श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १२ ]
क्या है, इसका तो पता है ही। संसार (शरीर) उत्पत्ति-विनाशवाला है, सदा एकरस रहनेवाला नहीं है—यह सबका अनुभव है। इस अनुभवको निरन्तर जाग्रत् रखना चाहिये। यह नियम है कि 'संसार' और 'मैं'—दोनोंमेंसे किसी एकका भी ठीक-ठीक ज्ञान होनेपर दूसरेके स्वरूपका ज्ञान अपने-आप हो जाता है।
'मैं' का प्रकाशक और आधार (अपना स्वरूप) चेतन और नित्य है। इसलिये उत्पत्ति-विनाशवाले जड़ संसारसे स्वरूपका कोई सम्बन्ध नहीं है। स्वरूपका तो भगवान्से स्वतःसिद्ध सम्बन्ध है। इस सम्बन्धको पहचानना ही 'मैं' की वास्तविकताका अनुभव करना है। इस सम्बन्धको पहचान लेनेपर मन-बुद्धि स्वतः भगवान्में लग जायेंगे*।
'निवसिष्यसि मध्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः'—यहाँ 'अत ऊर्ध्वम्'—'पदोंका भाव यह है कि जिस क्षण मन-बुद्धि भगवान्में पूरी तरह लग जायेंगे अर्थात् मन-बुद्धिमें किंचिमात्र भी अपनापन नहीं रहेगा, उसी क्षण भगवत्प्राप्ति हो जायगी। ऐसा नहीं है कि मन-बुद्धि पूर्णतया लगनेके बाद भगवत्प्राप्तिमें कालका कोई व्यवधान रह जाय।
भगवान् कहते हैं कि हे अर्जुन! मुझमें ही मन-बुद्धि लगानेपर तू मुझमें निवास करेगा, इसमें संशय नहीं है। इससे ऐसा मालूम देता है कि अर्जुनके हृदयमें कुछ संशय है, तभी भगवान् 'न संशयः' पद देते हैं। यदि संशयकी सम्भावना न होती, तो इस पदको देनेकी आवश्यकता ही नहीं पड़ती। वह संशय क्या है? मनुष्यके हृदयमें प्रायः यह बात बैठी हुई है कि कर्म अच्छे होंगे, आचरण अच्छे होंगे, एकात्ममें ध्यान लगायेंगे, तभी परमात्माकी प्राप्ति होगी, और यदि इस प्रकार साधन नहीं कर पाये, तो परमात्मप्राप्ति असम्भव है। इस भ्रमको दूर करनेके लिये भगवान् कहते हैं कि मेरी प्रापिका उद्देश्य रखकर मन-बुद्धिको मेरेमें लगाना जितना कीमती है, ये सब साधन मिलकर भी उतने कीमती नहीं हो सकते। अतः मन-बुद्धिको मेरेमें लगानेसे निश्चय ही मेरी प्राप्ति होगी, इसमें कोई संशय नहीं है—'मध्यर्पित-
मनोबुद्धिर्माभैवैव्यस्यसंशयम् ॥' (गीता ८।७)।
जबतक बुद्धिमें संसारका महत्त्व है और मनसे संसारका चिन्तन होता रहता है, तबतक (परमात्मामें स्वाभाविक स्थिति होते हुए भी) अपनी स्थिति संसारमें ही समझनी चाहिये। संसारमें स्थिति अर्थात् संसारका संग
रहनेसे ही संसारचक्रमें घूमना पड़ता है।
उपर्युक्त पदोंसे अर्जुनका संशय दूर करते हुए भगवान् कहते हैं कि तू यह चिन्ता मत कर कि मेरेमें मन-बुद्धि सर्वथा लग जानेपर तेरी स्थिति कहाँ होगी। जिस क्षण तेरे मन-बुद्धि एकमात्र मेरेमें सर्वथा लग जायेंगे, उसी क्षण तू मेरेमें ही निवास करेगा।
मन-बुद्धि भगवान्में लगानेके सिवाय साधकके लिये और कोई कर्तव्य नहीं है। मन भगवान्में लगानेसे संसारका चिन्तन नहीं होगा और बुद्धि भगवान्में लगानेसे साधक संसारके आश्रयसे रहित हो जायगा। संसारका किसी प्रकारका चिन्तन और आश्रय न रहनेसे भगवान्का ही चिन्तन और भगवान्का ही आश्रय होगा, जिससे भगवान्की ही प्राप्ति होगी।
यहाँ मनके साथ 'चित्त' को तथा बुद्धिके साथ 'अहम्' को भी ले लेना चाहिये; क्योंकि भगवान्में चित्त और अहम्को लगे बिना 'तू मेरेमें ही निवास करेगा' यह कहना सार्थक नहीं होगा।
सम्पूर्ण सृष्टिके एकमात्र ईश्वर-(परमात्मा-) का ही साक्षात् अंश यह जीवात्मा है। परन्तु यह इस सृष्टिके एक तुच्छ अंश (शरीर, इन्द्रियों, मन, बुद्धि आदि)-को अपना मानकर इनको अपनी ओर खींचता है (गीता—पन्द्रहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक) अर्थात् इनका स्वामी बन बैठता है। वह (जीवात्मा) इस बातको सर्वथा भूल जाता है कि ये मन-बुद्धि आदि भी तो उसी परमात्माकी समष्टि सृष्टिके ही अंश हैं। मैं उसी परमात्माका अंश हूँ और सर्वदा उसीमें स्थित हूँ, इसको भूलकर वह अपनी अलग सत्ता मानने लगता है। जैसे, एक करोड़पतिका मूर्ख पुत्र उससे अलग होकर अपनी विशाल कोठीके एक-दो कमरोंपर अपना अधिकार जमाकर अपनी उन्नति समझ लेता है, पर जब उसे अपनी भूल समझमें आ जाती है, तब उसे करोड़पतिका उत्तराधिकारी होनेमें कठिनाई नहीं होती। इसी लक्ष्यसे भगवान् कहते हैं कि जब तू इन व्यष्टि मन-बुद्धिको मेरे अर्पण कर देगा (जो स्वतः ही मेरे हैं; क्योंकि मैं ही समष्टि मन-बुद्धिका स्वामी हूँ) तो स्वयं इनसे मुक्त होकर (वास्तवमें पहलेसे ही मेरा अंश और मेरेमें ही स्थित होनेके कारण) निःसन्देह मेरेमें ही निवास करेगा।
- चेतन और अविनाशी स्वरूप-(आत्मा-) को ही 'स्वयं', 'अहम्' का आधार, वास्तविक 'मैं', 'मैं' का प्रकाशक, आधार आदि नामोंसे कहा जाता है।