श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंश्लोक १२ ]
- साधक-संजीवनी *
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रहनेसे निषिद्ध कर्म होते हैं। परन्तु 'मैं निषिद्ध कर्म नहीं करूँगा' इस निषेधात्मक निश्चयमें किसी योग्यता, सामर्थ्यकी अपेक्षा न रहनेके कारण साधकमें अभिमान नहीं आता। निषिद्ध कर्मोंके त्यागमें भी मूर्खतासे अभिमान आ सकता है। अभिमान आनेपर विचार करे कि जो नहीं करना चाहिये, वह नहीं किया तो इसमें विशेषता किस बातकी? फलकी कामना भी तभी होती है, जब कुछ किया जाता है। जब कुछ किया ही नहीं, केवल निषिद्ध कर्मका त्याग ही किया है,* तब फलकी कामना क्यों होगी? अतः करनेका अभिमान न रहनेसे फलासक्तिका त्याग स्वतः हो जाता है। फलासक्तिका त्याग होनेपर शान्ति स्वतः सिद्ध है।
साधन-सम्बन्धी विशेष बात
भगवान्ने नवें, दसवें और ग्यारहवें श्लोकमें क्रमशः जो तीन साधन (अभ्यासयोग, भगवदर्थ-कर्म और कर्मफल-त्याग) बताये हैं, विचारपूर्वक देखा जाय तो उनमेंसे (कर्मफलत्यागको छोड़कर) प्रत्येक साधनमें शेष दोनों साधन भी आ जाते हैं; जैसे—(१) अभ्यासयोगमें भगवान्ने लिये भजन, नाम-जप आदि क्रियाएँ करनेसे वह भगवदर्थ है ही और नाशवान् फलकी कामना न होनेसे उसमें कर्मफलत्याग भी है, (२) भगवदर्थ-कर्ममें भगवान्ने लिये कर्म होनेसे अभ्यासयोग भी है और नाशवान् फलकी कामना न होनेसे कर्मफलत्याग भी है।
वास्तवमें साधकको सबसे पहले अपने लक्ष्य, ध्येय अथवा उद्देश्यको दृढ़ करना चाहिये। इसके बाद उसे यह पहचानना चाहिये कि उसका सम्बन्ध वास्तवमें किसके साथ है। फिर चाहे कोई भी साधन करे—अभ्यास करे, भगवत्प्रतीत्यर्थ कर्म करे अथवा कर्मफलत्याग करे, वही साधन उसके लिये श्रेष्ठ हो जायगा। जब साधकका यह लक्ष्य हो जायगा कि उसे भगवान्को ही प्राप्त करना है और वह यह भी पहचान लेगा कि अनादिकालसे उसका भगवान्के साथ स्वतःसिद्ध सम्बन्ध है, तब कोई भी साधन उसके लिये छोटा नहीं रह जायगा। किसी साधनका छोटा या बड़ा होना लौकिक दृष्टिसे ही है। वास्तवमें मुख्यता उद्देश्यकी ही है। अतः साधकको चाहिये कि वह अपने उद्देश्यमें कभी किञ्चिन्मात्र भी शिथिलता न आने दे।
किसी साधनको सुगमता या कठिनता साधकको
'रुचि' और 'उद्देश्य' पर निर्भर करती है। रुचि और उद्देश्य एक भगवान्का होनेसे साधन सुगम होता है तथा रुचि संसारकी और उद्देश्य भगवान्का होनेसे साधन कठिन हो जाता है।
जैसे, भूख सबकी एक ही होती है और भोजन करनेपर तृप्तिका अनुभव भी सबको एक ही होता है, पर भोजनकी रुचि सबकी भिन्न-भिन्न होनेके कारण भोज्य-पदार्थ भी भिन्न-भिन्न होते हैं। इसी तरह साधकोंकी रुचि, विश्वास और योग्यताके अनुसार साधन भी भिन्न-भिन्न होते हैं, पर भगवान्की अप्राप्तिका दुःख तथा भगवत्प्राप्तिकी अभिलाषा (भूख) सभी साधकोंमें एक ही होती है। साधक चाहे किसी भी श्रेणीका क्यों न हो, साधनकी पूर्णताके बाद भगवत्प्राप्तिरूप आनन्दकी अनुभूति (तृप्ति) भी सबको एक-जैसी ही होती है।
इस प्रकरणमें अर्जुनको निमित्त बनाकर भगवान्ने मनुष्यमात्रके कल्याणके लिये चार साधन बताये हैं—(१) समर्पणयोग, (२) अभ्यासयोग, (३) भगवान्के लिये ही सम्पूर्ण कर्मोंका अनुष्ठान और (४) सर्वकर्मफल-त्याग। यद्यपि चारों साधनोंका फल भगवत्प्राप्ति ही है, तथापि साधकोंमें रुचि, श्रद्धा-विश्वास और योग्यताकी भिन्नताके कारण ही भिन्न-भिन्न साधनोंका वर्णन हुआ है। वास्तवमें चारों ही साधन समानरूपसे स्वतन्त्र और श्रेष्ठ हैं। इसलिये साधक जो भी साधन अपनाये, उसे उस साधनको सर्वोपरि मानना चाहिये।
अपने साधनको किसी भी तरह हीन (निम्नश्रेणीका) नहीं मानना चाहिये और साधनकी सफलता-(भगवत्प्राप्ति- ) के विषयमें कभी निराश भी नहीं होना चाहिये; क्योंकि कोई भी साधन निम्नश्रेणीका नहीं होता। अगर साधकका एकमात्र उद्देश्य भगवत्प्राप्ति हो, साधन उसकी रुचि, विश्वास तथा योग्यताके अनुसार हो, साधन पूरी सामर्थ्य और तत्परता-(लगन- ) से किया जाय और भगवत्प्राप्तिकी उत्कण्ठा भी तीव्र हो तो सभी साधन एक समान हैं। साधकको उद्देश्य, सामर्थ्य और तत्परताके विषयमें कभी हतोत्साह नहीं होना चाहिये। भगवान् साधकसे इतनी ही अपेक्षा रखते हैं कि वह अपनी पूरी सामर्थ्य और योग्यताको साधनमें लगा दे।
- निषिद्ध कर्म न करनेका निश्चय होनेपर दो अवस्थाएँ होती हैं—या तो विहित कर्मोंमें प्रवृत्ति होगी या सर्वथा निवृत्ति। विहित कर्मोंमें प्रवृत्तिसे अन्तःकरण निर्मल होता है और सर्वथा निवृत्ति होनेसे परमात्मामें स्थिति होती है। सर्वथा निवृत्तिका तात्पर्य वासनारहित अवस्थामें है, न कि अकर्मण्यता या आलस्यसे; क्योंकि आलस्य आदि भी निषिद्ध कर्म हैं।