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भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 856, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 856

श्लोक २० ]

  • साधक-संजीवनी *

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अवगुणोंका तो सर्वथा त्याग हो सकता है, पर गुणोंका सर्वथा त्याग नहीं हो सकता। कारण कि साधन और स्वभावके अनुसार सिद्ध पुरुषमें गुणोंका तारतम्य तो रहता है; परन्तु उनमें गुणोंकी कमिरूप अवगुण किंचित्मात्र भी नहीं रहता। गुणोंमें न्यूनाधिकता रहनेसे उनके पाँच विभाग किये गये हैं; परन्तु अवगुण सर्वथा त्याज्य हैं; अतः उनका विभाग हो ही नहीं सकता।

साधक सत्संग तो करता है, पर साथ-ही-साथ कुसंग भी होता रहता है। वह संयम तो करता है, पर साथ-ही-साथ असंयम भी होता रहता है। वह साधन तो करता है, पर साथ-ही-साथ असाधन भी होता रहता है। जबतक साधनके साथ असाधन अथवा गुणोंके साथ अवगुण रहते हैं, तबतक साधककी साधना पूर्ण नहीं होती। कारण कि असाधनके साथ साधन अथवा अवगुणोंके साथ गुण उनमें भी पाये जाते हैं, जो साधक नहीं है। इसके सिवाय जबतक साधनके साथ असाधन अथवा गुणोंके साथ अवगुण रहते हैं, तबतक साधकमें अपने साधन अथवा गुणोंका अभिमान रहता है, जो आसुरी सम्पत्तिका आधार है। इसलिये धर्माभूतका यथोक्त सेवन करनेके लिये कहा गया है। तात्पर्य यह है कि इसका ठीक वैसा ही पालन होना चाहिये, जैसा वर्णन किया गया है। अगर धर्माभूतके सेवनमें दोष (असाधन) भी साथ रहेंगे तो भगवत्प्राप्ति नहीं होगी। अतः इस विषयमें साधकको विशेष सावधान रहना चाहिये। यदि साधनमें किसी कारणवश आंशिकरूपसे कोई दोषमय वृत्ति उत्पन्न हो जाय, तो उसकी अवहेलना न करके तत्परतासे उसे हटानेकी चेष्टा करनी चाहिये। चेष्टा करनेपर भी न हटे, तो व्याकुलतापूर्वक प्रभुसे प्रार्थना करनी चाहिये।

जितने सदगुण, सदाचार, सद्भाव आदि हैं, वे सब-के-सब 'सत्'- (परमात्मा-) के सम्बन्धसे ही होते हैं। इसी प्रकार दुर्गुण, दुराचार, दुर्भाव आदि सब 'असत्' के सम्बन्धसे ही होते हैं। दुराचारी-से-दुराचारी पुरुषमें भी सदगुण-सदाचारका सर्वथा अभाव नहीं होता; क्योंकि 'सत्'- (परमात्मा-) का अंश होनेके कारण जीवमात्रका 'सत्' से नित्यसिद्ध सम्बन्ध है। परमात्मासे सम्बन्ध रहनेके कारण किसी-न-किसी अंशमें उसमें सदगुण-सदाचार रहेंगे ही। परमात्माकी प्राप्ति होनेपर असत्से सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और दुर्गुण, दुराचार, दुर्भाव आदि सर्वथा नष्ट हो जाते हैं।

सदगुण-सदाचार-सद्भाव भगवान्की सम्पत्ति है। इसलिये

साधक जितना ही भगवान्के सम्मुख अथवा भगवत्परायण होता जायगा, उतने ही अंशमें स्वतः सदगुण-सदाचार-सद्भाव प्रकट होते जायेंगे और दुर्गुण-दुराचार-दुर्भाव नष्ट होते जायेंगे।

राग-द्वेष, हर्ष-शोक, काम-क्रोध आदि अन्तःकरणके विकार हैं, धर्म नहीं (गीता—तेरहवें अध्यायका छठा श्लोक)। धर्मके साथ धर्मका नित्य-सम्बन्ध रहता है। जैसे, सूर्यरूप धर्मके साथ उष्णतारूप धर्मका नित्य-सम्बन्ध रहता है, जो कभी मिट नहीं सकता। अतः धर्मके बिना धर्म तथा धर्मके बिना धर्म नहीं रह सकता। काम-क्रोधादि विकार साधारण मनुष्यमें भी हर समय नहीं रहते, साधन करनेवालेमें कम होते रहते हैं और सिद्ध पुरुषमें तो सर्वथा ही नहीं रहते। यदि ये विकार अन्तःकरणके धर्म होते, तो हर समय एकरूपसे रहते और अन्तःकरण- (धर्म-) के रहते हुए कभी नष्ट नहीं होते। अतः ये अन्तःकरणके धर्म नहीं, प्रत्युत आगन्तुक (आने-जानेवाले) विकार हैं। साधक जैसे-जैसे अपने एकमात्र लक्ष्य भगवान्की ओर बढ़ता है, वैसे-ही-वैसे राग-द्वेषादि विकार मिटते जाते हैं और भगवान्को प्राप्त होनेपर उन विकारोंका अत्यन्ताभाव हो जाता है।

गीतामें जगह-जगह भगवान्ने 'तयोरनं वशमागच्छेत्' (३।३४), 'रागद्वेषवियुक्तैः' (२।६४), 'रागद्वेषौ व्युदस्य' (१८।५१) आदि पदोंसे साधकोंको इन राग-द्वेषादि विकारोंका सर्वथा त्याग करनेके लिये कहा है। यदि ये (राग-द्वेषादि) अन्तःकरणके धर्म होते तो अन्तःकरणके रहते हुए इनका त्याग असम्भव होता और असम्भवको सम्भव बनानेके लिये भगवान् आज्ञा भी कैसे दे सकते थे?

गीतामें सिद्ध महापुरुषोंको राग-द्वेषादि विकारोंसे सर्वथा मुक्त बताया गया है। जैसे, इसी अध्यायके तेरहवें श्लोकसे उनीसवें श्लोकतक जगह-जगह भगवान्ने सिद्ध भक्तोंको राग-द्वेषादि विकारोंसे सर्वथा मुक्त बताया है। इसलिये भी ये विकार ही सिद्ध होते हैं, अन्तःकरणके धर्म नहीं। असत्से सर्वथा विमुख होनेसे उन सिद्ध महापुरुषोंमें ये विकार लेशमात्र भी नहीं रहते। यदि अन्तःकरणमें ये विकार बने रहते, तो फिर वे मुक्त किससे होते?

जिसमें ये विकार लेशमात्र भी नहीं हैं, ऐसे सिद्ध महापुरुषके अन्तःकरणके लक्षणोंको आदर्श मानकर भगवत्प्राप्तिके लिये उनका अनुसरण करनेके लिये भगवान्ने उन लक्षणोंको यहाँ 'धर्माभूतम्' के नामसे सम्बोधित किया है।