श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
श्लोक १२ ]
- साधक-संजीवनी *
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रहनेसे निषिद्ध कर्म होते हैं। परन्तु 'मैं निषिद्ध कर्म नहीं करूँगा' इस निषेधात्मक निश्चयमें किसी योग्यता, सामर्थ्यकी अपेक्षा न रहनेके कारण साधकमें अभिमान नहीं आता। निषिद्ध कर्मोंके त्यागमें भी मूर्खतासे अभिमान आ सकता है। अभिमान आनेपर विचार करे कि जो नहीं करना चाहिये, वह नहीं किया तो इसमें विशेषता किस बातकी? फलकी कामना भी तभी होती है, जब कुछ किया जाता है। जब कुछ किया ही नहीं, केवल निषिद्ध कर्मका त्याग ही किया है,* तब फलकी कामना क्यों होगी? अतः करनेका अभिमान न रहनेसे फलासक्तिका त्याग स्वतः हो जाता है। फलासक्तिका त्याग होनेपर शान्ति स्वतः सिद्ध है।
साधन-सम्बन्धी विशेष बात
भगवान्ने नवें, दसवें और ग्यारहवें श्लोकमें क्रमशः जो तीन साधन (अभ्यासयोग, भगवदर्थ-कर्म और कर्मफल-त्याग) बताये हैं, विचारपूर्वक देखा जाय तो उनमेंसे (कर्मफलत्यागको छोड़कर) प्रत्येक साधनमें शेष दोनों साधन भी आ जाते हैं; जैसे—(१) अभ्यासयोगमें भगवान्ने लिये भजन, नाम-जप आदि क्रियाएँ करनेसे वह भगवदर्थ है ही और नाशवान् फलकी कामना न होनेसे उसमें कर्मफलत्याग भी है, (२) भगवदर्थ-कर्ममें भगवान्ने लिये कर्म होनेसे अभ्यासयोग भी है और नाशवान् फलकी कामना न होनेसे कर्मफलत्याग भी है।
वास्तवमें साधकको सबसे पहले अपने लक्ष्य, ध्येय अथवा उद्देश्यको दृढ़ करना चाहिये। इसके बाद उसे यह पहचानना चाहिये कि उसका सम्बन्ध वास्तवमें किसके साथ है। फिर चाहे कोई भी साधन करे—अभ्यास करे, भगवत्प्रतीत्यर्थ कर्म करे अथवा कर्मफलत्याग करे, वही साधन उसके लिये श्रेष्ठ हो जायगा। जब साधकका यह लक्ष्य हो जायगा कि उसे भगवान्को ही प्राप्त करना है और वह यह भी पहचान लेगा कि अनादिकालसे उसका भगवान्के साथ स्वतःसिद्ध सम्बन्ध है, तब कोई भी साधन उसके लिये छोटा नहीं रह जायगा। किसी साधनका छोटा या बड़ा होना लौकिक दृष्टिसे ही है। वास्तवमें मुख्यता उद्देश्यकी ही है। अतः साधकको चाहिये कि वह अपने उद्देश्यमें कभी किञ्चिन्मात्र भी शिथिलता न आने दे।
किसी साधनको सुगमता या कठिनता साधकको
'रुचि' और 'उद्देश्य' पर निर्भर करती है। रुचि और उद्देश्य एक भगवान्का होनेसे साधन सुगम होता है तथा रुचि संसारकी और उद्देश्य भगवान्का होनेसे साधन कठिन हो जाता है।
जैसे, भूख सबकी एक ही होती है और भोजन करनेपर तृप्तिका अनुभव भी सबको एक ही होता है, पर भोजनकी रुचि सबकी भिन्न-भिन्न होनेके कारण भोज्य-पदार्थ भी भिन्न-भिन्न होते हैं। इसी तरह साधकोंकी रुचि, विश्वास और योग्यताके अनुसार साधन भी भिन्न-भिन्न होते हैं, पर भगवान्की अप्राप्तिका दुःख तथा भगवत्प्राप्तिकी अभिलाषा (भूख) सभी साधकोंमें एक ही होती है। साधक चाहे किसी भी श्रेणीका क्यों न हो, साधनकी पूर्णताके बाद भगवत्प्राप्तिरूप आनन्दकी अनुभूति (तृप्ति) भी सबको एक-जैसी ही होती है।
इस प्रकरणमें अर्जुनको निमित्त बनाकर भगवान्ने मनुष्यमात्रके कल्याणके लिये चार साधन बताये हैं—(१) समर्पणयोग, (२) अभ्यासयोग, (३) भगवान्के लिये ही सम्पूर्ण कर्मोंका अनुष्ठान और (४) सर्वकर्मफल-त्याग। यद्यपि चारों साधनोंका फल भगवत्प्राप्ति ही है, तथापि साधकोंमें रुचि, श्रद्धा-विश्वास और योग्यताकी भिन्नताके कारण ही भिन्न-भिन्न साधनोंका वर्णन हुआ है। वास्तवमें चारों ही साधन समानरूपसे स्वतन्त्र और श्रेष्ठ हैं। इसलिये साधक जो भी साधन अपनाये, उसे उस साधनको सर्वोपरि मानना चाहिये।
अपने साधनको किसी भी तरह हीन (निम्नश्रेणीका) नहीं मानना चाहिये और साधनकी सफलता-(भगवत्प्राप्ति- ) के विषयमें कभी निराश भी नहीं होना चाहिये; क्योंकि कोई भी साधन निम्नश्रेणीका नहीं होता। अगर साधकका एकमात्र उद्देश्य भगवत्प्राप्ति हो, साधन उसकी रुचि, विश्वास तथा योग्यताके अनुसार हो, साधन पूरी सामर्थ्य और तत्परता-(लगन- ) से किया जाय और भगवत्प्राप्तिकी उत्कण्ठा भी तीव्र हो तो सभी साधन एक समान हैं। साधकको उद्देश्य, सामर्थ्य और तत्परताके विषयमें कभी हतोत्साह नहीं होना चाहिये। भगवान् साधकसे इतनी ही अपेक्षा रखते हैं कि वह अपनी पूरी सामर्थ्य और योग्यताको साधनमें लगा दे।
- निषिद्ध कर्म न करनेका निश्चय होनेपर दो अवस्थाएँ होती हैं—या तो विहित कर्मोंमें प्रवृत्ति होगी या सर्वथा निवृत्ति। विहित कर्मोंमें प्रवृत्तिसे अन्तःकरण निर्मल होता है और सर्वथा निवृत्ति होनेसे परमात्मामें स्थिति होती है। सर्वथा निवृत्तिका तात्पर्य वासनारहित अवस्थामें है, न कि अकर्मण्यता या आलस्यसे; क्योंकि आलस्य आदि भी निषिद्ध कर्म हैं।
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १२ ]
साधक चाहे भगवत्त्वको ठीक-ठीक न जाने, पर सर्वज्ञ भगवान् तो उसके उद्देश्य, भाव, सामर्थ्य, तत्परता आदिको अच्छी तरह जानते ही हैं। यदि साधक अपने उद्देश्य, भाव, चेष्टा, तत्परता, उत्कण्ठा आदिमें किसी प्रकारकी कमी न आने दे तो भगवान् स्वयं उसे अपनी प्राप्ति करा देते हैं। वास्तवमें अपने उद्योग, बल, ज्ञान आदिकी कीमतसे भगवान्की प्राप्ति हो ही नहीं सकती। अगर भगवान्के दिये हुए बल, ज्ञान आदिको भगवान्की प्राप्तिके लिये ही लगा दिया जाय तो वे साधकको कृपापूर्वक अपनी प्राप्ति करा देते हैं।
संसारमें भगवत्प्राप्ति ही सबसे सुगम है और इसके सभी अधिकारी हैं; क्योंकि इसीके लिये मनुष्यशरीर मिला है। सब प्राणियोंके कर्म भिन्न-भिन्न होनेके कारण किन्हीं दो व्यक्तियोंको भी संसारके पदार्थ एक समान नहीं मिल सकते, जब कि (भगवान् एक होनेसे) भगवत्प्राप्ति सबको एक समान ही होती है; क्योंकि भगवत्प्राप्ति कर्मजन्य
नहीं है।
भगवान्की प्राप्तिमें संसारसे वैराग्य और भगवत्प्राप्तिकी उत्कण्ठा—ये दो बातें ही मुख्य हैं। इन दोनोंमेंसे किसी भी एक साधनके तीव्र होनेपर भगवत्प्राप्ति हो जाती है। फिर भी भगवत्प्राप्तिकी उत्कण्ठामें विशेष शक्ति है।
ऊपर जो चार साधन बताये गये हैं, उनमेंसे प्रथम तीन साधन तो मुख्यतः भगवत्प्राप्तिकी उत्कण्ठा जाग्रत् करनेवाले हैं, और चौथा साधन (कर्मफलत्याग) मुख्यतः संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेवाला है।
साधन कोई भी हो; जब सांसारिक भोग दुःखदायी प्रतीत होने लगेंगे तथा भोगोंका हृदयसे त्याग होगा, तब (लक्ष्य भगवान् होनेसे) भगवान्की ओर स्वतः प्रगति होगी और भगवान्की कृपासे ही उनकी प्राप्ति हो जायगी।
इसी तरह जब भगवान् परमप्रिय लगने लगेंगे, उनके बिना रहा नहीं जायगा, उनके वियोगमें व्याकुलता होने लगेगी, तब शीघ्र ही भगवान्की प्राप्ति हो जायगी।
परिशिष्ट भाव —अभ्यास, शास्त्रज्ञान और ध्यान—ये तीनों तो करणसापेक्ष हैं, पर कर्मफलत्याग करणनिरपेक्ष है। कर्मफलत्यागको श्रेष्ठ बतानेका कारण यह है कि लोगोंकी इस साधनमें निकृष्टबुद्धि है। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि कर्मफलत्याग पहलेके तीनों साधनोंसे श्रेष्ठ है। वास्तवमें ये चारों ही साधन श्रेष्ठ हैं और उन साधकोंके लिये हैं, जिनका उद्देश्य त्यागका है।
इस श्लोकमें आये चार साधनोंके अन्तर्गत दसवें श्लोकमें आये 'मर्दर्थमपि कर्माणि' (भगवान्के लिये कर्म करना) को नहीं लिया गया है। इसका कारण यह है कि 'मर्दर्थमपि कर्माणि' अर्थात् भक्तिमें ही साधनकी पूर्णता हो जाती है। अतः भक्ति और त्याग—दोनों ही साधन श्रेष्ठ हैं।
कर्मफलत्यागसे कर्मफलकी इच्छाका त्याग समझना चाहिये। इच्छा भीतर होती है और फलत्याग बाहर होता है। फलत्याग करनेपर भी भीतरमें उसकी इच्छा रह सकती है। अतः साधकका उद्देश्य कर्मफलकी इच्छाके त्यागका रहना चाहिये। इच्छाका त्याग होनेपर जन्म-मरणका कारण ही नहीं रहता। मुक्ति वस्तुके त्यागसे नहीं होती, प्रत्युत इच्छाके त्यागसे होती है।
सम्बन्ध—भगवान्ने निर्गुण-निराकार ब्रह्म और सगुण-साकार भगवान्की उपासना करनेवाले उपासकोंमें सगुण-उपासकोंको श्रेष्ठ बताकर अर्जुनको सगुण-उपासना करनेकी आज्ञा दी। सगुण-उपासनाके अन्तर्गत भगवान्ने आठवेंसे ग्यारहवें श्लोकतक अपनी प्राप्तिके चार साधन बताये। अब तेरहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक भगवान् पाँच प्रकरणोंमें चारों साधनोंसे सिद्धावस्थाको प्राप्त हुए अपने प्रिय भक्तोंके लक्षणोंका वर्णन करते हैं। पहला प्रकरण तेरहवें और चौदहवें दो श्लोकोंका है, जिसमें सिद्ध भक्तके बारह लक्षण बताये गये हैं।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥ १३ ॥ सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः। मध्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ १४ ॥
श्लोक १३-१४ ]
- साधक-संजीवनी *
८३७
सर्वभूतानाम् = सब प्राणियोंमें अद्रेष्टा = द्वेषभावसे रहित च = और मैत्रः = मित्रभाववाला (तथा) करुणः = दयालु एव = भी (और) निर्ममः = ममत्तरहित, निरहङ्कारः = अहंकाररहित,
समदुःखसुखः = सुख-दुःखकी प्राप्तिमें सम, क्षमी = क्षमाशील, सततम् = निरन्तर सन्तुष्टः = सन्तुष्ट, योगी = योगी, यतात्मा = शरीरको वशमें किये हुए, दूढनिश्चयः = दूढ निश्चयवाला,
मयि = मुझमें अर्पित- मनोबुद्धिः = अर्पित मन-बुद्धिवाला यः = जो मद्वक्तः = मेरा भक्त है, सः = वह मे = मुझे प्रियः = प्रिय है।
व्याख्या —‘अद्रेष्टा सर्वभूतानाम्’—अनिष्ट करने-वालोंके दो भेद हैं—(१) इष्टकी प्राप्तिमें अर्थात् धन, मान-बड़ाई, आदर-सत्कार आदिकी प्राप्तिमें बाधा पैदा करनेवाले और (२) अनिष्ट पदार्थ, क्रिया, व्यक्ति, घटना आदिसे संयोग करनेवाले। भक्तके शरीर, मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ और सिद्धान्तके प्रतिकूल चाहे कोई कितना ही, किसी प्रकारका व्यवहार करे—इष्टकी प्राप्तिमें बाधा डाले, किसी प्रकारकी आर्थिक और शारीरिक हानि पहुँचाये, पर भक्तके हृदयमें उसके प्रति कभी किंचिन्मात्र भी द्वेष नहीं होता। कारण कि वह प्राणिमात्रमें अपने प्रभुको ही व्याप्त देखता है, ऐसी स्थितिमें वह विरोध करे तो किससे करे— निज प्रभुमय देखहि जगत केहि सन करहि विरोध ॥ (मानस ७।११२ ख)
इतना ही नहीं; वह तो अनिष्ट करनेवालोंकी सब क्रियाओंको भी भगवान्का कृपापूर्ण मंगलमय विधान ही मानता है!
प्राणिमात्र स्वरूपसे भगवान्का ही अंश है। अतः किसी भी प्राणीके प्रति थोड़ा भी द्वेषभाव रहना भगवान्के प्रति ही द्वेष है। इसलिये किसी प्राणीके प्रति द्वेष रहते हुए भगवान्से अभिन्नता तथा अनन्यप्रेम नहीं हो सकता। प्राणिमात्रके प्रति द्वेषभावसे रहित होनेपर ही भगवान्में पूर्ण प्रेम हो सकता है। इसलिये भक्तमें प्राणिमात्रके प्रति द्वेषका सर्वथा अभाव होता है।
‘मैत्रः करुण एव च’* —भक्तके अन्तःकरणमें प्राणिमात्रके प्रति केवल द्वेषका अत्यन्त अभाव ही नहीं होता, प्रत्युत सम्पूर्ण प्राणियोंमें भगवद्भाव होनेके नाते उसका सबसे मैत्री और दयाका व्यवहार भी होता है।
भगवान् प्राणिमात्रके सुहृद् हैं—‘सुहृदं सर्वभूतानाम्’ (गीता ५।२९)। भगवान्का स्वभाव भक्तमें अवतरित होनेके कारण भक्त भी सम्पूर्ण प्राणियोंका सुहृद् होता है— ‘सुहृदः सर्वदेहिनाम्’ (श्रीमद्भागवत ३।२५।२१)। इसलिये भक्तका भी सभी प्राणियोंके प्रति बिना किसी स्वार्थके स्वाभाविक ही मैत्री और दयाका भाव रहता है—
हेतु रहित जग जुग उपकारी। तुम्ह तुम्हार सेवक अमुरारी।
(मानस ७।४७।३)
अपना अनिष्ट करनेवालोंके प्रति भी भक्तके द्वारा मित्रताका व्यवहार होता है; क्योंकि उसका भाव यह रहता है कि अनिष्ट करनेवालेने अनिष्टरूपमें भगवान्का विधान ही प्रस्तुत किया है। अतः उसने जो कुछ किया है, मेरे लिये ठीक ही किया है। कारण कि भगवान्का विधान सदैव मंगलमय होता है। इतना ही नहीं, भक्त यह मानता है कि मेरा अनिष्ट करनेवाला (अनिष्टमें निमित्त बनकर) मेरे पूर्वकृत पापकर्मोंका नाश कर रहा है; अतः वह विशेषरूपसे आदरका पात्र है।
साधकमात्रके मनमें यह भाव रहता है और रहना ही चाहिये कि उसका अनिष्ट करनेवाला उसके पिछले पापोंका फल भुगताकर उसे शुद्ध कर रहा है। जब सामान्य साधकमें भी अनिष्ट करनेवालेके प्रति मैत्री और करुणाका भाव रहता है, फिर सिद्ध भक्तका तो कहना ही क्या है? सिद्ध भक्तका तो उसके प्रति ही क्या, प्राणिमात्रके प्रति मैत्री और दयाका विलक्षण भाव रहता है।
पातंजलयोगदर्शनमें चित्त-शुद्धिके चार हेतु बताये गये हैं—
- यहाँ भक्तके जो लक्षण बताये गये हैं, वे ज्ञानी (गुणातीत) पुरुषोंके (गीता—चौदहवें अध्यायके बाईसवेंसे पचीसवें श्लोकतक वर्णित) लक्षणोंकी अपेक्षा भी अधिक एवं विलक्षण हैं। ‘मैत्रः’ और ‘करुणः’ पद भी यहाँ—भक्तके लक्षणोंमें ही आये हैं।
८३८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १२ ]
‘मैत्रीकरणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्य-विषयाणां भावनातिश्चितप्रसादनम्।’ (१।३३)
‘सुखियोंके प्रति मैत्री, दुःखियोंके प्रति करुणा, पुण्यात्माओंके प्रति मुदिता (प्रसन्नता) और पापात्माओंके प्रति उपेक्षाके भावसे चित्तमें निर्मलता आती है।’
परन्तु भगवान्ने इन चारों हेतुओंको दोमें विभक्त कर दिया है—‘मैत्रः च करुणः।’ तात्पर्य यह है कि सिद्ध भक्तका सुखियों और पुण्यात्माओंके प्रति ‘मैत्री’ का भाव तथा दुःखियों और पापात्माओंके प्रति ‘करुणा’ का भाव रहता है।
दुःख पानेवालेकी अपेक्षा दुःख देनेवालेपर (उपेक्षाका भाव न होकर) दया होनी चाहिये; क्योंकि दुःख पानेवाला तो (पुराने पापोंका फल भोगकर) पापोंसे छूट रहा है, पर दुःख देनेवाला नया पाप कर रहा है। अतः दुःख देनेवाला दयाका विशेष पात्र है।
‘निर्ममः’—यद्यपि भक्तका प्राणिमात्रके प्रति स्वाभाविक ही मैत्री और करुणाका भाव रहता है, तथापि उसकी किसीके प्रति किंचिन्मात्र भी ममता नहीं होती। प्राणियों और पदार्थोंमें ममता (मेरेपनका भाव) ही मनुष्यको संसारमें बाँधनेवाली होती है। भक्त इस ममतासे सर्वथा रहित होता है। उसकी अपने कहलानेवाले शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धिमें भी बिलकुल ममता नहीं होती। साधकसे भूल यह होती है कि वह प्राणियों और पदार्थोंसे तो ममताको हटानेकी चेष्टा करता है, पर अपने शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियोंसे ममता हटानेकी ओर विशेष ध्यान नहीं देता। इसीलिये वह सर्वथा निर्मम नहीं हो पाता।
‘निरहंकारः’—शरीर, इन्द्रियाँ आदि जड-पदार्थोंको अपना स्वरूप माननेसे अहंकार उत्पन्न होता है।
भक्तकी अपने शरीरादिके प्रति किंचिन्मात्र भी अहंबुद्धि न होनेके कारण तथा केवल भगवान्ने अपने नित्य सम्बन्धका अनुभव हो जानेके कारण उसके अन्तःकरणमें स्वतः श्रेष्ठ, दिव्य, अलौकिक गुण प्रकट होने लगते हैं। इन गुणोंको भी वह अपने गुण नहीं मानता, प्रत्युत (दैवी सम्पत्ति होनेसे) भगवान्के ही मानता है। ‘सत्’-(परमात्मा-)के होनेके कारण ही ये गुण ‘सद्गुण’
कहलाते हैं। ऐसी दशामें भक्त उनको अपना मान ही कैसे सकता है! इसलिये वह अहंकारसे सर्वथा रहित होता है।
‘समदुःखसुखः’—भक्त सुख-दुःखोंकी प्राप्तिमें सम रहता है अर्थात् अनुकूलता-प्रतिकूलता उसके हृदयमें राग-द्वेष, हर्ष-शोक आदि विकार पैदा नहीं कर सकते।
गीतामें ‘सुख-दुःख’ पद अनुकूलता-प्रतिकूलताकी परिस्थिति-(जो सुख-दुःख उत्पन्न करनेमें हेतु है) के लिये तथा अन्तःकरणमें होनेवाले हर्ष-शोकादि विकारोंके लिये भी आया है।
अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थिति मनुष्यको सुखी-दुःखी बनाकर ही उसे बाँधती है। इसलिये सुख-दुःखमें सम होनेका अर्थ है—अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति आनेपर अपनेमें हर्ष-शोकादि विकारोंका न होना।
भक्तके शरीर, इन्द्रियाँ, मन, सिद्धान्त आदिके अनुकूल या प्रतिकूल प्राणी, पदार्थ, परिस्थिति, घटना आदिका संयोग या वियोग होनेपर उसे अनुकूलता और प्रतिकूलताका ‘ज्ञान’ तो होता है, पर उसके अन्तःकरणमें हर्ष-शोकादि कोई ‘विकार’ उत्पन्न नहीं होता। यहाँ यह बात समझ लेनी चाहिये कि किसी परिस्थितिका ज्ञान होना अपने-आपमें कोई दोष नहीं है, प्रत्युत उससे अन्तःकरणमें विकार उत्पन्न होना ही दोष है। भक्त राग-द्वेष, हर्ष-शोक आदि विकारोंसे सर्वथा रहित होता है। जैसे, प्रारब्धानुसार भक्तके शरीरमें कोई रोग होनेपर उसे शारीरिक पीड़ाका ज्ञान (अनुभव) तो होगा; किन्तु उसके अन्तःकरणमें किसी प्रकारका विकार नहीं होगा।
‘क्षमी’—अपना किसी तरहका भी अपराध करनेवालेको किसी भी प्रकारका दण्ड देनेकी इच्छा न रखकर उसे क्षमा कर देनेवालेको ‘क्षमी’ कहते हैं।
भक्तके लक्षणोंमें पहले ‘अद्वेष्टा’ पद देकर भगवान्ने भक्तमें अपना अपराध करनेवालेके प्रति द्वेषका अभाव बताया, अब यहाँ ‘क्षमी’ पदसे यह बताते हैं कि भक्तमें अपना अपराध करनेवालेके प्रति ऐसा भाव रहता है कि उसको भगवान् अथवा अन्य किसीके द्वारा भी दण्ड न मिले। ऐसा क्षमाभाव भक्तकी एक विशेषता है।
‘सन्तुष्टः सततम्’*—जीवको मनके अनुकूल प्राणी,
- ऐसे संतोषीके लिये भागवतकार कहते हैं—
सदा संतुष्टमनसः सर्वाः सुखमया दिशः। शर्कराकण्टकादिभ्यो यथोपान्तपदः शिवम्॥
(श्रीमद्भगवत ७।१५।१७)
‘जैसे पैरोंमें जूते पहनकर चलनेवालेको कंकड़ और काँटोंसे कोई भय नहीं होता, ऐसे ही जिसके मनमें संतोष है, उसके लिये सर्वदा सब जगह सुख-ही-सुख है, दुःख है ही नहीं।’
श्लोक १३-१४ ]
- साधक-संजीवनी *
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पदार्थ, घटना, परिस्थिति आदिके संयोगमें और मनके प्रतिकूल प्राणी, पदार्थ, घटना, परिस्थिति आदिके वियोगमें एक संतोष होता है। विजातीय और अनित्य पदार्थसे होनेके कारण यह संतोष स्थायी नहीं रह पाता। स्वयं नित्य होनेके कारण जीवको नित्य परमात्माकी अनुभूतिसे ही वास्तविक और स्थायी संतोष होता है।
भगवान्को प्राप्त होनेपर भक्त नित्य-निरन्तर संतुष्ट रहता है; क्योंकि न तो उसका भगवान्से कभी वियोग होता है और न उसको नाशवान् संसारकी कोई आवश्यकता ही रहती है। अतः उसके असंतोषका कोई कारण ही नहीं रहता। इस संतुष्टिके कारण वह संसारके किसी भी प्राणी-पदार्थके प्रति किंचिन्मात्र भी महत्त्वबुद्धि नहीं रखता*।
‘सन्तुष्टः’ के साथ ‘सततम्’ पद देकर भगवान्ने भक्तके उस नित्य-निरन्तर रहनेवाले संतोषकी ओर ही लक्ष्य कराया है, जिसमें न तो कभी कोई अन्तर पड़ता है और न कभी अन्तर पड़नेकी सम्भावना ही रहती है। कर्मयोग, ज्ञानयोग या भक्तियोग—किसी भी योगमार्गसे सिद्धि प्राप्त करनेवाले महापुरुषमें ऐसी संतुष्टि (जो वास्तवमें है) निरन्तर रहती है।
‘योगी’—भक्तियोगके द्वारा परमात्माको प्राप्त (नित्य-निरन्तर परमात्मासे संयुक्त) पुरुषका नाम यहाँ ‘योगी’ है।
वास्तवमें किसी भी मनुष्यका परमात्मासे कभी वियोग हुआ नहीं, है नहीं, हो सकता नहीं और सम्भव ही नहीं। इस वास्तविकताका जिसने अनुभव कर लिया है, वही ‘योगी’ है।
‘यतात्मा’—जिसका मन-बुद्धि-इन्द्रियोंसहित शरीरपर पूर्ण अधिकार है, वह ‘यतात्मा’ है। सिद्ध भक्तको मन-बुद्धि आदि वशमें करने नहीं पड़ते, प्रत्युत ये स्वाभाविक ही उसके वशमें रहते हैं। इसलिये उसमें किसी प्रकारके इन्द्रियजन्य दुर्गुण-दुराचारके आनेकी सम्भावना ही नहीं रहती।
वास्तवमें मन-बुद्धि-इन्द्रियाँ स्वाभाविकरूपसे सन्मार्गपर चलनेके लिये ही हैं; किन्तु संसारसे रागयुक्त सम्बन्ध रहनेसे ये मार्गच्युत हो जाती हैं। भक्तका संसारसे किंचिन्मात्र भी रागयुक्त सम्बन्ध नहीं होता, इसलिये उसकी मन-बुद्धि-इन्द्रियाँ सर्वथा उसके वशमें होती हैं। अतः उसकी प्रत्येक क्रिया दूसरोंके लिये आदर्श होती है।
- सत कबीरदासजी कहते हैं—
गोधन गजधन बाजिधन, और रतन धन खान। जब आवै संतोष धन, सब धन धुरि समान॥
ऐसा देखा जाता है कि न्याय-पथपर चलनेवाले सत्पुरुषोंकी इन्द्रियाँ भी कभी कुमार्गगामी नहीं होतीं। जैसे, राजा दुष्यन्तकी वृत्ति शकुन्तलाकी ओर जानेपर उन्हें दृढ़ विश्वास हो जाता है कि यह क्षत्रिय-कन्या ही है, ब्राह्मण कन्या नहीं। कवि कालिदासके कथनानुसार जहाँ सन्देह हो, वहाँ सत्पुरुषके अन्तःकरणकी प्रवृत्ति ही प्रमाण होती है— सतां हि संदेहपदेशु वस्तुषु प्रमाणमन्तःकरणप्रवृत्तयः ॥
(अभिज्ञानशाकुन्तलम् १।२१)
जब न्यायशील सत्पुरुषकी इन्द्रियोंकी प्रवृत्ति भी स्वतः कुमार्गकी ओर नहीं होती, तब सिद्ध भक्त (जो न्यायधर्मसे कभी किसी अवस्थामें च्युत नहीं होता—) की मन-बुद्धि-इन्द्रियाँ कुमार्गकी ओर जा ही कैसे सकती हैं!
‘दृढनिश्चयः’—सिद्ध महापुरुषकी दृष्टिमें संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका सर्वथा अभाव रहता है। उसकी बुद्धिमें एक परमात्माकी ही अटल सत्ता रहती है। अतः उसकी बुद्धिमें विपर्यय-दोष (प्रतिक्षण बदलनेवाले संसारका स्थायी दीखना) नहीं रहता। उसको एक भगवान्के साथ ही अपने नित्यसिद्ध सम्बन्धका अनुभव होता रहता है। अतः उसका भगवान्में ही दृढ़ निश्चय होता है। उसका यह निश्चय बुद्धिमें नहीं, प्रत्युत ‘स्वयं’ में होता है, जिसका आभास बुद्धिमें प्रतीत होता है।
संसारकी स्वतन्त्र सत्ता माननेसे अथवा संसारसे अपना सम्बन्ध माननेसे ही बुद्धिमें विपर्यय और संशयरूप दोष उत्पन्न होते हैं। विपर्यय और संशययुक्त बुद्धि कभी स्थिर नहीं होती। ज्ञानी और अज्ञानी पुरुषकी बुद्धिके निश्चयमें ही अन्तर होता है; स्वरूपसे तो दोनों समान ही होते हैं। अज्ञानीकी बुद्धिमें संसारकी सत्ता और उसका महत्त्व रहता है; परन्तु सिद्ध भक्तकी बुद्धिमें एक भगवान्के सिवाय न तो संसारकी किसी वस्तुकी स्वतन्त्र सत्ता रहती है और न उसका कोई महत्त्व ही रहता है। अतः उसकी बुद्धि विपर्यय और संशयदोषसे सर्वथा रहित होती है और उसका केवल परमात्मामें ही दृढ़ निश्चय होता है।
‘मध्यर्पितमनोबुद्धिः’—जब साधक एकमात्र भगवत्प्राप्तिको ही अपना उद्देश्य बना लेता है और स्वयं भगवान्का ही हो जाता है (जो कि वास्तवमें है) तब उसके मन-बुद्धि भी अपने-आप भगवान्में लग जाते हैं। फिर
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १२ ]
सिद्ध भक्तके मन-बुद्धि भगवान्के अपित रहें—इसमें तो कहना ही क्या है!
जहाँ प्रेम होता है, वहाँ स्वाभाविक ही मनुष्यका मन लगता है और जिसे मनुष्य सिद्धान्तसे श्रेष्ठ समझता है, उसमें स्वाभाविक ही उसकी बुद्धि लगती है। भक्तके लिये भगवान्से बढ़कर कोई प्रिय और श्रेष्ठ होता ही नहीं। भक्त तो मन-बुद्धिपर अपना अधिकार ही नहीं मानता। वह तो
परिशिष्ट भाव —गीतामें कर्मयोगीके लक्षण भी आये हैं (दूसरे अध्यायके पचपनवेंसे बहत्तरवें श्लोकतक और छठे अध्यायके सातवेंसे नवें श्लोकतक), ज्ञानयोगीके लक्षण भी आये हैं (चौदहवें अध्यायके बाईसवेंसे पचीसवें श्लोकतक) और भक्तके लक्षण भी आये हैं (बारहवें अध्यायके तेरहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक)। परन्तु केवल भक्तके लक्षणोंमें ही भगवान्ने कहा है—‘अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ’। यह लक्षण (मित्रता और करुणा) न कर्मयोगीके लक्षणोंमें आया है, न ज्ञानयोगीके लक्षणोंमें, प्रत्युत केवल भक्तके लक्षणोंमें आया है। कर्मयोगी और ज्ञानयोगीमें समता तो होती है, पर मित्रता और करुणा नहीं होती। परन्तु भक्तमें आरम्भसे ही मित्रता और करुणा होती है।
भक्तकी दृष्टिमें सम्पूर्ण प्राणी समग्र भगवान्का अंग होनेसे अपने प्रभु ही हैं, फिर कौन वैर करे, किससे करे और क्यों करे?—‘निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं विरोध ’ (मानस, उत्तर० ११२ ख)। उदाहरणके लिये, किसीको राम प्रिय हैं, किसीको कृष्ण प्रिय हैं, किसीको शंकर प्रिय हैं तो इष्ट अलग-अलग होनेपर भी वे सब भक्त परस्पर एक हो सकते हैं, पर सब ज्ञानयोगी परस्पर एक नहीं हो सकते। अगर भक्त और ज्ञानयोगी परस्पर मिलें तो भक्त ज्ञानयोगीका जितना आदर करेगा, उतना ज्ञानयोगी भक्तका नहीं कर सकेगा। इसलिये भक्तोंका लक्षण बताया है—‘सबहि मानप्रद आपु अमानी ’ (मानस, उत्तर० ३८।२)।
श्रीरामचरितमानसके आरम्भमें गोस्वामी तुलसीदासजी महाराज सज्जनोंके साथ-साथ दुष्टोंकी भी वन्दना करते हैं और सच्चे भावसे करते हैं—‘बहुति बंदि खल गन सतिभार् ’ (मानस, बाल० ४।१)। ऐसा भक्त ही कर सकता है, ज्ञानयोगी नहीं! यद्यपि ज्ञानयोगीका किसीसे कभी किंचिन्मात्र भी वैर नहीं होता, तथापि उसमें स्वाभाविक उदासीनता, तटस्थता रहती है। विवेकमार्ग-(ज्ञान-में) वैराग्यकी मुख्यता रहती है और वैराग्य रूखा होता है। इसलिये ज्ञानयोगीमें भीतरसे कठोरता न होनेपर भी वैराग्य, उदासीनताके कारण बाहरसे कठोरता प्रतीत होती है।
सुख लेनेमें कठोरता रहती है और सुख देनेमें कोमलता रहती है। ज्ञानयोगी मोक्षका भी सुख लेता है, तो उसमें कठोरता रहती है। परन्तु दूसरेको सुख देनेका भाव होनेसे भक्तमें आरम्भसे ही कोमलता रहती है। भक्तके मनमें वैरीसे भी द्वेष नहीं होता। ज्ञानयोगी पिताकी तरह होता है और भक्त माँकी तरह, इसलिये भक्तमें करुणा ज्यादा होती है।
‘एव ’ पद देनेका तात्पर्य है कि भक्त द्वेषभावसे रहित होता है—इतनी ही बात नहीं है, वह मित्रभाववाला और दयालु भी होता है।
‘निर्ममो निरहंकारः ’—प्रत्येक साधकके लिये निर्मम और निरहंकार होना बहुत आवश्यक है, इसलिये गीतामें भगवान्ने कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—तीनों ही योगमार्गोंमें निर्मम और निरहंकार होनेकी बात कही है—कर्मयोगमें ‘निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति ’ (२।७१), ज्ञानयोगमें ‘अहंकारं ..... विमुच्य निर्ममः
- भगवान् श्रीराम कहते हैं—
अखिल बिस्व यह मोर उपाया। सब पर मोहि बराबरी दाय॥
तिन्ह महीं जो परिहरी मद माया। भजै मोहि मन बच अरु काया॥
पुरुष नपुंसक नारि वा जीव चराचर कोइ।
सर्व भाव भज कपट तजि मोहि परम प्रिय सोइ॥
(मानस, उत्तर० ८७।४, ८७ क)
श्लोक १५ ]
- साधक-संजीवनी *
८४९
शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते' (१८।५३) और भक्तियोगमें 'निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी' (१२।१३)। इस विषयमें एक विशेष ध्यान देनेकी बात है कि वास्तवमें हमारा स्वरूप अहंता-ममतासे रहित है। अहंता (मैंपन) और ममता (मेरापन)—दोनों अपने स्वरूपमें मानी हुई हैं, वास्तविक नहीं हैं। अगर ये वास्तविक होतीं तो हम कभी निर्मम और निरहंकार नहीं हो सकते और भगवान् भी सबके लिये निर्मम और निरहंकार होनेकी बात नहीं कहते। परन्तु हम निर्मम और निरहंकार हो सकते हैं, तभी भगवान् ऐसा कहते हैं।
कर्मयोगमें पहले 'कामना'का त्याग होता है, फिर कर्मयोगी स्वतः निर्मम-निरहंकार हो जाता है (गीता—दूसरे अध्यायका इकहत्तरवाँ श्लोक)। ज्ञानयोगमें पहले 'अहंकार'का त्याग होता है, फिर ज्ञानयोगी स्वतः निर्मम हो जाता है (गीता—अठारहवाँ अध्यायका तिरपनवाँ श्लोक)। भक्तियोगमें भक्त अपने-आपको भगवान्के अर्पित कर देता है तो भगवत्कृपासे वह स्वतः निर्मम-निरहंकार हो जाता है।
'मव्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः'—यहाँ 'मव्यर्पितमनोबुद्धिः' पद उस मनुष्यका वाचक है, जिसने स्वयंको (अपने-आपको) भगवान्के अर्पित कर दिया है। स्वयं अर्पित होनेसे मन-बुद्धि भी स्वतः भगवान्के अर्पित हो जाते हैं। स्वयं अर्पित होनेसे फिर कुछ बाकी रहता ही नहीं। कारण कि स्वयं पहले है, शरीर-मन-बुद्धि आदि पीछे हैं। भक्त पहले है, मनुष्य पीछे है। भगवान्में अर्पित होनेसे मन-बुद्धिकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रहती, प्रत्युत केवल भगवान् ही रहते हैं।
भगवान्का परा और अपरा दोनों प्रकृतियोंके साथ समान सम्बन्ध है, पर जीव-(परा-) का सम्बन्ध अपराके साथ नहीं है। कारण कि जीव अपरा प्रकृतिसे उत्कृष्ट है और भगवान्का अंश है। इसलिये जीवका सम्बन्ध भगवान्के साथ है। 'मव्यर्पितमनोबुद्धिः' का तात्पर्य है कि जीव अपरा प्रकृति-(मन-बुद्धि-) को अपना न माने, प्रत्युत भगवान्को ही अपना माने*।
भगवान् ज्ञानस्वरूप और नित्य परिपूर्ण हैं। अतः उनमें ज्ञानकी भूख (जिज्ञासा) तो नहीं है, पर प्रेमकी भूख (प्रेम-पिपासा) अवश्य है। इसलिये भगवान् कहते हैं कि मेरेमें अर्पित मन-बुद्धिवाला जो मेरा भक्त है, वह मेरेको प्रिय है। ऐसे भक्तके सिवाय भगवान्को प्यारा और कोई हो ही नहीं सकता।
जैसे किसी राजाका बेटा दूसरोंसे भीख माँगने लगे तो वह राजाको नहीं सुहाता, ऐसे ही सत्-चित्-आनन्दरूप भगवान्का अंश जीव जब असत्-जड़-दुःखरूप संसारसे कुछ आशा रखता है, तब वह भगवान्को नहीं सुहाता, प्यारा नहीं लगता; क्योंकि इसमें जीवका महान् अहित है। भगवान्को वही प्यारा लगता है, जो अन्यसे आशा नहीं रखता तथा जिसमें जीवका परम हित होता है—
एक बानि करुनानिधान की। सो प्रिय जाके गति न आन की ॥ (मानस, अरण्य० १०।४)
सम्बन्ध—सिद्ध भक्तके लक्षणोंका दूसरा प्रकरण, जिसमें छः लक्षणोंका वर्णन है, आगेके श्लोकमें आया है।
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥ १५ ॥
| यस्मात् | = जिससे | लोकात् | = किसी प्राणीसे | भय और उद्वेग- |
|---|---|---|---|---|
| लोकः | = कोई भी प्राणी | न, उद्विजते | = उद्विग्न नहीं होता | (हलचल-) से |
| न, उद्विजते | = उद्विग्न (क्षुब्ध) | च | = तथा | मुक्तः |
| नहीं होता | यः | = जो | = रहित है, | |
| च | = और | हर्षामर्ष- | सः | |
| यः | = जो स्वयं भी | भयोद्वेगैः | = हर्ष, अमर्ष (ईर्ष्या), | मे |
| प्रियः | ||||
| = मुझे | ||||
| = प्रिय है। |
- यहाँ 'मन'के अन्तर्गत चित्तको और बुद्धिके अन्तर्गत अहम्को भी लेना चाहिये।
८४२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १२ ]
व्याख्या—‘यस्मान्नोद्विजते लोकः’— भक्त सर्वत्र और सबमें अपने परमप्रिय प्रभुको ही देखता है। अतः उसकी दृष्टिमें मन, वाणी और शरीरसे होनेवाली सम्पूर्ण क्रियाएँ एकमात्र भगवान्की प्रसन्नताके लिये ही होती हैं (गीता ६।३१)। ऐसी अवस्थामें भक्त किसी भी प्राणीको उद्देग कैसे पहुँचा सकता है? फिर भी भक्तोंके चरित्रमें यह देखनेमें आता है कि उनकी महिमा, आदर-सत्कार तथा कहीं-कहीं उनकी क्रिया, यहाँतक कि उनकी सीम्य आकृतिमात्रसे भी कुछ लोग ईर्ष्यावश उद्भ्रान्त हो जाते हैं और भक्तोंसे अकारण द्वेष और विरोध करने लगते हैं।
लोगोंको भक्तसे होनेवाले उद्देगके सम्बन्धमें विचार किया जाय, तो यही पता चलेगा कि भक्तकी क्रियाएँ कभी किसीके उद्देगका कारण नहीं होतीं; क्योंकि भक्त प्राणिमात्रमें भगवान्को ही देखता है—‘वासुदेवः सर्वम् ’ (गीता ७।१९)। उसकी मात्र क्रियाएँ स्वभावतः प्राणियोंके परमहितके लिये ही होती हैं। उसके द्वारा कभी भूलसे भी किसीके अहितकी चेष्टा नहीं होती। जिनको उससे उद्देग होता है, वह उनके अपने राग-द्वेषयुक्त आसुर स्वभावके कारण ही होता है। अपने ही दोषयुक्त स्वभावके कारण उनको भक्तकी हितपूर्ण चेष्टाएँ भी उद्देगजनक प्रतीत होती हैं।
इसमें भक्तका क्या दोष? भर्तृहरिजी कहते हैं—
मृगमीनसज्जनानां तृणजलसंतोषवहितवृत्तीनाम्। लुब्धकधीवरपिशूना निष्कारणवैरिणो जगति ॥
(भर्तृहरि-नीतिशतक ६१)
‘हरिण, मछली और सज्जन क्रमशः तृण, जल और संतोषपर अपना जीवन-निर्वाह करते हैं (किसीको कुछ नहीं कहते); परन्तु व्याध, मछुए और दुष्टलोग अकारण ही इनसे वैर करते हैं।’
वास्तवमें भक्तोंद्वारा दूसरे मनुष्योंके उद्भ्रान्त होनेका प्रश्न ही पैदा नहीं होता, प्रत्युत भक्तोंके चरित्रमें ऐसे प्रसंग देखनेमें आते हैं कि उनसे द्वेष रखनेवाले लोग भी उनके चिन्तन और संग-दर्शन-स्पर्श-वार्तालापके प्रभावसे अपना आसुर स्वभाव छोड़कर भक्त हो गये। ऐसा होनेमें भक्तोंका उदारतापूर्ण स्वभाव ही हेतु है।
उमा संत कइ इइइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई ॥
(मानस ५।४१।४)
परन्तु भक्तोंसे द्वेष करनेवाले सभी लोगोंको लाभ ही होता हो—ऐसा नियम भी नहीं है।
अगर ऐसा मान लिया जाय कि भक्तसे किसीको उद्देग होता ही नहीं अथवा दूसरे लोग भक्तके विरुद्ध कोई चेष्टा
करते ही नहीं या भक्तके शत्रु-मित्र होते ही नहीं, तो फिर भक्तके लिये शत्रु-मित्र, मान-अपमान, निन्दा-स्तुति आदिमें सम होनेकी बात (जो आगे अठारहवें-उन्नीसवें श्लोकोंमें कही गयी है) नहीं कही जाती। तात्पर्य यह है कि लोगोंको अपने आसुर स्वभावके कारण भक्तकी हितकर क्रियाओंसे भी उद्देग हो सकता है और वे बदलेकी भावनासे भक्तके विरुद्ध चेष्टा कर सकते हैं तथा अपनेको उस भक्तका शत्रु मान सकते हैं; परन्तु भक्तकी दृष्टिमें न तो कोई शत्रु होता है और न किसीको उद्भ्रान्त करनेका उसका भाव ही होता है।
‘लोकान्नोद्विजते च यः’— पहले भगवान्ने बताया कि भक्तसे किसी प्राणीको उद्देग नहीं होता और अब उपर्युक्त पदोंसे यह बताते हैं कि भक्तको खुद भी किसी प्राणीसे उद्देग नहीं होता। इसके दो कारण हैं—
(१) भक्तके शरीर, मन, इन्द्रियाँ, सिद्धान्त आदिके विरुद्ध भी अनिच्छा या परेच्छासे क्रियाएँ और घटनाएँ हो सकती हैं। परन्तु वास्तविकताका बोध होने तथा भगवान्में अत्यन्त प्रेम होनेके कारण भक्त भगवत्प्रेममें इतना निमग्न रहता है कि उसको सर्वत्र और सबमें भगवान्के ही दर्शन होते हैं। इसलिये प्राणिमात्रकी क्रियाओंमें (चाहे उनमें कुछ उसके प्रतिकूल ही क्यों न हों) उसको भगवान्की ही लीला दिखायी देती है। अतः उसको किसी भी क्रियासे कभी उद्देग नहीं होता।
(२) मनुष्यको दूसरोंसे उद्देग तभी होता है, जब उसकी कामना, मान्यता, साधना, धारणा आदिका विरोध होता है। भक्त सर्वथा पूर्णकाम होता है। इसलिये दूसरोंसे उद्भ्रान्त होनेका कोई कारण ही नहीं रहता।
‘हर्षामर्षभयोद्देगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः’— यहाँ हर्षसे मुक्त होनेका तात्पर्य यह है कि सिद्ध भक्त सब प्रकारके हर्षादि विकारोंसे सर्वथा रहित होता है। पर इसका आशय यह नहीं है कि सिद्ध भक्त सर्वथा हर्षरहित (प्रसन्नताशून्य) होता है, प्रत्युत उसकी प्रसन्नता तो नित्य, एकरस, विलक्षण और अलौकिक होती है। हाँ, उसकी प्रसन्नता सांसारिक पदार्थोंके संयोग-वियोगसे उत्पन्न क्षणिक, नाशवान् तथा घटने-बढ़नेवाली नहीं होती। सर्वत्र भगवद्बुद्धि रहनेसे एकमात्र अपने इष्टदेव भगवान्को और उनकी लीलाओंको देख-देखकर वह सदा ही प्रसन्न रहता है।
किसीके उत्कर्ष-(उन्नति-) को सहन न करना ‘अमर्ष’ कहलाता है। दूसरे लोगोंको अपने समान या अपनेसे
श्लोक १५ ]
- साधक-संजीवनी *
८४३
अधिक सुख-सुविधा, धन, विद्या, महिमा, आदर-सत्कार आदि प्राप्त हुआ देखकर साधारण मनुष्यके अन्तःकरणमें उनके प्रति ईर्ष्या होने लगती है; क्योंकि उसको दूसरोंका उत्कर्ष सहन नहीं होता।
कई बार कुछ साधकोंके अन्तःकरणमें भी दूसरे साधकोंकी आध्यात्मिक उन्नति और प्रसन्नता देखकर अथवा सुनकर किंचित् ईर्ष्याका भाव पैदा हो जाता है। पर भक्त इस विकारसे सर्वथा रहित होता है; क्योंकि उसकी दृष्टिमें अपने प्रिय प्रभुके सिवाय अन्य किसीकी स्वतन्त्र सत्ता रहती ही नहीं। फिर वह किसके प्रति अमर्ष करे और क्यों करे?
अगर साधकके हृदयमें दूसरोंकी आध्यात्मिक उन्नति देखकर ऐसा भाव पैदा होता है कि मेरी भी ऐसी ही आध्यात्मिक उन्नति हो, तो यह भाव उसके साधनमें सहायक होता है। परन्तु अगर साधकके हृदयमें ऐसा भाव पैदा हो जाय कि इसकी उन्नति क्यों हो गयी, तो ऐसे दुर्भावके कारण उसके हृदयमें अमर्षका भाव पैदा हो जायगा, जो उसे पतनकी ओर ले जानेवाला होगा।
इष्टके वियोग और अनिष्टके संयोगकी आशंकासे होनेवाले विकारको 'भय' कहते हैं। भय दो कारणोंसे होता है—(१) बाहरी कारणोंसे; जैसे—सिंह, साँप, चोर, डाकू आदिसे अनिष्ट होने अथवा किसी प्रकारकी सांसारिक हानि पहुँचनेकी आशंकासे होनेवाला भय और (२) भीतरी कारणोंसे; जैसे—चोरी, झूठ, कपट, व्यभिचार आदि शास्त्र-विरुद्ध भावों तथा आचरणोंसे होनेवाला भय।
सबसे बड़ा भय मौतका होता है। विवेकशील कहे जानेवाले पुरुषोंको भी प्रायः मौतका भय बना रहता है।* साधकको भी प्रायः सत्संग-भजन-ध्यानादि साधनोंसे शरीरके कृश होने आदिका भय रहता है। उसको कभी-कभी यह भय भी होता है कि संसारसे सर्वथा वैराग्य हो जानेपर मेरे शरीर और परिवारका पालन कैसे होगा! साधारण मनुष्यको अनुकूल वस्तुकी प्राप्तिमें बाधा पहुँचानेवाले अपनेसे बलवान् मनुष्यसे भय होता है। ये सभी भय केवल शरीर—(जड़ता—) के आश्रयसे ही पैदा होते हैं। भक्त सर्वथा भगवच्चरणोंके आश्रित रहता है, इसलिये वह सदा-सर्वदा भयरहित होता है। साधकको भी तभीतक भय रहता है, जबतक वह सर्वथा भगवच्चरणोंके आश्रित नहीं हो जाता। सिद्ध भक्तको तो सदा, सर्वत्र अपने प्रिय प्रभुकी
लीला ही दीखती है। फिर भगवान्की लीला उसके हृदयमें भय कैसे पैदा कर सकती है!
मनका एकरूप न रहकर हलचलयुक्त हो जाना 'उद्वेग' कहलाता है। इस (पंद्रहवें) श्लोकमें 'उद्वेग' शब्द तीन बार आया है। पहली बार उद्वेगकी बात कहकर भगवान्ने यह बताया कि भक्तकी कोई भी क्रिया उसकी ओरसे किसी मनुष्यके उद्वेगका कारण नहीं बनती। दूसरी बार उद्वेगकी बात कहकर यह बताया कि दूसरे मनुष्योंकी किसी भी क्रियासे भक्तके अन्तःकरणमें उद्वेग नहीं होता। इसके सिवाय दूसरे कई कारणोंसे भी मनुष्यको उद्वेग हो सकता है; जैसे बार-बार कोशिश करनेपर भी अपना कार्य पूरा न होना, कार्यका इच्छानुसार फल न मिलना, अनिच्छासे क्रतु-परिवर्तन; भूकम्प, बाढ़ आदि दुःखदायी घटनाएँ घटना; अपनी कामना, मान्यता, सिद्धान्त अथवा साधनमें विघ्न पड़ना आदि। भक्त इन सभी प्रकारके उद्वेगोंसे सर्वथा मुक्त होता है—यह बतानेके लिये ही तीसरी बार उद्वेगकी बात कही गयी है। तात्पर्य यह है कि भक्तके अन्तःकरणमें 'उद्वेग' नामकी कोई चीज रहती ही नहीं।
उद्वेगके होनेमें अज्ञानजनित इच्छा और आसुर स्वभाव ही कारण हैं। भक्तमें अज्ञानका सर्वथा अभाव होनेसे कोई स्वतन्त्र इच्छा नहीं रहती, फिर आसुर स्वभाव तो साधना-अवस्थामें ही नष्ट हो जाता है। भगवान्की इच्छा ही भक्तकी इच्छा होती है। भक्त अपनी क्रियाओंके फलरूपमें अथवा अनिच्छासे प्राप्त अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियोंमें भगवान्का कृपापूर्ण विधान ही देखता है और निरन्तर आनन्दमें मग्न रहता है। अतः भक्तमें उद्वेगका सर्वथा अभाव होता है।
'मुक्तः' पदका अर्थ है—विकारोंसे सर्वथा छूटा हुआ। अन्तःकरणमें संसारका आदर रहनेसे अर्थात् परमात्मामें पूर्णतया मन-बुद्धि न लगनेसे ही हर्ष, अमर्ष, भय, उद्वेग आदि विकार उत्पन्न होते हैं। परन्तु भक्तकी दृष्टिमें एक भगवान्के सिवाय अन्य किसीकी स्वतन्त्र सत्ता और महत्ता न रहनेसे उसमें ये विकार उत्पन्न ही नहीं होते। उसमें स्वाभाविक ही सदगुण-सदाचार रहते हैं।
इस श्लोकमें भगवान्ने 'भक्तः' पद न देकर 'मुक्तः' पद दिया है। इसका तात्पर्य यह है कि भक्त यावन्मात्र दुर्गुण-दुराचारोंसे सर्वथा रहित होता है।
गुणोंका अभिमान होनेसे दुर्गुण अपने-आप आ जाते हैं।
- स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेशः ॥ (पातंजलयोगदर्शन २।१)
८४४ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय १२
अपनेमें किसी गुणके आनेपर अभिमानरूप दुर्गुण उत्पन्न
हो जाय तो उस गुणको गुण कैसे माना जा सकता है?
दैवी सम्पत्ति (सद्गुण)-से कभी आसुरी सम्पत्ति (दुर्गुण)
उत्पन्न नहीं हो सकती। अगर दैवी सम्पत्तिसे आसुरी
सम्पत्तिकी उत्पत्ति होती तो 'दैवी सम्पद्विमोक्षाय' (गीता
१६। ५)-इन भगवद्वचनोंके अनुसार मनुष्य मुक्त कैसे
होता? वास्तवमें गुणोंके अभिमानमें गुण कम तथा दुर्गुण
(अभिमान) अधिक होता है। अभिमानसे दुर्गुणोंकी वृद्धि
होती है; क्योंकि सभी दुर्गुण-दुराचार अभिमानके ही
आश्रित रहते हैं।
भक्तको तो प्राय: इस बातकी जानकारी ही नहीं
होती कि मेरेमें कोई गुण है। अगर उसको अपनेमें कभी
कोई गुण दीखता भी है तो वह उसको भगवान्का ही
मानता है, अपना नहीं। इस प्रकार गुणोंका अभिमान न
होनेके कारण भक्त सभी दुर्गुण-दुराचारों, विकारोंसे
मुक्त होता है भक्तको भगवान् प्रिय होते हैं, इसलिये
भगवान्को भी भक्त प्रिय होते हैं, (गीता-सातवें अध्यायका
सत्रहवाँ श्लोक)।
परिशिष्ट भाव-दूसरेको सत्ता देनेसे ही उद्वेग, ईर्ष्या, भय आदि होते हैं। भक्तकी दृष्टिमें एक भगवान्के सिवाय
दूसरी कोई सत्ता है ही नहीं, फिर वह किससे उद्वेग, ईर्ष्या, भय आदि करे और क्यों करे?-'निज प्रभुमय देखहिं
जगत केहि सन करहिं बिरोध' (मानस, उत्तर० ११२ ख)।
सम्बन्ध-सिद्ध भक्तके छ: लक्षण बतानेवाला तीसरा प्रकरण आगेके श्लोकमें आया है।
अनपेक्ष: शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथ:।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्त: स मे प्रिय: ॥ १६ ॥
य: = जो
अनपेक्ष: = अपेक्षा-
(आवश्यकता-) से
रहित,
शुचि: = (बाहर-भीतरसे)
पवित्र,
दक्ष: = चतुर,
उदासीन: = उदासीन,
गतव्यथ: = व्यथासे रहित (और)
सर्वारम्भ-
परित्यागी = सभी आरम्भोंका
अर्थात् नये-नये
कर्मोंके आरम्भका
सर्वथा त्यागी है,
स: = वह
मद्भक्त: = मेरा भक्त
मे = मुझे
प्रिय: = प्रिय है।
व्याख्या-'अनपेक्ष:'-भक्त भगवान्को ही सर्वश्रेष्ठ
मानता है। उसकी दृष्टिमें भगवत्प्राप्तिसे बढ़कर दूसरा कोई
लाभ नहीं होता। अत: संसारकी किसी भी वस्तुमें उसका
किंचिन्मात्र भी खिंचाव नहीं होता। इतना ही नहीं, अपने
कहलानेवाले शरीर, इन्द्रियों, मन, बुद्धिमें भी उसका
अपनापन नहीं रहता, प्रत्युत वह उनको भी भगवान्का ही
मानता है, जो कि वास्तवमें भगवान्के ही हैं। अत: उसको
शरीर-निर्वाहकी भी चिन्ता नहीं होती। फिर वह और किस
बातकी अपेक्षा करे? अर्थात् फिर उसे किसी भी वस्तुकी
इच्छा-वासना-स्पृहा नहीं रहती।
भक्तपर चाहे कितनी ही बड़ी आपत्ति आ जाय,
आपत्तिका ज्ञान होनेपर भी उसके चित्तपर प्रतिकूल प्रभाव
नहीं होता। भयंकर-से-भयंकर परिस्थितिमें भी वह
भगवान्की लीलाका अनुभव करके मस्त रहता है। इसलिये
वह किसी प्रकारकी अनुकूलताकी कामना नहीं करता।
नाशवान् पदार्थ तो रहते नहीं, उनका वियोग अवश्यम्भावी
है और अविनाशी परमात्मासे कभी वियोग होता ही नहीं-
इस वास्तविकताको जाननेके कारण भक्तमें स्वाभाविक ही
नाशवान् पदार्थोंकी इच्छा पैदा नहीं होती।
यह बात खास ध्यान देनेकी है कि केवल इच्छा
करनेसे शरीर-निर्वाहके पदार्थ मिलते हैं तथा इच्छा न
करनेसे न मिलते हों-ऐसा कोई नियम नहीं है। वास्तवमें
शरीर-निर्वाहके आवश्यक सामग्री स्वत: प्राप्त होती है;
क्योंकि जीवमात्रके शरीर-निर्वाहकी आवश्यक सामग्रीका
प्रबन्ध भगवान्की ओरसे पहले ही हुआ रहता है। इच्छा
करनेसे तो आवश्यक वस्तुओंकी प्राप्तिमें बाधा ही आती
है। अगर मनुष्य किसी वस्तुको अपने लिये अत्यन्त आवश्यक
समझकर 'वह वस्तु कैसे मिले? कहाँ मिले? कब
मिले?'-ऐसी प्रबल इच्छाको अपने अन्तःकरणमें पकड़े
रहता है, तो उसकी उस इच्छाका विस्तार नहीं हो पाता।
श्लोक १६ ]
- साधक-संजीवनी *
८४५
अर्थात् उसकी वह इच्छा दूसरे लोगोंके अन्तःकरणतक नहीं पहुँच पाती। इस कारण दूसरे लोगोंके अन्तःकरणमें उस आवश्यक वस्तुको देनेकी इच्छा या प्रेरणा नहीं होती। प्रायः देखा जाता है कि लेनेकी प्रबल इच्छा रखनेवाले—(चोर आदि) को कोई देना नहीं चाहता। इसके विपरीत किसी वस्तुकी इच्छा न रखनेवाले विरक्त त्यागी और बालककी आवश्यकताओंका अनुभव अपने-आप दूसरोंको होता है, और दूसरे उनके शरीर-निर्वाहका अपने-आप प्रसन्नतापूर्वक प्रबन्ध करते हैं। इससे यह सिद्ध हुआ कि इच्छा न करनेसे जीवन-निर्वाहकी आवश्यक वस्तुएँ बिना माँगें स्वतः मिलती हैं। अतः वस्तुओंकी इच्छा करना केवल मूर्खता और अकारण दुःख पाना ही है। सिद्ध भक्तको तो अपने कहे जानेवाले शरीरकी भी अपेक्षा नहीं होती; इसलिये वह सर्वथा निरपेक्ष होता है।
किसी-किसी भक्तको तो इसकी भी अपेक्षा नहीं होती कि भगवान् दर्शन दें! भगवान् दर्शन दें तो आनन्द, न दें तो आनन्द! वह तो सदा भगवान्की प्रसन्नता और कृपाको देखकर मस्त रहता है। ऐसे निरपेक्ष भक्तके पीछे-पीछे भगवान् भी घूमा करते हैं! भगवान् स्वयं कहते हैं—
निरपेक्षं मुनिं शान्तं निर्वैरं समदर्शनम्। अनुब्रजाम्यहं नित्यं पृथेयेत्यङ्घिरेणुभिः॥
(श्रीमद्भागवतम् ११।१४।१६)
‘जो निरपेक्ष (किसीकी अपेक्षा न रखनेवाला), निरन्तर मेरा मनन करनेवाला, शान्त, द्वेषरहित और सबके प्रति समान दृष्टि रखनेवाला है, उस महात्माके पीछे-पीछे मैं सदा यह सोचकर घूमा करता हूँ कि उसकी चरण-रज मेरे ऊपर पड़ जाय और मैं पवित्र हो जाऊँ।’
किसी वस्तुकी इच्छाको लेकर भगवान्की भक्ति करनेवाला मनुष्य वस्तुतः उस इच्छित वस्तुका ही भक्त होता है; क्योंकि (वस्तुकी ओर लक्ष्य रहनेसे) वह वस्तुके लिये ही भगवान्की भक्ति करता है, न कि भगवान्के लिये। परन्तु भगवान्की यह उदारता है कि उसको भी अपना भक्त मानते हैं (गीता—सातवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक); क्योंकि वह इच्छित वस्तुके लिये किसी दूसरेपर भरोसा न रखकर अर्थात् केवल भगवान्पर भरोसा रखकर ही भजन करता है। इतना ही नहीं, भगवान् भक्त ध्रुवकी तरह उस (अर्थार्थी भक्त)-की इच्छा पूरी करके उसको सर्वथा निःसृष्ट भी बना देते हैं।
‘शुचिः’—शरीरमें अहंता-ममता (मैं-मेरापन) न
रहनेसे भक्तका शरीर अत्यन्त पवित्र होता है। अन्तःकरणमें राग-द्वेष, हर्ष-शोक, काम-क्रोधादि विकारोंके न रहनेसे उसका अन्तःकरण भी अत्यन्त पवित्र होता है। ऐसे (बाहर-भीतरसे अत्यन्त पवित्र) भक्तके दर्शन, स्पर्श, वातालाप और चिन्तनसे दूसरे लोग भी पवित्र हो जाते हैं। तीर्थ सब लोगोंको पवित्र करते हैं; किन्तु ऐसे भक्त तीर्थोंको भी तीर्थत्व प्रदान करते हैं अर्थात् तीर्थ भी उनके चरण-स्पर्शसे पवित्र हो जाते हैं (पर भक्तोंके मनमें ऐसा अहंकार नहीं होता)। ऐसे भक्त अपने हृदयमें विराजित ‘पवित्राणां पवित्रम्’ (पवित्रोंको भी पवित्र करनेवाले) भगवान्के प्रभावसे तीर्थोंको भी महातीर्थ बनाते हुए विचरण करते हैं—
तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि स्वान्तःस्थेन गदाभूता॥
(श्रीमद्भागवतम् ११।१३।१०)
महाराज भगीरथ गंगाजीसे कहते हैं—
साधवो न्यासिनः शान्ता ब्रह्मिष्ठा लोकपावनाः। हरन्त्यधं तेऽङ्गसंगात् तेष्वान्ते हृद्यभिन्द्ररिः॥
(श्रीमद्भागवतम् ११।११।६)
‘माता! जिन्होंने लोक-परलोककी समस्त कामनाओंका त्याग कर दिया है, जो संसारसे उपरत होकर अपने-आपमें शान्त हैं, जो ब्रह्मनिष्ठ और लोकोंको पवित्र करनेवाले परोपकारी साधु पुरुष हैं, वे अपने अंगस्पर्शसे तुम्हारे (पापियोंके अंग-स्पर्शसे आये) समस्त पापोंको नष्ट कर देंगे; क्योंकि उनके हृदयमें समस्त पापोंका नाश करनेवाले भगवान् सर्वदा निवास करते हैं।’
‘दक्षः’—जिसने करनेयोग्य काम कर लिया है, वही दक्ष है। मानव-जीवनका उद्देश्य भगवत्प्राप्ति ही है। इसीके लिये मनुष्य-शरीर मिला है। अतः जिसने अपना उद्देश्य पूरा कर लिया अर्थात् भगवान्को प्राप्त कर लिया, वही वास्तवमें दक्ष अर्थात् चतुर है। भगवान् कहते हैं—
एषा बुद्धिमतां बुद्धिर्मनीषा च मनीषिणाम्। यत्सत्यमनुतेनेह मर्त्यनाजोति मामृतम्॥
(श्रीमद्भागवतम् ११।२१।२२)
‘विवेकियोंके विवेक और चतुरोंकी चतुराईकी पराकाष्ठा इसीमें है कि वे इस विनाशी और असत्य शरीरके द्वारा मुझ अविनाशी एवं सत्य तत्त्वको प्राप्त कर लें।’
सांसारिक दक्षता (चतुराई) वास्तवमें दक्षता नहीं है।
एक दृष्टिसे तो व्यवहारमें अधिक दक्षता होना कलंक ही है; क्योंकि इससे अन्तःकरणमें जड़ पदार्थोंका आदर बढ़ता है।
८४६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १२ ]
जो मनुष्यके पतनका कारण होता है।
सिद्ध भक्तमें व्यावहारिक (सांसारिक) दक्षता भी होती है। परन्तु व्यावहारिक दक्षताको पारमार्थिक स्थितिकी कसौटी मानना वस्तुतः सिद्ध भक्तका अपमान ही करना है।
‘उदासीनः’ —उदासीन शब्दका अर्थ है—उत्+आसीन अर्थात् ऊपर बैठा हुआ, तटस्थ, पक्षपातसे रहित।
विवाद करनेवाले दो व्यक्तियोंके प्रति जिसका सर्वथा तटस्थ भाव रहता है, उसको उदासीन कहा जाता है। उदासीन शब्द निलिप्तताका द्योतक है। जैसे ऊँचे पर्वतपर खड़े हुए पुरुषपर नीचे पृथ्वीपर लगी हुई आग या बाढ़ आदिका कोई असर नहीं पड़ता, ऐसे ही किसी भी अवस्था, घटना, परिस्थिति आदिका भक्तपर कोई असर नहीं पड़ता, वह सदा निलिप्त रहता है।
जो मनुष्य भक्तका हित चाहता है तथा उसके अनुकूल आचरण करता है, वह उसका मित्र समझा जाता है और जो मनुष्य भक्तका अहित चाहता है तथा उसके प्रतिकूल आचरण करता है, वह उसका शत्रु समझा जाता है। इस प्रकार मित्र और शत्रु समझे जानेवाले व्यक्तिके साथ भक्तके बाहरी व्यवहारमें फरक मालूम दे सकता है; परन्तु भक्तके अन्तःकरणमें दोनों मनुष्योंके प्रति किंचिन्मात्र भी भेदभाव नहीं होता। वह दोनों स्थितियोंमें सर्वथा उदासीन अर्थात् निलिप्त रहता है।
भक्तके अन्तःकरणमें अपनी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रहती। वह शरीरसहित सम्पूर्ण संसारको परमात्माका ही मानता है। इसलिए उसका व्यवहार पक्षपातसे रहित होता है।
‘गतव्यथः’ —कुछ मिले या न मिले, कुछ भी आये या चला जाय, जिसके चित्तमें दुःख-चिन्ता-शोकरूप हलचल कभी होती ही नहीं, उस भक्तको यहाँ ‘गतव्यथः’ कहा गया है।
यहाँ ‘व्यथा’ शब्द केवल दुःखका वाचक नहीं है। अनुकूलताकी प्राप्ति होनेपर चित्तमें प्रसन्नता तथा प्रतिकूलताकी प्राप्ति होनेपर चित्तमें खिन्नताकी जो हलचल होती है, वह भी ‘व्यथा’ ही है। अतः अनुकूलता तथा प्रतिकूलतासे अन्तःकरणमें होनेवाले रग-द्रेष, हर्ष-शोक आदि विकारोंके सर्वथा अभावको ही यहाँ ‘गतव्यथः’ पदसे कहा गया है।
‘सर्वारम्भपरित्यागी’ —भोग और संग्रहके उद्देश्यसे नये-नये कर्म करनेको ‘आरम्भ’ कहते हैं; जैसे—
सुखभोगके उद्देश्यसे घरमें नयी-नयी चीजें इकट्ठी करना, वस्त्र खरीदना; रुपये बढ़ानेके उद्देश्यसे नयी-नयी दूकानें खोलना, नया व्यापार शुरू करना आदि। भक्त भोग और संग्रहके लिये किये जानेवाले मात्र कर्मोंका सर्वथा त्यागी होता है*।
जिसका उद्देश्य संसारका है और जो वर्ण, आश्रम, विद्या, बुद्धि, योग्यता, पद, अधिकार आदिको लेकर अपनेमें विशेषता देखता है, वह भक्त नहीं होता। भक्त भगवनिष्ठ होता है। अतः उसके कहलानेवाले शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, क्रिया, फल आदि सब भगवान्के अर्पित होते हैं। वास्तवमें इन शरीरादिके मालिक भगवान् ही हैं। प्रकृति और प्रकृतिका कार्यमात्र भगवान्का है। अतः भक्त एक भगवान्के सिवाय किसीको भी अपना नहीं मानता। वह अपने लिये कभी कुछ नहीं करता। उसके द्वारा होनेवाले मात्र कर्म भगवान्की प्रसन्नताके लिये ही होते हैं। धन-सम्पत्ति, सुख-आराम, मान-बड़ाई आदिके लिये किये जानेवाले कर्म उसके द्वारा कभी होते ही नहीं।
जिसके भीतर परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिकी ही सच्ची लगन लगी है, वह साधक चाहे किसी भी मार्गका क्यों न हो, भोग भोगने और संग्रह करनेके उद्देश्यसे वह कभी कोई नया कर्म आरम्भ नहीं करता।
‘यो मद्भक्तः स मे प्रियः’ —भगवान्में स्वाभाविक ही इतना महान् आकर्षण है कि भक्त स्वतः उनकी ओर खिंच जाता है, उनका प्रेमी हो जाता है।
आत्मारामाश्च मुनयो निर्गन्था अप्यरुक्रमे।
कुर्वन्त्यहंतुर्को भक्तिमिथ्याभूतगुणो हरिः॥
(श्रीमद्भगवद्गीता १।७।१०)
‘ज्ञानके द्वारा जिनकी चित्-जड-ग्रन्थि कट गयी है, ऐसे आत्माराम मुनिगण भी भगवान्की हेतुरहित (निष्काम) भक्ति किया करते हैं; क्योंकि भगवान्के गुण ही ऐसे हैं कि वे प्राणियोंको अपनी ओर खींच लेते हैं।’
यहाँ प्रश्न हो सकता है कि अगर भगवान्में इतना महान् आकर्षण है, तो सभी मनुष्य भगवान्की ओर क्यों नहीं खिंच जाते, उनके प्रेमी क्यों नहीं हो जाते?
वास्तवमें देखा जाय तो जीव भगवान्का ही अंश है। अतः उसका भगवान्की ओर स्वतः-स्वाभाविक आकर्षण होता है। परन्तु जो भगवान् वास्तवमें अपने हैं, उनको तो
- अनारंभ अनेकेत अमानी। अनघ अरोष दच्छ विग्यानी ॥ (मानस ७।४६।३)
श्लोक १७ ]
- साधक-संजीवनी *
८४७
मनुष्यने अपना माना नहीं और जो मन-बुद्धि-इन्द्रियां-शरीर-कुटुम्बादि अपने नहीं हैं, उनको उसने अपना मान लिया। इसीलिये वह शारीरिक निर्वाह और सुखकी कामनासे सांसारिक भोगोंकी ओर आकृष्ट हो गया तथा अपने अंशी भगवान्से दूर (विमुख) हो गया। फिर भी उसकी यह दूरी वास्तविक नहीं माननी चाहिये। कारण कि नाशवान् भोगोंकी ओर आकृष्ट होनेसे उसकी भगवान्से दूरी दिखायी तो देती है, पर वास्तवमें दूरी है नहीं; क्योंकि उन भोगोंमें भी तो सर्वव्यापी भगवान् परिपूर्ण हैं। परन्तु
इन्द्रियोंके विषयोंमें अर्थात् भोगोंमें ही आसक्ति होनेके कारण उसको उनमें छिपे भगवान् दिखायी नहीं देते। जब इन नाशवान् भोगोंकी ओर उसका आकर्षण नहीं रहता, तब वह स्वतः ही भगवान्की ओर खिंच जाता है। संसारमें किंचिन्मात्र भी आसक्ति न रहनेसे भक्तका एकमात्र भगवान्में स्वतः प्रेम होता है। ऐसे अनन्यप्रेमी भक्तको भगवान् 'मन्दरुक्तः ' कहते हैं।
जिस भक्तका भगवान्में अनन्य प्रेम है, वह भगवान्को प्रिय होता है।
परिशिष्ट भाव—‘अनपेक्षः’ —अमुक वस्तु आदि न हो तो काम कैसे चलेगा—यह अपेक्षा भक्तमें नहीं होती। भक्तकी दृष्टिमें सब कुछ भगवान्-ही-भगवान् हैं, फिर वह किसकी अपेक्षा रखे? 'शुचिः ’—भक्तका दर्शन, स्पर्श, भाषण दूसरोंको शुद्ध करनेवाला होता है। उसके शरीरका स्पर्श करनेवाली हवा भी शुद्ध होती है! यद्यपि ऐसी शुद्धि ज्ञानयोगी महापुरुषमें भी होती है, तथापि भक्तमें शुरूसे ही सबकी हितैषिता (मैत्रः करुण एव च) विशेषरूपसे रहनेके कारण उसमें विशेष शुद्धि होती है। 'दक्षः ’—भक्तने करनेयोग्य काम कर लिया अर्थात् वह कृतकृत्य, ज्ञातव्य और प्राप्त-प्राप्तव्य हो गया, इसलिये वह 'दक्ष' है।
‘सर्वारम्भपरित्यागी’ —यह पद चौदहवें अध्यायके पचीसवें श्लोकमें गुणातीत महापुरुषके लिये भी आया है—'सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ’। गुणातीत महापुरुषमें कर्तृत्व न होनेसे वह सर्वारम्भपरित्यागी होता है और भक्तमें स्वार्थ तथा अभिमान न होनेसे वह सर्वारम्भपरित्यागी होता है। भक्तको अपने लिये कुछ करना शेष है ही नहीं, फिर वह आरम्भ क्या करे? उसके द्वारा आरम्भ तो हो सकता है, पर उसमें उसको कोई लगाव, आसक्ति, प्रयोजन, आग्रह नहीं रहता, आरम्भ हो जाय तो ठीक, न हो तो ठीक! वह दोनोंमें सम रहता है।
सम्बन्ध—सिद्ध भक्तके पाँच लक्षणोंवाला चौथा प्रकरण आगेके श्लोकमें आया है।
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः ॥ १७ ॥
| यः | = जो | न | = न | (राग-द्वेषरहित) है, | |
|---|---|---|---|---|---|
| न | = न (कभी) | काङ्क्षति | = कामना करता है | सः | = वह |
| हृष्यति | = हर्षित होता है, | (और) | |||
| न | = न | यः | = जो | भक्तिमान् | = भक्तिमान् |
| द्वेष्टि | = द्वेष करता है, | शुभाशुभ- | मनुष्य | ||
| न | = न | परित्यागी | = शुभ-अशुभ कर्मोंसे | मे | = मुझे |
| शोचति | = शोक करता है, | ऊँचा उठा हुआ | प्रियः | = प्रिय है। |
व्याख्या—‘यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति’ —मुख्य विकार चार हैं—(१) राग, (२) द्वेष, (३) हर्ष और (४) शोक*। सिद्ध भक्तमें ये चारों ही विकार नहीं होते। उसका यह अनुभव होता है कि
संसारका प्रतिक्षण वियोग हो रहा है और भगवान्से कभी वियोग होता ही नहीं। संसारके साथ कभी संयोग था नहीं, हे नहीं, रहेगा नहीं और रह सकता भी नहीं। अतः संसारकी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है—इस वास्तविकताका अनुभव
- प्रचलित भाषामें किसीकी मृत्युसे मनमें होनेवाली व्यथाके लिये 'शोक' शब्दका प्रयोग किया जाता है; परन्तु यहाँ 'शोक' शब्दका तात्पर्य अन्तःकरणके दुःखरूप 'विकार' से है।
८४८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १२ ]
कर लेनेके बाद (जड़ताका कोई सम्बन्ध न रहनेपर) भक्तका केवल भगवान्के साथ अपने नित्यसिद्ध सम्बन्धका अनुभव अटलरूपसे रहता है। इस कारण उसका अन्तःकरण राग-द्वेषादि विकारोंसे सर्वथा मुक्त होता है। भगवान्का साक्षात्कार होनेपर ये विकार सर्वथा मिट जाते हैं। साधनावस्थामें भी साधक ज्यों-ज्यों साधनमें आगे बढ़ता है, त्यों-ही-त्यों उसमें राग-द्वेषादि कम होते चले जाते हैं। जो कम होनेवाला होता है, वह मिटनेवाला भी होता है। अतः जब साधनावस्थामें ही विकार कम होने लगते हैं, तब सहज ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि सिद्धावस्थामें भक्तमें ये विकार नहीं रहते, पूर्णतया मिट जाते हैं।
हर्ष और शोक—दोनों राग-द्वेषके ही परिणाम हैं। जिसके प्रति राग होता है, उसके संयोगसे और जिसके प्रति द्वेष होता है, उसके वियोगसे 'हर्ष' होता है। इसके विपरीत जिसके प्रति राग होता है, उसके वियोग या वियोगकी आशंकासे और जिसके प्रति द्वेष होता है, उसके संयोग या संयोगकी आशंकासे 'शोक' होता है। सिद्ध भक्तमें राग-द्वेषका अत्यन्ताभाव होनेसे स्वतः एक साम्यावस्था निरन्तर रहती है। इसलिये वह विकारोंसे सर्वथा रहित होता है।
जैसे रात्रिके समय अन्धकारमें दीपक जलानेकी कामना होती है; दीपक जलानेसे हर्ष होता है, दीपक बुझानेवालेके प्रति द्वेष या क्रोध होता है और पुनः दीपक कैसे जले—ऐसी चिन्ता होती है। रात्रि होनेसे ये चारों बातें होती हैं। परन्तु मध्याह्नका सूर्य तपता हो तो दीपक जलानेकी कामना नहीं होती, दीपक जलानेसे हर्ष नहीं होता, दीपक बुझानेवालेके प्रति द्वेष या क्रोध नहीं होता और (अंधेरा न होनेसे) प्रकाशके अभावकी चिन्ता भी नहीं होती। इसी प्रकार भगवान्से विमुख और संसारके सम्मुख होनेसे शरीर-निर्वाह और सुखके लिये अनुकूल पदार्थ, परिस्थिति आदिके मिलनेकी कामना होती है; इनके मिलनेपर हर्ष होता है; इनकी प्राप्तिमें बाधा पहुँचानेवालेके प्रति द्वेष या क्रोध होता है और इनके न मिलनेपर 'कैसे मिलें' ऐसी चिन्ता होती है। परन्तु जिसको (मध्याह्नके
सूर्यकी तरह) भगवत्प्राप्ति हो गयी है, उसमें ये विकार कभी नहीं रहते। वह पूर्णकाम हो जाता है। अतः उसको संसारकी कोई आवश्यकता नहीं रहती।
'शुभाशुभपरित्यागी'—ममता, आसक्ति और फलेच्छासे रहित होकर ही शुभ कर्म करनेके कारण भक्तके कर्म 'अकर्म' हो जाते हैं। इसलिये भक्तको शुभ कर्मोंका भी त्यागी कहा गया है। राग-द्वेषका सर्वथा अभाव होनेके कारण उससे अशुभ कर्म होते ही नहीं। अशुभ कर्मोंके होनेमें कामना, ममता, आसक्ति ही प्रधान कारण हैं और भक्तमें इनका सर्वथा अभाव होता है। इसलिये उसको अशुभ कर्मोंका भी त्यागी कहा गया है।
भक्त शुभ कर्मोंसे तो राग नहीं करता और अशुभ कर्मोंसे द्वेष नहीं करता। उसके द्वारा स्वाभाविक शास्त्रविहित शुभ कर्मोंका आचरण और अशुभ (निषिद्ध एवं काम्य) कर्मोंका त्याग होता है, राग-द्वेषपूर्वक नहीं। राग-द्वेषका सर्वथा त्याग करनेवाला ही सच्चा त्यागी है।
मनुष्यको कर्म नहीं बाँधते, प्रत्युत कर्मोंमें राग-द्वेष ही बाँधते हैं। भक्तके सम्पूर्ण कर्म राग-द्वेषरहित होते हैं, इसलिये वह शुभाशुभ सम्पूर्ण कर्मोंका परित्यागी है।
'शुभाशुभपरित्यागी' पदका अर्थ शुभ और अशुभ कर्मोंके फलका त्यागी भी लिया जा सकता है। परन्तु इसी श्लोकके पूर्वार्धमें आये 'न ह्यस्ति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति' पदोंका सम्बन्ध भी शुभ (अनुकूल) और अशुभ (प्रतिकूल) कर्मफलके त्यागसे ही है। अतः यहाँ 'शुभाशुभपरित्यागी' पदका अर्थ शुभाशुभ कर्मफलका त्यागी माननेसे पुनरुक्ति-दोष आता है। इसलिये इस पदका अर्थ शुभ एवं अशुभ कर्मोंमें राग-द्वेषका त्यागी ही मानना चाहिये।
'भक्तिमान्यः स मे प्रियः'—भक्तकी भगवान्में अत्यधिक प्रियता रहती है। उसके द्वारा स्वतः-स्वाभाविक भगवान्का चिन्तन, स्मरण, भजन होता रहता है। ऐसे भक्तको यहाँ 'भक्तिमान्' कहा गया है।
भक्तका भगवान्में अनन्य प्रेम होता है, इसलिये वह भगवान्को प्रिय होता है।
परिशिष्ट भाव— हर्ष (ह्यस्ति) और शोक (शोचति), राग (काङ्क्षति) और द्वेष (द्वेष्टि)—ये द्वन्द्व हैं। भक्तमें कोई द्वन्द्व नहीं रहता, वह निर्द्वन्द्व हो जाता है। नारदभक्तिसूत्रमें भी आया है—
यत्प्राप्य न किंचिद्वाञ्छति न शोचति न द्वेष्टि न रमते नोत्साही भवति ॥५॥
'जिस भक्तिके प्राप्त होनेपर भक्त न तो किसी वस्तुकी इच्छा करता है, न शोक करता है, न द्वेष करता है, न किसी वस्तुमें आसक्त होता है और न उसे किसी वस्तुकी प्राप्तिमें उत्साह (हर्ष) होता है।'
श्लोक १८-१९ ] * साधक-संजीवनी * ८४९
सम्बन्ध-अब आगेके दो श्लोकोंमें सिद्ध भक्तके दस लक्षणोंवाला पाँचवाँ और अन्तिम प्रकरण कहते हैं।
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥ १८ ॥
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् ।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥ १९ ॥
शत्रौ = (जो) शत्रु प्रतिकूलता-) में (शरीरका निर्वाह
च = और समः = सम है होने-न-होनेमें)
मित्रे = मित्रमें च = एवं सन्तुष्टः = सन्तुष्ट
तथा = तथा सङ्गविवर्जितः = आसक्तिरहित अनिकेतः = रहनेके स्थान तथा
मानापमानयोः = मान-अपमानमें है (और) शरीरमें ममता-
समः = सम है (और) तुल्यनिन्दा- आसक्तिसे रहित
शीतोष्ण- स्तुतिः = जो निन्दा-स्तुतिको (और)
सुखदुःखेषु = शीत-उष्ण (शरीर- समान समझने- स्थिरमतिः = स्थिर बुद्धिवाला है,
की अनुकूलता- वाला, भक्तिमान् = (वह) भक्तिमान्
प्रतिकूलता) तथा मौनी = मननशील, नरः = मनुष्य
सुख-दुःख-(मन- येन = जिस मे = मुझे
बुद्धिकी अनुकूलता- केनचित् = किसी प्रकारसे भी प्रियः = प्रिय है।
व्याख्या—'समः शत्रौ च मित्रे च'—यहाँ भगवान्ने
भक्तमें व्यक्तियोंके प्रति होनेवाली समताका वर्णन किया है।
सर्वत्र भगवद्बुद्धि होने तथा राग-द्वेषसे रहित होनेके कारण
सिद्ध भक्तका किसीके भी प्रति शत्रु-मित्रका भाव नहीं
रहता। लोग ही उसके व्यवहारमें अपने स्वभावके अनुसार
अनुकूलता या प्रतिकूलताको देखकर उसमें मित्रता या
शत्रुताका आरोप कर लेते हैं। साधारण लोगोंका तो कहना
ही क्या है, सावधान रहनेवाले साधकोंका भी उस सिद्ध
भक्तके प्रति मित्रता और शत्रुताका भाव हो सकता है।
परंतु भक्त अपने-आपमें सदैव पूर्णतया सम रहता है।
उसके हृदयमें कभी किसीके प्रति शत्रु-मित्रका भाव उत्पन्न
नहीं होता।
मान लिया जाय कि भक्तके प्रति शत्रुता और
मित्रताका भाव रखनेवाले दो व्यक्तियोंमें धनके बँटवारेसे
सम्बन्धित कोई विवाद हो जाय और उसका निर्णय
करानेके लिये वे भक्तके पास जायँ, तो भक्त धनका
बँटवारा करते समय शत्रु-भाववाले व्यक्तिको कुछ अधिक
और मित्र-भाववाले व्यक्तिको कुछ कम धन देगा। यद्यपि
भक्तके इस निर्णय- (व्यवहार-) में विषमता दीखती है,
तथापि शत्रु-भाववाले व्यक्तिको इस निर्णयमें समता दिखायी
देगी कि इसने पक्षपातरहित बँटवारा किया है। अतः
भक्तके इस निर्णयमें विषमता (पक्षपात) दीखनेपर भी
वास्तवमें यह (समताको उत्पन्न करनेवाला होनेसे) समता
ही कहलायेगी।
उपर्युक्त पदोंसे यह भी सिद्ध होता है कि सिद्ध भक्तके
साथ भी लोग (अपने भावके अनुसार) शत्रुता-मित्रताका
व्यवहार करते हैं और उसके व्यवहारसे अपनेको उसका
शत्रु-मित्र मान लेते हैं। इसीलिये उसे यहाँ शत्रु-मित्रसे
रहित न कहकर 'शत्रु-मित्रमें सम' कहा गया है।
'तथा मानापमानयोः'—मान-अपमान परकृत क्रिया
है, जो शरीरके प्रति होती है। भक्तकी अपने कहलानेवाले
शरीरमें न तो अहंता होती है, न ममता। इसलिये शरीरका
मान-अपमान होनेपर भी भक्तके अन्तःकरणमें कोई विकार
(हर्ष-शोक) पैदा नहीं होता। वह नित्य-निरन्तर समतामें
स्थित रहता है।
'शीतोष्णसुखदुःखेषु समः'—इन पदोंमें दो स्थानों-
पर सिद्ध भक्तकी समता बतायी गयी है—
(१) शीत-उष्णमें समता अर्थात् इन्द्रियोंका अपने-
अपने विषयोंसे संयोग होनेपर अन्तःकरणमें कोई विकार
न होना।
८५०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १२ ]
(२) सुख-दुःखमें समता अर्थात् धनादि पदार्थोंकी प्राप्ति या अप्राप्ति होनेपर अन्तःकरणमें कोई विकार न होना।
‘शीतोष्ण’ शब्दका अर्थ ‘सरदी-गरमी’ होता है। सरदी-गरमी त्वगिन्द्रियके विषय हैं। भक्त केवल त्वगिन्द्रियके विषयोंमें ही सम रहता हो, ऐसी बात नहीं है। वह तो समस्त इन्द्रियोंके विषयोंमें सम रहता है। अतः यहाँ ‘शीतोष्ण’ शब्द समस्त इन्द्रियोंके विषयोंका वाचक है। प्रत्येक इन्द्रियका अपने-अपने विषयके साथ संयोग होनेपर भक्तको उन (अनुकूल या प्रतिकूल) विषयोंका ज्ञान तो होता है, पर उसके अन्तःकरणमें हर्ष-शोकादि विकार नहीं होते। वह सदा सम रहता है।
साधारण मनुष्य धनादि अनुकूल पदार्थोंकी प्राप्तिमें सुख तथा प्रतिकूल पदार्थोंकी प्राप्तिमें दुःखका अनुभव करते हैं। परन्तु उन्हीं पदार्थोंके प्राप्त होने अथवा न होनेपर सिद्ध भक्तके अन्तःकरणमें कभी किंचिन्मात्र भी राग-द्वेष, हर्ष-शोकादि विकार नहीं होते। वह प्रत्येक परिस्थितिमें सम रहता है।
‘सुख-दुःखमें सम’ रहने तथा ‘सुख-दुःखसे रहित’ होने—दोनोंका गीतामें एक ही अर्थमें प्रयोग हुआ है। सुख-दुःखकी परिस्थिति अवश्यम्भावी है; अतः उससे रहित होना सम्भव नहीं है। इसलिये भक्त अनुकूल तथा प्रतिकूल परिस्थितियोंमें सम रहता है। हाँ, अनुकूल तथा प्रतिकूल परिस्थितिको लेकर अन्तःकरणमें जो हर्ष-शोक होते हैं, उनसे रहित हुआ जा सकता है। इस दृष्टिसे गीतामें जहाँ ‘सुख-दुःखमें सम’ होनेकी बात आयी है, वहाँ सुख-दुःखकी परिस्थितिमें सम समझना चाहिये और जहाँ ‘सुख-दुःखसे रहित’ होनेकी बात आयी है, वहाँ (अनुकूल तथा प्रतिकूल परिस्थितिकी प्राप्तिसे होनेवाले) हर्ष-शोकसे रहित समझना चाहिये।
‘संगविवर्जितः’—‘संग’ शब्दका अर्थ सम्बन्ध (संयोग) तथा आसक्ति दोनों ही होते हैं। मनुष्यके लिये यह सम्भव नहीं है कि वह स्वरूपसे सब पदार्थोंका संग अर्थात् सम्बन्ध छोड़ सके; क्योंकि जबतक मनुष्य जीवित रहता है, तबतक शरीर-मन-बुद्धि-इन्द्रियाँ उसके साथ रहती ही हैं। हाँ, शरीरसे भिन्न कुछ पदार्थोंका त्याग स्वरूपसे किया जा सकता है। जैसे किसी व्यक्तिने स्वरूपसे प्राणी-पदार्थोंका संग छोड़ दिया, पर उसके अन्तःकरणमें अगर उनके प्रति किंचिन्मात्र भी आसक्ति बनी हुई है, तो उन
प्राणी-पदार्थोंसे दूर होते हुए भी वास्तवमें उसका उनसे सम्बन्ध बना हुआ ही है। दूसरी ओर, अगर अन्तःकरणमें प्राणी-पदार्थोंकी किंचिन्मात्र भी आसक्ति नहीं है, तो पास रहते हुए भी वास्तवमें उनसे सम्बन्ध नहीं है। अगर पदार्थोंका स्वरूपसे त्याग करनेपर ही मुक्ति होती, तो मरनेवाला हरेक व्यक्ति मुक्त हो जाता; क्योंकि उसने तो अपने शरीरका भी त्याग कर दिया! परन्तु ऐसी बात है नहीं। अन्तःकरणमें आसक्तिके रहते हुए शरीरका त्याग करनेपर भी संसारका बन्धन बना रहता है। अतः मनुष्यको सांसारिक आसक्ति ही बाँधनेवाली है, न कि सांसारिक प्राणी-पदार्थोंका स्वरूपसे सम्बन्ध।
आसक्तिको मिटानेके लिये पदार्थोंका स्वरूपसे त्याग करना भी एक साधन हो सकता है; किंतु खास जरूरत आसक्तिका सर्वथा त्याग करनेकी ही है। संसारके प्रति यदि किंचिन्मात्र भी आसक्ति है, तो उसका चिन्तन अवश्य होगा। इस कारण वह आसक्ति साधकको क्रमशः कामना, क्रोध, मूढ़ता आदिको प्राप्त कराती हुई उसे पतनके गर्तमें गिरानेका हेतु बन सकती है (गीता—दूसरे अध्यायका बासठवाँ-तिरसठवाँ श्लोक)।
भगवान्ने दूसरे अध्यायके उनसठवाँ श्लोकमें ‘परं दृष्ट्वा निवर्तते’ पदोंसे भगवत्प्राप्तिके बाद आसक्तिकी सर्वथा निवृत्तिकी बात कही है। भगवत्प्राप्तिसे पहले भी आसक्तिकी निवृत्ति हो सकती है, पर भगवत्प्राप्तिके बाद तो आसक्ति सर्वथा निवृत्त हो ही जाती है। भगवत्प्राप्त महापुरुषमें आसक्तिका सर्वथा अभाव होता ही है। परन्तु भगवत्प्राप्तिसे पूर्व साधनावस्थामें आसक्तिका सर्वथा अभाव होता ही नहीं—ऐसा नियम नहीं है। साधनावस्थामें भी आसक्तिका सर्वथा अभाव होकर साधकको तत्काल भगवत्प्राप्ति हो सकती है (गीता—पाँचवाँ अध्यायका इक्कीसवाँ और सोलहवाँ अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)।
आसक्ति न तो परमात्माके अंश शुद्ध चेतनमें रहती है और न जड-(प्रकृति-में) ही। वह जड और चेतनके सम्बन्धरूप ‘मैं’-पनकी मान्यतामें रहती है। वही आसक्ति बुद्धि, मन, इन्द्रियाँ और विषयों-(पदार्थों-में) प्रतीत होती है। अगर साधकके ‘मैं’-पनकी मान्यतामें रहनेवाली आसक्ति मिट जाय, तो दूसरी जगह प्रतीत होनेवाली आसक्ति स्वतः मिट जायगी। आसक्तिका कारण अविवेक है। अपने विवेकको पूर्णतया महत्त्व न देनेसे साधकमें आसक्ति रहती है। भक्तमें अविवेक नहीं रहता। इसलिये
श्लोक १८-१९ ]
- साधक-संजीवनी *
८५९
वह आसक्तिसे सर्वथा रहित होता है।
अपने अंशी भगवान्से विमुख होकर भूलसे संसारको अपना मान लेनेसे संसारमें राग हो जाता है और राग होनेसे संसारमें आसक्ति हो जाती है। संसारसे माना हुआ अपनापन सर्वथा मिट जानेसे बुद्धि सम हो जाती है। बुद्धिके सम होनेपर स्वयं आसक्ति रहित हो जाता है।
मार्मिक बात
वास्तवमें जीवमात्रकी भगवान्के प्रति स्वाभाविक अनुरक्ति (प्रेम) है। जबतक संसारके साथ भूलसे माना हुआ अपनेपनका सम्बन्ध है, तबतक वह अनुरक्ति प्रकट नहीं होती, प्रत्युत संसारमें आसक्तिके रूपमें प्रतीत होती है। संसारकी आसक्ति रहते हुए भी वस्तुतः भगवान्की अनुरक्ति मिटती नहीं। अनुरक्तिके प्रकट होते ही आसक्ति (सूर्यका उदय होनेपर अंधकारकी तरह) सर्वथा निवृत्त हो जाती है। ज्यों-ज्यों संसारसे विरक्ति होती है, त्यों-ही-त्यों भगवान्में अनुरक्ति प्रकट होती है। यह नियम है कि आसक्तिको समाप्त करके विरक्ति स्वयं भी उसी प्रकार शान्त हो जाती है, जिस प्रकार लकड़ीको जलाकर अग्नि। इस प्रकार आसक्ति और विरक्तिके न रहनेपर स्वतः-स्वाभाविक अनुरक्ति-(भगवत्प्रेम-) का स्रोत प्रवाहित होने लगता है। इसके लिये किंचिन्मात्र भी कोई उद्योग नहीं करना पड़ता। फिर भक्त सब प्रकारसे भगवान्के पूर्ण समर्पित हो जाता है। उसकी सम्पूर्ण क्रियाएँ भगवान्की प्रियताके लिये ही होती हैं। उससे प्रसन्न होकर भगवान् उस भक्तको अपना प्रेम प्रदान करते हैं। भक्त उस प्रेमको भी भगवान्के ही प्रति लगा देता है। इससे भगवान् और आनन्दित होते हैं तथा पुनः उसे प्रेम प्रदान करते हैं। भक्त पुनः उसे भगवान्के प्रति लगा देता है। इस प्रकार भक्त और भगवान्के बीच प्रतिक्षण वर्धमान प्रेमके आदान-प्रदानकी यह लीला चलती रहती है।
‘तुल्यनिन्दास्तुतिः’ —निन्दा-स्तुति मुख्यतः नामकी होती है। यह भी परकृत क्रिया है। लोग अपने स्वभावके अनुसार भक्तकी निन्दा या स्तुति किया करते हैं। भक्तमें अपने कहलानेवाले नाम और शरीरमें लेशमात्र भी अहंता और ममता नहीं होती। इसलिये निन्दा-स्तुतिका उसपर लेशमात्र भी असर नहीं पड़ता। भक्तका न तो अपनी स्तुति या प्रशंसा करनेवालेके प्रति राग होता है और न निन्दा करनेवालेके प्रति द्वेष ही होता है। उसकी दोनोंमें ही समबुद्धि रहती है। साधारण मनुष्योंके भीतर अपनी प्रशंसाकी कामना रहा
करती है, इसलिये वे अपनी निन्दा सुनकर दुःखका और स्तुति सुनकर सुखका अनुभव करते हैं। इसके विपरीत (अपनी प्रशंसा न चाहनेवाले) साधक पुरुष निन्दा सुनकर सावधान होते हैं और स्तुति सुनकर लज्जित होते हैं। परन्तु नाममें किंचिन्मात्र भी अपनापन न होनेके कारण सिद्ध भक्त इन दोनों भावोंसे रहित होता है अर्थात् निन्दा-स्तुतिमें सम होता है। हाँ, वह भी कभी-कभी लोकसंग्रहके लिये साधककी तरह (निन्दामें सावधान तथा स्तुतिमें लज्जित होनेका) व्यवहार कर सकता है।
भक्तकी सर्वत्र भगवदबुद्धि होनेके कारण भी उसका निन्दा-स्तुति करनेवालोंमें भेदभाव नहीं होता। ऐसा भेदभाव न रहनेसे ही यह प्रतीत होता है कि वह निन्दा-स्तुतिमें सम है।
भक्तके द्वारा अशुभ कर्म तो हो ही नहीं सकते और शुभ-कर्मोंके होनेमें वह केवल भगवान्को हेतु मानता है। फिर भी उसकी कोई निन्दा या स्तुति करे, तो उसके चित्तमें कोई विकार पैदा नहीं होता।
‘मौनी’ —सिद्ध भक्तके द्वारा स्वतः-स्वाभाविक भगवत्स्वरूपका मनन होता रहता है, इसलिये उसको ‘मौनी’ अर्थात् मननशील कहा गया है। अन्तःकरणमें आनेवाली प्रत्येक वृत्तिमें उसको ‘वासुदेवः सर्वम्’ (गीता ७।१९) ‘सब कुछ भगवान् ही हैं’—यही दीखता है। इसलिये उसके द्वारा निरन्तर ही भगवान्का मनन होता है।
यहाँ ‘मौनी’ पदका अर्थ ‘वाणीका मौन रखनेवाला’ नहीं माना जा सकता; क्योंकि ऐसा माननेसे वाणीके द्वारा भक्तिका प्रचार करनेवाले भक्त पुरुष भक्त ही नहीं कहलायेंगे। इसके सिवाय अगर वाणीका मौन रखनेमात्रसे भक्त होना सम्भव होता, तो भक्त होना बहुत ही आसान हो जाता और ऐसे भक्त असंख्य बन जाते; किंतु संसारमें भक्तोंकी संख्या अधिक देखनेमें नहीं आती। इसके सिवाय आसुर स्वभाववाला दम्भी व्यक्ति भी हठपूर्वक वाणीका मौन रख सकता है। परन्तु यहाँ भगवत्प्राप्त सिद्ध भक्तके लक्षण बताये जा रहे हैं। इसलिये यहाँ ‘मौनी’ पदका अर्थ ‘भगवत्स्वरूपका मनन करनेवाला’ ही मानना युक्तिसंगत है।
‘सन्तुष्टो येन केनचित्’ —दूसरे लोगोंको भक्त ‘सन्तुष्टो येन केनचित्’ अर्थात् प्रारब्धानुसार शरीर-निर्वाहके लिये जो कुछ मिल जाय, उसीमें संतुष्ट दीखता है; परन्तु वास्तवमें भक्तकी संतुष्टिका कारण कोई सांसारिक पदार्थ, परिस्थिति आदि नहीं होती। एकमात्र
८५२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १२ ]
भगवान्में ही प्रेम होनेके कारण वह नित्य-निरन्तर भगवान्में ही संतुष्ट रहता है। इस संतुष्टिके कारण वह संसारको प्रत्येक अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिमें सम रहता है; क्योंकि उसके अनुभवमें प्रत्येक अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति भगवान्के मंगलमय विधानसे ही आती है। इस प्रकार प्रत्येक परिस्थितिमें नित्य-निरन्तर संतुष्ट रहनेके कारण उसे 'सन्तुष्टो येन केनचित्' कहा गया है।
'अनिकेतः'—जिनका कोई निकेत अर्थात् वास-स्थान नहीं है, वे ही 'अनिकेत' हों—ऐसी बात नहीं है। चाहे गृहस्थ हों या साधु-संन्यासी, जिनकी अपने रहनेके स्थानमें ममता-आसक्ति नहीं है, वे सभी 'अनिकेत' हैं। भक्तका रहनेके स्थानमें और शरीर (स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीर) में लेशमात्र भी अपनापन एवं आसक्ति नहीं होती। इसलिये उसको 'अनिकेतः' कहा गया है।
'स्थिरमतिः'—भक्तकी बुद्धिमें भगवत्तत्त्वकी सत्ता और स्वरूपके विषयमें कोई संशय अथवा विपर्यय (विपरीत ज्ञान) नहीं होता। अतः उसकी बुद्धि भगवत्तत्त्वके ज्ञानसे कभी किसी अवस्थामें विचलित नहीं होती। इसलिये उसको 'स्थिरमतिः' कहा गया है। भगवत्तत्त्वको जाननेके लिये उसको कभी किसी प्रमाण या शास्त्र-विचार, स्वाध्याय आदिकी जरूरत नहीं रहती; क्योंकि वह स्वाभाविकरूपसे भगवत्तत्त्वमें तल्लीन रहता है।
स्थिरबुद्धि होनेमें कामनाएँ ही बाधक होती हैं (गीता— दूसरे अध्यायका चौवालीसवाँ श्लोक)। अतः कामनाओंके त्यागसे ही स्थिरबुद्धि होना सम्भव है (गीता—दूसरे अध्यायका पचपनवाँ श्लोक)। अन्तःकरणमें सांसारिक (संयोगजन्य) सुखकी कामना रहनेसे संसारमें आसक्ति हो जाती है। यह आसक्ति संसारको असत्य या मिथ्या जान लेनेपर भी मिटती नहीं; जैसे—सिनेमामें दीखनेवाले दृश्य- (प्राणी-पदार्थों- ) को मिथ्या जानते हुए भी उसमें आसक्ति हो जाती है अथवा जैसे भूतकालकी बातोंको याद करते समय मानसिक दृष्टिके सामने आनेवाले दृश्यको मिथ्या जानते हुए भी उसमें आसक्ति हो जाती है। अतः जबतक भीतरमें सांसारिक सुखकी कामना है, तबतक संसारको मिथ्या माननेपर भी संसारकी आसक्ति नहीं मिटती। आसक्तिसे संसारकी स्वतन्त्र सत्ता दूढ़ होती है। सांसारिक सुखकी कामना मिटनेपर आसक्ति स्वतः मिट जाती है। आसक्ति मिटनेपर संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव हो जाता है और एक भगवत्तत्त्वमें बुद्धि स्थिर हो
जाती है।
'भक्तिमान्ने प्रियो नरः'—'भक्तिमान्' पदमें 'भक्ति' शब्दके साथ नित्ययोगके अर्थमें 'मनुष्य' प्रत्यय है। इसका तात्पर्य यह है कि मनुष्यमें स्वाभाविकरूपसे 'भक्ति' (भगवत्प्रेम) रहती है। मनुष्यसे भूल यही होती है कि वह भगवान्को छोड़कर संसारकी भक्ति करने लगता है। इसलिये उसे स्वाभाविक रहनेवाली भगवद्भक्तिका रस नहीं मिलता और उसके जीवनमें नीरसता रहती है। सिद्ध भक्त हरदम भक्ति-रसमें तल्लीन रहता है। इसलिये उसको 'भक्तिमान्' कहा गया है। ऐसा भक्तिमान् मनुष्य भगवान्को प्रिय होता है।
'नरः' पद देनेका तात्पर्य है कि भगवान्को प्राप्त करके जिसने अपना मनुष्यजीवन सफल (सार्थक) कर लिया है, वही वास्तवमें नर (मनुष्य) कहलानेयोग्य है। जो मनुष्य-शरीरको पाकर सांसारिक भोग और संग्रहमें ही लगा हुआ है, वह नर (मनुष्य) कहलानेयोग्य नहीं है।
[इन दो श्लोकोंमें भक्तके सदा-सर्वदा समभावमें स्थित रहनेकी बात कही गयी है। शत्रु-मित्र, मान-अपमान, शीत-उष्ण, सुख-दुःख और निन्दा-स्तुति—इन पाँचों द्वन्द्नोंमें समता होनेसे ही साधक पूर्णतः समभावमें स्थित कहा जा सकता है।]
प्रकरण-सम्बन्धी विशेष बात
भगवान्ने पहले प्रकरणके अन्तर्गत तेरहवें-चौदहवें श्लोकोंमें सिद्ध भक्तोंके लक्षणोंका वर्णन करके अन्तमें 'यो मद्भक्तः स मे प्रियः' कहा, दूसरे प्रकरणके अन्तर्गत पन्द्रहवें श्लोकके अन्तमें 'यः स च मे प्रियः' कहा, तीसरे प्रकरणके अन्तर्गत सोलहवें श्लोकके अन्तमें 'यो मद्भक्तः स मे प्रियः' कहा, चौथे प्रकरणके अन्तर्गत सत्रहवें श्लोकके अन्तमें 'भक्तिमान् यः स मे प्रियः' कहा और अन्तिम पाँचवें प्रकरणके अन्तर्गत अठारहवें-उन्नीसवें श्लोकोंके अन्तमें 'भक्तिमान् मे प्रियो नरः' कहा। इस प्रकार भगवान्ने पाँच बार अलग-अलग 'मे प्रियः' पद देकर सिद्ध भक्तोंके लक्षणोंको पाँच भागोंमें विभक्त किया है। इसलिये सात श्लोकोंमें बताये गये सिद्ध भक्तोंके लक्षणोंको एक ही प्रकरणके अन्तर्गत नहीं समझना चाहिये। इसका मुख्य कारण यह है कि यदि यह एक ही प्रकरण होता, तो एक लक्षणको बार-बार न कहकर एक ही बार कहा जाता, और 'मे प्रियः' पद भी एक ही बार कहे जाते।
श्लोक २० ]
- साधक-संजीवनी *
८५३
पाँचों प्रकरणोंके अन्तर्गत सिद्ध भक्तोंके लक्षणोंमें राग-द्वेष और हर्ष-शोकका अभाव बताया गया है। जैसे, पहले प्रकरणमें 'निर्ममः' पदसे रागका, 'अद्वेष्टा' पदसे द्वेषका और 'समदुःखमुखः' पदसे हर्ष-शोकका अभाव बताया गया है। दूसरे प्रकरणमें 'हर्षामर्षभयोद्वेगैः' पदसे राग-द्वेष और हर्ष-शोकका अभाव बताया गया है। तीसरे प्रकरणमें 'अनपेक्षः' पदसे रागका, 'उदासीनः' पदसे द्वेषका और 'गतव्यथः' पदसे हर्ष-शोकका अभाव बताया गया है। चौथे प्रकरणमें 'न काङ्क्षति' पदोंसे रागका, 'न द्वेष्टि' पदोंसे द्वेषका और 'न ह्व्यति' तथा 'न शोचति' पदोंसे हर्ष-शोकका अभाव बताया गया है। अन्तिम पाँचवें प्रकरणमें 'संगविवर्जितः' पदसे रागका, 'सन्तुष्टः' पदसे एकमात्र भगवान्में ही सन्तुष्ट रहनेके कारण द्वेषका और 'शीतोष्णमुखदुःखेषु समः' पदोंसे हर्ष-शोकका अभाव बताया गया है।
अगर सिद्ध भक्तोंके लक्षण बतानेवाला (सात श्लोकोंका) एक ही प्रकरण होता, तो सिद्ध भक्तमें राग-द्वेष, हर्ष-शोकादि विकारोंके अभावकी बात कहीं शब्दोंसे और कहीं भावसे बार-बार कहनेकी जरूरत नहीं होती। इसी तरह चौदहवें और उन्नीसवें श्लोकमें 'सन्तुष्टः' पदका तथा तेरहवें श्लोकमें 'समदुःखमुखः' और अठारहवें श्लोकमें 'शीतोष्णमुखदुःखेषु समः' पदोंका भी सिद्ध
परिशिष्ट भाव —इन दो श्लोकोंमें भगवान्ने वे ही स्थल दिये हैं, जहाँ समता होनेमें कठिनता आती है। अगर इनमें समता हो जाय तो अन्य जगह समता होनेमें कठिनता नहीं आयेगी। अपनेपर कोई असर न पड़ना 'समता' है। यद्यपि भक्तकी दृष्टिमें भगवान्के सिवाय दूसरी सत्ता है ही नहीं, तथापि दूसरे लोगोंकी दृष्टिमें वह शत्रु और मित्रमें सम दीखता है। शत्रुता-मित्रताका ज्ञान होनेपर भी वह सम रहता है।
'शीतोष्णमुखदुःखेषु' —भक्त शरीरकी अनुकूलता-प्रतिकूलतामें भी सम रहता है और मन-बुद्धिकी अनुकूलता-प्रतिकूलतामें भी सम रहता है। तात्पर्य है कि भक्त शरीरकी अनुकूलता-प्रतिकूलता, इन्द्रियोंकी अनुकूलता-प्रतिकूलता, मनकी अनुकूलता-प्रतिकूलता, बुद्धिकी अनुकूलता-प्रतिकूलता, सिद्धान्तकी अनुकूलता-प्रतिकूलता आदि सब तरहकी अनुकूलता-प्रतिकूलतामें सम रहता है। उसका न तो अनुकूलतामें राग होता है और न प्रतिकूलतामें द्वेष होता है।
'यो मद्भक्तः स मे प्रियः', 'भक्तिमान्मे प्रियो नरः' आदि पदोंका तात्पर्य है कि वे भक्तिके कारण भगवान्को प्रिय हैं, गुणों-(लक्षणों-के) कारण नहीं। गुण मुख्य नहीं हैं, प्रत्युत भक्ति मुख्य है।
सम्बन्ध —पीछेके सात श्लोकोंमें भगवान्ने सिद्ध भक्तोंके कुल उन्तालीस लक्षण बताये। अब आगेके श्लोकमें भगवान् अर्जुनके प्रश्नका स्पष्ट रीतिसे उत्तर देते हैं।
ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते।
श्रद्धाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ॥ २० ॥
भक्तोंके लक्षणोंमें दो बार प्रयोग हुआ है, जिससे (सिद्ध भक्तोंके लक्षणोंका एक ही प्रकरण माननेसे) पुनरुक्तिका दोष आता है। भगवान्के वचनोंमें पुनरुक्तिका दोष आना सम्भव ही नहीं। अतः सातों श्लोकोंके विषयको एक प्रकरण न मानकर अलग-अलग पाँच प्रकरण मानना ही युक्तिसंगत है।
इस तरह पाँचों प्रकरण स्वतन्त्र (भिन्न-भिन्न) होनेसे किसी एक प्रकरणके भी सब लक्षण जिसमें हों, वही भगवान्का प्रिय भक्त है। प्रत्येक प्रकरणमें सिद्ध भक्तोंके अलग-अलग लक्षण बतानेका कारण यह है कि साधन-पद्धति, प्रारब्ध, वर्ण, आश्रम, देश, काल, परिस्थिति आदिके भेदसे सब भक्तोंकी प्रकृति-(स्वभाव-) में परस्पर थोड़ा-बहुत भेद रहा करता है। हाँ, राग-द्वेष, हर्ष-शोकादि विकारोंका अत्यन्ताभाव एवं समतामें स्थिति और समस्त प्राणियोंके हितमें रति सबकी समान ही होती है।
साधकको अपनी रुचि, विश्वास, योग्यता, स्वभाव आदिके अनुसार जो प्रकरण अपने अनुकूल दिखायी दे, उसीको आदर्श मानकर उसके अनुसार अपना जीवन बनानेमें लग जाना चाहिये। किसी एक प्रकरणके भी यदि पूरे लक्षण अपनेमें न आयें, तो भी साधकको निराश नहीं होना चाहिये। फिर सफलता अवश्यम्भावी है।
८५४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १२
तु
= परन्तु
भक्ताः
= भक्त
पर्युपासते
= भलीभाँति सेवन
ये
= जो (मुझमें)
इदम्
= इस
करते हैं,
श्रद्दधानाः
= श्रद्धा रखनेवाले
धर्म्यामृतम्
= धर्ममय
ते
= वे
(और)
अमृतका
मे
= मुझे
मत्परमाः
= मेरे परायण
यथा, उक्तम् = जैसा कहा है,
अतीव
= अत्यन्त
हुए
(वैसा ही)
प्रियाः
= प्रिय हैं।
व्याख्या—'ये तु'—यहाँ 'ये' पदसे भगवान्ने उन
साधक भक्तोंका संकेत किया है, जिनके विषयमें अर्जुनने
पहले श्लोकमें प्रश्न करते हुए 'ये' पदका प्रयोग किया
था। उसी प्रश्नके उत्तरमें भगवान्ने दूसरे श्लोकमें सगुणकी
उपासना करनेवाले साधकोंको अपने मतमें ('ये' और 'ते'
पदोंसे) 'युक्ततमाः' बताया था। फिर उसी सगुण-
उपासनाके साधन बताये और फिर सिद्ध भक्तोंके लक्षण
बताकर अब उसी प्रसंगका उपसंहार करते हैं।
यहाँ 'ये' पद उन परम श्रद्धालु भगवत्परायण
साधकोंके लिये आया है। जो सिद्ध भक्तोंके लक्षणोंको
आदर्श मानकर साधन करते हैं।
'तु' पदका प्रयोग प्रकरणको अलग करनेके लिये
किया जाता है। यहाँ सिद्ध भक्तोंके प्रकरणसे साधक
भक्तोंके प्रकरणको अलग करनेके लिये 'तु' पदका प्रयोग
हुआ है। इस पदसे ऐसा प्रतीत होता है कि सिद्ध भक्तोंकी
अपेक्षा साधक भक्त भगवान्को विशेष प्रिय हैं।
'श्रद्दधानाः'—भगवत्प्राप्ति हो जानेके कारण सिद्ध
भक्तोंके लक्षणोंमें श्रद्धाकी बात नहीं आयी; क्योंकि
जबतक नित्यप्राप्त भगवान्का अनुभव नहीं होता, तबतक
श्रद्धाकी जरूरत रहती है। अतः इस पदको श्रद्धालु साधक
भक्तोंका ही वाचक मानना चाहिये। ऐसे श्रद्धालु भक्त
भगवान्के धर्ममय अमृतरूप उपदेशको (जो भगवान्ने
तेरहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक कहा है) भगवत्प्राप्तिके
उद्देश्यसे अपनेमें उतारनेकी चेष्टा किया करते हैं।
यद्यपि भक्तिके साधनमें श्रद्धा और प्रेमका तथा ज्ञानके
साधनमें विवेकका महत्त्व होता है, तथापि इससे यह नहीं
समझना चाहिये कि भक्तिके साधनमें विवेकका और
ज्ञानके साधनमें श्रद्धाका महत्त्व ही नहीं है। वास्तवमें श्रद्धा
और विवेककी सभी साधनोंमें बड़ी आवश्यकता है।
विवेक होनेसे भक्ति-साधनमें तेजी आती है। इसी प्रकार
शास्त्रोंमें तथा परमात्मतत्त्वमें श्रद्धा होनेसे ही ज्ञान-साधनका
पालन हो सकता है। इसलिये भक्ति और ज्ञान दोनों ही
साधनोंमें श्रद्धा और विवेक सहायक हैं।
'मत्परमाः'—साधक भक्तोंका सिद्ध भक्तोंमें अत्यन्त
पूज्यभाव होता है। उनकी सिद्ध भक्तोंके गुणोंमें श्रेष्ठ बुद्धि
होती है। अतः वे उन गुणोंको आदर्श मानकर आदरपूर्वक
उनका अनुसरण करनेके लिये भगवान्के परायण होते हैं।
इस प्रकार भगवान्का चिन्तन करनेसे और भगवान्पर ही
निर्भर रहनेसे वे सब गुण उनमें स्वतः आ जाते हैं।
भगवान्ने ग्यारहवें अध्यायके पचपनवें श्लोकमें
'मत्परमः' पदसे और इसी (बारहवें) अध्यायके छठे
श्लोकमें 'मत्पराः' पदसे अपने परायण होनेकी बात
विशेषरूपसे कहकर अन्तमें पुनः उसी बातको इस
श्लोकमें 'मत्परमाः' पदसे कहा है। इससे सिद्ध होता है
कि भक्तियोगमें भगवत्परायणता मुख्य है। भगवत्परायण
होनेपर भगवत्कृपासे अपने-आप साधन होता है और
असाधन-(साधनके विघ्नों-) का नाश होता है।
'धर्म्यामृतमिदं यथोक्तम्'—सिद्ध भक्तोंके उनतालीस
लक्षणोंके पाँचों प्रकरण धर्ममय अर्थात् धर्मसे ओतप्रोत हैं।
उनमें किंचिन्मात्र भी अधर्मका अंश नहीं है। जिस साधनमें
साधन-विरोधी अंश सर्वथा नहीं होता, वह साधन अमृत-
तुल्य होता है। पहले कहे हुए लक्षण समुदायके धर्ममय
होनेसे तथा उसमें साधन-विरोधी कोई बात न होनेसे ही
उसे 'धर्म्यामृत' संज्ञा दी गयी है।
साधनमें साधन-विरोधी कोई बात न होते हुए भी
जैसा पहले कहा गया है, ठीक वैसा-का-वैसा धर्ममय
अमृतका सेवन तभी सम्भव है, जब साधकका उद्देश्य
किंचिन्मात्र भी धन, मान, बड़ाई, आदर, सत्कार, संग्रह,
सुखभोग आदि न होकर एकमात्र भगवत्प्राप्ति ही हो।
प्रत्येक प्रकरणके सब लक्षण धर्म्यामृत हैं। अतः
साधक जिस प्रकरणके लक्षणोंको आदर्श मानकर साधन
करता है, उसके लिये वही धर्म्यामृत है।
धर्म्यामृतके जो 'अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः....' आदि
लक्षण बताये गये हैं, वे आंशिकरूपसे साधकमात्रमें रहते
हैं और इनके साथ-साथ कुछ दुर्गुण-दुराचार भी रहते हैं।
प्रत्येक प्राणीमें गुण और अवगुण दोनों ही रहते हैं, फिर भी