भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय २ ]

तथा चिन्ता-शोकसे ही अर्जुनके शरीरमें उपर्युक्त विकार प्रकट हो रहे हैं। इसमें भगवान्ने ‘गतासून्’ और ‘अगतासून्’ के शोकको ही हेतु बताया है। जिनके प्राण चले गये हैं, वे ‘गतासून्’ हैं और जिनके प्राण नहीं चले गये हैं, वे ‘अगतासून्’ हैं। पिण्ड और जल न मिलनेसे पितरोंका पतन हो जाता है’ (पहले अध्यायका बयालीसवाँ श्लोक)—यह अर्जुनकी ‘गतासून्’ की चिन्ता है और ‘जिनके लिये हम राज्य, भोग और सुख चाहते हैं, वे ही प्राणोंकी और धनकी आशा छोड़कर युद्धमें खड़े हैं’ (पहले अध्यायका तैंतीसवाँ श्लोक)—यह अर्जुनकी ‘अगतासून्’ की चिन्ता है। ये दोनों चिन्ताएँ शरीरको लेकर ही हो रही हैं; अतः ये दोनों चिन्ताएँ धातुरूपसे एक ही हैं। कारण कि ‘गतासून्’ और ‘अगतासून्’ दोनों ही नाशवान् हैं। ‘गतासून्’ और ‘अगतासून्’—इन दोनोंके लिये कर्तव्य-कर्म करना चिन्ताकी बात नहीं है। ‘गतासून्’ के लिये

पिण्ड-पानी देना, श्राद्ध-तर्पण करना—यह कर्तव्य है और ‘अगतासून्’ के लिये व्यवस्था कर देना, निर्वाहका प्रबन्ध कर देना—यह कर्तव्य है। कर्तव्य चिन्ताका विषय नहीं होता, प्रत्युत विचारका विषय होता है। विचारसे कर्तव्यका बोध होता है और चिन्तासे विचार नष्ट होता है।

‘नानुशोचन्ति पिण्डिताः’—सत्-असत्-विवेकवती बुद्धिका नाम ‘पण्डा’ है। वह ‘पण्डा’ जिनकी विकसित हो गयी है अर्थात् जिनको सत्-असत्का स्पष्टतया विवेक हो गया है, वे पिण्डित हैं। ऐसे पिण्डितोंमें सत्-असत्को लेकर शोक नहीं होता; क्योंकि सत्को सत् माननेसे भी शोक नहीं होता और असत्को असत् माननेसे भी शोक नहीं होता। स्वयं सत्-स्वरूप है और बदलनेवाला शरीर असत्-स्वरूप है। असत्को सत् मान लेनेसे ही शोक होता है अर्थात् ये शरीर आदि ऐसे ही बने रहे, मरें नहीं—इस बातको लेकर ही शोक होता है। सत्को लेकर कभी चिन्ता-शोक होते ही नहीं।

परिशिष्ट भाव —एक विभाग शरीरका है और एक विभाग शरीरी (शरीरवाले)-का है। दोनों एक-दूसरेसे सर्वथा सम्बन्धरहित हैं। दोनोंका स्वभाव ही अलग-अलग है। एक जड़ है, एक चेतन। एक नाशवान् है, एक अविनाशी, एक विकारी है, एक निर्वाकार। एकमें प्रतिक्षण परिवर्तन होता है और एक अनन्तकालतक ज्यों-का-त्यों ही रहता है—‘भूतग्रामः स एवायम्’ (गीता ८।१९), ‘सर्गोऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च’ (गीता १४।२)।

शरीर और शरीरी—दोनों ही अशोच्य हैं। शरीरका निरन्तर विनाश होता है; अतः उसके लिये शोक करना नहीं बनता और शरीरीका विनाश कभी होता ही नहीं; अतः उसके लिये भी शोक करना नहीं बनता। शोक केवल मूर्खतासे होता है। शरीरकी निरन्तर सहजनिवृत्ति है और शरीरी निरन्तर सबको प्राप्त है। शरीर और शरीरीके इस विभागको जाननेवाले विवेकी मनुष्य मृत अथवा जीवित, किसी भी प्राणीके लिये कभी शोक नहीं करते। उनकी दृष्टिमें बदलनेवाले शरीरका विभाग ही अलग है और न बदलनेवाले शरीरी अर्थात् स्वरूपकी सत्ताका विभाग ही अलग है।

गीताका उपदेश शरीर और शरीरीके भेदसे आरम्भ होता है। दूसरे दार्शनिक ग्रन्थ तो आत्मा और अनात्माका इदंतासे वर्णन करते हैं, पर गीता इदंतासे आत्मा-अनात्माका वर्णन न करके सबके अनुभवके अनुसार देह-देही, शरीर-शरीरीका वर्णन करती है। यह गीताकी विलक्षणता है! साधक अपना कल्याण चाहता है तो उसके लिये सबसे पहले यह जानना आवश्यक है कि ‘मैं कौन हूँ’। अर्जुने भी अपने कल्याणका उपाय पूछा है—‘यच्छ्रेयः स्यानिश्चितं ब्रूहि तन्मे’ (२।७)। देह और देहीका भेद स्वीकार करनेसे ही कल्याण हो सकता है। जबतक ‘मैं देह हूँ’—यह भाव रहेगा, तबतक कितना ही उपदेश सुनते रहें, सुनाते रहें और साधन भी करते रहें, कल्याण नहीं होगा।

जो वस्तु अपनी न हो, उसको अपना मान लेना और जो वस्तु वास्तवमें अपनी हो, उसको अपना न मानना बहुत बड़ी भूल है। अपनी वस्तु वही हो सकती है, जो सदा हमारे साथ रहे और हम सदा उसके साथ रहें। शरीर एक क्षण भी हमारे साथ नहीं रहता और परमात्मा निरन्तर हमारे साथ रहते हैं। कारण कि शरीरकी सजातीयता संसारके साथ है और हमारी अर्थात् शरीरकी सजातीयता परमात्माके साथ है। इसलिये शरीरको अपना मानना और परमात्माको अपना न मानना सबसे बड़ी भूल है। इस भूलको मिटानेके लिये भगवान् गीतामें सबसे पहले शरीर-शरीरीके भेदका वर्णन करते हैं और साधकको उद्बोधन करते हैं कि जिसकी मृत्यु होती है, वह तुम नहीं हो अर्थात् तुम शरीर नहीं हो। तुम ज्ञाता (जाननेवाले) हो, शरीर ज्ञेय (जाननेमें आनेवाला) है। (गीता—तेरहवें अध्यायका पहला श्लोक) तुम सर्वदेशीय हो—‘नित्यः सर्वगतः’ (गीता २।२४), ‘येन सर्वमिदं ततम्’ (गीता २।१७), शरीर एकदेशीय है। तुम चिन्मय लोकके निवासी हो, शरीर जड़ संसारका निवासी है। तुम मुझ परमात्माके अंश हो—‘ममेवांशो जीवलोकै’ (गीता ५।७), शरीर प्रकृतिका अंश है—‘मनःषष्ठीनीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि’ (गीता १५।७)। तुम निरन्तर अमरतामें