मन मुख्य है। सब इन्द्रियाँ मनके साथ रहनेसे (मनको साथमें लेकर) ही काम करती हैं। मन साथमें न

रहनेसे इन्द्रियाँ अपना काम नहीं करतीं। यदि मनका साथ न हो तो इन्द्रियोंके सामने विषय आनेपर भी विषयोंका ज्ञान नहीं होता। मनमें यह विशेषता भगवान्से ही आयी है। इसलिये भगवान्ने मनको अपनी विभूति बताया है।

‘भूतानामस्मि चेतना’ —सम्पूर्ण प्राणियोंकी जो चेतना-शक्ति, प्राणशक्ति है, जिससे मेरे हुए आदमीकी अपेक्षा सोये हुए आदमीमें विलक्षणता दीखती है, उसे भगवान्ने अपनी विभूति बताया है।

इन विभूतियोंमें जो विशेषता है, वह भगवान्से ही आयी है। इनकी स्वतन्त्र विशेषता नहीं है।

रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वितेशो यक्षरक्षसाम् ।

वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम् ॥ २३ ॥

रुद्राणाम्= रुद्रोंमेंअस्मि= मैं हूँ।शिखरिणाम्= शिखरवाले
शङ्करः= शंकरवसूनाम्= वसुओंमेंपर्वतोंमें
= औरपावकः= पवित्र करनेवालीमेरुः= सुमेरु
यक्षरक्षसाम्= यक्ष-राक्षसोंमेंअग्निअहम्= मैं
वितेशः= कुबेर= औरअस्मि= हूँ।

व्याख्या— ‘रुद्राणां शङ्करश्चास्मि’—हर, बहुरूप, त्र्यम्बक आदि ग्यारह रुद्रोंमें शम्भु अर्थात् शंकर सबके अधिपति हैं। ये कल्याण प्रदान करनेवाले और कल्याणस्वरूप हैं। इसलिये भगवान्ने इनको अपनी विभूति बताया है।

‘वितेशो यक्षरक्षसाम्’ —कुबेर यक्ष तथा राक्षसोंके अधिपति हैं और इनको धनाध्यक्षके पदपर नियुक्त किया गया है। सब यक्ष-राक्षसोंमें मुख्य होनेसे ये भगवान्की विभूति हैं।

‘वसूनां पावकश्चास्मि’ —धर, ध्रुव, सोम आदि आठ

श्लोक २४-२५ ]

  • साधक-संजीवनी *

७२३

वसुओंमें अनल अर्थात् पावक (अग्नि) सबके अधिपति हैं। ये सब देवताओंको यज्ञकी हवि पहुँचानेवाले तथा भगवान्के मुख हैं। इसलिये इनको भगवान्ने अपनी विभूति बताया है।

‘मेरुः शिखरिणामहम्’—सोने, चाँदी, ताँबे आदिके शिखरोंवाले जितने पर्वत हैं, उनमें सुमेरु पर्वत मुख्य है।

यह सोने तथा रत्नोंका भण्डार है। इसलिये भगवान्ने इसको अपनी विभूति बताया है।

इस श्लोकमें जो चार विभूतियाँ कही हैं, उनमें जो कुछ विशेषता—महत्ता दीखती है, वह विभूतियोंके मूलरूप परमात्मासे ही आयी है। अतः इन विभूतियोंमें परमात्माका ही चिन्तन होना चाहिये।

पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम्।

सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः ॥ २४ ॥

पार्थ= हे पार्थ!विद्धि= समझो।सरसाम्= जलाशयोंमें
पुरोधसाम्= पुरोहितोंमेंसेनानीनाम्= सेनापतियोंमेंसागरः= समुद्र
मुख्यम्= मुख्यस्कन्दः= कार्तिकेयअहम्= मैं
बृहस्पतिम्= बृहस्पतिको= औरअस्मि= हूँ।
माम्= मेरा स्वरूप

व्याख्या—‘पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम्’—संसारके सम्पूर्ण पुरोहितोंमें और विद्या-बुद्धिमें बृहस्पति श्रेष्ठ हैं। ये इन्द्रके गुरु तथा देवताओंके कुलपुरोहित हैं। इसलिये भगवान्ने अर्जुनसे बृहस्पतिको अपनी विभूति जानने-(मानने-)के लिये कहा है।

‘सेनानीनामहं स्कन्दः’—स्कन्द (कार्तिकेय) शंकरजीके पुत्र हैं। इनके छः मुख और बारह हाथ हैं। ये देवताओंके सेनापति हैं और संसारके सम्पूर्ण सेनापतियोंमें श्रेष्ठ हैं। इसलिये भगवान्ने इनको अपनी विभूति बताया है।

‘सरसामस्मि सागरः’—इस पृथ्वीपर जितने जलाशय हैं, उनमें समुद्र सबसे बड़ा है। समुद्र सम्पूर्ण जलाशयोंका अधिपति है और अपनी मर्यादामें रहनेवाला तथा गम्भीर है। इसलिये भगवान्ने इसको अपनी विभूति बताया है।

यहाँ इन विभूतियोंकी जो अलौकिकता दीखती है, यह उनकी खुदकी नहीं है, प्रत्युत भगवान्की है और भगवान्से ही आयी है। अतः इनको देखनेपर भगवान्की ही स्मृति होनी चाहिये।

महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्येकमक्षरम्।

यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥ २५ ॥

महर्षीणाम्= महर्षियोंमेंअक्षरम्= अक्षर अर्थात्जपयज्ञः= जपयज्ञ (और)
भृगुः= भृगु (और)प्रणवस्थावराणाम्= स्थिर
गिराम्= वाणियों-(शब्दों-)अहम्= मैंरहनेवालोंमें
मेंमेंअस्मि= हूँ।हिमालयः= हिमालय
एकम्= एकयज्ञानाम्= सम्पूर्ण यज्ञोंमेंअस्मि= मैं हूँ।

व्याख्या—‘महर्षीणां भृगुरहम्’—भृगु, अत्रि, मरीचि आदि महर्षियोंमें भृगुजी बड़े भक्त, ज्ञानी और तेजस्वी हैं। इन्होंने ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश—इन तीनोंकी परीक्षा करके भगवान् विष्णुको श्रेष्ठ सिद्ध किया था। भगवान् विष्णु भी अपने वक्षःस्थलपर इनके चरणचिह्नको ‘भुगुलता’ नामसे धारण किये रहते हैं। इसलिये भगवान्ने इनको

अपनी विभूति बताया है।

‘गिरामस्येकमक्षरम्’—सबसे पहले तीन मात्रा-वाला प्रणव प्रकट हुआ। फिर प्रणवसे त्रिपदा गायत्री, त्रिपदा गायत्रीसे वेद और वेदोंसे शास्त्र, पुराण आदि सम्पूर्ण वाङ्मय जगत् प्रकट हुआ। अतः इन सबका कारण होनेसे और इन सबमें श्रेष्ठ होनेसे भगवान्ने एक अक्षर—

७२४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १० ]

प्रणवको अपनी विभूति बताया है। गीतामें और जगह भी इसका वर्णन आता है; जैसे—‘प्रणवः सर्ववेदेषु ’ (७।८)—‘सम्पूर्ण वेदोंमें प्रणव मैं हूँ’; ‘ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मानुसन्मन् ’। यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्।’ (८।१३) ‘जो मनुष्य ‘ॐ’—इस एक अक्षर प्रणवका उच्चारण करके और भगवान्का स्मरण करके शरीर छोड़कर जाता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है’; ‘तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः । प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ’ (१७।२४) ‘वैदिक लोगोंकी शास्त्रविहित यज्ञ, दान और तपरूप क्रियाएँ प्रणवका उच्चारण करके ही आरम्भ होती हैं।’

यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि ’—मन्त्रोंसे जितने यज्ञ किये जाते हैं, उनमें अनेक वस्तु-पदार्थोंकी, विधियोंकी आवश्यकता पड़ती है और उनको करनेमें कुछ-न-कुछ दोष आ ही जाता है। परन्तु जपयज्ञ अर्थात् भगवान्नामका जप करनेमें किसी पदार्थ या विधिकी आवश्यकता नहीं पड़ती। इसको करनेमें दोष आना तो दूर रहा, प्रत्युत सभी दोष नष्ट हो जाते हैं। इसको करनेमें सभी स्वतन्त्र हैं। भिन्न-भिन्न सम्प्रदायोंमें भगवान्के नामोंमें अन्तर तो होता है, पर नामजपसे कल्याण होता है—इसको हिन्दू, मुसलमान, बौद्ध, जैन आदि सभी मानते हैं। इसलिये भगवान्ने जपयज्ञको अपनी विभूति बताया है।

श्वावराणां हिमालयः ’—स्थिर रहनेवाले जितने भी पर्वत हैं, उन सबमें हिमालय तपस्याका स्थल होनेसे महान् पवित्र है और सबका अधिपति है। गंगा, यमुना आदि जितनी तीर्थस्वरूप पवित्र नदियाँ हैं, वे सभी प्रायः हिमालयसे प्रकट होती हैं। भगवत्प्राप्तिमें हिमालयस्थल बहुत सहायक है। आज भी दीर्घ आयुवाले बड़े-बड़े योगी और सन्तजन हिमालयकी गुफाओंमें साधन-भजन करते हैं। नर-नारायण ऋषि भी हिमालयमें जगत्के कल्याणके लिये आज भी तपस्या कर रहे हैं। हिमालय भगवान् शंकरका समुराल है और स्वयं शंकर भी इसीके एक शिखर—कैलास पर्वतपर रहते हैं। इसीलिये भगवान्ने हिमालयको अपनी विभूति बताया है।

संसारमें जो कुछ भी विशेषता दीखती है, उसको संसारकी माननेसे मनुष्य उसमें फँस जाता है, जिससे उसका पतन होता है। परन्तु भगवान् यहाँ बहुत ही सरल साधन बताते हैं कि तुम्हारा मन जहाँ-कहीं और जिस-किसी विशेषताको लेकर आकृष्ट होता है, वहाँ उस विशेषताको तुम मेरी समझो कि यह विशेषता भगवान्की है और भगवान्से ही आयी है, यह इस परिवर्तनशील नाशवान् संसारकी नहीं है। ऐसा समझोगे, मानोगे तो तुम्हारा वह आकर्षण मेरेमें ही होगा। तुम्हारे मनमें मेरी ही महत्ता हो जायगी। इससे संसारका चिन्तन छूटकर मेरा ही चिन्तन होगा, जिससे तुम्हारा मेरेमें प्रेम हो जायगा।

अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ।

गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः ॥ २६ ॥

सर्ववृक्षाणाम् = सम्पूर्ण वृक्षोंमें अश्वत्थः = पीपल, देवर्षीणाम् = देवर्षियोंमें

नारदः = नारद, गन्धर्वाणाम् = गन्धर्वोंमें चित्ररथः = चित्ररथ च = और

सिद्धानाम् = सिद्धोंमें कपिलः = कपिल मुनिः = मुनि (में हूँ)।

व्याख्या —‘अश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम् ’—पीपल एक सौम्य वृक्ष है। इसके नीचे हरेक पेड़ लग जाता है और यह पहाड़, मकानकी दीवार, छत आदि कठोर जगहपर भी पैदा हो जाता है। पीपल वृक्षके पूजनकी बड़ी महिमा है। आयुर्वेदमें बहुत-से रोगोंका नाश करनेकी शक्ति पीपल वृक्षमें बतायी गयी है। इन सब दृष्टियोंसे भगवान्ने पीपलको अपनी विभूति बताया है।

देवर्षीणां च नारदः ’—देवर्षि भी कई हैं और नारद भी कई हैं; पर ‘देवर्षि नारद’ एक ही हैं। ये भगवान्के मनके

अनुसार चलते हैं और भगवान्को जैसी लीला करनी होती है, ये पहलेसे ही वैसी भूमिका तैयार कर देते हैं। इसलिये नारदजीको भगवान्का मन कहा गया है। ये सदा वीणा लेकर भगवान्के गुण गाते हुए घूमते रहते हैं। वाल्मीकि और व्यासजीको उपदेश देकर उनको रामायण और भागवत-जैसे ग्रन्थोंके लेखन-कार्यमें प्रवृत्त करानेवाले भी नारदजी ही हैं। नारदजीकी बातपर मनुष्य, देवता, असुर, नाग आदि सभी विश्वास करते हैं। सभी इनकी बात मानते हैं और इनसे सलाह लेते हैं। महाभारत आदि ग्रन्थोंमें इनके अनेक गुणोंका वर्णन

श्लोक २७-२८ ] * साधक-संजीवनी * ७२५

किया गया है। यहाँ भगवान्‌ने इनको अपनी विभूति बताया है।

‘गन्धर्वाणां चित्ररथः’—स्वर्गके गायकोंको गन्धर्व

कहते हैं और उन सभी गन्धर्वोंमें चित्ररथ मुख्य हैं। अर्जुनके

साथ इनकी मित्रता रही और इनसे ही अर्जुनने गानविद्या

सीखी थी। गानविद्यामें अत्यन्त निपुण और गन्धर्वोंमें मुख्य

होनेसे भगवान्‌ने इनको अपनी विभूति बताया है।

‘सिद्धानां कपिलो मुनिः’—सिद्ध दो तरहके होते

हैं—एक तो साधन करके सिद्ध बनते हैं और दूसरे

जन्मजात सिद्ध होते हैं। कपिलजी जन्मजात सिद्ध हैं और

इनको आदिसिद्ध कहा जाता है। ये कर्दमजीके यहाँ

देवहूतिके गर्भसे प्रकट हुए थे। ये सांख्यके आचार्य और

सम्पूर्ण सिद्धोंके गणाधीश हैं। इसलिये भगवान्‌ने इनको

अपनी विभूति बताया है।

इन सब विभूतियोंमें जो विलक्षणता प्रतीत होती है,

वह मूलतः, तत्त्वतः भगवान्‌की ही है। अतः साधककी

दृष्टि भगवान्‌में ही रहनी चाहिये।

उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम्।

ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम्॥ २७॥

अश्वानाम् = घोड़ोंमें

अमृतोद्भवम् = अमृतके साथ

समुद्रसे

प्रकट

होनेवाले

उच्चैःश्रवसम् = उच्चैःश्रवा नामक

घोड़ेको,

गजेन्द्राणाम् = श्रेष्ठ हाथियोंमें

ऐरावतम् = ऐरावत नामक

हाथीको

च = और

नराणाम् = मनुष्योंमें

नराधिपम् = राजाको

माम् = मेरी विभूति

विद्धि = मानो।

व्याख्या—‘उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम्’—

समुद्रमन्थनके समय प्रकट होनेवाले चौदह रत्नोंमें उच्चैःश्रवा

घोड़ा भी एक रत्न है। यह इन्द्रका वाहन और सम्पूर्ण

घोड़ोंका राजा है। इसलिये भगवान्‌ने इसको अपनी विभूति

बताया है।

‘ऐरावतं गजेन्द्राणाम्’—हाथियोंके समुदायमें जो

श्रेष्ठ होता है, उसको गजेन्द्र कहते हैं। ऐसे गजेन्द्रोंमें भी

ऐरावत हाथी श्रेष्ठ है। उच्चैःश्रवा घोड़ेकी तरह ऐरावत

हाथीकी उत्पत्ति भी समुद्रसे हुई है और यह भी इन्द्रका वाहन

है। इसलिये भगवान्‌ने इसको अपनी विभूति बताया है।

‘नराणां च नराधिपम्’—सम्पूर्ण प्रजाका पालन,

संरक्षण, शासन करनेवाला होनेसे राजा सम्पूर्ण मनुष्योंमें

श्रेष्ठ है। साधारण मनुष्योंकी अपेक्षा राजामें भगवान्‌की

ज्यादा शक्ति रहती है। इसलिये भगवान्‌ने राजाको अपनी

विभूति बताया है*।

इन विभूतियोंमें जो बलवत्ता, सामर्थ्य है, वह भगवान्‌से

ही आयी है, अतः उसको भगवान्‌की ही मानकर

भगवान्‌का चिन्तन करना चाहिये।

आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्।

प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः॥ २८॥

आयुधानाम् = आयुधोंमें

वज्रम् = वज्र (और)

धेनूनाम् = धेनुओंमें

कामधुक् = कामधेनु

अहम् = मैं

अस्मि = हूँ।

प्रजनः = सन्तान-

उत्पत्तिका

हेतु

कन्दर्पः = कामदेव

अस्मि = मैं हूँ

च = और

सर्पाणाम् = सर्पोंमें

वासुकिः = वासुकि

अस्मि = मैं हूँ।

व्याख्या—‘आयुधानामहं वज्रम्’—जिनसे युद्ध किया

जाता है, उनको आयुध (अस्त्र-शस्त्र) कहते हैं। उन

आयुधोंमें इन्द्रका वज्र मुख्य है। यह दधीचि ऋषिकी

हड्डियोंसे बना हुआ है और इसमें दधीचि ऋषिकी तपस्याका

  • यहाँ वर्तमान मन्वन्तरके मनुको भी राजा मान सकते हैं।

श्रीमद्भगवद्गीता

तेज है। इसलिये भगवान्ने वज्रको अपनी विभूति कहा है। 'धेनूनामस्मि कामधुक्'—नयी ब्यायी हुई गायको धेनु कहते हैं। सभी धेनुओंमें कामधेनु मुख्य है, जो समुद्र-मन्थनसे प्रकट हुई थी। यह सम्पूर्ण देवताओं और मनुष्योंकी कामनापूर्ति करनेवाली है। इसलिये यह भगवान्की विभूति है। 'प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः'—संसारमात्रकी उत्पत्ति कामसे ही होती है। धर्मके अनुकूल केवल सन्तानकी उत्पत्तिके लिये सुखबुद्धिका त्याग करके जिस कामका उपयोग किया जाता है, वह काम भगवान्की विभूति है। सातवें

अध्यायके ग्यारहवें श्लोकमें भी भगवान्ने कामको अपनी विभूति बताया है—'धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ' अर्थात् सब प्राणियोंमें धर्मके अनुकूल काम मैं हूँ। 'सर्पाणामस्मि वासुकिः'—वासुकि सम्पूर्ण सर्पोंके अधिपति और भगवान्के भक्त हैं। समुद्र-मन्थनके समय इन्हींकी मन्थन-डोरी बनायी गयी थी। इसलिये भगवान्ने इनको अपनी विभूति बताया है। इन विभूतियोंमें जो विलक्षणता दिखायी देती है, वह प्रतिक्षण परिवर्तनशील संसारकी ही कैसे सकती है! वह तो परमात्माकी ही है।

अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्। पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्॥ २९॥

नागानाम् = नागोंमें, अनन्तः = अनन्त (शेषनाग), च = और, यादसाम् = जल-जन्तुओंका, अधिपति = अधिपति, वरुणः = वरुण, अहम् = मैं, अस्मि = हूँ।, पितॄणाम् = पितरोंमें, अर्यमा = अर्यमा, च = और, संयमताम् = शासन करनेवालोंमें, यमः = यमराज, अहम् = मैं, अस्मि = हूँ।

व्याख्या—'अनन्तश्चास्मि नागानाम्'—शेषनाग सम्पूर्ण नागोंके राजा हैं*। इनके एक हजार फण हैं। ये क्षीरसागरमें सदा भगवान्की शय्या बनकर भगवान्को सुख पहुँचाते रहते हैं। ये अनेक बार भगवान्के साथ अवतार लेकर उनकी लीलामें शामिल हुए हैं। इसलिये भगवान्ने इनको अपनी विभूति बताया है। 'वरुणो यादसामहम्'—वरुण सम्पूर्ण जल-जन्तुओंके तथा जल-देवताओंके अधिपति हैं और भगवान्के भक्त हैं। इसलिये भगवान्ने इनको अपनी विभूति बताया है। 'पितॄणामर्यमा चास्मि'—कव्यवाह, अनल, सोम आदि सात पितृगण हैं। इन सबमें अर्यमा नामवाले

पितर मुख्य हैं। इसलिये भगवान्ने इनको अपनी विभूति बताया है। 'यमः संयमतामहम्'—प्राणियोंपर शासन करनेवाले राजा आदि जितने भी अधिकारी हैं, उनमें यमराज मुख्य हैं। ये प्राणियोंको उनके पाप-पुण्योंका फल भुताकर शुद्ध करते हैं। इनका शासन न्याय और धर्मपूर्वक होता है। ये भगवान्के भक्त और लोकपाल भी हैं। इसलिये भगवान्ने इनको अपनी विभूति बताया है। इन विभूतियोंमें जो विलक्षणता दीखती है, वह इनकी व्यक्तिगत नहीं है। वह तो भगवान्से ही आयी है और भगवान्की ही है। अतः इनमें भगवान्का ही चिन्तन होना चाहिये।

प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्। मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्॥ ३०॥

  • सर्प पृथ्वीपर रहता है और नाग जलमें रहता है—यही सर्प और नागमें अन्तर है।

श्लोक ३१ ]

  • साधक-संजीवनी *

७२७

दैत्यानाम्= दैत्योंमेंकालः= कालमृगेन्द्रः= सिंह
प्रह्लादः= प्रह्लादअहम्= मैं= और
= औरअस्मि= हूँपक्षिणाम्= पक्षियोंमें
कलयताम्= गणना करनेवालों-
(ज्योतिषियों- )में= तथावैनतेयः= गरुड़
मृगाणाम्= पशुओंमेंअहम्= मैं हूँ।

व्याख्या —‘प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानाम् ’—जो दितिसे उत्पन्न हुए हैं, उनको दैत्य कहते हैं। उन दैत्योंमें प्रह्लादजी मुख्य हैं और श्रेष्ठ हैं। ये भगवान्के परम विश्वासी और निष्काम प्रेमी भक्त हैं। इसलिये भगवान्ने इनको अपनी विभूति बताया है।

प्रह्लादजी तो बहुत पहले हो चुके थे, पर भगवान्ने ‘दैत्योंमें प्रह्लाद मैं हूँ’ ऐसा वर्तमानका प्रयोग किया है। इससे यह सिद्ध होता है कि भगवान्के भक्त नित्य रहते हैं और श्रद्धा-भक्तिके अनुसार दर्शन भी दे सकते हैं। उनके भगवान्में लीन हो जानेके बाद अगर कोई उनको याद करता है और उनके दर्शन चाहता है, तो उनका रूप धारण करके भगवान् दर्शन देते हैं।

कालः कलयतामहम् ’—ज्योतिष-शास्त्रमें काल-(समय-)से ही आयुकी गणना होती है। इसलिये क्षण,

घड़ी, दिन, पक्ष, मास, वर्ष आदि गणना करनेके साधनोंमें काल भगवान्की विभूति है।

मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहम् ’—बाघ, हाथी, चीता, रीछ आदि जितने भी पशु हैं, उन सबमें सिंह बलवान्, तेजस्वी, प्रभावशाली, शूरवीर और साहसी है। यह सब पशुओंका राजा है। इसलिये भगवान्ने इसको अपनी विभूति बताया है।

वैनतेयश्च पक्षिणाम् ’—विनताके पुत्र गरुड़जी सम्पूर्ण पक्षियोंके राजा हैं और भगवान्के भक्त हैं। ये भगवान् विष्णुके वाहन हैं और जब ये उड़ते हैं, तब इनके पंखोंसे स्वतः सामवेदकी ऋचाएँ ध्वनित होती हैं। इसलिये भगवान्ने इनको अपनी विभूति बताया है।

इन सब विभूतियोंमें अलग-अलग रूपसे जो मुख्यता बतायी गयी है, वह तत्त्वतः भगवान्की ही है। इसलिये इनकी ओर दृष्टि जाते ही स्वतः भगवान्का चिन्तन होना चाहिये।

पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभूतामहम्।

झषाणां मकरश्चास्मि स्तोतसामस्मि जाह्नवी ॥ ३१ ॥

पवताम्= पवित्र करनेवालोंमेंअहम्= मैंअस्मि= मैं हूँ
पवनः= वायु
(और)अस्मि= हूँ।= और
शस्त्रभूताम्= शस्त्रधारियोंमेंझषाणाम्= जल-
जनुओंमेंस्तोतसाम्= नदियोंमें
रामः= राममकरः= मगरजाह्नवी= गंगाजी
अस्मि= मैं हूँ।

व्याख्या —‘पवनः पवतामस्मि ’—वायुसे ही सब चीजें पवित्र होती हैं। वायुसे ही नीरोगता आती है। अतः भगवान्ने पवित्र करनेवालोंमें वायुको अपनी विभूति बताया है।

रामः शस्त्रभूतामहम् ’—ऐसे तो राम अवतार हैं, साक्षात् भगवान् हैं, पर जहाँ शस्त्रधारियोंकी गणना होती है, उन सबमें राम श्रेष्ठ हैं। इसलिये भगवान्ने रामको अपनी विभूति बताया है।

झषाणां मकरश्चास्मि ’—जल-जनुओंमें मगर सबसे बलवान् है। इसलिये जलचरोंमें मगरको भगवान्ने अपनी विभूति बताया है।

स्तोतसामस्मि जाह्नवी ’—प्रवाहरूपसे बहनेवाले जितने भी नद, नदी, नाले, झरने हैं, उन सबमें गंगाजी श्रेष्ठ हैं। ये भगवान्की खास चरणोदक हैं। गंगाजी अपने दर्शन, स्पर्श आदिसे दुनियाका उद्धार करनेवाली हैं। मेरे हुए मनुष्योंकी अस्थियाँ गंगाजीमें डालनेसे उनकी सदगति हो जाती है। इसलिये भगवान्ने इनको अपनी विभूति बताया है।

वास्तवमें इन विभूतियोंकी मुख्यता न मानकर भगवान्की ही मुख्यता माननी चाहिये। कारण कि इन सबमें जो विशेषता-महत्ता देखनेमें आती है, वह भगवान्से ही आयी है।

सत्रहवें श्लोकमें अर्जुनके दो प्रश्न थे—पहला, भगवान्को जाननेका (मैं आपको कैसे जानूँ) और दूसरा,

७२८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १० ]

जाननेके उपायका (किन-किन भावोंमें मैं आपका चिन्तन करूँ)। इन दोनोंमेंसे उपाय तो है—विभूतियोंमें भगवान्का चिन्तन करना और उस चिन्तनका फल (परिणाम) होगा—सब विभूतियोंके मूलमें भगवान्को तत्त्वसे जानना। जैसे, शस्त्रधारियोंमें श्रीरामको और वृष्णियोंमें वासुदेव-(अपने-) को भगवान्ने अपनी विभूति बताया। यह तो उस समुदायमें विभूतिरूपसे श्रीरामका और वासुदेवका चिन्तन करनेके लिये बताया और उनके चिन्तनका फल होगा—श्रीरामको और वासुदेवको तत्त्वसे भगवान् जान जाना। यह चिन्तन करना और भगवान्को तत्त्वसे जानना सभी विभूतियोंके विषयमें समझना चाहिये।

संसारमें जहाँ-कहीं भी जो कुछ विशेषता, विलक्षणता, सुन्दरता दीखती है, उसको वस्तु-व्यक्तिकी माननेसे फँसावट होती है अर्थात् मनुष्य उस विशेषता आदिको संसारकी मानकर उसमें फँस जाता है। इसलिये भगवान्ने यहाँ मनुष्य मात्रके लिये यह बताया है कि तुमलोग उस विशेषता सुन्दरता आदिको वस्तु-व्यक्तिकी मत मानो, प्रत्युत मेरी और मेरेसे ही आयी हुई मानो। ऐसा मानकर मेरा चिन्तन करोगे तो तुम्हारा संसारका चिन्तन तो छूट जायगा और उस जगह मैं आ जाऊँगा। इसका परिणाम यह होगा कि तुमलोग मेरेको तत्त्वसे जान जाओगे। मेरेको तत्त्वसे जाननेपर मेरेमें तुम्हारी दृढ़ भक्ति हो जायगी (गीता—इसी अध्यायका सातवाँ श्लोक)।

सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन।

अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् ॥ ३२ ॥

अर्जुन = हे अर्जुन! सर्गाणाम् = सम्पूर्ण सृष्टियोंके आदिः = आदि, मध्यम् = मध्य च = तथा अन्तः = अन्तमें

अहम् = मैं एव = ही हूँ। विद्यानाम् = विद्याओंमें अध्यात्मविद्या = अध्यात्मविद्या (ब्रह्मविद्या) च = और

प्रवदताम् = परस्पर शास्त्रार्थ करनेवालोंका वादः = (तत्त्व-निर्णयके लिये किया जानेवाला) वाद अहम् = मैं हूँ।

व्याख्या —‘सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहम्’—जितने सर्ग और महासर्ग होते हैं अर्थात् जितने प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है, उनके आदिमें भी मैं रहता हूँ, उनके मध्यमें भी मैं रहता हूँ और उनके अन्तमें (उनके लीन होनेपर) भी मैं रहता हूँ। तात्पर्य है कि सब कुछ वासुदेव ही है। अतः मात्र संसारको, प्राणियोंको देखते ही भगवान्की याद आनी चाहिये।

‘अध्यात्मविद्या विद्यानाम्’—जिस विद्यासे मनुष्यका कल्याण हो जाता है, वह ‘अध्यात्मविद्या’ कहलाती है*। दूसरी सांसारिक कितनी ही विद्याएँ पढ़ लेनेपर भी पढ़ना बाकी ही रहता है; परन्तु इस अध्यात्मविद्याके प्राप्त होनेपर पढ़ना अर्थात् जानना बाकी नहीं रहता। इसलिये भगवान्ने इसको अपनी विभूति बताया है।

‘वादः प्रवदतामहम्’—आपसमें जो शास्त्रार्थ किया जाता है, वह तीन प्रकारका होता है—

(१) जल्प—युक्ति-प्रयुक्तिसे अपने पक्षका मण्डन और दूसरे पक्षका खण्डन करके अपने पक्षकी जीत और दूसरे पक्षकी हार करनेकी भावनासे जो शास्त्रार्थ किया जाता है, उसको जल्प कहते हैं।

(२) वितण्डा—अपना कोई भी पक्ष न रखकर केवल दूसरे पक्षका खण्डन-ही-खण्डन करनेके लिये जो शास्त्रार्थ किया जाता है, उसको ‘वितण्डा’ कहते हैं।

(३) वाद—बिना किसी पक्षपातके केवल तत्त्व-निर्णयके लिये आपसमें जो शास्त्रार्थ (विचार-विनिमय) किया जाता है उसको ‘वाद’ कहते हैं।

उपर्युक्त तीनों प्रकारके शास्त्रार्थोंमें ‘वाद’ श्रेष्ठ है। इसी वादको भगवान्ने अपनी विभूति बताया है।

  • अध्यात्मविद्या और राजविद्या—इन दोनोंमें अन्तर है। अध्यात्मविद्यामें निर्गुण-स्वरूपकी मुख्यता है और राजविद्यामें सगुण-स्वरूपकी मुख्यता है। संसारका अभाव करके निर्गुण परमात्माको जानना अध्यात्मविद्या है। सब देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति, घटना आदिमें व्यापकरूपसे नित्य-निरन्तर रहनेवाले सगुण परमात्माको जानना राजविद्या है।

श्लोक ३३ ]

  • साधक-संजीवनी *

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परिशिष्ट भाव —लौकिक विद्याओंमें ‘अध्यात्मविद्या’ अर्थात् आत्मज्ञान श्रेष्ठ है। इसीको गीताके अध्यायोंकी पुष्पिकामें ‘ब्रह्मविद्या’ कहा गया है।

अध्यात्मविद्या अर्थात् आत्मज्ञानको अपनी विभूति बतानेका कारण है कि यह सबसे सरल है, सबसे सुगम है और सबके प्रत्यक्ष अनुभवकी बात है। इसको करनेमें, समझनेमें और पानेमें कोई कठिनता है ही नहीं। इसमें करना, समझना और पाना लागू होता ही नहीं। कारण कि यह नित्यप्राप्त है और जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति आदि सम्पूर्ण अवस्थाओंमें सदा ज्यों-का-त्यों मौजूद है। आत्मज्ञान जितना प्रत्यक्ष है, उतना प्रत्यक्ष यह संसार भी नहीं है। तात्पर्य है कि हमारे अनुभवमें आत्मज्ञान जितना स्पष्ट आता है, उतना स्पष्ट संसार नहीं आता। इस बातको इस प्रकार समझना चाहिये। हम अपने बालकपनको देखें और वर्तमान अवस्थाको देखें तो शरीर वही नहीं रहा, आदत वही नहीं रही, भाषा वही नहीं रही, व्यवहार वही नहीं रहा, स्थान वही नहीं रहा, समय वही नहीं रहा, साथी वही नहीं रहे, क्रियाएँ वही नहीं रहीं, विचार वही नहीं रहे; सब कुछ बदल गया, पर सत्तारूपसे हम स्वयं नहीं बदले, तभी हम कहते हैं कि ‘मैं तो वही हूँ, जो बालकपनमें था’। तात्पर्य यह हुआ कि जो बदल गया, वह अलग स्वभाववाला है और जो नहीं बदला, वह अलग स्वभाववाला है। जो नहीं बदला, वह हमारा असली स्वरूप अर्थात् शरीरी है और जो बदल गया, वह शरीर है। यह आत्मज्ञान है।

अक्षराणामकारोऽस्मि द्रुद्धः सामासिकस्य च।

अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः ॥ ३३ ॥

अक्षराणाम् | = अक्षरोंमें | अस्मि | = हूँ। | मुखवाला | ---|---|---|---|---|--- अकारः | = अकार | अक्षयः, कालः | = अक्षयकाल | धाता | = धाता (सबका च | = और | | अर्थात् | | पालन- सामासिकस्य | = समासोंमें | | कालका भी | | पोषण द्रुद्धः | = द्रुद्ध समास | | महाकाल (तथा) | | करनेवाला भी) अहम् | = मैं | विश्वतोमुखः | = सब ओर | अहम्, एव | = मैं ही हूँ।

व्याख्या —‘अक्षराणामकारोऽस्मि’—वर्णमालामें सर्वप्रथम अकार आता है। स्वर और व्यंजन—दोनोंमें अकार मुख्य है। अकारके बिना व्यंजनोंका उच्चारण नहीं होता। इसलिये अकारको भगवान्ने अपनी विभूति बताया है।

‘द्रुद्धः सामासिकस्य च’ —जिससे दो या दोसे अधिक शब्दोंको मिलाकर एक शब्द बनता है, उसको समास कहते हैं। समास कई तरहके होते हैं। उनमें अव्ययीभाव, तत्पुरुष, बहुब्रीहि और द्रुद्ध—ये चार मुख्य हैं। दो शब्दोंके समासमें यदि पहला शब्द प्रधानता रखता है तो वह ‘अव्ययीभाव समास’ होता है। यदि आगेका शब्द प्रधानता रखता है तो वह ‘तत्पुरुष समास’ होता है। यदि दोनों शब्द अन्यके वाचक होते हैं तो वह ‘बहुब्रीहि समास’ होता है। यदि दोनों

शब्द प्रधानता रखते हैं तो वह ‘द्रुद्ध समास’ होता है।

द्रुद्ध समासमें दोनों शब्दोंका अर्थ मुख्य होनेसे भगवान्ने इसको अपनी विभूति बताया है।

‘अहमेवाक्षयः कालः’ —जिस कालका कभी क्षय नहीं होता अर्थात् जो कालातीत है और अनादि-अनन्तरूप है, वह काल भगवान् ही हैं।

सर्ग और प्रलयकी गणना तो सूर्यसे होती है, पर महाप्रलयमें जब सूर्य भी लीन हो जाता है, तब समयकी गणना परमात्मासे ही होती है*। इसलिये परमात्मा अक्षय काल हैं।

तीसवें श्लोकके ‘कालः कलयतामहम्’ पदोंमें आये ‘काल’में और यहाँ आये ‘अक्षय काल’में क्या अन्तर है? वहाँका जो ‘काल’ है, वह एक क्षण भी स्थिर नहीं रहता,

  • महाप्रलयमें ब्रह्माजी लीन हो जाते हैं। महामर्गका अर्थात् ब्रह्माजीकी आयुका जितना समय होता है, उतना ही समय महाप्रलयका होता है। अतः इतने लम्बे (महाप्रलयके) समयकी गणना अक्षयकालरूप परमात्मासे ही होती है।