श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 824, कुल 1299 में से
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- साधक-संजीवनी *
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चाहेंगे, उस विषयमें लग सकते हैं। उस विषयमें मन-बुद्धि लग जानेपर उन्हें सिद्धियाँ तो प्राप्त हो सकती हैं, पर (भगवत्प्राप्तिका उद्देश्य न होनेसे) भगवत्प्राप्ति नहीं हो सकती। अतः साधकको चाहिये कि बुद्धिसे यह दृढ़ निश्चय कर ले कि 'मुझे भगवत्प्राप्ति ही करनी है।' इस निश्चयमें बड़ी शक्ति है। ऐसी निश्चयात्मिका बुद्धि होनेमें सबसे बड़ी बाधा है—भोग और संग्रहका सुख लेना। सुखकी आशासे ही मनुष्यकी वृत्तियाँ धन, मान-बड़ाई आदि पानेका उद्देश्य बनाती हैं, इसलिये उसकी बुद्धि बहुत भेदोंवाली तथा अनन्त हो जाती है (गीता—दूसरे अध्यायका इकतालिसवाँ श्लोक)। परन्तु अगर भगवत्प्राप्तिका ही एक निश्चय हो, तो इस निश्चयमें इतनी पवित्रता और शक्ति है कि दुराचारी-से-दुराचारी पुरुषको भी भगवान् साधु माननेके लिये तैयार हो जाते हैं! इस निश्चयमात्रके प्रभावसे वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और सदा रहनेवाली परमशान्ति प्राप्त कर लेता है (गीता—नवें अध्यायका तीसवाँ-इकतीसवाँ श्लोक)।
'मैं भगवान्का ही हूँ और भगवान् ही मेरे हैं'—ऐसा निश्चय (साधककी दृष्टिमें) बुद्धिमें हुआ प्रतीत होता है, परन्तु वास्तवमें ऐसा नहीं है। बुद्धिमें ऐसा निश्चय दीखनेपर भी साधकको इस बातका पता नहीं होता कि वह 'स्वयं' पहलेसे ही भगवान्में स्थित है। वह चाहे इस बातको न भी जाने, पर वास्तविकता यही है। 'स्वयं' भगवान्में स्थित होनेकी पहचान यही है कि इस सम्बन्धकी कभी विस्मृति नहीं होती। अगर यह केवल बुद्धिकी बात हो तो भूली भी जा सकती है, पर 'मैं'-पनकी बातको साधक कभी नहीं भूलता। जैसे, 'मैं विवाहित हूँ' यह 'मैं'-पनका निश्चय है, बुद्धिका नहीं। इसीलिये मनुष्य इस बातको कभी नहीं भूलता। अगर कोई यह निश्चय कर ले कि मैं अमुक गुरुका शिष्य हूँ, तो इस सम्बन्धके लिये कोई अभ्यास न करनेपर भी यह निश्चय उसके भीतर अटल रहता है। स्मृतिमें तो स्मृति रहती ही है, विस्मृतिमें भी सम्बन्धकी स्मृतिका अभाव नहीं होता; क्योंकि सम्बन्धका निश्चय 'मैं'-पनमें है। इस प्रकार संसारमें माना हुआ सम्बन्ध भी जब स्मृति और विस्मृति दोनों अवस्थाओंमें अटल रहता है, तब भगवान्के साथ जो सदासे ही नित्य-सम्बन्ध है, उसकी विस्मृति कैसे हो सकती है? अतः 'मैं भगवान्का ही हूँ और भगवान् ही मेरे हैं'—इस प्रकार 'मैं'-पन (स्वयं-) के भगवान्में लग जानेसे मन-बुद्धि भी
स्वतः भगवान्में लग जाते हैं।
मन-बुद्धिमें अन्तःकरण-चतुष्टयका अन्तर्भाव है। मनके अन्तर्गत चित्तका और बुद्धिके अन्तर्गत अहंकारका अन्तर्भाव है। मन-बुद्धि भगवान्में लगनेसे अहंकारका आधार 'स्वयं' भगवान्में लग जायगा और परिणामस्वरूप 'मैं भगवान्का ही हूँ और भगवान् ही मेरे हैं' ऐसा भाव हो जायगा। इस भावमें निर्विकल्प स्थिति होनेसे 'मैं'-पन भगवान्में लीन हो जायगा।
विशेष बात
साधारणतया अपना स्वरूप-(‘मैं’-पनका आधार ‘स्वयम्’) मन, बुद्धि, शरीर आदिके साथ दीखता है, पर वास्तवमें इनके साथ है नहीं। सामान्य रूपसे प्रत्येक व्यक्ति यह अनुभव कर सकता है कि बचपनसे लेकर अबतक शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि सब-के-सब बदल गये, पर मैं वही हूँ। अतः 'मैं बदलनेवाला नहीं हूँ' इस बातको आजसे ही दृढ़तापूर्वक मान लेना चाहिये (साधारणतया मनुष्य बुद्धिसे ही समझनेकी चेष्टा करता है, पर यहाँ स्वयंसे जाननेकी बात है)।
विचार करें—एक ओर अपना स्वरूप नहीं बदला, यह सभीका प्रत्यक्ष अनुभव है और आस्तिकों एवं भगवान्में श्रद्धा रखनेवालोंके भगवान् भी कभी नहीं बदले, दूसरी ओर शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि आदि सब-के-सब बदल गये और संसार भी बदलता हुआ प्रत्यक्ष दीखता है। इससे सिद्ध हुआ कि कभी न बदलनेवाले ‘स्वयम्’ और ‘भगवान्’ दोनों एक जातिके हैं, जब कि निरन्तर बदलनेवाले ‘शरीर’ और ‘संसार’ दोनों एक जातिके हैं। न बदलनेवाले ‘स्वयम्’ और ‘भगवान्’ दोनों ही व्यक्तृपसे नहीं दीखते, जब कि बदलनेवाले शरीर और संसार—दोनों ही व्यक्तृपसे प्रत्यक्ष दीखते हैं। बदलनेवाले मन-बुद्धि इन्द्रियाँ-शरीरादिको पकड़कर ही ‘स्वयम्’ अपनेको बदलनेवाला मान लेता है। वास्तवमें ‘अहं’ का जो सत्तारूपसे आधार (‘स्वयम्’) है, वह कभी नहीं बदलता; क्योंकि वह परमात्माका अंशस्वरूप है।
वास्तवमें 'मैं क्या हूँ' इसका तो पता नहीं, पर 'मैं हूँ' इस होनेपनमें थोड़ा भी सन्देह नहीं है। जैसे संसार प्रत्यक्ष दीखता है, ऐसे ही 'मैं'-पनका भी भान होता है। इसलिये तत्त्वतः 'मैं' क्या है, इसकी खोज करना साधकके लिये बहुत उपयोगी है।
'मैं' क्या है, इसका तो पता नहीं; परन्तु संसार (शरीर)