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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 855

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १२

तु

= परन्तु

भक्ताः

= भक्त

पर्युपासते

= भलीभाँति सेवन

ये

= जो (मुझमें)

इदम्

= इस

करते हैं,

श्रद्दधानाः

= श्रद्धा रखनेवाले

धर्म्यामृतम्

= धर्ममय

ते

= वे

(और)

अमृतका

मे

= मुझे

मत्परमाः

= मेरे परायण

यथा, उक्तम् = जैसा कहा है,

अतीव

= अत्यन्त

हुए

(वैसा ही)

प्रियाः

= प्रिय हैं।

व्याख्या—'ये तु'—यहाँ 'ये' पदसे भगवान्ने उन

साधक भक्तोंका संकेत किया है, जिनके विषयमें अर्जुनने

पहले श्लोकमें प्रश्न करते हुए 'ये' पदका प्रयोग किया

था। उसी प्रश्नके उत्तरमें भगवान्ने दूसरे श्लोकमें सगुणकी

उपासना करनेवाले साधकोंको अपने मतमें ('ये' और 'ते'

पदोंसे) 'युक्ततमाः' बताया था। फिर उसी सगुण-

उपासनाके साधन बताये और फिर सिद्ध भक्तोंके लक्षण

बताकर अब उसी प्रसंगका उपसंहार करते हैं।

यहाँ 'ये' पद उन परम श्रद्धालु भगवत्परायण

साधकोंके लिये आया है। जो सिद्ध भक्तोंके लक्षणोंको

आदर्श मानकर साधन करते हैं।

'तु' पदका प्रयोग प्रकरणको अलग करनेके लिये

किया जाता है। यहाँ सिद्ध भक्तोंके प्रकरणसे साधक

भक्तोंके प्रकरणको अलग करनेके लिये 'तु' पदका प्रयोग

हुआ है। इस पदसे ऐसा प्रतीत होता है कि सिद्ध भक्तोंकी

अपेक्षा साधक भक्त भगवान्को विशेष प्रिय हैं।

'श्रद्दधानाः'—भगवत्प्राप्ति हो जानेके कारण सिद्ध

भक्तोंके लक्षणोंमें श्रद्धाकी बात नहीं आयी; क्योंकि

जबतक नित्यप्राप्त भगवान्का अनुभव नहीं होता, तबतक

श्रद्धाकी जरूरत रहती है। अतः इस पदको श्रद्धालु साधक

भक्तोंका ही वाचक मानना चाहिये। ऐसे श्रद्धालु भक्त

भगवान्के धर्ममय अमृतरूप उपदेशको (जो भगवान्ने

तेरहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक कहा है) भगवत्प्राप्तिके

उद्देश्यसे अपनेमें उतारनेकी चेष्टा किया करते हैं।

यद्यपि भक्तिके साधनमें श्रद्धा और प्रेमका तथा ज्ञानके

साधनमें विवेकका महत्त्व होता है, तथापि इससे यह नहीं

समझना चाहिये कि भक्तिके साधनमें विवेकका और

ज्ञानके साधनमें श्रद्धाका महत्त्व ही नहीं है। वास्तवमें श्रद्धा

और विवेककी सभी साधनोंमें बड़ी आवश्यकता है।

विवेक होनेसे भक्ति-साधनमें तेजी आती है। इसी प्रकार

शास्त्रोंमें तथा परमात्मतत्त्वमें श्रद्धा होनेसे ही ज्ञान-साधनका

पालन हो सकता है। इसलिये भक्ति और ज्ञान दोनों ही

साधनोंमें श्रद्धा और विवेक सहायक हैं।

'मत्परमाः'—साधक भक्तोंका सिद्ध भक्तोंमें अत्यन्त

पूज्यभाव होता है। उनकी सिद्ध भक्तोंके गुणोंमें श्रेष्ठ बुद्धि

होती है। अतः वे उन गुणोंको आदर्श मानकर आदरपूर्वक

उनका अनुसरण करनेके लिये भगवान्के परायण होते हैं।

इस प्रकार भगवान्का चिन्तन करनेसे और भगवान्पर ही

निर्भर रहनेसे वे सब गुण उनमें स्वतः आ जाते हैं।

भगवान्ने ग्यारहवें अध्यायके पचपनवें श्लोकमें

'मत्परमः' पदसे और इसी (बारहवें) अध्यायके छठे

श्लोकमें 'मत्पराः' पदसे अपने परायण होनेकी बात

विशेषरूपसे कहकर अन्तमें पुनः उसी बातको इस

श्लोकमें 'मत्परमाः' पदसे कहा है। इससे सिद्ध होता है

कि भक्तियोगमें भगवत्परायणता मुख्य है। भगवत्परायण

होनेपर भगवत्कृपासे अपने-आप साधन होता है और

असाधन-(साधनके विघ्नों-) का नाश होता है।

'धर्म्यामृतमिदं यथोक्तम्'—सिद्ध भक्तोंके उनतालीस

लक्षणोंके पाँचों प्रकरण धर्ममय अर्थात् धर्मसे ओतप्रोत हैं।

उनमें किंचिन्मात्र भी अधर्मका अंश नहीं है। जिस साधनमें

साधन-विरोधी अंश सर्वथा नहीं होता, वह साधन अमृत-

तुल्य होता है। पहले कहे हुए लक्षण समुदायके धर्ममय

होनेसे तथा उसमें साधन-विरोधी कोई बात न होनेसे ही

उसे 'धर्म्यामृत' संज्ञा दी गयी है।

साधनमें साधन-विरोधी कोई बात न होते हुए भी

जैसा पहले कहा गया है, ठीक वैसा-का-वैसा धर्ममय

अमृतका सेवन तभी सम्भव है, जब साधकका उद्देश्य

किंचिन्मात्र भी धन, मान, बड़ाई, आदर, सत्कार, संग्रह,

सुखभोग आदि न होकर एकमात्र भगवत्प्राप्ति ही हो।

प्रत्येक प्रकरणके सब लक्षण धर्म्यामृत हैं। अतः

साधक जिस प्रकरणके लक्षणोंको आदर्श मानकर साधन

करता है, उसके लिये वही धर्म्यामृत है।

धर्म्यामृतके जो 'अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः....' आदि

लक्षण बताये गये हैं, वे आंशिकरूपसे साधकमात्रमें रहते

हैं और इनके साथ-साथ कुछ दुर्गुण-दुराचार भी रहते हैं।

प्रत्येक प्राणीमें गुण और अवगुण दोनों ही रहते हैं, फिर भी