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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 854, कुल 1299 में से

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पृष्ठ 854

श्लोक २० ]

  • साधक-संजीवनी *

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पाँचों प्रकरणोंके अन्तर्गत सिद्ध भक्तोंके लक्षणोंमें राग-द्वेष और हर्ष-शोकका अभाव बताया गया है। जैसे, पहले प्रकरणमें 'निर्ममः' पदसे रागका, 'अद्वेष्टा' पदसे द्वेषका और 'समदुःखमुखः' पदसे हर्ष-शोकका अभाव बताया गया है। दूसरे प्रकरणमें 'हर्षामर्षभयोद्वेगैः' पदसे राग-द्वेष और हर्ष-शोकका अभाव बताया गया है। तीसरे प्रकरणमें 'अनपेक्षः' पदसे रागका, 'उदासीनः' पदसे द्वेषका और 'गतव्यथः' पदसे हर्ष-शोकका अभाव बताया गया है। चौथे प्रकरणमें 'न काङ्क्षति' पदोंसे रागका, 'न द्वेष्टि' पदोंसे द्वेषका और 'न ह्व्यति' तथा 'न शोचति' पदोंसे हर्ष-शोकका अभाव बताया गया है। अन्तिम पाँचवें प्रकरणमें 'संगविवर्जितः' पदसे रागका, 'सन्तुष्टः' पदसे एकमात्र भगवान्में ही सन्तुष्ट रहनेके कारण द्वेषका और 'शीतोष्णमुखदुःखेषु समः' पदोंसे हर्ष-शोकका अभाव बताया गया है।

अगर सिद्ध भक्तोंके लक्षण बतानेवाला (सात श्लोकोंका) एक ही प्रकरण होता, तो सिद्ध भक्तमें राग-द्वेष, हर्ष-शोकादि विकारोंके अभावकी बात कहीं शब्दोंसे और कहीं भावसे बार-बार कहनेकी जरूरत नहीं होती। इसी तरह चौदहवें और उन्नीसवें श्लोकमें 'सन्तुष्टः' पदका तथा तेरहवें श्लोकमें 'समदुःखमुखः' और अठारहवें श्लोकमें 'शीतोष्णमुखदुःखेषु समः' पदोंका भी सिद्ध

परिशिष्ट भाव —इन दो श्लोकोंमें भगवान्ने वे ही स्थल दिये हैं, जहाँ समता होनेमें कठिनता आती है। अगर इनमें समता हो जाय तो अन्य जगह समता होनेमें कठिनता नहीं आयेगी। अपनेपर कोई असर न पड़ना 'समता' है। यद्यपि भक्तकी दृष्टिमें भगवान्के सिवाय दूसरी सत्ता है ही नहीं, तथापि दूसरे लोगोंकी दृष्टिमें वह शत्रु और मित्रमें सम दीखता है। शत्रुता-मित्रताका ज्ञान होनेपर भी वह सम रहता है।

'शीतोष्णमुखदुःखेषु' —भक्त शरीरकी अनुकूलता-प्रतिकूलतामें भी सम रहता है और मन-बुद्धिकी अनुकूलता-प्रतिकूलतामें भी सम रहता है। तात्पर्य है कि भक्त शरीरकी अनुकूलता-प्रतिकूलता, इन्द्रियोंकी अनुकूलता-प्रतिकूलता, मनकी अनुकूलता-प्रतिकूलता, बुद्धिकी अनुकूलता-प्रतिकूलता, सिद्धान्तकी अनुकूलता-प्रतिकूलता आदि सब तरहकी अनुकूलता-प्रतिकूलतामें सम रहता है। उसका न तो अनुकूलतामें राग होता है और न प्रतिकूलतामें द्वेष होता है।

'यो मद्भक्तः स मे प्रियः', 'भक्तिमान्मे प्रियो नरः' आदि पदोंका तात्पर्य है कि वे भक्तिके कारण भगवान्को प्रिय हैं, गुणों-(लक्षणों-के) कारण नहीं। गुण मुख्य नहीं हैं, प्रत्युत भक्ति मुख्य है।

सम्बन्ध —पीछेके सात श्लोकोंमें भगवान्ने सिद्ध भक्तोंके कुल उन्तालीस लक्षण बताये। अब आगेके श्लोकमें भगवान् अर्जुनके प्रश्नका स्पष्ट रीतिसे उत्तर देते हैं।

ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते।

श्रद्धाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ॥ २० ॥

भक्तोंके लक्षणोंमें दो बार प्रयोग हुआ है, जिससे (सिद्ध भक्तोंके लक्षणोंका एक ही प्रकरण माननेसे) पुनरुक्तिका दोष आता है। भगवान्के वचनोंमें पुनरुक्तिका दोष आना सम्भव ही नहीं। अतः सातों श्लोकोंके विषयको एक प्रकरण न मानकर अलग-अलग पाँच प्रकरण मानना ही युक्तिसंगत है।

इस तरह पाँचों प्रकरण स्वतन्त्र (भिन्न-भिन्न) होनेसे किसी एक प्रकरणके भी सब लक्षण जिसमें हों, वही भगवान्का प्रिय भक्त है। प्रत्येक प्रकरणमें सिद्ध भक्तोंके अलग-अलग लक्षण बतानेका कारण यह है कि साधन-पद्धति, प्रारब्ध, वर्ण, आश्रम, देश, काल, परिस्थिति आदिके भेदसे सब भक्तोंकी प्रकृति-(स्वभाव-) में परस्पर थोड़ा-बहुत भेद रहा करता है। हाँ, राग-द्वेष, हर्ष-शोकादि विकारोंका अत्यन्ताभाव एवं समतामें स्थिति और समस्त प्राणियोंके हितमें रति सबकी समान ही होती है।

साधकको अपनी रुचि, विश्वास, योग्यता, स्वभाव आदिके अनुसार जो प्रकरण अपने अनुकूल दिखायी दे, उसीको आदर्श मानकर उसके अनुसार अपना जीवन बनानेमें लग जाना चाहिये। किसी एक प्रकरणके भी यदि पूरे लक्षण अपनेमें न आयें, तो भी साधकको निराश नहीं होना चाहिये। फिर सफलता अवश्यम्भावी है।

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