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भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 853

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १२ ]

भगवान्में ही प्रेम होनेके कारण वह नित्य-निरन्तर भगवान्में ही संतुष्ट रहता है। इस संतुष्टिके कारण वह संसारको प्रत्येक अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिमें सम रहता है; क्योंकि उसके अनुभवमें प्रत्येक अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति भगवान्के मंगलमय विधानसे ही आती है। इस प्रकार प्रत्येक परिस्थितिमें नित्य-निरन्तर संतुष्ट रहनेके कारण उसे 'सन्तुष्टो येन केनचित्' कहा गया है।

'अनिकेतः'—जिनका कोई निकेत अर्थात् वास-स्थान नहीं है, वे ही 'अनिकेत' हों—ऐसी बात नहीं है। चाहे गृहस्थ हों या साधु-संन्यासी, जिनकी अपने रहनेके स्थानमें ममता-आसक्ति नहीं है, वे सभी 'अनिकेत' हैं। भक्तका रहनेके स्थानमें और शरीर (स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीर) में लेशमात्र भी अपनापन एवं आसक्ति नहीं होती। इसलिये उसको 'अनिकेतः' कहा गया है।

'स्थिरमतिः'—भक्तकी बुद्धिमें भगवत्तत्त्वकी सत्ता और स्वरूपके विषयमें कोई संशय अथवा विपर्यय (विपरीत ज्ञान) नहीं होता। अतः उसकी बुद्धि भगवत्तत्त्वके ज्ञानसे कभी किसी अवस्थामें विचलित नहीं होती। इसलिये उसको 'स्थिरमतिः' कहा गया है। भगवत्तत्त्वको जाननेके लिये उसको कभी किसी प्रमाण या शास्त्र-विचार, स्वाध्याय आदिकी जरूरत नहीं रहती; क्योंकि वह स्वाभाविकरूपसे भगवत्तत्त्वमें तल्लीन रहता है।

स्थिरबुद्धि होनेमें कामनाएँ ही बाधक होती हैं (गीता— दूसरे अध्यायका चौवालीसवाँ श्लोक)। अतः कामनाओंके त्यागसे ही स्थिरबुद्धि होना सम्भव है (गीता—दूसरे अध्यायका पचपनवाँ श्लोक)। अन्तःकरणमें सांसारिक (संयोगजन्य) सुखकी कामना रहनेसे संसारमें आसक्ति हो जाती है। यह आसक्ति संसारको असत्य या मिथ्या जान लेनेपर भी मिटती नहीं; जैसे—सिनेमामें दीखनेवाले दृश्य- (प्राणी-पदार्थों- ) को मिथ्या जानते हुए भी उसमें आसक्ति हो जाती है अथवा जैसे भूतकालकी बातोंको याद करते समय मानसिक दृष्टिके सामने आनेवाले दृश्यको मिथ्या जानते हुए भी उसमें आसक्ति हो जाती है। अतः जबतक भीतरमें सांसारिक सुखकी कामना है, तबतक संसारको मिथ्या माननेपर भी संसारकी आसक्ति नहीं मिटती। आसक्तिसे संसारकी स्वतन्त्र सत्ता दूढ़ होती है। सांसारिक सुखकी कामना मिटनेपर आसक्ति स्वतः मिट जाती है। आसक्ति मिटनेपर संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव हो जाता है और एक भगवत्तत्त्वमें बुद्धि स्थिर हो

जाती है।

'भक्तिमान्ने प्रियो नरः'—'भक्तिमान्' पदमें 'भक्ति' शब्दके साथ नित्ययोगके अर्थमें 'मनुष्य' प्रत्यय है। इसका तात्पर्य यह है कि मनुष्यमें स्वाभाविकरूपसे 'भक्ति' (भगवत्प्रेम) रहती है। मनुष्यसे भूल यही होती है कि वह भगवान्को छोड़कर संसारकी भक्ति करने लगता है। इसलिये उसे स्वाभाविक रहनेवाली भगवद्भक्तिका रस नहीं मिलता और उसके जीवनमें नीरसता रहती है। सिद्ध भक्त हरदम भक्ति-रसमें तल्लीन रहता है। इसलिये उसको 'भक्तिमान्' कहा गया है। ऐसा भक्तिमान् मनुष्य भगवान्को प्रिय होता है।

'नरः' पद देनेका तात्पर्य है कि भगवान्को प्राप्त करके जिसने अपना मनुष्यजीवन सफल (सार्थक) कर लिया है, वही वास्तवमें नर (मनुष्य) कहलानेयोग्य है। जो मनुष्य-शरीरको पाकर सांसारिक भोग और संग्रहमें ही लगा हुआ है, वह नर (मनुष्य) कहलानेयोग्य नहीं है।

[इन दो श्लोकोंमें भक्तके सदा-सर्वदा समभावमें स्थित रहनेकी बात कही गयी है। शत्रु-मित्र, मान-अपमान, शीत-उष्ण, सुख-दुःख और निन्दा-स्तुति—इन पाँचों द्वन्द्नोंमें समता होनेसे ही साधक पूर्णतः समभावमें स्थित कहा जा सकता है।]

प्रकरण-सम्बन्धी विशेष बात

भगवान्ने पहले प्रकरणके अन्तर्गत तेरहवें-चौदहवें श्लोकोंमें सिद्ध भक्तोंके लक्षणोंका वर्णन करके अन्तमें 'यो मद्भक्तः स मे प्रियः' कहा, दूसरे प्रकरणके अन्तर्गत पन्द्रहवें श्लोकके अन्तमें 'यः स च मे प्रियः' कहा, तीसरे प्रकरणके अन्तर्गत सोलहवें श्लोकके अन्तमें 'यो मद्भक्तः स मे प्रियः' कहा, चौथे प्रकरणके अन्तर्गत सत्रहवें श्लोकके अन्तमें 'भक्तिमान् यः स मे प्रियः' कहा और अन्तिम पाँचवें प्रकरणके अन्तर्गत अठारहवें-उन्नीसवें श्लोकोंके अन्तमें 'भक्तिमान् मे प्रियो नरः' कहा। इस प्रकार भगवान्ने पाँच बार अलग-अलग 'मे प्रियः' पद देकर सिद्ध भक्तोंके लक्षणोंको पाँच भागोंमें विभक्त किया है। इसलिये सात श्लोकोंमें बताये गये सिद्ध भक्तोंके लक्षणोंको एक ही प्रकरणके अन्तर्गत नहीं समझना चाहिये। इसका मुख्य कारण यह है कि यदि यह एक ही प्रकरण होता, तो एक लक्षणको बार-बार न कहकर एक ही बार कहा जाता, और 'मे प्रियः' पद भी एक ही बार कहे जाते।