भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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श्लोक १२]

  • साधक-संजीवनी *

७९

रहते हो, शरीर निरन्तर मृत्युमें रहता है। शरीरकी क्षतिसे तुम्हारी किंचिन्मात्र भी क्षति नहीं होती। अतः शरीरको लेकर तुम्हें शोक, चिन्ता, भय आदि नहीं होने चाहिये।

शरीरी किसी शरीरसे लिप्त नहीं है, इसलिये उसको सर्वव्यापी कहा गया है—‘सर्वगतः’ (गीता २।२४), ‘येन सर्वमिदं ततम्’ (२।१७)। तात्पर्य हुआ कि साधकका स्वरूप सत्तामात्र है; अतः वास्तवमें वह शरीरी (शरीरवाला) नहीं है, प्रत्युत अशरीरी है। इसलिये भगवान्ने उसको अव्यक्त भी कहा है—‘अव्यक्तः’ (२।२५), ‘अव्यक्तादीनि भूतानि’ (२।२८)। शरीर प्रतिक्षण नष्ट होनेवाला और असत् है। असत्की सत्ता विद्यमान नहीं है—‘नासतो विद्यते भावः’ (२।१६)। जिसकी सत्ता विद्यमान नहीं है, ऐसे असत् शरीरको लेकर साधक शरीरी (शरीरवाला) कैसे हो सकता है? इसलिये साधक शरीर भी नहीं है और शरीरी भी नहीं है। परन्तु इस प्रकरणमें भगवान्ने साधकोंको समझानेकी दृष्टिसे उस सत्तामात्र स्वरूपको ‘शरीरी’ (देही) नामसे कहा है। ‘शरीरी’ कहनेका तात्पर्य यही बताना है कि तुम शरीर नहीं हो।

जिस समय हम शरीर और शरीरीका विचार करते हैं, उस समय भी शरीर और शरीरी वैसे ही हैं और जिस समय विचार नहीं करते, उस समय भी वे वैसे ही हैं। विचार करनेसे वस्तुस्थितिमें तो कोई फर्क नहीं पड़ता, पर साधकका मोह मिट जाता है, उसका मनुष्यजन्म सफल हो जाता है।

मनुष्यशरीर विवेकप्रधान है। अतः ‘मैं शरीर नहीं हूँ’—यह विवेक मनुष्यशरीरमें ही हो सकता है। शरीरको मैं-मेरा मानना मनुष्यबुद्धि नहीं है, प्रत्युत पशुबुद्धि है। इसलिये श्रीशुकदेवजी महाराज राजा परीक्षितसे कहते हैं— त्वं तु राजन् मरिष्येति पशुबुद्धिमिमां जहि। न जातः प्रागभूतोऽद्य देहवस्त्वं न नृदृश्यसि॥

(श्रीमद्भा० १२।५।२)

‘हे राजन्! अब तुम यह पशुबुद्धि छोड़ दो कि मैं मर जाऊँगा। जैसे शरीर पहले नहीं था, पीछे पैदा हुआ और फिर मर जायगा, ऐसे तुम पहले नहीं थे, पीछे पैदा हुए और फिर मर जाओगे—यह बात नहीं है।’

सम्बन्ध—सत्-तत्त्वको लेकर शोक करना अनुचित क्यों हैं—इस शंकाके समाधानके लिये आगेके दो श्लोक कहते हैं।

न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः।

न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्॥ १२॥

जातु= किसी कालमेंजनाधिपाः= राजालोगवयम्= (मैं, तू और
अहम्= मैं= नहीं (थे),राजालोग—) हम
= नहींन, तु, एव= यह बात भीसर्वे= सभी
आसम्= था (और)नहीं है;= नहीं
त्वम्= तू= औरभविष्यामः= रहेंगे,
= नहीं (था)अतः= इसकेएव= (यह बात) भी
इमे= (तथा) येपरम्= बाद (भविष्यमें)= नहीं है।

व्याख्या—[मात्र संसारमें दो ही वस्तुएँ हैं—शरीरी (सत्) और शरीर (असत्)। ये दोनों ही अशोच्य हैं अर्थात् शोक न शरीरी-(शरीरमें रहनेवाले-) को लेकर हो सकता है और न शरीरको लेकर ही हो सकता है। कारण कि शरीरीका कभी अभाव होता ही नहीं और शरीर कभी रह सकता ही नहीं। इन दोनोंके लिये पूर्वश्लोकमें जो ‘अशोच्यान्’ पद आया है, उसकी व्याख्या अब शरीरीकी नित्यता और शरीरकी अनित्यताके रूपमें करते हैं।]

‘न त्वेवाहं जातु ..... जनाधिपाः’—लोगोंकी दृष्टिसे मैंने जबतक अवतार नहीं लिया था, तबतक मैं इस रूपसे (कृष्णरूपसे) सबके सामने प्रकट नहीं था और तेरा जबतक जन्म नहीं हुआ था, तबतक तू भी इस रूपसे (अर्जुनरूपसे) सबके सामने प्रकट नहीं था तथा इन राजाओंका भी जबतक जन्म नहीं हुआ था, तबतक ये भी इस रूपसे (राजारूपसे) सबके सामने प्रकट नहीं थे। परन्तु मैं, तू और ये राजालोग इस रूपसे प्रकट न होनेपर भी पहले