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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 823

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १२ ]

वे ही करेंगे। वह अपने उद्धारकी चिन्ता न करके केवल भगवान्‌के भजनमें ही लगा रहता है। उसके साधन और साध्य भगवान् ही होते हैं। परन्तु ज्ञानमार्गमें चलनेवाला अपना उद्धार स्वयं करता है।

स्वरूप-बोध होनेपर भक्ति प्राप्त हो जाय—यह नियम नहीं है, पर भक्ति प्राप्त होनेपर स्वरूप-बोध भी हो जाता है, इसलिये भगवान्‌ने कहा है—

मम दरसन फल परम अनुपा। जीव पाव निज सहज सरूपा॥

(मानस, अरण्य० ३६।५)

भगवान् अपने भक्तोंको कर्मयोग और ज्ञानयोग—दोनों दे देते हैं (गीता—दसवें अध्यायका दसवों-ग्यारहवों श्लोक); क्योंकि भगवान्‌का स्वरूप समग्र है।

देहाभिमानके कारण ज्ञानमार्गके साधकका चित्त अव्यक्तमें 'आसक्त' होता है—'अव्यक्तासक्तचेतसाम्' (गीता १२।५)। पर भक्तका चित्त भगवान्‌में 'आविष्ट' होता है—'मध्यावेशितचेतसाम्'। ज्ञानमें विवेक मुख्य है, भक्तिमें विश्वास मुख्य है। ज्ञानमें अपरा प्रकृति त्याज्य होती है, भक्तिमें वह भगवत्स्वरूप होती है।

सम्बन्ध—भगवान्‌ने दूसरे श्लोकमें सगुण-उपासकोंको श्रेष्ठ योगी बताया तथा छठे और सातवें श्लोकमें यह बात कही कि ऐसे भक्तोंका मैं शीघ्र उद्धार करता हूँ। इसलिये अब भगवान्‌ अर्जुनको ऐसा श्रेष्ठ योगी बननेके लिये पहले आठवें श्लोकमें समर्पणयोगरूप साधनका वर्णन करके फिर नवें, दसवें और ग्यारहवें श्लोकमें क्रमशः अभ्यासयोग, भगवर्द्ध कर्म और सर्वकर्मफलत्यागरूप साधनोंका वर्णन करते हैं।

मध्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।

निवसिष्यसि मध्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥ ८॥

मयि= (तू) मुझमेंएव= हीमयि= मुझमें
मनः= मनकोबुद्धिम्= बुद्धिकोएव= ही
आधत्स्व= स्थापन करनिवेशय= प्रविष्ट कर;निवसिष्यसि= निवास करेगा—
(और)अतः= इसकेसंशयः, न= (इसमें) संशय
मयि= मुझमेंऊर्ध्वम्= बाद (तू)नहीं है।

व्याख्या —'मध्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय'—भगवान्‌के मतमें वे ही पुरुष उत्तम योगवेत्ता हैं, जिनको भगवान्‌के साथ अपने नित्ययोगका अनुभव हो गया है। सभी साधकोंको उत्तम योगवेत्ता बनानेके उद्देश्यसे भगवान्‌ अर्जुनको निमित्त बनाकर यह आज्ञा देते हैं कि मुझ परमेश्वरको ही परमश्रेष्ठ और परम प्रापणीय मानकर बुद्धिको मेरेमें लगा दे और मेरेको ही अपना परम प्रियतम मानकर मनको मेरेमें लगा दे।

भगवान्‌में हमारी स्वतःसिद्ध स्थिति (नित्ययोग) है; परन्तु भगवान्‌में मन-बुद्धिके न लगनेके कारण हमें भगवान्‌के साथ अपने स्वतःसिद्ध नित्य-सम्बन्धका अनुभव नहीं होता। इसलिये भगवान्‌ कहते हैं कि मन-बुद्धिको मेरेमें लगा, फिर तू मेरेमें ही निवास करेगा (जो पहलेसे ही है) अर्थात् तुझे मेरेमें अपनी स्वतःसिद्ध स्थितिका अनुभव हो जायगा।

मन-बुद्धि लगानेका तात्पर्य यह है कि अबतक मनुष्य

जिस मनसे जड़ संसारमें ममता, आसक्ति, सुख-भोगकी इच्छा, आशा आदिके कारण बार-बार संसारका ही चिन्तन करता रहा है और बुद्धिसे संसारमें ही अच्छे-बुरेका निश्चय करता रहा है, उस मनको संसारसे हटाकर भगवान्‌में लगाये तथा बुद्धिके द्वारा दृढ़तासे निश्चय करे कि 'मैं केवल भगवान्‌का ही हूँ और केवल भगवान्‌ ही मेरे हैं तथा मेरे लिये सर्वोपरि, परमश्रेष्ठ एवं परम प्रापणीय भगवान्‌ ही हैं।' ऐसा दृढ़ निश्चय करनेसे संसारका चिन्तन और महत्त्व समाप्त हो जायगा और एक भगवान्‌के साथ ही सम्बन्ध रह जायगा। यही मन-बुद्धिका भगवान्‌में लगाना है।

मन-बुद्धि लगानेमें भी बुद्धिका लगाना मुख्य है। किसी विषयमें पहले बुद्धिका ही निश्चय होता है और फिर बुद्धिके उस निश्चयको मन स्वीकार कर लेता है। साधन करनेमें भी पहले (उद्देश्य बनानेमें) बुद्धिकी प्रधानता होती है, फिर मनकी प्रधानता होती है। जिन पुरुषोंका लक्ष्य भगवत्प्राप्ति नहीं है, उनके मन-बुद्धि भी, वे जिस विषयमें लगाना